पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – पंचदश मयूख

।।पंचदश मयूख।।

शल्यपर्व

वैशंपायन उवाच
दोहा
संजय और युयुत्सु दोउ, आये नृप कौं लैन।
त्रियन युक्त कुरुखेत हित, बड़ी बधाई दैन।।१।।
वैशंपायन कहने लगे कि हे जन्मेजय! युद्ध के सम्पूर्ण होने पर संजय और युयुत्सु ये दोनों, गांधारी आदि स्त्रियों सहित, राजा धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र ले जाने को तथा बधाई देने को हस्तिनापुर में आए।

संजय उवाच
कवित्त
भीम कौं दयो हो विष ता दिन बयो हो बीज,
लाखागृह भये ताको अंकुर लखायो है।
द्यूतक्रीड़ा काल बिसतार पाय बड़ो भयो,
द्रौपदी हरन भये मंजरी तैं छायो है।
मच्छ गाय घेरी जबै पुष्प फल भार भयो,
तैंने ही कुमंत्र जल सींचिकै बढायो है।
बिदुर के वचन कुठार तैं न कट्यो वृक्ष,
वाको फल पाको भूप तेरी भेंट आयो है।।२।।
संजय कहने लगा कि हे राजा धृतराष्ट्र! सर्व प्रथम जिस दिन भीमसेन को जहर दिया गया उसी दिन अनीतिरूपी वृक्ष का बीज बोया गया और लाक्षागृह का षड्‌यंत्र रचा, तब उस बीज को अंकुर आया। जुए के खेल के समय, वह अंकुर विकसित हो वृक्ष के रूप में बड़ा हुआ और द्रौपदी का चीरहरण हुआ उस दिन उस वृक्ष पर मंजरियां आई। विराट नगर में जा कर जिस दिन गायों को घेरा गया उस दिन वह वृक्ष फूल-फलों से लकदक हो गया। हे राजा! आप ने ही अपने कुविचार रूपी जल से सींच कर इस वृक्ष को सघन बनाया है। जो विदुर के सत्य वचनों रूपी कुठार से नहीं कट पाया, उसी अनीति के वृक्ष पर जो सर्वनाश नामक फल पका, वही आज आपके नजराने हेतु आया है।

दोहा
यों सुनि नृप मूर्छित भयो, खाई हृदय दरार।
हाय हाय रनिवास सब, कहि करि उठी पुकार।।३।।
संजय के इस तरह के वचन सुन राजा धृतराष्ट्र का जैसे कलेजा फट गया हो, वे इसे सुन कर मूर्च्छित हो गए, और राजा का यह हाल देख, पूरे रनिवास में हाहाकार मच गया।

मूर्छा जागी नृपति की, ढरत अंसु दोउ नेत्र।
सीघ्र गमन रथ चढि सकल, चले तहां कुरुक्षेत्र।।४।।
फिर जब राजा की मूर्च्छा टूटी तो उनकी आखों से अश्रुधार बहने लगी। बाद में सभी रथ में सवार हो कर कुरुक्षेत्र की ओर रवाना हुए।

संजय अरु धृतराष्ट्र भये, एक हि रथ आरोह।
पूछत पथ बिच जुद्ध की, बात नृपति जुत मोह।।५।।
इस यात्रा के लिए संजय और धृतराष्ट्र एक ही रथ पर आरूढ़ हुए। बाद में राजा ने मोहवश हो कर रास्ते में युद्ध की बात पूछी।

छंद पद्धरी
ज्यों भई कथा जुध विषम भाय, सब कहत यथा संजय सुनाय।
मद्रेश भयो सेनप महीप, सब व्यूह जुक्त तव सुत समीप।।६।।
तब जिन विषम परिस्थितियों में युद्ध आगे बढ़ा उसकी पूरी कथा संजय सुनाते हुए कहने लगा कि हे राजा! महेश (शल्यराज) सेनापति बना और पूरी सेना सहित तुम्हारा पुत्र उसके साथ रहा।

फिर होन लगो संग्राम भूप, अरि रहे शूर जित तित अनूप।
सूशर्मा वध भो नकुल हाथ, पुनि हती सैन्य सब ताहि पाथ।।७।।
फिर हे राजा! दोनों सेनाओं में संग्राम होने लगा। रणभूमि में ठौर-ठौर अनुपम शूरवीर एक से एक भिड़ने लगे। इसी बीच नकुल के हाथ से सुशर्मा का वध हुआ और उसकी पूरी सेना का अर्जुन ने नाश कर दिया।

द्वादश सुत तेरे शल समीप, मारे सु भीम रन बिच महीप।
सहदेव हत्यो तव सालभद्र, क्षय बीज प्रवर्तक शकुनी क्षुद्र।।८।।
हे राजा! तुम्हारे बारहपुत्र जो शल्य के पास लड़ रहे थे, उन्हें रणभूमि में भीमसेन ने मार डाला और तुम्हारे वंश के नाश का प्रवर्तक जो तुम्हारा नीच साला शकुनि था, उसे सहदेव ने मार गिराया।

मोहि पकरि लियो सात्यकि सहास, करि कृपा छुडायो वेदव्यास।
युधिष्ठिर शक्ति लगि हृदय बीच, महेश गिर्यो बसि दुसह मीच।।९।।
कर पद पसारि अध बदन होय, कामी त्रिय लपटे जथा कोय।
फिर मुझे भी परिहास में सात्यकि ने पकड़ लिया था, तो वेदव्यास ने कृपा कर छुड़ाया। इसके बाद युधिष्ठिर की छोड़ी हुई शक्ति मद्रेश (शल्यराज) के हृदयस्थल में लगी तब दुःसह मृत्यु के वशिभूत हो वह रणभूमि में इस तरह गिरा मानो कोई कामी पुरुष हाथ-पाँव पसारे, ओंधे मुँह स्त्री से लिपटा पड़ा हो।

दोहा
नर तैं अष्टादश सहस, धर्म सैन बचि ओर।
कृतवर्मा द्रौणेय कृप, तीन महारथि तोर।।१०।।
इस समय अर्जुन जहाँ है, वहाँ धर्मराज की अठारह हजार शेष रही सेना है और तुम्हारी सेना में अब कृतवर्मा, अश्वत्थामा और कृपाचार्य ये बस तीन महारथी शेष हैं।

शल्य मरे तैं तोर सुत, निद्रा तैं अकुलाय।
जलमंथन के मंत्र तैं, जल बिच सोयो जाय।।११।।
फिर तुम्हारा पुत्र दुर्योधन, शल्य राज के मरने के बाद, अपनी तंद्रा से अकुला कर जल-स्तंभन मंत्र की सहायता से जल के भीतर जा कर सो रहा।

भीमसेन के बधिक जे, गये शिकार हि लैन।
तजे मृतक मृग कुण्ड पै, दई बधाई ऐन।।१२।।
उस समय भीमसेन के भेजे हुए शिकारी उधर शिकार की खोज में गए हुए थे, वे पानी के कुंड पर आए तब उन्होंने दुर्योधन को पानी में सोते हुए देखा तो वे अपने मारे हुए मृगादि वहीं छोड़ कर पांडवों के पास आए और उन्हें यह बधाई दी।

सो सुनि सैन्य तैयार ह्वै, गई जहाँ कुरुभूप।
धर्मराज कटु वचन कहि, छेड्यो काल स्वरूप।।१३।।
यह सुनते ही पाण्डव सेना तैयार हो कर जहाँ दुर्योधन था वहाँ आई। वहाँ धर्मराज ने उस सर्प रूप दुर्योधन को खरी-खोटी सुना कर उकसाया।

धिक दुर्योधन तोर मत, अपजश को डर नाहिं।
करि सारे कुल को कदन, मिलि सोयो जल माहिं।।१४।।
धर्मराज ने कहा कि हे दुर्योधन! तेरी बुद्धि को धिक्कार है कि तुझे अपयश का भय नहीं, पूरे वंश को निकंदन करवा कर, अब पानी में घुस कर सो रहा है।

श्रीकृष्णोवाच
मैं कैसे रन छोरिहौं, कहतो तूँ कुरुराज।
भजि जल बिच भय भीम के, आय छिप्यो क्यों आज।।१५।।
इतने में श्रीकृष्ण बोले कि हे दुर्योधन! तू तो यह कहता था ना, कि मैं रण कैसे छोड़ूं? और अब भीमसेन के भय से रण से भाग कर यहाँ आ, पानी में क्यों छिपा बैठा है?

