पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – षोड़श मयूख

।।षोड़श मयूख।।

अंतिम पर्व

वैशंपायन उवाच
दोहा
धृतराष्टर आदेश, धर्मपुत्र शिर पर धर्यो।
यथा सुयोधन लेश, कबहुँ न अंगीकृत कर्यो।।१।।
वैशंपायन मुनि आगे कहने लगे कि हे राजा जन्मेजय! धृतराष्ट की एक-एक आज्ञा को जिस प्रकार राजा युधिष्ठिर ने शिरोधार्य किया, उसी प्रकार दुर्योधन ने उनकी एक भी आज्ञा को नहीं माना था।

दोहा
स्नान दान गज गाय महि, भेजन सयन सुभाय।
प्रथम करै धृतराष्ट्र जब, पीछे नृपति सदाय।।२।।
श्रेष्ठ भाव से स्नान कर, हाथी, गायें एवं पृथ्वी का दान कर, भोजन और शयन आदि नित्य कार्य पहले धृतराष्ट्र करते उसके बाद धर्मराज युधिष्ठिर अपना नित्य कर्म निबटाते।

जो पदार्थ होवै निजर, करि धृतराष्ट्र विभाग।
विदुर युयुत्सु आदि दै, सबकौं देत सभाग।।३।।
राजा के समक्ष जिन-जिन पदार्थो का नजराना होता। उन सारी चीजों को महाराज धृतराष्ट्र पहले हिस्सा कर विदुर और युयुत्सु को देते उसके बाद शेष रही चीजों को दूसरे सभी लोगों में बँटवा देते।

कैद जुधिष्ठिर को कियो, दे धृतराष्ट्र सु छोर।
कैद कियो धृतराष्ट्र को, छोरि सकै न और।।४।।
राजा युधिष्टिर का कैद किया हुआ व्यक्ति तो धृतराष्ट्र की आज्ञा से छूट जाता था पर धृतराष्ट्र का कैद किया हुआ (द्वारा सजा दिया हुआ व्यक्ति) किसी और के आदेश से नहीं छोड़ा जा सकता था।

युधिष्ठिर उवाच
समरन पूर्व विरोध करि, करै पिता तैं द्वेष।
सो मेरा अति शत्रु है, वल्लभ जदपि विशेष।।५।।
एक दिन राजा युधिष्ठिर ने राज दरबार में यह घोषणा की, कि पुराने विरोध को याद कर, जो कोई मेरे पिता (महाराज धृतराष्ट्र) से ईर्ष्या करेगा। वह मेरा कितना ही प्रिय क्यों न हो मेरे लिए वह शत्रुवत हो जाएगा।

वैशंपायन उवाच
भयो परीक्षित को जनम, सब कुल कौं सुखदान।
दै कोटिन धन द्विजन कौं, कर्यो भूप सनमान।।६।।
वैशंपायन मुनि कहने लगे कि हे जन्मेजय! तब पूरे कुल को सुख देने वाले परीक्षित का जन्म हुआ। इस अवसर पर राजा ने ब्राह्मणों को करोड़ों मुद्राओं का दान दे कर, उनका सम्मान किया।

कीनी विदुर प्रधानता, नृपति पांडु की बेर।
सोइ युयुत्सु ने करी, कृपा युधिष्ठिर हेर।।७।।
जिस प्रकार पांडु राजा के समय में विदुर ने प्रधान का (महाआमात्य का) कार्य किया था, उसी प्रकार युयुत्सु को राजा युधिष्ठिर ने अपना प्रधान नियुक्त किया।

युधिष्ठिर का नित्यकर्म
छंद नाराच
वितीत रात्रि तीन जाम भूप मंजनं करै।
पिताम्बरं सुधारि फेर देवसेव विस्तरै।
जुहाव अग्निहोत्र कौं रु गाय विप्र पूजिकै।
बुलायकै अमात्यवृंद लाभ खर्च बूझिकै।।८।।
राजा युधिष्ठिर का नित्य नियम इस प्रकार था, रात्रि के तीन प्रहर बीतने पर राजा स्नान करता, उसके बाद पीतांबर पहन कर देव सेवा में प्रवर्त हो जाता। यज्ञादि का कार्य अग्निहोत्र कर्म पूरा कर, वह गाय और ब्राह्मण की पूजा करता। इसके बाद अपने अमात्यवृंदों को बुला कर राज्य के खर्च और लाभ पर विमर्श करता।

पिता रु मात कौं प्रणाम धारिकै सभा करै।
प्रताप देखि शत्रु आप ताप तैं जरै डरै।
स्वदेश के विदेश के कवि अमात्य आयकै।
यथास्थितं सु मान दान जे चलंत पायकै।।९।।
इसके बाद पिता (धृतराष्ट्र) और माताओं (गांधारी एवं पृथा) को प्रणाम कर राज्यसभा में आता। राजा के दिन-दिन बढते प्रताप को देख कर शत्रु मन ही मन जलते पर डरते थे। स्वयं के देश और परदेश से आने वाले कवि और अमात्य आ कर अपनी-अपनी योग्यतानुसार पुरस्कार पाते। राजा उन्हें पूरा सम्मान दे कर विदा करता।

निहारि अश्वशाल औ रसोइथान आवना।
सहस्त्र अष्ट औ असी ऋषीन कौं जिमावना।
सबंधु फेर जीमि भूप भूपवृंद संजुतं।
करै विचार शास्त्र को अरोगि पान अमृतं।।१०।।
राजा दरबार लगाने के बाद अश्वशाला का निरीक्षण कर पाकशाला में आते। वहाँ अट्ठासी हजार ऋषियों को भोजन कराने का कार्य करवाते। इसके बाद धृतराष्ट्र के परिजनों और अपने भाइयों के साथ बैठ कर स्वयं भोजन कर पान, तांबूल खा सभी के साथ शास्त्रों पर विमर्श करने में संलग्न हो जाता।

तृतीय जाम पायकै लखंत सैन्य हाजरी।
करंत शस्त्र अस्त्र एक एक की बराबरी।
प्रदोस संधि साधिकै करंत रात्रि कौं सभा।
लखात गान नृत्य तैं सुरेंद्र लोक की प्रभा।।११।।
बाद में तीसरे प्रहर फौज का निरीक्षण करते, सेना की हाजरी लेते और सेना द्वारा समय-समय पर किये जाने वाले शस्त्राभ्यास को देखते। फिर सायंकाल संध्यावंदन साध कर, रात्रि को सभा का आयोजन करते, इसमें गायकों, नर्तकों की कला को देखते थे।