दुर्योधन उवाच
सोरठा (डिंगल)
नित तुम कपट निवास, दुर्योधन निर्कपट दिल।
सब कहसी साबास, अपजश रहसी आपरौ।।१६।।
यह सुन कर दुर्योधन ने कहा कि हे कृष्ण! तुम तो हमेशा से कपट के स्थाई निवास रूप हो, और मैं दिल से निष्कपटी हूं। इसलिए सुनने वाले मुझे धन्य कहेंगे और तुम्हारा सदा अपयश करेंगे।

भीम उवाच
कवित्त
कुल को विनास करि जल को निवास कीनो,
भीम को न त्रास और लाज नेक आई ना।
भीषम से द्रोन से करन से मराय बैठो,
दुशासन दशा पेखि तोहू ग्लानि पाई ना।
भीम कहै कहतो तूं, अकेलो मिटाय दैहौं,
पौरुषता कहाँ गई कब हू दिखाई ना।
करी लपराई तैं तो सबै बिसराई, मैं तो,
द्रौपदी पिराई ताकौं अब लौं सिराई ना।।१७।।
इतने में भीमसेन बोला कि हे दुर्योधन! तुमने अपने वंश का विनाश कर अब यह पानी में निवास क्यों किया? क्या तुझे भीमसेन का डर नहीं लगता? तुझे लाज आनी चाहिए। भीष्म जैसे को, द्रोण और कर्ण जैसों को मरवा बैठा और दुःशासन की हालत देख कर भी तुझे शोक न हुआ। फिर तू तो कहता था ना, कि मैं अकेला ही पांडवों का नाश कर डालूंगा, तेरा वह पराक्रम अब कहाँ गया? जिसे आज तक तूने कहीं पर कभी दिखलाया नहीं। अब तक तूने जितनी बकवास की, मैंने उसे बिसार दी पर एक द्रौपदी की वह आर्त्त पुकार मुझसे आज तक बिसराई न जा सकी है। बस। उसे मैंने अवश्य आज तक शान्त नहीं किया।

दोहा
कोपी द्रुपद कुमारि तैं, उरुन व्हेहौं मैं आज।
लै जिय तोसे दुष्ट को, दै अग्रज कौं राज।।१८।।
इसलिए आज मैं तेरे जैसे दुष्ट के प्राण ले कर, राजा युधिष्ठिर को उनका राज्य लौटा कर, उस कुपित द्रौपदी के ऋण से उरिन होऊंगा।

दुर्योधन उवाच
कवित्त
द्रोण कर्ण शोक ही तैं मोकौं निंद लागी नाहिं,
तीन द्यौस भये होनहार यों बिचारेगो।
एक याम सोऊँ तो मैं श्रम तैं निवर्त होऊँ,
सुयोधन तातैं नीरसय्या चित्त धारेगो।
कुसमै जगायो सदा ऐसे ई अधर्मकारी,
अकेलो है तोउ नैंक तुमतैं न हारेगो।
चूक जैहै कैसे भए एकठे से भांडन पै,
टूक भयो लठ्ठ तोउ भूक करि डारेगो।।१९।।
दुर्योधन बोला कि हे भीमसेन! द्रोणाचार्य और कर्ण के मरने के शोक में मुझे पिछले तीन दिनों से नींद नहीं आई। अब जो होना होगा, होगा यह सोच कर, अपने दिल को समझा कर, बस एक प्रहर तक सो लूं, जिससे मैं अपनी थकान से मुक्ति पाऊं। यही सोच कर जलशय्या पर सो रहने का मानस बनाया था पर तुमने मुझे आ जगाया। वैसे भी तुम लोग तो अधर्म ही करने वाले हो। माना कि, मैं अकेला हूं पर तुमसे नहीं हारूंगा। तुम इकट्टे हुए माटी के भांडों के लिए, मैं टूटा हुआ डंडा हूं तब भी काफी हूं। तुम लोग भूल कर रहे हो, मैरे अपने एक ही वार में सारे भांडों का कचूमर निकल जाएगा।

युधिष्ठिर उवाच
दोहा
कहो युधिष्ठिर नदपति सुनि, अजहुँ अर्ध भू लेहु।
अंध मात पितु दुखित कौं, संतति को सुख देहु।।२०।।
तब धर्मराज बोले कि हे दुर्योधन! सुन, अच्छा है अभी भी पृथ्वी का आधा भाग ले कर तू अपने दुःखी और अंधे माता-पिता को पुत्र सुख दे।

दुर्योधन उवाच
कवित्त
गदा धारे कंध पै बकारत मदांध नृप,
भीम आदि सुनिए बिचारि कहौं पन मैं।
कै तो मोहि मारिकैं अजातशत्रु राज करो,
कै संघारि तुमकौं निवास करौं वन में।
मेरी तो अखंड आज्ञा रही छत्रधारिन पै,
दीन नर नारीन पै भावै नाहिँ मन मैं।
त्यों ही जुध्द जूटि पर्यो फूटि पर्यो जंघ देश,
नाहीं हठ छूटि पर्यो तूटि पर्यो रन मैं।।२१।।
यह सुन कर गर्वोन्मत्त दुर्योधन अपने कंधे पर गदा धारण कर भीमसेन आदि को ललकार कर कहने लगा, मैं अपने हठ को विचार कर कहता हूं उसे सुनो! या तो तुम लोग मुझे मार कर अजातशत्रु हो कर राज्य करो अथवा मैं तुम सभी का संहार कर वन में जा बसूं। मैंने तो अब तक छत्रधारी राजाओं पर ही अपनी आज्ञा चलाई है, इससे अब तुम्हारे जैसे शेष रहे दयनीय नर-नारियों पर राज्य करना मुझे पसन्द नहीं। इतना कह कर दुर्योधन भिड़ पड़ा जिसमें उसकी जांघ टूट गई और वह रण में टूट गया पर स्वयं के हठ से नहीं छूटा।

दोहा
भीम सिखाये कृष्ण के, वामहि जंघ प्रहार।
कर्यो गदा को ढह पर्यो, कुरु कुल भूषन भार।।२२।।
भीमसेन ने श्री कृष्ण द्वारा संकेत में बताए अनुरूप दुर्योधन की बांई जंघा पर प्रहार किया जिससे वह जिस पर कुरुवंश का पूरा भार था, वही वंश भूषण दुर्योधन ढह पड़ा।

कवित्त
काली कैसो चक्र कै फनाली कैसो फूतकार,
लोचन कपाली के कपाल कैसो है उद्योति।
आयुध सुरेश कैसो मानहुँ प्रलै को भानु,
कोप को उफान किधौं मीच हू की मानों सोति।
सुयोधन दुशासन दुर्मुख दुसह गन,
देख दो गदा रूपी ये दूनि हू तैं दूनि होति।
जेठ ज्वाल झाल है कि जीह जमराज की सी,
जहर हलाहल कै भीम की गदा की जोति।।२३।।
वह भीमसेन की गदा, महाकाली के कालचक्र जैसी तीखी है। सर्प की फुफकार की तरह मारक और महादेव के तीसरे नेत्र जैसी तेजस्वी है। फिर वह इन्द्र के वज्र सी, प्रलयकाल के सूर्य जैसी और क्रोध के उफान में मानों मृत्यु की सौत है। दुर्योधन, दुःशासन और दुर्मुख जैसे शत्रुओं को तो हमेशा एक नहीं दो दिखती थी और बराबर दुगुनी होती जाती थी। वह जेठ मास की लू की आतप्त ज्वाला जैसी है कि यमराज की जीभ जैसी? वह भीमसेन की गदा तो जहर में भी हलाहल जैसी है।

दोहा
ऐसी गदा प्रहार तैं, भयो तोर सुत नाश।
भीम न तो सुत तैं मर्यो, रक्षक कृष्ण प्रकाश।।२४।।
संजय बताने लगा कि हे राजा धृतराष्ट्र! ऐसी गदा के प्रहार से तुम्हारे पुत्र का नाश हुआ परन्तु तुम्हारे पुत्र से (की गदा से) भीमसेन नहीं मरा क्योंकि श्री कृष्ण साफ-साफ उसकी रक्षा करने वाले उसके साथ थे।

कवित्त
चामीकर कोश शस्त्र वस्त्रन के कोश और,
रत्नन के कोश एक एक तैं नवीने हैं।
देश देश संभव तुरंग रंग रंग के जे,
गति है विहंग संग प्रेरक अधीने हैं।
और हू अनेक राजवैभव सराष्ट्र जेते,
काज धृतराष्ट्र कर्न शत्रुन के छीने हैं।
महाबली अर्जुन को अग्रज विपणकार,
गदा को प्रहार एक दै सँभारि लीने हैं।।२५।।
हे धृतराष्ट्र! सारा स्वर्णभण्डार, वस्त्रभंडार, शस्त्रागार और एक से एक नायाब रत्नों का भण्डार, देश-देश में उत्पन्न रंग-रंग के घोड़े कि जो सारथी के वश में रह कर पक्षियों के समान गति वाले थे। इनके साथ कई देश, जो दुर्योधन के लिए कर्ण शत्रुओं से जीत कर लाया था उनका राज्य वैभव, सभी कुछ, महाबलवान अर्जुन के बड़े भाई भीमसेन रूपी व्यापारी ने दुर्योधन को गदा का एक घाव दे कर बदले में ले लिया।

निमुची कौं इन्द्र जैसे त्रिपुर कौं रुद्र जैसे,
मधु कौं उपेन्द्र नीके मूल ही मिटायकै।
नाग कौं खगेन्द्र जैसे गज कौं मृगेन्द्र जैसे,
रामचन्द्र कुंभ जुत रावन पचायकै।
मेघ कौं फनीन्द्र महाकाली दईतेन्द्र कौं ज्यों,
द्वंद कौं कपिंद्र ज्योंहि पौरस दबायकै।
कौरवेन्द्र धायकै उठायकै महान गदा,
पृथानंद ढाढो यों नरेन्द्र बिजै पायकै।।२६।।
जिस प्रकार नमुचि को इन्द्र ने, त्रिपुरासुर को शंकर ने, मधु दानव को उपेन्द्र भगवान ने सभी प्रकार से समूल मिटा दिया था। सर्प को जैसे गरुड़ खा जाए, हाथी को जैसे सिंह मार डाले। जैसे रामचन्द्र, कुंभकर्ण सहित रावण का नाश कर डाले, मेघनाद को जैसे लक्ष्मण मिटा डाले। जिस प्रकार महाकाली ने दैत्येन्द्र महिषासुर को और दुंदुभि दैत्य को जैसे कपिन्द्र बालि ने अपने पौरुष से कुचल डाला। उसी प्रकार भीमसेन ने स्वयं दुर्योधन को मार डाला और अब राजाओं पर विजय पा कर, अपनी भारी गदा को कंधे पर रखे हुए वही भीमसेन रणभूमि में गर्वोन्मत्त खड़ा है।

कवि कथन
अरनी द्रुपदजाई कोप भीम को सु आगि,
जजत जुधिष्ठिर सँभारि स्वांग लीने हैं।
होता है किरीट धनु सरवो ज्या शब्द स्वाहा,
साकल्य है वीर आज्य बीररस भीने हैं।
सुयोधन यज्ञपशु कुरुक्षेत्र अग्निकुण्ड,
पुरणाहुती मैं गदा ही तैं अंग छीने हैं।
वारि पृथा कूख की सु ऐसे जग्यकारी पुत्र,
के ते भुवचारी सुरलोकचारी कीने हैं।।२७।।
कवि कहता है कि इस यज्ञ में अग्नि उत्पन्न करने वाली अरणी की लकड़ी रूप द्रौपदी है, भीमसेन का आवेश रूपी घर्षण हैं। युधिष्ठिर रूप यजमान ने सभी साधन-सामग्री एकत्रित कर यजमान का स्वांग किया है। यज्ञ करने वाला ऋग्वेदी (अर्जुन) है। धनुष रूपी सरवा (होमने का चम्मच) है। टंकार रूपी स्वाहा है। वीर रस से भीगने रूपी याज्य (घी) है। शूरवीर रूपी साकल्य (हविष्य) है। दुर्योधन रूपी यज्ञपशु (बलि पशु) है। कुरुक्षेत्र रूपी अग्निकुंड (वेदिका) है। इस यज्ञ की पूर्णाहुति में गदा से दुर्योधन के अंग क्षीण किये है। कुंती की कोख पर न्योछावर जाऊं कि जिसने ऐसे यज्ञ करने वाले पुत्रों को जन्म दिया है। जिन्होंने कितने ही भूमिचारियों (पृथ्वी पर चलने वाले) को सुरलोकचारी (स्वर्ग में भ्रमण करने वाले) बना दिया। [इसमें समस्त विषयक सावयव रूपकालंकार है-सं.]

अग्रिध्र अभिमन्यू है, वायुतनै उदगाथा,
कपि की ध्वजा को जहाँ यूप करि राख्यो है।
धृष्टद्युम्न चतुरानन, अध्वर्यु सात्यकि है,
गाथा है शिखंडी बैर लैन अभिलाख्यो है।
आहुती बड़ी है बीच कर्न द्रोन भीष्म और,
जयद्रथ से होमे त्रयलोक जश भाख्यो है।
जज्ञरूप देह धरे होता के समीप बैठो,
सेना सोमवल्ली घोटि सुधारस चाख्यो है।।२८।।
फिर इस युद्ध रूपी यज्ञ में अभिमन्यू रूपी आग्रीध्र (यज्ञ की वरुणी का याचक) है। वायु तनय (भीमसेन) रूपी उद्‌गाता (सामवेद की ऋचाएं पढ़ने वाला) है। बानरराज के चिह्न युक्त ध्वजदंड रूपी जहाँ यूप (यज्ञ के बलि पशु को बांधने का खूंटा) बना रखा है। धृष्टद्युम्न रूपी चतुरानन (चतुर्थ ऋत्विज ब्रह्मा) है। सात्यकि रूप अध्वर्यु (यजुर्वेद का जानकार) है। शिखंडी रूपी गाथा है। पश्यंति वाणी रूप मन मंत्रोचार कि जो वैर लेने का (पूर्व में अंबा रूप भीष्म का शत्रु) अभिलाषी है। जिस यज्ञ में कर्ण, द्रोण, भीष्म के बाद जयद्रथ जैसे योद्धाओं को होमा तब तीनों लोकों ने उसका यशोचार किया। ऐसे नर (अर्जुन) रूपी होता के पास श्री कृष्ण रूपी यज्ञनारायण देह धारण कर बिराजमान हुए हैं और जिसने सेना रूपी सोमवल्ली (यज्ञ के परिणाम स्वरूप सोमरस) को पीस कर सुधारस चखा है। अर्थात् सोमरस पीने वाला अमर हो जाता है वैसे ही अर्जुन अपनी कीर्ति से अमर हो गया।

गदाभंग होयकै परे कौं धर्मराज कहै,
बातैं शत्रुताई की उठाई छानी छानी तैं।
मात पिता भीष्म द्रोण कृष्ण विदुरादिक ने,
नीके समझायो तामैं एक हू न मानी तैं।
मेरी ही अनीति आज्ञा सब पै रहैगी बनी,
कौन ऐसो मोहिकौं मिटावै ऐसी जानी तैं।
कुरु राजधानी कौं न सोचत सुयोधन मैं,
केती राजधानी हाय! कीनी धूरधानी तैं।।२९।।
भीमसेन की गदा से घायल हो कर पृथ्वी पर पड़े दुर्योधन से धर्मराज कहने लगे कि हे दुर्योधन! तुमने चुपचाप भीतर ही भीतर हम से शत्रुता करने की युक्तियां सोची। तुझे माता (गांधारी) पिता (धृतराष्ट्र) और भीष्म, द्रोणाचार्य, श्रीकृष्ण तथा विदुर आदि ने अच्छी तरह समझाया पर तुमने उनकी एक की भी बात नहीं मानी। फिर तू ने ‘मेरी ही अनीति भरी आज्ञा सभी पर चलती रहेगी और मुझे मारने वाला कौन है? ‘ ऐसा जाना। फिर हे दुर्योधन! मैं केवल कौरवों की राजधानी के क्षय होने की चिंता नहीं कर रहा, तुम ने तो हाय! कितनी सारी दूसरी राजधानियों को भी नष्टभ्रष्ट करवा दिया है। मुझे उनकी पीड़ा है।

संजयोवाच
दोहा
दुर्योधन के शिविर सब, करि आज्ञा आधीन।
उतरे रथ तैं विजय हरि, सीघ्र भयो रथ क्षीन।।३०।।
प्रथम उतार्यो पार्थ कौं, पुनि हरि उतरे आप।
भयो भस्म रथ अस्त्र तैं, भीषम द्रोण प्रताप।।३१।।
संजय कहने लगा कि हे राजा धृतराष्ट्र! फिर धर्मराज युधिष्ठिर ने अपनी आज्ञा जारी कर दुर्योधन के सारे खेमे (शिविर) को अपने अधीन कर लिया। इधर अपने शिविर को लौटने पर अर्जुन और श्रीकृष्ण ज्यों ही अपने रथ से उतरे कि तत्क्षण रथ जल कर भस्म हो गया।
श्री कृष्ण ने पहले रथ से अर्जुन को उतारा (नहीं उतारते तो अर्जुन भी जल जाता) फिर श्री कृष्ण स्वयं उतरे। उनके उतरते ही भीष्म और द्रोण के शस्त्रों के पूर्व प्रयोग से, अर्जुन का रथ जल कर खत्म हो गया।

छंद पद्धरी
गो सिविर बीच उठि धर्मराज, सुत द्रौन आय सुत तोर काज।
लखि भूप दशा चित विकल क्षिप्र, किय शत्रु हतन संकल्प बिप्र।।३२।।
कृतवर्मा मातुल जुक्त जाय, तिहु छोरे रथ निग्रोध पाय।
कछु करैं सयन जो लगैं नैन, श्रम समर मिटै तन होय चैन।।३३।।
इसके बाद धर्मराज उठ कर अपने शिविर में गए। हे महाराज धृतराष्ट्र! इसके बाद तुम्हारे पुत्र (दुर्योधन) के लिए अश्वत्थामा, रणभूमि में जहाँ दुर्योधन पड़ा हुआ था वहाँ आया और उसे इस तरह तड़पते देख तत्क्षण उसने शत्रु संहार का संकल्प लिया। कृतवर्मा और अपने मामा (कृपाचार्य) सहित उन तीनों ने वहाँ से आकर एक वृक्ष के नीचे अपने रथ छोड़े। फिर विचार किया कि थोड़ी देर सो लिया जाए। थोड़ी आँख लगे तो युद्ध की थकान कम हो और शरीर को आराम मिले।