करंत मंत्र द्वै घरी किये सभा विसर्जनं।
प्रकार मंत्र होत ना बिना सपत्न तर्जनं।
बितीत डेढ जाम रात्रि व्है द्वितीय भोजनं।
समग्र नग्र देश के बचाव के प्रयोजनं।।१२।।
रात्रि सभा के विसर्जन होने के बाद घड़ी-दो घड़ी एकान्त में विचार करते, कि किस शत्रु को क्या सजा देनी है? वह विचार अमल में लाए बिना नहीं छूटता या उसका अधूरा कार्यान्वन नहीं होता था। इसके बाद डेढ़ प्रहर रात्रि के बीतने पर व्यालू करते और उसके बाद पूरे देश और सारे नगरों की सुरक्षा सम्बन्धी व्यवस्था पर विचार करते।

इतेक काज नित्य हैं निमित्त काज और जे।
अनेक दान होम जाम होत सांझ भोर जे।
प्रहार व्है धनाढ्य पै पुकार दीन की भये।
निवेर नीर खीर होत राजद्वार पै गये।।१३।।
यह सारे कार्य राजा युधिष्ठिर के नित्य प्रति के कार्य थे। फिर वापस दूसरे प्रातःकाल और सायंकाल को यज्ञादि, होम, जप तथा अनेक प्रकार के दान होते। इसके अतिरिक्त गरीब की पुकार पर धनाढ्य पर दंड किया जाता। इस प्रकार धर्मराज की ड्योढी पर दूध का दूध और पानी का पानी जैसा न्याय होता।

परमार्थ कार्य
दोहा
अँधरे कुष्टी पांगुरे, जे कोउ बिनु आधार।
तिनकौं ल्यावन सात शत, शिबिका करत प्रचार।।१४।।
अंधे, पंगु, कोढ़ी, रोगी आदि जो निराधार थे, उन्हें लाने ले जाने के लिए युधिष्ठिर के राज्य में सात सौ पालकियों के संचार की व्यवस्था थी।

जित तित कीने धर्मसुत, वापी-कूप-तड़ाग।
तथा प्रजा राजा जथा, बहु देवालय-बाग।।१५।।
इसके अतिरिक्त धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने राज्य में जगह-जगह पर बाव-कूप और तालाबों का निर्माण करवाया। और ‘यथा राजा तथा प्रजा’ के अनुरूप प्रजाजनों ने भी वहाँ कई देवालय और बाग-बगीचों का निर्माण किया।

कवित्त
शत्रु कौं उथापि पीछो थापिबे मैं व्रतभंग,
दीसत युधिष्ठिर में गृद्धन मैं कंकता।
कैद लोक कुल की त्यों वेद की मृजाद ही मैं,
स्वैर गति मारत मैं चातक मैं रंकता।
इति ग्रंथ पूर्णता में संचर लिखैया लिखैं,
चोरी इतिहासन मैं होरी मैं निशंकता।
चंद्रमा मैं काहू काल राहू तैं सशंकता त्यों,
दुतिया मैं बंकता है पून्यो मैं कलंकता।।१६।।
राजा युधिष्ठिर के राज्य में व्रतभंग (नियम भंग करने के नाम पर) मात्र शत्रु को जड़मूल से विस्थापित कर उसे फिर से बसाने में था। हिंसक व्यवहार मात्र मृत जानवरों को फाड़ कर खाने वाले पलचर एवं गिद्ध पक्षियों में था। कैद के नाम पर लोक मर्यादा, कुल मर्यादा और वेद मर्यादा थी। स्वेच्छाचारिता मात्र पवन में ही थी। दीनता चातक पक्षी में थी और इति यह मात्र किसी ग्रंथ की समाप्ति पर प्रयुक्त होने वाला शब्द था। चोरी वह भी मात्र शब्द के रूप में इतिहास में था। निशंकपन केवल होली खेलने में था। भय मात्र कभी-कभी राहू से चन्द्रमा में था (ग्रहण के समय)। वक्रता सिर्फ दूज के चन्द्रमा में थी और कलंक मात्र पूर्णिमा के चाँद में दिखता था। अर्थात् राजा युधिष्ठिर के राज्य की प्रजा में व्रतभंग, कंकास (हिंसा), कैद, स्वेच्छाचारिता, दीनता, सात प्रकार की इतियां, चोरी, अपराध, भय, कुटिलता और कलंक आदि कोई भी प्रदूषण नहीं था। (इस कवित्त में परिसंख्यालंकार है सं.)

दोहा
कियो राज यह रीत नृप, अश्वमेध किय तीन।
अवभृत भो मख तृतिय को, उच्छव होत नवीन।।१७।।
इस तरह नीति पूर्वक धर्मराज युधिष्ठिर ने राज्य किया और तीन अश्ववेध यज्ञ किये। तीसरे यज्ञ का अवभृथ स्नान होने के बाद नये उत्सव आयोजित होने लगे।

पांच भ्रात श्रीकृष्ण जुत, भोजन करत प्रभात।
पृथा द्रौपदी उभय ढिग, चली पूर्व की बात।।१८।।
फिर एक दिन सवेरे श्रीकृष्ण सहित पाँचों भाई भोजन कर रहे थे और कुंती एवं द्रौपदी पास में थीं तब पांडवों पर बीती हुई मुसीबतों की बात चली।

विपति समय को भाव सब, अपनी मति अनुरूप।
कहत स्तुती करि कृष्ण की, सुनत युधिष्ठिर भूप।।१९।।
श्री कृष्ण की स्तुति कर (पांडवों ने) पहले पड़ी विपत्ति का वर्णन कर सभी अपनी-अपनी मति अनुसार अपने मनोभावों का वर्णन करने लगे। इसे युधिष्ठिर भी ध्यान पूर्वक सुनने लगे।

कुंती का मनोभाव
कवित्त
अवभृत स्नान अश्वमेध भये कुंता कहै,
जानती मैं ऐसो भाग्य मेरो कबै होयहैं।
गुरुजन पुर की अमात्य उमरावन की,
त्रिया मिलि ऐहैं मेरी कृपादीठ जोयहैं।
तिन को करौंगी सतकार कदा भांति भांति,
वस्त्र औ सुगंध दासी लिये तैल्य तोय हैं।
कृष्ण के प्रताप अबै ताही आव आदर मैं,
बीतत दिवस निशा सोचै कब सोयहैं।।२०।।
कुंती बोली कि मैं यह इच्छा करती थी कि मेरा कब ऐसा सौभाग्य होगा कि अश्वमेघ यज्ञ के अवभृत स्नान के बाद, गुरुजनों की, अग्रजों की, प्रधानों की, उमरावों की और पुरजनों की स्त्रियां मिलकर मेरे पास आएंगी और वे मेरी कृपा दृष्टि की मोहताज होंगी? फिर सुंगधित इत्र और गुलाब जल एवं वस्त्र ले कर दासियां मेरे पिछवाड़े खड़ी रहेंगी और मैं अपने यहाँ आने वाली अतिथि स्त्रियों की आवभगत करूंगी। अब श्री कृष्ण की कृपा से उनकी ऐसी ही आवभगत में पूरा दिन बीत जाता है और अब रात जल्दी हो जाए कि मैं आराम से सो जाऊं। यही सब सोचती रहती हूं।

द्रौपदी का मनोभाव
द्रौपदी कहत मेरो वांछित सदैव हुतो,
कदा नाना भांतिन के व्यंजन बनाऊंगी।
छहूँ रस भक्ष भोज्य लेह्य चोस्य पाक पान,
रिषि नृप पंक्ति जुत नृप कौं जिमाऊँगी।
करिहैं प्रशंसा मेरी सुनिकै श्रवन ताहि,
विप्रन की आशिष तैं अति ही अघाऊँगी।
कृष्ण के प्रसाद अब महानिसि टहल बीच,
सोचौं नित्य नेम अवकाश कब पाऊँगी।।२१।।
द्रौपदी बोली, मेरी सदा से यह इच्छा थी कि मैं कभी विविध प्रकार के व्यंजन बनाऊंगी? भक्ष्य (दांतों से खाने योग्य) चोस्य (चूसने योग्य), पेय (पीने योग्य) और खटरस वाला भोजन बना कर ऋषियों और राजाओं की पंक्ति में राजा युधिष्ठिर को बिठा कर भोजन कराऊंगी? फिर जो मेरे बखान करेंगे उन्हें मैं अपने कानों से सुन कर और ब्राह्मणों के आशीर्वचन सुन कर कब अघाऊंगी? श्री कृष्ण की कृपा से अब यह सभी कुछ होने लगा है और अब उनकी इसी सेवा में होती आधी रात को सोचती हूं कि अब मुझे अपने नित्य नियम (पूजन, आराधन) का समय कब मिलेगा?

भीम का मनोभाव
भीमसेन कहै मेरे हुती अभिलाषा ऐसी,
गांधारी के पूत कदा गदा तैं प्रहारिहौं।
और हू अनेक ताके होयहैं सहाय नृप,
मसक समान तेउ जूदे जूदे मारिहौं।
सबै भूमि राज कुरुबंशिन को छत्र ताहि,
युधिष्ठिर छमाशील ताके शिर धारिहौं।
युद्धसिंधु ग्राह भौंर जुक्त सो तर्यो मैं नीके,
कृष्ण के प्रताप ताको का जश पुकारिहौं।।२२।।
भीमसेन ने कहा कि मेरी इच्छा यह थी कि मैं गांधारी के बेटों को अपनी गदा के प्रहारों से कब मारूंगा? इसके अलावा उन राजाओं को भी जो उनकी मदद को आए हैं मैं मच्छरों की तरह कब मसलूंगा? और कुरुवंश के सार्वभौम राज्य के छत्र के नीचे धर्मराज युधिष्ठिर को कब आसीन कराऊंगा? इस तरह की अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए, युद्ध के समुद्र को, जिसमें बड़े बड़े ग्राह रूपी महारथी थे, मैं श्री कृष्ण की कृपा से सकुशल तैर कर पार कर सका। इसके लिए मैं उनका कितना सुयश करूं? अर्थात् मैं अपने आपको इसके लिए उपयुक्त नहीं पाता।

अर्जुन का मनोभाव
अर्जुन कहत मोकौं रही थी बड़ी सी चाह,
भूपन के पुत्र देश देशन के आयहैं।
अस्त्र शस्त्र धनु को प्रताप मो मैं देखिहैं ते,
आपको पराक्रम सो हमकौं दिखायहैं।
धनु विद्या चार भांति सीखिहैं हमारे पास,
ऐसा दिन व्हैहै कबै सज्जन कौं भायहैं।
तिन्हें शिक्षा देते मोकौं नित्य को समय नाहिँ,
कृष्ण को कहाय फेर क्यों न सिद्धि पायहैं।।२३।।
अर्जुन बोला कि मेरी सबसे बड़ी इच्छा यह थी कि देश-देशांतरों के राजकुमार मेरे पास कब आएंगे, जो मेरे धनुष का पराक्रम और अस्त्र-शस्त्रादि के चलाने की मेरी विद्या को देखेंगे और अपना पराक्रम और विशिष्टताएं मुझे बतायेंगे? मेरे पास आ कर वे मेरी चार प्रकार की धनुष विद्याओं (जोड़ना, खींचना, छोड़ना और छोड़े हुए अस्त्र को वापस खींच लेना) को सीखेंगे? और अब मेरे पास आए राजकुमारों को धनुर्विद्या का अभ्यास कराने में मुझे अपने नित्य नियम की साधना का भी समय नहीं मिलता। यह सब श्रीकृष्ण का सहायक कहलाने का प्रताप है।

नकुल का मनोभाव
नकुल कहै विचार आपदा की बार मेरो,
जाके द्वार एक अश्व धन्य क्षत्रि जात सो।
दोय कान चार पाँव एक पूंछ ऐसा हय,
मेरे होय अहोभाग्य मानौं बड़ी बात सो।
जाके अपलच्छन सुलच्छन बिचार्यो करौं,
खान पान सेवा को विधान सांझ प्रात सो।
कृष्ण की कृपा प्रसंग लाखों हैं तुरंग जुदे,
अंग रंग चीन्हत ही आयु कौं बितात सो।।२४।।
नकुल बोला कि विपत्ति के दिनों में प्रायः यह सोचा करता था कि जिस किसी के पास अच्छी नश्ल का एक घोड़ा हो वह क्षत्रिय धन्य है। दो कान, चार पाँव और पूंछ (शालिहोत्र शास्त्र में घोड़ों की परीक्षा में घोड़े के इन्ही अवयवों को परखा जाता है) से शुभ लक्षणों वाला एक घोड़ा मेरे पास हो तो मैं इसे मेरा अहोभाग्य मानूं। और मैं दिन भर उसके अशुभ और शुभ लक्षणों पर, उसके खान पान के बारे में विचार करूं। पर अब श्री कृष्ण की कृपा से लाखों घोड़े हैं जिनके रंग, आदतों और अलग-अलग गुणों पर सोचते हुए ही मेरी उम्र बीत रही है।