इक आय घूक तहँ निशाचार, सब काकन को कीनो संहार।
गुरु गन्यो ताहि अरि नाश काज, मातुल प्रति बोल्यो विप्रराज।।३४।।
पितु बयर और नृप बयर दोय, सिर धरे मरत मैं भार सोय।
निद्रा न लगत आवस निसास, तुम चलहु करहुँ निशि शत्रु नाश।।३५।।
रात को उस वट वृक्ष पर एक निशाचर उल्लू ने आ कर सभी कौओं का संहार कर डाला, यह देख कर अश्वत्थामा ने अपने शत्रुओं को मारने के लिए, उस निशाचर को मन ही मन अपना गुरु मान कर स्वयं के मामा कृपाचार्य से कहा कि हे मामा! एक तो मेरे पिता का वैर है और दूसरा राजा दुर्योधन का बदला लेना है। इन दो वैरों का भार (उनके मरने पर) मैंने अपने कंधो पर ले लिया है। इस कारण मुझे नींद नहीं आती और मैं रात भर निःश्वास छोड़ता रहता हूं। अब यदि आप मेरे साथ चलें तो मैं अभी रात में ही अपने शत्रुओं का नाश कर डालूं।

कृपाचार्य उवाच
दोहा
करिबो जुक्त न विप्र कौं, हाथ शस्त्र गहि जुद्ध।
जो जुध करिबो होय तो, स्वामी ढिग अविरुद्ध।।३६।।
अपने भानजे की योजना सुन कर कृपाचार्य ने कहा कि हाथ में शस्त्र उठा कर ब्राह्मण का युद्ध करना युक्तिसंगत नहीं। इस पर भी यदि युद्ध आवश्यक हो तो स्वामी के साथ रह कर युद्ध करने में कोई बाधा नहीं।

बिनु स्वामी जो किय चहै, सावधान अरि पाय।
करहु प्रात जुध होयहैं, हम दोउ तोर सहाय।।३७।।
और यदि बिना स्वामी के भी युद्ध करने की इच्छा हो तो शत्रुओं को युद्ध में तैयार हुए देख कर सवेरे युद्ध करना। उस समय हम दोनों तुम्हारी मदद को रहेंगे।

लूं द्विज नृप रन कटि पर्यो, निद्रागत अरिवृंद।
तोहि अधर्म ते ना घटे, करिबो शत्रु निकंद।।३८।।
फिर तू शत्रुओं को मारने की बात करता है तो विचार कर! एक तो तू ब्राह्मण है, दूसरे राजा दुर्योधन रणभूमि में कटे हुए पड़े हैं (साथ नहीं) और तीसरा शत्रु समूह अभी निद्रा वश है। इसलिए अभी रात में शत्रुओं का वध करने पर यह पाप तुझे लगेगा। ऐसा अनर्थ मत कर।

अश्वत्थामा उवाच
भीष्म दीन अरु करन नृप, छल करि मारे चार।
ते अधर्म तैं ना डरे, बर्जत कौन प्रकार।।३९।।
यह सुन कर अश्वत्थामा कहने लगा कि हे मामा! पाँडवों ने भीष्म पितामह को और द्रोणाचार्य को, कर्ण को और दुर्योधन को, इन चारों को छल-कपट कर मारा है। यदि वे अधर्म (पाप) से नहीं डरे तब फिर आप मुझे अधर्म बता कर ना क्यों दे रहे हो?

संजय उवाच
पांच पांडुसुत सात्यकि, कृष्ण गये लै दूर।
देवी पूजा व्याज करि, जानि द्रोनसुत क्रूर।।४०।।
संजय बताने लगा कि हे धृतराष्ट्र! अश्वत्थामा अत्यन्त क्रूर है यह जान कर श्री कृष्ण, देवी पूजन का बहाना बना कर सात्यकि सहित पाँचों पाण्डवों को शिविर से बाहर दूर ले गए।

शत्रु हतन द्रोणी चल्यो, निशि निशीथ सुनि भूप।
तिहि प्रतिरोधन हरि धर्यो, विश्व विराट स्वरूप।।४१।।
हे राजा! फिर अर्द्धरात्रि को अश्वत्थामा शत्रुओं को मारने के लिए चला, उसे रोकने के लिए श्रीकृष्ण ने विराट स्वरूप धारण किया।

धरे रूप बैराट हरि, खड़े सुडेरन बीच।
तिन पै करै प्रहार सो, डरै कहा लखि मीच।।४२।।
विराट रूप धारण कर श्री कृष्ण पांडवों के शिविर के बीच खड़े थे, वहाँ उनके ऊपर अश्वत्थामा शस्त्र प्रहार करने लगा पर जो स्वयं मृत्यु भी हों, वे मृत्यु से क्या डरें?

द्रौनी के आयुध संकल, भये विराट तन लीन।
कर्यो होम निज मांस को, रुद्र निमित ह्वै दीन।।४३।।
शस्त्र प्रहार करते करते अश्वत्थामा के सारे आयुध श्री कृष्ण के विराट शरीर में लीन हुए देख कर, अश्वत्थामा ने दीन हो कर रुद्र के निमित्त स्वयं के मांस का हवन किया।

दियो खङ्ग हर मिटि गयो, वहै विराट स्वरूप।
हत्यो जाय पितु को हतक, पशू वद्ध ज्यों भूप।।४४।।
इस तपस्या से महादेव ने प्रसन्न हो कर अश्वत्थामा को एक तलवार दी। फिर हे राजा! उसने पांडवों के शिविर में जा कर अपने पिता को मारने वाले (धृष्टद्युम्न) का पशु-वध की तरह गला काट दिया।

पांच द्रौपदी के सुवन, नाना आयुध धारि।
भिरे सु मारे खङ्ग तैं, विप्र बकारि बकारि।।४५।।
फिर द्रौपदी के पाँच पुत्र जो विविध प्रकार के शस्त्रों से सज्जित थे, वे सभी मिल कर अश्वत्थामा से लड़ने लगे। उन पाँचों को उसने ललकार-ललकार कर अपनी तलवार से मार डाला।

द्रोपद पुत्र दुहित्र सब, मारे सैन्य सहेत।
बचे सु कृतवर्मा हते, अरु मातुल करि चेत।।४६।।
इसके बाद द्रुपदराज के सारे पुत्रों और दोहित्रों को उनकी सेना सहित अश्वत्थामा ने मार डाला और बाकी रहे सभी को सावधान कर-कर कृपाचार्य तथा कृतवर्मा ने मारा।

कवित्त
मातुल शिखावन कौं द्रौनी नाहिँ कीनी कान,
कीनो सत्य वाक्य पूर्व पिता के उचारे कौं।
उर्णपनो पिता को रु भीष्म को सुयोधन को,
कीनो सो दिखानो नीके वृद्ध और बारे कौं।
जाकौं देखि किरीटी हू विकल भयो है बीर,
ताकौं यो प्रहारै है विराट रूप धारे कौं।
जम की जमात जैसी जिमाई जटीश सैन,
द्रौन को तीसरा कीनो मारि हथ मारे कौं।।४७।।
अपने मामा कृपाचार्य की नसीहत को द्रोणी (अश्वत्थामा) ने नहीं माना और अपने पिता से कहे पूर्व वचन उसने अब स्वयं सत्य किये। जिस प्रकार वह अपने पिता के, भीष्म पितामह के और दुर्योधन के ऋण से उरिन हुआ, उसे बालक वृद्ध सभी ने देखा। फिर जिसे देख कर पूर्व में वीर अर्जुन भी व्याकुल हो गया था उस विराट रूप धारी श्रीकृष्ण पर भी अश्वत्थामा ने निडर हो कर वार पर वार किये। और अपने शत्रुओं (धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि) को मार कर यमराज की जमात जैसी महादेव की सेना को भर पेट खिलाकर, अपने पिता (द्रोणाचार्य) का तीसरा (मृतक के निधन पर तीसरे दिन होने वाली क्रिया जिसमें भोजनादि भी कराया जाता है) किया। अर्थात् अपने शत्रुओं की मृत देह से महादेव के गणों को तृप्त किया।