सहदेव का मनोभाव
कहै सहदेव अभिलाष समै आपदा को,
जानतो मैं धन्य जाकौं विप्रन को संग है।
अष्ट ही निदान और उपाय षट-वेत्ता वैद्य,
राशि औ नक्षत्र गृह जोतिष के अंग हैं।
चार वेद षट शास्त्र काव्य कोश व्याकरन,
साहित्य संगीत ध्वनि लक्षना रु व्यंग हैं।
कृष्ण के प्रसाद ऐसी विद्या जुत ब्रह्मवृंद,
आवत अनेक रहै निशा द्यौष रंग है।।२५।।
सहदेव बोला कि आपदा के उस समय में बहुधा मैं सोचा करता था कि जिसे उत्तम ब्राह्मणों का संग मिलता है, वे कितने धन्य हैं। आठ प्रकार के निदान और उपाय, तथा वैद्यक के छः अंग जानने वाले वैद्य, राशि, नक्षत्र तथा ग्रहों की जानकारी जो ज्योतिष का अंग गिनी जाती है, चार वेद, छः शास्त्र, काव्य, शब्दकोश, व्याकरण, ध्वनि, लक्षणा, व्यंग्य, साहित्य और संगीत ऐसी ऐसी विद्या जानने वाले विद्वान ब्राह्मणों के अनेक समूह अब श्री कृष्ण की कृपा से मेरे यहाँ आते हैं जिससे रात-दिन आनन्द बना रहता है।

युधिष्ठिर उवाच श्रीकृष्ण स्तुति
छंद पद्धरी
युधिष्ठिर कहत जदुकुल उद्योत, हरि स्तुती कहा तुम सदृश्य होत।
महि भई भार पीड़ायमान, अवतार लियो यदुवंश आन।।२६।।
युधिष्ठिर बोले, हे यदुवंश के प्रकाश श्री कृष्ण! आपके अपार गुणों के कारण आपकी स्तुति मुझसे कैसे हो सकती है? पृथ्वी जब पापाचार के भार से पीड़ित हो उठी तब आपने उसका भार उतारने के लिए यदुवंश में अवतार लिया।

पूतना शकट अरु तृणाव्रत्त, केशी खर बक अजगर कुक्रत।
बच्छासुर प्रलँबासुर सँघारि, मधवा विधि कालिय मान मारि।।२७।।
आपने पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, केशी दैत्य, खर राक्षस, बकासुर, अघासुर, वत्सासुर, प्रलंबासुर आदि कुकर्म करने वाले असुरों का संहार किया। इसके अतिरिक्त आपने इन्द्र, ब्रह्मा और कालिय नाग का अभिमान मिटाया।

कँस दंतवक्र शिशुपाल क्रूर, दलि कालजवन किय भार दूर।
नर्कासुर मागध आदि नीच, बाकी अष्टादश दिवस बीच।।२८।।
सब भूमि भार कीनो सँघार, पुनि शेष सोई करिहो प्रहार।
कृष्ण मम विघ्न काटे कृपाल, गिनतै न पार पाऊं गुपाल।।२९।।
कंस, क्रूर, दंतवक्र, शिशुपाल और कालयवन को मार कर आपने पृथ्वी का भार मिटाया। नरकासुर, मगधपति जरासंध आदि आसुरी वृत्तियों वाले अधम लोगों का संहार किया। आपने यह सभी कुछ अठारह दिनों में कर दिया। यही नहीं शेष रहे राक्षसों का भी आप वध करेंगे। हे कृपालु! आपने मेरे जितने विघ्नों को काट डाला है, हे गोपाल! उनकी गिनती भी मुझसे नहीं बनती है।

भीम कौं दियो विख शत्रुभाव, विष्णु को करत तुम बिनु बचाव।
बन्हि के सदन सब जरत बार, को विदुर रूप उपदेशकार।।३०।।
भीमसेन को जब शत्रुभाव से दुर्योधन ने जहर दिया तब हे विष्णु भगवान! आपके अतिरिक्त उसका बचाव करने वाला कौन था? हम सभी लाक्षागृह में जल कर भस्म हो जाते यदि उस समय विदुर रूप आप उपदेशक न होते।

महि नृपन जीति मागध मदंध, सब पास लिया कर जरासंध।
भीषम तैं कुरु यदु तव प्रभाव, तिन्ह बिगर सबन कौं दियो ताव।।३१।।
गज अयुत प्राण सोइ नृप अत्रास, नरहरि प्रताप किय भीम नाश।
द्रौपदी सभा बिच वस्त्र एक, ऐंचत हि थक्यो छल करि अनेक।।३२।।
जब मगध देश के मदान्ध राजा जरासन्ध ने पृथ्वी के सारे राजाओं को जीत कर उनसे कर वसूल करना शुरू किया। भीष्म पितामह के प्रताप से कुरुवंश और आपके प्रताप से यदुवंश को छोड़ कर, सारे क्षत्रिय वंशों को नानाविध कष्ट देना शुरू किया। हजार हाथियों के बल वाले, किसी से न डरने वाले राजा जरासंध का, हे नरहरि! आपके प्रताप से भीमसेन ने नाश किया। द्रौपदी को जब खींच कर राज सभा में लाया गया, उसके पास मात्र एक ही वस्त्र था पर आपकी कृपा से दुःशासन जैसा बलवान भी उसका चीर खींचते-खींचते थक गया।

दुर्वासा आयो शाप देन, लखि कुसमय मेरो धर्म लेन।
तव कृपा प्रसन व्है दै असीस, प्रेरक तैं कीनी उलट रीस।।३३।।
मेरा कुसमय देख कर, मेरे धर्म का हरण करने के लिए दुर्वासा ऋषि शाप देने को आये तब मात्र आपकी कृपा से उन्होंने प्रसन्न हो कर जाते-जाते शाप की जगह आशीर्वाद दिया और उन्हें यहाँ हमारे पास भेजने वालों (दुर्योधनादि) पर वे उल्टे कुपित हुए।

प्रथम दिय कर्न मन कोप प्रेरि, गनि भीष्म द्वेष जिन शस्त्र गेरि।
भट कर्न द्रौन भीषम अभीत, एकठे लरत होते अजीत।।३४।।
युद्ध आरंभ होने से पूर्व ही आपने कर्ण के चित्त में क्रोध को प्रेरित किया और आपने पितामह भीष्म पर क्रोध किया, जिससे उन्होंने अपने शस्त्र धर दिये। भीष्म, द्रोण और कर्ण ये तीनों योद्धा यदि इकट्ठे लड़ते तो उन्हे कोई हराने वाला नहीं था।

भीष्म को पतन रन असंभाव, आप बिन कठिन बनतो उपाव।
वैष्णव सु अस्त्र भगदत बकारि, मोख्यो सु आप झेल्यो मुरारि।।३५।।
अर्जुन बचाय जैद्रथ असंत, उन रथिन बीच मार्यो अनंत।
ताको शिर ताके पितु सु पास, अंजुलिगत करि किम उभय नाश।।३६।।
रणभूमि में भीष्म पितामह का पतन (मरण) का उपाय आपके बिना बनना कठिन और नितान्त असंभव था। फिर भगदत्त ने ललकार कर जब वैष्णव नामक अस्त्र अर्जुन पर चलाया उसे हे मुरारि! आपने झेल लिया और अर्जुन को बचा लिया। हे भगवान! आपने उस अधम जयद्रथ को इतने महारथियों की रक्षा में भी मरवा डाला और उसका कटा हुआ मस्तक उसके पिता के अंजलीगत कर, उन दोनों पिता-पुत्र का संहार करवाया।

वासवी शक्ति अर्जुन बचाय, किय मोघ हिडंबासुत मराय।
द्रौन को कौन करतो निपात, गुरु जानि न अर्जुन करत घात।।३७।।
करि आप बहुत छल अनायास, द्रुपदसुत हाथ कीनो बिनास।
द्रौनी नारायन अस्त्र डारि, मम सैन्य जीततो सबन मारि।।३८।।
आप से होय रक्षक उदार, बिस्मय न नाश पावै विकार।
अर्जुन मोहि मारन मरन धारि, उन समय दुहुँन लीने उबारि।।३९।।
कर्ण की इन्द्र द्वारा प्रदत्त वासवी शक्ति से अर्जुन को बचा कर, आपने हिडिंबा के पुत्र (घटोत्कच) को मरवा कर, उस शक्ति को व्यर्थ किया। फिर द्रोणाचार्य को कौन मारता? क्योंकि अर्जुन उन्हें अपना गुरु समझ कर उन पर वार नहीं करता, इसके निमित्त आपने अचींता छल कर द्रुपद पुत्र (धृष्टद्युम्न) के हाथ से उनका नाश करवाया। अश्वत्थामा (द्रोणी) अपने नारायण नामक अस्त्र से मेरी पूरी सेना का संहार कर जीत जाता परन्तु जिसके आप जैसे उदार रक्षक हों, उनका कोई क्या बिगाड़ सकता है? फिर जब अर्जुन मुझे मार कर स्वयं मरने के लिए तैयार हो गया था उस समय हे प्रभु! आपने ही हम दोनों को बचाया।

जब बह्यो करन को सर्पवान, रथ पटकि सखा के रखे प्रान।
भीम कौं गदा छल कहि सुभाय, सुयोधन मारि कीनी सहाय।।४०।।
जब कर्ण ने सर्पबाण चलाया, यदि उस समय आपने घोड़ों सहित रथ को नीचे नहीं दबाया होता तो अपने सखा अर्जुन के प्राण नहीं बचते (अर्थात् आपने ही बचाये)। यही नहीं भीमसेन को छल-संकेत से गदायुद्ध में आप नहीं बताते तो दुर्योधन कैसे मरता? आपने ही सभी तरह से हमारी रक्षा की।

निशि कियो द्रौनसुत कर्म नीच, पांचहि कौं लै गये बिपिन बीच।
सुबलजा ताहि नीती सुनाय, हम विषम शाप तैं लिय बचाय।।४१।।
रात्रि में जब अश्वत्थामा ने नीच कर्म कर शिविर में उपस्थित सभी योद्धाओं को मार दिया। यदि उस समय आप हम पाँचों भाइयों को बचा कर वन में नहीं ले जाते तो हम में से कौन बचता? हे नारायण। आपने सुबलजा (सुबल राजा की पुत्री गांधारी) को नीति और ज्ञान की बातें सुना कर, उनके भयंकर शाप से हमें बचा लिया।

भीम तैं मिलन जब पिता भाखि, लोहमय कियो तन लियो राखि।
ब्रह्मास्त्र तेज तैं गर्भ बाल, कर चक्र प्रेरि राख्यो कृपाल।।४२।।
जब पिता (धृतराष्ट्र) ने भीम सेन से मिलने का कहा, तब आपने उसकी जगह लोहे के पुतले से उन्हें मिलवा कर, भीमसेन की काया की रक्षा की। इसके अतिरिक्त हे कृपा सिंधु! अश्वत्थामा द्वारा प्रेरित ब्रह्मास्त्र के तेज से आपने उत्तरा के गर्भ में पल रहे बालक (परीक्षित) को अपने चक्र की सहायता से बचाया।