कृपाचार्य उवाच
शारद्वत कहै भोजवंश अवतंश देखि,
पिता पिता शत्रु के मिटानहार छेटा कौं।
द्रोनी के प्रहारे तैं न सोमक सुनैंगे बचे,
लावा ज्यों न बच्यो सुन्यो बाज के झपेटा को।
निशा बीच जाको तेज प्रलै भान के समान,
उबाहै विकोश खङ्ग हाटक लपेटा को।
मारत चपेटा मेटा चहै वंश द्रौपद को,
खेटा करै घेटा ठाढो बेटा बमनेटा को।।४८।।
शारद्वत (कृपाचार्य) कहने लगे कि हे भोज वंश के मुकुट रूप (कृतवर्मा)! देख, अपने पिता और पितामह के शत्रुओं को समूल नष्ट करने वाले अश्वत्थामा के प्रहार से ये सोमक (द्रुपद वंशी) कब तक बचेंगे? जैसे बाज के झपट्टे से लावा (छोटा तीतर जैसा पक्षी) बचा हुआ नहीं सुना, उसी तरह सोमकों का बचना कठिन है। जिसका पराक्रम रात्रि समय में प्रलयकाल के सूर्य जैसा है वह अश्वत्थामा अपनी सोने के म्यांन से अपनी तलवार बाहर खींच कर, शत्रुदल पर प्रहार कर उन्हें काटने लगा। बेतहाशा वार करने वाला, वह द्रुपद के वंश को मिटा डालने की इच्छा रखने वाला, अपनी तलवार के एक झटके से शत्रु रूप भेड़ को काटने वाला ब्राह्मण का बेटा रणभूमि में खड़ा है, उसे निहारो।

संजय उवाच
मातुल की कान कौं न मानि मन मान्यो कियो,
कर उर नेत्र बीच बीर रस पायो है।
ताही छिन जोति अश्व आयुध सँभारि बैठो,
सांभ कौं रिझाय सांभ रूप दरसायो है।
वाही निशा बीच नाश कीनो चतुरंगिनी को,
धन्य कृपी कूख जाके बीच वीर जायो है।
द्रोन अपकार कै बिखेर्यो कुल द्रौपद को,
द्रोनी उपकार कै विजोग कौं मिटायो है।।४९।।
संजय कहने लगा कि हे राजा! जिसने मामा की नसीहत को अनसुना कर अपने मन का सोचा किया। उस वीर अश्वत्थामा के हाथों में, हृदय में और आंखों में वीर रस भरा है। वह तत्क्षण अपने घोड़े को रथ में जोत, अपने शस्त्रों को संभाले रथारूढ़ हुआ। जो रुद्र को रिझा कर स्वयं रौद्ररूप दिखाई दे रहा है। इसी अठारहवें दिन के बाद, रात्रि समय में जिसने शत्रुओं की चतुरंगिनी सेना का नाश किया। वह वीर माता कृपी धन्य है, जिसकी कोख से अश्वत्थामा जैसा वीर उत्पन्न हुआ। द्रोणाचार्य के अपकारी (बुरा करनेवाले, कृतघ्न) द्रुपद राज के वंश को बिखेरने का उपकार कर उस अश्वत्थामा ने, पिता और पिता के शत्रुओं का वियोग मिटाया। अर्थात् द्रुपद वंश को भी द्रोणाचार्य के पीछे का पीछे यमलोक को रवाना किया।

अनुष्टुप छंद (श्र्लोक)
पांचालास्तु गता: स्वर्गे, द्रोणेन बाहुशालिना।
अवशेषा हते राज्ञा, द्रोणीना योजिता पुन:।।५०।।
संजय बताने लगा कि बाहुबली द्रोणाचार्य ने अपने बाहुबल से पाँचालों को स्वर्ग भेजा और हे राजा! उसके पीछे जो शेष बच गये थे उन्हें अश्वत्थामा ने मार कर भेज दिया।

कवित्त
रुक्यो मन पाप मैं न द्रौपदी विलाप मैं न,
मातुल की सीख सुनि घोर नर्क ताप मैं।
शत्रु मारि सात शेष सुनाये सुयोधन कौं,
दिखायो सवायो फेर बाप मैं रु आप मैं।
ऐसी रीस साप मैं न प्रलै के प्रताप मैं न,
जैसी रीस द्रोनी की वा शत्रु के मिलाप मैं।
आधी रात सोये थे मिटाय दिये पिछली मैं,
आयो चुपचाप मैं त्यों गयो चुपचाप मैं।।५१।।
जिसका मन पाप (करने) में, न द्रौपदी के विलाप में और न मामा के उपदेश में कि घोर नरक का ताप मिलेगा सुन कर भी न रुका। जिसने सात शेष रहे शत्रुओं को मार कर रणभूमि में घायल पड़े दुर्योधन को बता दिया। और यह भी बता दिया कि मैरा स्वयं का पराक्रम अपने पिता के पराक्रम से सवाया है (बढ कर है)। इस अश्वत्थामा को अपने शत्रु के मिलने पर इतना क्रोध आता था जितना न तो सर्प को और न प्रलयकाल के उताप को आता है। जो शत्रु आधी रात तक नींद में सोये रहे, उन्हें रात के पिछले प्रहर में उसने मार कर, न जागने वाली नींद में सुला दिया। और शिविर में वह अश्वत्थामा जितना चुपचाप आया था उतना ही चुपचाप वह अपने शत्रुओं को मार कर (अपना काम कर) वापस चला गया। (जो विरोध रहित प्रवेश कर बिना किसी शत्रु के अवरोध के चला गया। )

दोहा
बाल वृद्ध कहा त्रियन बिन, सब ही डारे मारि।
रह्यौ न अष्टादश सहस, बिच कोउ उठै पुकारि।।५२।।
केवल स्त्रियों को छोड़ कर, क्या वृद्ध और क्या बालक, उसने अपने सारे शत्रुओं को मार डाला और पाण्डवों की अठारह हजार शेष रही सेना, में से कोई पुकार करे जैसा अथवा उठ खड़ा हो, वैसा एक न छोड़ा।

सवैया
संजय बोलत भूप अचक्षु तैं होय सु तो सब दैव अधीनो।
कौनको कौनको शोच करै सब क्षत्रिन को गन युद्ध मैं छीनो।
द्रौन से द्रौनि से होत दशेक तौ होत न तौ सुत को बल हीनो।
बौयकै लूनिगो खेत पिता त्यों हि पूत निशा मैं सला भल कीनो।।५३।।
धृतराष्ट्र से संजय कहने लगा कि हे राजा! जो होने का है, वह तो देवों के अधीन है, वह हो कर रहता है। अब आप किस किस का शोक करेंगे? युद्ध में तो पूरे क्षत्रिय समूह का नाश हुआ है। हाँ, यदि द्रोणाचार्य तथा अश्वत्थामा जैसे दस योद्धा भी होते तो तुम्हारे पुत्र का बल समाप्त नहीं हो सकता था। द्रोणाचार्य जिस रणखेत में युद्ध के बीज बो कर उसकी फसल काट ले गया, उसी खेत की बची- खुची (खेत में फसल काटने के बाद बिखरा हुए शेष अनाज) फसल, रात्रि में अश्वत्थामा चुग-बीन कर ले गया। (अर्थात् जो योद्धा द्रोणाचार्य के हाथों मरने से बच गए उन्हें अश्वत्थामा मार गया। )

गांधारी उवाच
कवित्त
पितु के मरे को शोक नाहिंन अलोक शोक,
स्वामी हू मरे तें स्वामीधर्म इक तारी पै।
भारद्वाज वंश अवतंश वंश द्रौपद को,
छेदिकै चढाई ध्वजा जुद्ध कथा सारी पै।
जनो हो तो ऐसो जनो जोबन वृथा न खोवो,
तेरो पुत्र देखिकै पुकारि कहौं नारी पै।
गांधरी कहत कृपी मेरी शत पुत्रधारी,
वारि वारि डारौं कूख एक पुत्रवारी पै।।५४।।
जिसे अपने वीरगति प्राप्त पिता का शोक नहीं और अपकीर्ति का भी अफसोस नहीं परन्तु स्वयं के स्वामी (दुर्योधन) के मरण पर जिसका मन शोक में इकतार हो गया। वह भारद्वाज वंश का मुकुट (अश्वत्थामा) अपने शत्रु द्रुपदराज के वंश को विनष्ट कर, युद्ध की पूरी कथा में पराक्रम प्रदर्शन का ध्वज चढ़ाने (ध्वज चढाने का अर्थ है सब से श्रेष्ठ होना) वाला है। गांधारी कहने लगी कि हे कृपी! मैं तुम्हारे पुत्र का पराक्रम देख कर (क्षत्रियों की) स्त्रियों को पुकार-पुकार कर कहती हूं कि हे स्त्रियों! पुत्र जनो तो ऐसा ही जनना, नहीं तो योवन को बेकार खोने में कोई अर्थ नहीं। हे कृपी! तुम्हारी एक पुत्र वाली कोख पर मैं अपनी सौ पुत्रों वाली कोख को बार-बार न्योछावर करती हूं।