पूर्णता यश निर्विघ्न पाय, श्रीकृष्ण आप ही थे सहाय।
दिन प्रति जिहिं पूजत असुर देव, सोइ करत आप मम अनुज सेव।।४३।।
दास के दास दीनन दयाल, करुणानिधान अघहर कृपाल।
रीझ तैं देत सुर स्वर्ग लोक, आप तो खीजते हु विष्णु ओक।।४४।।
ऐसो तजि स्वामी चहत आन, सो द्विपदरूप चौपद समान।
दुख भुगति मिले अब राजभोग, जे कहा रावरी स्तुती जोग।।४५।।
बहु निंद्य कर्म हम जुत विकार, कीर्ति तैं किये जग पवित्रकार।
निज दोष कृष्ण की स्तुति निहोरि, बंधुन तैं बोलत नृप बहोरि।।४६।।
हे प्रभु! आपके सहाय रहते हम निर्विघ्न रूप से यज्ञ करने में सफल हुए। हे कृष्ण! जिन्हें हमेशा देवता और दानव पूजते हैं, वही आप, मेरे छोटे भाई अर्जुन के सारथी बन कर सेवाकार्य में संलग्न हुए। आप पाप को विनष्ट करने वाले, कृपानिधान और कृपालु दीन दयाल हैं पर दासों के दास भी बन जाते हैं। प्रसन्न हो कर देवताओं को स्वर्गलोक का सुख देते हैं, आप स्वयं खीजते हैं पर दूसरों को विष्णुलोक (वैकुंठ) प्रदान करते हैं। ऐसे स्वामी को छोड़ कर जो दूसरों को पाने की इच्छा करते हैं, वे मनुष्य रूपी पशु हैं। पहले दुःख भोग लेने पर अब हमें भोगने के लिए राज्य मिला है, वह भी आपकी कृपा से। अब आप ही बताएं हमसे आपकी स्तुति कैसे बने? हम विकार युक्त हैं, बहुत से निंदनीय कामों को करने वाले हैं पर आपका कीर्तिरूप कीर्तन करने से हमें आपकी कीर्ति ने ही पवित्र बनाया है। इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर श्री कृष्ण की स्तुति कर, अपने दोष गिनवाते हुए अपने भाइयों से कहने लगे।

कवित्त
दादो कानीन पिता गोलक हम कुंडज हैं,
पांच पति एक त्रिया ए हू विपरीति है।
पितामह बंधु विप्र मारे तुच्छ लोभ लागि,
मृत्युलोक राजकाज अतिसै अनीति है।
हमकौं न पंकति दै क्षत्रि ऐसे कर्मकारी,
तिनको सुजश सुन मिटे नर्क भीति है।
भये राजभागी दुखभागी तैं का स्तुति करौं,
कहै नृप कृष्ण की कृपालता की प्रीति है।।४७।।
अपना दादा (व्यास मुनि) कानीन (कुंवारी मत्स्यगंधा के साथ पराशर ऋषि के संयोग से उत्पन) है। पिता (पांडुराज) गोलक (पति के निःसंतान मर जाने पर शास्त्रोक्त विधि के अनुसार उनकी स्त्री से दिगर अथवा सपिंडी पुरूष के नियोग से पुत्र हो वह) हैं। और हम कुंडज (पति रोगी होने पर उसकी आज्ञा से उच्च कोटि के पुरूष से पुत्र उत्पन हो वह) हुए। फिर एक स्त्री (द्रौपदी) के (हम) पांच पति हैं यह भी लोक मर्यादा के विरुद्ध बात है। हम ने तुच्छ लोभ के वशीभूत हो कर पितामह (भीष्म), बन्धु (कौरव) और विप्र (द्रोणाचार्य) को मारा है। मृत्युलोक में राजकाज इतना अनीतिदायक है। हम ने फिर कर्म ऐसे किये हैं कि क्षत्रिय हमें अपनी पंक्ति में नहीं बैठने दें, पर अपना सुयश सुनने से (लोगों के मुंह से) हमारा नर्क का भय जाता रहा। हम दुःख के भागी थे, पर अब राज्य के भागी बन गए हैं। इस तरह राजा युधिष्ठिर कहने लगे कि ऐसे में भला मैं क्या आपकी स्तुति करूं? यह सभी कुछ श्री कृष्ण आप की कृपा का फल है।

दोहा
करी स्तुती नृप धर्म की, करै पाठ जो कोय।
सब भारत के पाठ को, फल पावै नर सोय।।४८।।
कवि कहता है कि धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा (श्रीकृष्ण की) की हुई इस स्तुति का जो कोई पाठ करेगा, वह मनुष्य पूरी महाभारत के पाठ का फल पाएगा।

श्रीकृष्ण उवाच
कवित्त
दान को न मान जाके मान न सयान हू को,
बंश को न मान जाकौं देखत थकात हौं।
दारा पुत्र आतमादि मेरे करि राखै कहा,
ताको उपकार करौं मन में सँकात हौं।
जीव मात्र मेरो रूप जानि सदा पूजत है,
ताके पाप होय क्यों? जो होय तो धकात हौं।
कृष्णचंद्र कहै तो सो होय जो अनन्य भक्त,
मेरो नेम ताके हाथ बेचे तैं बिकात हौं।।४९।।
युधिष्ठिर की स्तुति सुन कर श्रीकृष्ण कहने लगे कि जिसे अपने दिये हुए दान का गुमान नहीं, अपनी बुद्धि पर गर्व नहीं और अपने कुल का अभिमान नहीं ऐसे (युधिष्ठिर) व्यक्ति को देख कर मैं थकित हो जाता हूं अर्थात् मैं उसके द्वारा विजित हूं। फिर जो अपनी स्त्री, पुत्र और आत्मा सभी को मेरा माने (अर्थात् मुझ ही को सभी का आधार माने)। ऐसे व्यक्ति का मैं क्या उपकार करने योग्य हूं? मुझे लज्जा आती है यह कहते हुए कि मैं उपकार करता हूं। जगत के जीव मात्र को मेरा रूप जान कर जो मुझे नित्य पूजता है उसे भला पाप कैसे हो सकते हैं? अर्थात् नहीं हो सकते है। इस पर भी यदि हों तो मैं उन्हें उससे दूर करता हूं। हे धर्मराज! मेरा नियम है कि तुम्हारे जैसा कोई मेरा अनन्य भक्त हो तो मैं उसके हाथों बिकता हूं, और बिकने को सदैव तत्पर रहता हूं।

दोहा
सीख माँगि द्वारावती, गये कृष्ण निज गेह।
दूर निकट हरि रहत तउ, नृप धन बढत सनेह।।५०।।
इसके बाद श्री कृष्ण सभी से जाने की रजा मांग कर द्वारिका पुरी में अपने घर को गए। श्री कृष्ण चाहे दूर अथवा पास रहें पर धर्मराज युधिष्ठिर का उनके प्रति अनुराग तो बढ़ता ही रहता है।

कछुक भीम दुर्वचन तैं, कछु विदूर सुनि ज्ञान।
भो धृतराष्ट्र विरागमय, चाह्यो विपिन प्रयान।।५१।।
इधर कुछ तो भीमसेन के कड़वे वचनों से आहत हो कर और कुछ विदुर की ज्ञान की बातें सुन कर महाराज धृतराष्ट्र को वैराग्य हो गया। इस पर उन्होंने वन में जाने की अपनी इच्छा दरसाई।

माँग्यो नृप सुत धम्र तैं, आतुर व्है आदेश।
कहत युधिष्ठिर दीन व्है, बिस्मय जुक्त बशेष।।५२।।
सीख लेहि ते आपतैं, आप सीख किहि पास।
लेत पिता क्यों करत हौं, हमकों परम निरास।।५३।।
इसके बाद राजा (धृतराष्ट्र) ने धर्मसुत (युधिष्ठिर) से आतुर हो कर वन में जाने की आज्ञा मांगी। इस पर युधिष्ठिर आश्चर्यचकित हो, अत्यधिक विनम्र हो कर कहने लगे कि जिसे आज्ञा लेनी हो आपसे ले। हे पिता! आप किस से जाने की आज्ञा मांगते हैं? फिर आप ऐसा कह कर मुझे दुःखी और निराश क्यों कर रहे हैं?