सजय उवाच
दोहा
द्रौणी मुख रिपु वध सुनी, गये सुयोधन प्रान।
विप्र शस्त्र परित्याग करि, गो व्यासाश्रम थान।।५५।।
संजय बताने लगा कि हे राजा धृतराष्ट्र! अश्वत्थामा के मुँह से शत्रुओं के वध का समाचार सुन कर दुर्योधन के अटके हुए प्राण छूट गए और अश्वत्थामा अपने शस्त्रों का त्याग कर व्यास के आश्रम में चला गया।

हरि लै आये पांडवन, शिविरन समय प्रभात।
द्रुपदा कहत विलाप जुत, हाय पुत्र हा भ्रात।।५६।।
फिर प्रातःकाल में श्री कृष्ण सारे पाण्डवों को वापस शिविर में लेकर आए, वहाँ द्रौपदी, ‘हाय बेटे! हाय भ्राता!’ कह कर विलाप कर रही थी।

सब निशि बीती बात सुनि, विजय प्रतिज्ञा कीन।
ला दैहौं शिर शत्रु को, मति रोवे अति दीन।।५७।।
अर्जुन ने पूरी रात बात सुनने में बिताई, कैसे क्या हुआ? और सवेरा होते होते द्रौपदी से कहा कि हे द्रौपदी! इस प्रकार अत्यन्त दीन हो कर आर्त्त विलाप मत कर, मैं तुझे तुम्हारे शत्रु का कटा हुआ सिर ला कर दूंगा।

वाके शिर धरि पाँव तुम, करिहू सूतक स्नान।
फिर बंधुन कौं, सुतन कौं, देहु जलांजलि दान।।५८।।
उस कटे हुए शत्रु मुंड पर पाँव रख कर ही तुम सूतक का स्नान करना और उसके बाद अपने पुत्रों और भाइयों को जलांजली देना।

पद्धरी छंद
यों कहि रु कियो रथजुक्त गौन, प्रति व्यासाश्रम नर गति सु पौन।
श्यंदन लखि द्रोनी विगत शस्त्र, उत पेर्यो नर पर ब्रह्म अस्त्र।।५९।।
लखि अस्त्र वंश पांडव निकंद, गर्भ की करी रक्षा गुविंद।
प्रतिरोध करन सोई अस्त्र पाथ, प्रेर्यो सु भिरे दोउ एक साथ।।६०।।
द्रौपदी को इतना कह कर अर्जुन अपने रथ पर आरूढ हो व्यास मुनि के आश्रम की ओर पवन की गति से चला। रथ के घोड़ों को आते देख अश्वत्थामा जो अभी शस्त्र रहित था, उसने अर्जुन की ओर ब्रह्मास्त्र चलाया। इस अस्त्र को पांडवों का नाश करने वाला जान कर श्री कृष्ण ने उत्तरा के गर्भ की रक्षा करने के लिए और अपनी ओर आते ब्रह्मास्त्र को रोकने के लिए अर्जुन को ब्रह्मास्त्र चलाने के लिए प्रेरित किया। फिर दोनों ब्रह्मास्त्र आपस में भिड़ गए।

व्यास उवाच
विधि अस्त्र पार्थ आकर्षि पुत्र, अथवा कि होय जग प्रलय अत्र।
प्रेर्यो यह द्रोनी जुत प्रमाद, आकर्षन याकौं नाहिँ याद।।६१।।
लखि उभय अस्त्र जग प्रलैकार, सुनि व्यास बचन लीने सँभार।
सुत द्रौन पकरि रथ पै बिठाय, युधिष्ठिर अग्र लै कियो जाय।।६२।।
यह देख कर व्यास मुनि ने कहा कि हे पुत्र (अर्जुन)! तू दोनों ब्रह्मास्त्र को खींच ले, नहीं तो जगत में अभी प्रलय होगा। अश्वत्थामा ने अनजाने में इस ब्रह्मास्त्र को फेंका है और उसे इसको वापस लौटाने की कला याद नहीं। अर्जुन ने व्यासजी की बात मान कर प्रलयंकारी दोनों अस्त्रों को वापस लौटा लिया और उसके बाद अश्वत्थामा को पकड़, रथ में बिठा कर युधिष्ठिर के पास ले गया। तब श्री कृष्ण और भीमसेन दोनों ने युधिष्ठिर से कहा कि ये ब्राह्मण नहीं, आतताई है। हे महाराज! दया से क्या देख रहे हैं? इस दुष्ट को शीघ्र ही मार डालना चाहिए।

दोहा
कृष्ण भीम दोनों कहत, आतताइ, नहिँ विप्र।
करत दया देखत कहा, हतहु दुष्ट कौं क्षिप्र।।६३।।
कहो युधिष्ठिर द्रौपदी, यह हम तैं नहिँ होय।
द्विज वध मम सुत ना मिलै, कृपी कहै का रोय।।६४।।
यह सुन कर युधिष्ठिर एवं द्रौपदी ने कहा कि यह कार्य हमसे नहीं होगा, इस ब्राह्मण के वध से हमें हमारे पुत्र वापस नहीं मिल सकते और कृपी (इसकी माँ) विलाप करती हमें शाप देगी।

चूडामणि जुत हरि शिखा, विजय देहु छुटकाय।
बिना शस्त्र यह विप्रवध, निगम कहत विधि न्याय।।६५।।
फिर युधिष्ठिर ने कहा, हे अर्जुन! इसकी चूड़ामणि (मस्तक मणि) सहित शिखा (चोटी) ले कर इसे मुक्त कर दे। वेदों में इस प्रकार कहा है कि यह बिना शस्त्र वाले ब्राह्मण के वध के बराबर है।

कह्यो युधिष्ठिर त्यों कियो, शिखा छेदि भुव डारि।
या पै पग धरि नर कहत, करहु स्नान अब नारि।।६६।।
संजय बताने लगा कि हे धृतराष्ट्र! जैसा युधिष्ठिर ने कहा वैसा ही अर्जुन ने किया। उसने अश्वत्थामा की शिखा को काट कर धरती पर पटक दिया और द्रौपदी से कहा कि हे स्त्री! अब इस शिखा पर पाँव रख कर जा और सूतक का स्नान कर।
(यहाँ धृतराष्ट्र तथा संजय का संवाद पूर्ण हुआ। )

अथ वैशंपायन उवाच
जुद्धभूमि बिच भूज जब, आयो त्रियन समेतु।
गांधारी प्रति कहत मिलि, कृष्ण व्यास जुत हेतु।।६७।।
वैशंपायन मुनि बोले कि हे जन्मेजय! जब राजा धृतराष्ट्र कौरव कुल की स्त्रियों के साथ युद्धभूमि में आये तब श्री कृष्ण और व्यास मुनि दोनों मिल कर गांधारी से कहने लगे।

तूं जानत का कहहिं हम, नहीं युधिष्ठिर दोष।
कर्यो बंश कुरु को कदन, एक सुयोधन रोष।।६८।।
हे गांधारी! आप सारी बातें जानती हैं, इसलिए हम क्या कहें? इसमें युधिष्ठिर का कोई दोष नहीं, केवल मात्र दुर्योधन के क्रोध के कारण ही कौरव वंश का नाश हुआ है।

अब तौ है तव पुत्र ए, भूलि न देहु शराप।
परत युधिष्ठिर पाय तव, हृदय लगावहु आप।।६९।।
अब तो यह युधिष्ठिर आपका पुत्र है इसलिए भूल से भी आप शाप मत देना। देखो, यह युधिष्ठिर आपके पाँवों में पड़ रहा है, इसे गले लगाओ। अर्थात् इसे पुत्र कर जानो।

पाय परत कर नखन पर, परी मातु की दृष्ट।
चख बँध पट अध छिद्र तें, भये करज दश भृष्ट।।७०।।
युधिष्ठिर के चरण स्पर्श करते समय उसके हाथों के नाखूनों पर माता (गांधारी) की दृष्टि पड़ी। (चूंकि अब तक उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी थी पर नीचे की ओर देखने पर थोड़ी नजर पड़ी) इससे युधिष्ठिर की दसों अंगुलियों के नाखून काले पड़ गए।

श्रीकृष्ण प्रति गांधारी उवाच
कठिन जंघ मम पुत्र की, छलहि डराई तोरि।
ईश्वरता दरसात फिर, श्याल सिंह पर छोरि।।७१।।
फिर गांधारी श्री कृष्ण से कहने लगी कि हे कृष्ण! तुमने सिंह पर सियार छोड़ कर, छल-कपट से (भीमसेन द्वारा) मेरे पुत्र की वज्र जंघा को तुड़वा डाला और अपनी प्रभुता का दावा करते हो?

जाके पद तर रहत थे, छत्रधारि के शीष।
पलचारी पद तैं मलत, ताको शीष अनीश।।७२।।
जिस के पाँवो के तले छत्रधारी राजाओं के सिर रहा करते थे पर जरा देखो तो सही उसी (दुर्योधन) के सिर को मांसाहारी जंगली जानवर अपने पावों से रोंध रहे है।

कवित्त
देशन मैं जीविका मिटानी सईरंधिन की,
चूरीगर बापुरे निकारिहैं क्यों टोटे कौं।
गंधि रंगरेज ये बिचारे का पै कहैं दुख,
सुन्यो ग्राम ग्राम मैं सँग्राम काम खोटे कौं।
बार बार दीनता पुकारि त्रिया झुंड बीच,
गांधारी कहत मरे देखि छोटे मोटे कौं।
युधिष्ठिर एती भर्तबंसिन की पुत्रवधु,
कर तैं छुवैंगी नहिं फेरि कजरोटे कौं।।७३।।
इसके बाद गांधारी युधिष्ठिर से कहने लगी कि हे युधिष्ठिर! सारे देशों में सैरंध्रियों की आजीविका नष्ट हो गई। बेचारे, मनिहारे (चूड़ी बेचने वाले) अब अपनी कमाई जाने से हुए नुकसान की भरपाई कैसे करेंगे? इस युद्ध के घातक परिणामों के चलते वे गरीब गंधी और रंगरेज अपना दुःख किससे जा कर कहेंगे कि उनकी ग्राहकी समाप्त हो गई। युद्ध में सभी छोटे-बड़े योद्धाओं की मृत्यु से गाँव-गाँव में शोक पसरा हुआ हैं। इस हेय कर्म (युद्ध) के फलस्वरूप घर-घर में विलाप करती स्त्रियों के झुण्ड में से गांधारी, सभी छोटे बड़ों के मरने पर कहती है कि हे युधिष्ठिर! देख, अब इतने सारे भरतवंशियों की पुत्र वधुएं अपनी काजल की डिबिया को कभी नहीं छूएंगी!

दोहा
धनुषकृत्त श्रम पाथ को, दोउ हाथ कहि देतु।
त्यों कुरुक्षेत्र बतात है, हते नृपन को हेतु।।७४।।
हे युधिष्ठिर! जिस प्रकार अर्जुन के अपने धनुष की प्रत्यंचा को खेंचने के श्रम की बात उसके दोनों थके हाथ बताते हैं उसी प्रकार घातक युद्ध में मरे योद्धाओं की बात कुरुक्षेत्र कह रहा है।

वृद्ध अंध तेरो पिता, चख बंधन मम टेक।
तिन्ह अंधन के लकुटिया, भीम न राखी एक।।७५।।
हे युधिष्ठिर! तेरे पिता वृद्ध और अंधे हैं और उनके कारण आखों पर पट्टी बांधे रखने की मेरी जिद है। हम अंधों के सहायक, लकुटी रूप एक पुत्र भी भीमसेन ने नहीं छोड़ा।

हुती प्रतिज्ञा भीम के, शत सुत दिये मिटाय।
एक सुता मम सोउ हती, अर्जुन कुमति अघाय।।७६।।
हे युधिष्ठिर! भीमसेन के तो प्रतिज्ञा थी इसलिए उसने मेरे सौ पुत्रों को मार डाला पर मेरी एक मात्र पुत्री (दुःशीला) थी उसे भी अर्जुन ने (उसके प्राण रूप पति जयद्रथ का वध कर) मार डाला!

अर्जुन उवाच
प्रथम हरन किय द्रौपदी, दुतिय हत्यो सुत मोर।
तातैं भगनीपति हतन, कियो संकळप घोर।।७७।।
गांधारी के ऐसे वचन सुन कर अर्जुन बोला कि हे माता! जयद्रथ ने प्रथम द्रौपदी का हरण किया फिर दुसरा उसने मेरे पुत्र ( अभिमन्यू) की हत्या की, तभी मैंने अपने बहनोई को मारने का ऐसा दुष्कर संकल्प लिया।

गांधारी उवाच
पति शिर धारे गोद में, लखि सुत मच्छकुमारि।
रक्त लिप्त मुख कचन कौं, पौंछति कहत पुकारि।।७८।।
क्यों त्यागी अपराध का, कित जैहौं कछु बोल।
मैं कांता प्राणेश तुम, अंतर की गति खोल।।७९।।
रणभूमि में बिलखती स्त्रियों के विलाप को देख कर विगलित होती गांधारी ने कहा कि हे पुत्र! देख, वह मच्छराज की पुत्री (उत्तरा) अपने पति (अभिमन्यू) का सिर गोद में ले कर, उसके मुँह पर रक्त से चिपके बालों को अपने हाथों से हटाती हुई, रो कर कह रही है कि ‘हे प्राणनाथ! आपने मुझे पीछे क्यों छोड़ा? मेरा क्या अपराध था? मैं अब आपके बिना क्या करूंगी? कुछ तो जवाब दो! मैं तुम्हारी पत्नि हूं, प्राणेश! मन खोल कर बात तो करो!’

युधिष्ठिर उवाच
माता मैं राखी छिमा, कुल ही बचावन काज।
दुर्योधन कलिरूप तैं, अधम भयो मैं आज।।८०।।
यह सुन कर युधिष्ठिर ने कहा कि हे माते! मैने तो वंश को बचाने के लिए क्षमा धारण की पर कलिकाल के अंध रूप दुर्योधन के कारण मैं आज अधम कहलाया हूं।

धृतराष्ट्र उवाच
अब मेरे सुत पांव ये, तिन्हमें अतिबल प्रीय।
भीम मिलावहु मोरतैं, ह्वै शीतल मम जीय।।८१।।
फिर राजा धृतराष्ट्र कहने लगे कि हे कृष्ण! ये पाँचों (पाण्डव) अब मेरे पुत्र हैं इनमें से भी मुझे बलवान भीमसेन सर्वाधिक प्रिय है उसे मेरे पास ला कर मुझसे मिलवाओ, जिससे मेरे मन को शान्ति मिले।

मिलत वृकोदर बरजि हरि, पुतरा धातु बनाय।
मिलवायो चूरन कियो, नृप हि पर्यो मुरछाय।।८२।।
वैशंपायन बोले कि हे राजा जन्मेजय! यह सुन कर भीमसेन मिलने को आगे बढ़ा। उसे संकेत से श्री कृष्ण ने रोक दिया और धातु का पुतला बना कर उसे राजा से मिलवाया। उसे मसल कर धृतराष्ट्र ने चूरा कर दिया और स्वयं मूर्च्छित हो कर नीचे गिर पड़े। (अधिक जानकारी के लिए देख महाभारत, स्त्री पर्व, अध्याय- १२ सं.)

हाय भीम अति दुखित हौं, मारे शत सुत मोहि।
क्षुभित नीच मैं कुमति करि, तिन हित मार्यो तोहि।।८३।।
फिर धृतराष्ट्र जोर से बोले कि हाय! हाय! हे भीमसेन! मैं अत्यन्त दुःखी हूं, तुमने मेरे सारे सौ पुत्रों को मार डाला, इसलिए मैंने क्रोधवश हो कर दुष्टमति से तुझे मारा है।

संजय उवाच
अब नृप मारे भीम के, मिलैं कि तव सुत आय।
अयमय हरि पुतरा रच्यो, भीमहि लियो बचाय।।८४।।
तब संजय ने कहा कि हे राजा! क्या भीमसेन को मारने से तुम्हारे पुत्र वापस तुम्हारे पास आ सकते हैं? यह तो लोहे से बने भीमसेन के आवक्ष पुतले को आपसे मिलवा कर श्रीकृष्ण ने भीमसेन को बचा लिया।

धृतराष्ट्र उवाच
कृपा करी मम दुखित पै, ईश्वर सुमति अगाध।
राख्यो छल करि भीम कौं, टर्यो मोहि अपराध।।८५।।
धृतराष्ट्र बोले कि अगाध बुद्धिवाले ईश्वर (श्रीकृष्ण) ने मुझ दुखियारे पर कृपा कर छल-कपट से भीमसेन को बचा लिया और मेरे पाप के अपराध को टाल दिया।

किया सबन को दाहक्रम, धर्मपुत्र जुत भ्रात।
पृथा कह्यो अब कर्न कौं, देहु जलांजलि तात।।८६।।
इसके बाद राजा युधिष्ठिर ने अपने सारे भाइयों को साथ ले कर युद्ध में मारे गए सभी योद्धाओं का दाहकर्म करवाया। इतने में पृथा (कुंती) ने उससे कहा कि बेटा! अब कर्ण को भी अर्घ्य (जलांजली) दो।

क्षेत्रज अग्रज पांडुसुत, तेरो बंधव सोय।
मातुवचन सुनि विवस ह्वै, गिर्यो युधिष्ठिर रोय।।८७।।
हे युधिष्ठिर! कर्ण भी एक ही कोख से जन्मा पांडु राजा का सबसे बड़ा लड़का होने से तुम्हारा भाई होता है। माता के ये वचन सुन कर युधिष्ठिर आश्चर्यचकित हो कर रोने लगे।