सुनि लपट्यो गांधारि गर, मूर्छित जथा नरेश।
तबहि पितु कौं धर्म-सुत, जान्यो दुखित विशेष।।५४।।
युधिष्ठिर का यह कहा सुन कर राजा धृतराष्ट्र मूर्च्छित से हो गए और गांधारी के गले से लिपट गए तब पिता को धर्मराज ने इस प्रकार सचमुच विशेष दुखी देखा।

व्यास उवाच
चोथे आश्रम तप करै, सेवै विपिन सप्रीत।
हठ न करहु सुत जान दे, यह राजन की रीत।।५५।।
यह सभी कुछ देख कर वेदव्यास बोले कि हे पुत्र! (युधिष्ठिर) चौथे आश्रम में प्रेमपूर्वक वन में रह कर तपस्या करना, यह राजाओं का धर्म है इसलिए हठ मत कर और इसे (धृतराष्ट्र को) जाने दे!

धर्म पितामह सीख सुनि, ”तथा अस्तु” कहि बैन।
कुल जुत पहुँचावे चल्यो, ढरत अश्रु दोउ नैन।।५६।।
धर्मराज ने पितामह (वेदव्यास) की राय सुन कर ‘तथास्तु’ कहा। और अपनी आंखों से बहते आंसुओं के साथ महाराज धृतराष्ट्र को परिवार सहित पहुँचाने को रवाना हुए।

तृतिय मजल तैं सीख लै, भूप चल्यो निज गेह।
पृथा संग गुरुजन ग्रह्यो, तजि पुत्रन को नेह।।५७।।
यात्रा के तीसरे पड़ाव पर राजा युधिष्ठिर आज्ञा ले कर वापस घर लौटे और कुंती ने पुत्र प्रेम को तिलांजली दे कर गांधारी, और धृतराष्ट्र का संग किया। अपने से बड़ों की सेवा-सुश्रुषा करने के लिए कुंती ने यह निर्णय लिया।

युधिष्ठिर उवाच
तेरे सुख हित वंश को, कर्यो द्विजन जुत पात।
मात छाँडि सुत राज-श्री, किहि कारन बन जात।।५८।।
यह देख कर युधिष्ठिर बोले कि हे माते! आपके सुख की खातिर ही हमने ब्राह्मणों सहित पूरे कुरु वंश का नाश किया और अब आप पुत्र, राजसुख एवं ऐश्वर्य को छोड़ कर किसलिए वन को जा रही हैं! किसलिए?

पृथा कथन
गांधारी धृतराष्ट्र दोउ, सासू स्वसुर समान।
इनकी सेवा इनहि तैं, करिहौं अर्ध तप ध्यान।।५९।।
कुंती ने प्रत्युत्तर में कहा कि हे पुत्र! गांधारी और धृतराष्ट्र ये दोनों सास-श्वसुर समान हैं। मैं इनकी वहाँ सेवा करूंगी और इनकी सेवा में ही अपना धर्म और तपस्या पा लूंगी।

कवि कथन
नृपति त्रियाजुत विदुरजुत, संजय पृथा समेत।
तप हित बिपिन निवास किय, व्यासाश्रम जुत हेत।।६०।।
कवि कहता है कि इसके बाद राजा (धृतराष्ट्र) ने अपनी स्त्री (गांधारी) सहित, विदुर, संजय और कुंती को साथ ले कर, तप करने हेतु वन के व्यासाश्रम में निवास किया।

दोहा
तृतिय वर्ष तित धर्म-सुत, आयो दर्शन लैन।
व्यास कृपा देखी सबनि, मरी सैन्य निज नैन।।६१।।
बाद में तीसरे वर्ष धर्मराज उनके दर्शन करने के लिए वहाँ आया। यहीं पर वेदव्यास की कृपा से उसने अपनी आखों से पूरी सेना को मरा हुआ देखा।

निकरि विदुर की देह तैं, धर्मराज को अंश।
लीन जुधिष्ठिर मैं भयो, सब देखत रिखिबंश।।६२।।
इसी अवसर पर महात्मा विदुर की देह से धर्मराज के अंश को निकल कर युधिष्ठिर की देह में प्रवेश करते हुए, सभी ऋषि-मुनियों ने देखा।

गयो युधिष्ठिर गेह पुनि, एक वर्ष उपरंत।
दाह लग्यो बन ताहि मैं, भयो मातु-पितु अंत।।६३।।
युधिष्ठिर के वापस हस्तिनापुर लौटने के एक वर्ष बाद, वन में आग लगी और उस अग्नि में जल कर माताओं (कुंती एवं गांधारी) तथा पिता का अन्त हो गया।

दी आज्ञा धृतराष्ट्र ने, संजय बद्रि निकेतु।
गयो बहुरि तप करन कौं, आयु रहि यहि हेतु।।६४।।
वन में आग लगने के समय वहाँ से संजय को भाग कर निकल जाने की आज्ञा धृतराष्ट्र ने दी थी, इसलिए वह बच गया और उस के शेष दिनों में उसने बद्रिकाश्रम में जा कर तप किया।

मिले कृष्ण तैं बहुत दिन, भये पार्थ जिय जान।
लैं आज्ञा नृप तैं कर्यो, द्वारापुरी प्रयान।।६५।।
इधर अर्जुन को श्रीकृष्ण से मिले बहुत दिन हो गए थे। उसने मन में मिलने की सोच कर, राजा युधिष्ठिर से जाने की आज्ञा मांगी और द्वारिकापुरी की ओर रवाना हुआ।