प्रथम शोक भूल्यो सबैं, शोक नयो सुनि सुद्ध।
पहले मोकौं कहत तो, भूलि न करतो युद्ध।।८८।।
माता की इस बात को सुन कर युधिष्ठिर नये शोक में डूब गए और पहले शोक (कौरवों को मारने का) को भूल गए। और माँ से कहने लगे कि हे माता! यदि आपने यह बात पहले कह दी होती तो मैं भूल कर भी युद्ध नहीं करता।

छंद त्रोटक
लखिकै नृप वंश विनाश नयौ, जल अंजुलि देत बिहाल भयो।
हरि व्यास दुहुँ समझाय कह्यो, सुनि ज्ञान हृदय नहिं नैक ग्रह्यो।।८९।।
समझाय न जाय यहै हम पै, मिलि ल्याये तिही सब भीषम पै।
नृप बोलत भीषम तै बतियाँ, निरवेद तैं जात फटी छतियाँ।।९०।।
कर्ण के मरने से एक नये वंश का नाश हुआ देख कर राजा युधिष्ठिर कर्ण को जलांजली देते हुए एक दम बेहाल हो गए। तब श्री कृष्ण और व्यास जी दोनों ने मिल कर उन्हें बहुत समझाया पर युधिष्ठिर के मन को इससे शान्ति नहीं मिली। यह देख कर व्यासजी और श्रीकृष्ण ने कहा कि हमारे समझाने का कोई असर नहीं हुआ है। अतः अब युधिष्ठिर को पितामह भीष्म के पास ले चलें। राजा युधिष्ठिर से भीष्म पितामह का संवाद तो हो रहा था पर युधिष्ठिर के मन में उपजे वैराग्य से उनकी छाती फटी जा रही थी। वे बहुत बेहाल थे।

युधिष्ठिर वचन
तुम दै मुख ग्रास सुबोध दिये, तिन पै हम नीच प्रहार किये।
जिन द्रोन शिखाय दिये नर कौं, अवशेष न अस्त्र रखे घर कौं।।९१।।
तिनकौं रन मैं हम मारि लियो, जब मानत हौं धिक मोर जियो।
जिन स्वाद कछू न लिये जग के, सब बाल मरे मत मो ठग के।।९२।।
युधिष्ठिर कहने लगे कि हे पिता! आपने हमारे मुँह में रोटी के ग्रास दे देकर हमें उत्तम बोध कराया पर हम दुष्टों ने आपके उसी शरीर पर घाव किये। इसी तरह गुरु द्रोणाचार्य ने उत्तम शस्त्र विद्या सिखा कर और अर्जुन को युद्ध विद्या में निपुण बनाया, यही नहीं उन्होंने बिना सिखाया हुआ एक शस्त्र भी अपने लिए नहीं रखा, उन्हें भी हमनें युद्ध में मरवा दिया। इससे अब मुझे अपना जीना धिक्कार लगता है। इसके अतिरिक्त उन कई राजकुमारों का, जिन्होंने अपने जीवन का पूरा स्वाद भी नहीं चखा था मेरी ठग मति से नाश हुआ।

जिनकी अबला विधवा बरतैं, तिनकौं न निहारि सकौं डर तैं।
बिन जानि रवीसुत भ्रात हन्यो, सब तैं निज शत्रु विशेष गिन्यो।।९३।।
सब ही कुल को हम नाश कियो, इन बातन तैं अकुलात हियो।
किहि रीति पितामह राज करौं, यह पाप तैं पार कदा उत्तरौं।।९४।।
इतनी कहि पायन बीच गिर्यो, उठवायकै भीषम अंक भर्यो।
शरसेज पै बोध करैं सुत कौं, मुखि थापि वेदांत हि के मत कौं।।९५।।
युद्ध में मृतकों की उन विधवाओं की ओर मैं भय वश देख भी नहीं सकता। उनके दग्ध हृदय से शाप ही निकलेंगे। यही नहीं सूर्य पुत्र कर्ण हमारा भाई था, यह नहीं जानते हुए हमने उन्हें ही अपना सबसे बड़ा शत्रु समझा और मार दिया। पूरे वंश का मैंने नाश करवा दिया। इन सारी बातों को सोच-सोच कर मेरा मन अकुलाता है। हे पितामह! मैं अब किस प्रकार राज करूं? और इस महापाप से कैसे निजात पाऊं? इतना कह कर युधिष्ठिर पितामह के चरणों में गिर पड़े। तब पितामह ने उन्हें उठा कर गले लगाया। फिर मुख्य वेद एवं, उपनिषदों आदि के मत का अनुसरण करते हुए, पितामह अपनी बाणशय्या पर से पुत्र को उपदेश देने लगे।

भीष्म वचन
सब आपकि आगि तैं आप जरै, किहि रीत तुं पुत्र विलाप करै।
कुन मारत कौन मरै कबहूँ, शुध रूप अखंड लखो सबहूँ।।९६।।
करता हम मानत मूड किते, जग बीच बँधे नर जानि जिते।
करता भुगता प्रकृती कहिये, निज जानि अलेप सदा रहिये।।९७।।
पितामह भीष्म कहने लगे कि हे पुत्र! वे सभी मृतक अपनी अग्नि (मोहाग्नि) से जले हैं फिर तू क्यों इतना विलाप कर रहा है? कौन मारता है? और कौन कब मरता है! अर्थात् कोई किसी को नहीं मारता और कोई कभी मरता नहीं। सभी को अखंड शुद्धरूप से देख, सभी अक्षर ब्रह्म रूप है। कितने ही अज्ञानी जन ‘मैं कर्त्ता हूं’ ऐसा मानते हैं, वे सभी जगत से बंधे हुए है ऐसा जान। कर्त्ता और भोक्ता तो प्रकृति अर्थात् माया को कह, तू तो (आत्मा तो) हमेशा निर्लेप है। ऐसा सोच कर तुझे आनन्दपूर्वक रहना चाहिए!

पति अंग अलिंगत है प्रमदा, तिन तैं दुहिता दुय भाव जुदा।
गति भावहि बंध रु मुक्ति गिनौ, सब पाप रु पुन्य उभै सुपनो।।९८।।
स्थुल सुक्षम कारन देह त्रिहुँ, भ्रमरूप बनी नहिं सत्य कहूँ।
तिन झूठ तैं कर्म न सत्य बनै, तृषणा मृगनीर न कोय गनै।।९९।।
सुनि भीषम बैन अज्ञान गयो, मनु भानु उदै तम नाश भयो।
पति (पुरुष) प्रमदा (स्त्री) को अपने अंग से लगा कर आलिंगन में लेता है, उसी अंग से पुत्री को भी आलिंगनबद्ध करता है परन्तु दोनों अलग-अलग भाव वाली, जुदा-जुदा स्थितियाँ हैं। अर्थात् स्त्री में स्त्रीभाव है और पुत्री को आलिंगन बद्ध करने में पुत्री भाव है। इससे हे पुत्र! भाव की ही स्थिति को बंधन और मोक्ष रूपी जान और पुण्य पाप रूपी जो जगत का द्वंद्व (उभय प्रपंच) है वह स्वप्नवत है, नाशवान है।
स्थूल, सूक्ष्म और कारण रूप ये तीन शरीर भ्रम से (अज्ञान से) उत्पन्न हैं, इन तीनों में से एक भी सत्य नहीं अर्थात् मिथ्या हैं। इन मिथ्या शरीरों से सत्यकर्म नहीं होता, इसी से तृष्णा, मृग मरीचिका जैसी मिथ्या है परन्तु स्वयं के भ्रम से उसे कोई मिथ्या नहीं मानता। वैशंपायन मुनि कहने लगे कि हे राजा जन्मेजय! भीष्म पितामह के ये वचन सुन कर, जिस प्रकार सुर्योदय से अन्धेरा विनष्ट हो जाता है उसी प्रकार युधिष्ठिर के मन के अज्ञान का नाश हो गया।

वैशंपायन उवाच
दोहा
दिवस पिचोतर सेज सर, राखे भीषम प्रान।
माघ शुक्ल पख अष्टमी, सुरपुर किया पयान।।१००।।
वैशंपायन बोले कि हे जन्मेजय! भीष्म पितामह ने शरशय्या पर सोते हुए भी अपने प्राणों को निकलने से ७५ दिवस तक रोके रखा और माघ शुक्ला ८ के दिन उन्होंने स्वर्ग के लिए प्रयाण किया।

दाह कर्म करि भीष्म को, नृपति गयो पुर नाग।
सिंहासन बैठो सदय, भई प्रजा बड़भाग।।१०१।।
इसके बाद राजा युधिष्ठिर अपने पितामह भीष्म का दाह संस्कार कर हस्तिनापुर गए और मन में दया, करुणा का भाव धारण कर राज्य सिंहासन पर बैठे। इसे प्रजा ने अपना अहोभाग्य माना।

।।इति पंचदश मयूख।।

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