मिलि हरि तै कोउ काल तित, कीने विविध विहार।
लखि नासागम जदुन को, बोले कृष्ण उदार।।६६।।
अर्जुन ने श्री कृष्ण से मिल कर कुछ समय तक वहाँ आनन्दपूर्वक विहार किया। फिर यादवों के विनाश का भविष्य जान कर उदार कृष्ण बोले।

छंद पद्धरी
नर ह्वैहैं सुनि यदुवंश नाश, पुनि मृत्युलोक तजिहौं प्रकाश।
जुत त्रियन जाहु लै वज्रनाभ, मधुपुरी राज दीजहु सु लाभ।।६७।।
दिन दसेक बीच मर्याद लोपि, करिहै पुर मंजन उदधि कोपि।
मेरी यह इच्छा जानि मीत, पुर स्वर्ग मिलहु मोतैं सप्रीत।।६८।।
हे अर्जुन! सुन, यदुवंश का नाश होगा फिर इस मृत्युलोक से मैं अपने प्रकाश को तजूंगा। इससे अब तू इस स्त्रीमंडल सहित वज्रनाभ (अनिरूद्ध का पुत्र) को ले कर जा और इसे मथुरा के राज्याभिषेक का लाभ देना। अर्थात् इसे वहाँ का राजा बना देना। अब आने वाले दस-पन्द्रह दिनों में समुद्र कुपित हो कर स्वयं की मर्यादा का लोप कर इस द्वारकापुरी को डूबो देगा। हे मित्र! मेरी यह इच्छा जान और प्रेम पूर्वक मुझसे फिर स्वर्गलोक में मिलना।

अर्जुन उवाच
छंद ललित
अखिल जक्त के, हेतु रूप हो। नर शरीर तैं, विश्वभूप हो।
निगम गान तैं, पार तोर ना। स्तुति करौं यथा, बुद्धि मोर ना।।६९।।
बुध बिरंचि से, भूलि जात है। प्रबलता रमा, यों दिखात है।
डरत सो सदा, तेज आपतैं। रहत काल कौं भीति ताप तैं।।७०।।
ऐसा सुन कर अर्जुन स्तुति रूप कहने लगा कि हे प्रभु! आप पूरे जगत के कारण रूप हो, मनुष्य की देह में विश्व के राजा हो। वेदों के अनुसार आपका पार नहीं। आपकी यह स्थिति देख कर मैं आपकी स्तुति करूं, इतनी मुझ में बुद्धि नहीं। आपकी माया इतनी प्रबल है कि ब्रह्मा जैसे विद्वान भी उसे पूरा नहीं बता सकते हैं। वे बीच में भूल जाते हैं। वही माया आपके पराक्रम से बराबर डरती है और यमराज को भी आपके क्रोध से भय लगता है।

तुम अधीन तैं, दीन दास तैं। अनुगमे जियो, या हुलास तैं।
अब न दास को, त्याग कीजिये। विरह ना सहौं, गैल लीजिये।।७१।।
मिलि रह्यो सदा, सेज यान हू। कछु न मैं गिन्यो, लाभ हानि हू।
विषमता परी, जत्र तत्र ही। सुलभता करी, तत्र तत्र ही।।७२।।
आपका अनुगमन कर ही मैं दीन एवं दास अब तक सुखपूर्वक जीवित रहा हूं, इससे आप अब मुझ सेवक का त्याग नहीं करें। मैं आपका वियोग सहन नहीं कर पाऊंगा इसलिए आप मुझे अपने साथ ले चलें। मैं तो प्रत्येक वाहन में और शयन में सदा आपके साथ रहा हूं। मैंने अब तक अपनी कोई लाभ-हानि का कभी विचार नहीं किया क्योंकि आपके रहते मुझे इसकी आवश्यकता नहीं पड़ी। फिर जहाँ-जहाँ मुझे आपदा ने घेरा आपने वहाँ-वहाँ मेरी अदेर सहायता की है।

चरण दास कौं, यों न छोरिये। कलि कलंक मैं, नाहिं बोरिये।
जदुन को यहाँ, नाश होय हैं। रहत जो त्रिया, बाल रोयहैं।।७३।।
नयन देखिकै, या अभद्र कौं। कहिहौं मैं कहा, कौरवेन्द्र कौं।
विपत्ति और तो, शीष डारिये। चरच संग तै नाहिं टारिये।।७४।।
अपने चरणों के सेवक को आप इस प्रकार न छोड़ें और कलियुग के कलंक में मुझे मत डुबोइये। यहाँ जब यादवों को नाश होगा, तब जो स्त्रियां और बालक शेष रहेंगे, वे सभी रो रो कर मर जाएंगे। इस अमंगल को मैं अपनी नजरों से प्रत्यक्ष देख कर राजा युधिष्ठिर को क्या बताऊंगा? हे प्रभु! और कोई विपत्ति हो तो मुझ दास के सिर पर डाल दें पर आप अपने चरणों के साथ से मुझे विलग न करें!

दोहा
सुनि विनती यह विजय की, कृष्ण कह्यो समझाय।
पांच भ्रात गिरि तुहीन मैं, देह गारियो जाय।।७५।।
अर्जुन की यह अनुनय सुन कर श्रीकृष्ण ने उसे समझाते हुए कहा कि हे अर्जुन! तुम पांचों भाई हिमालय पर जा कर अपनी देह को गला देना।

भयो तुम्हारो जगत बिच, कुल बिनास अपवाद।
यह शांती अपवाद की, करहु न और विषाद।।७६।।
क्योंकि जगत में तुम्हारा वंश विनाश रूप अपवाद है। इस अपवाद (निंदा) को शान्त करना। दूसरा कोई खेद नहीं करना।

तूं तो मेरो रूप है, मिलिहै मो तैं आय।
फिर लैंगे अवतार कछु, ऐसो कारन पाय।।७७।।
फिर हे अर्जुन! तू तो मेरा ही रूप है इससे तू मुझसे आ मिलेगा और कोई कारण देख कर, हम फिर से अवतार लेंगे।

छंद पद्धरी
सुनि चल्यो पाथ जदुत्रिय लिवाय, पथ बीच लुटेरे मिले आय।
उद्यम न किरीटी फुर्यो रंच, व्है गये अस्त्र शस्त्र हि प्रपंच।।७८।।
लै गये जदुन की त्रिया लूटि, परिपंथी बाण न सके छूटि।
सुर-असुरन गांजिवधर अजेय, तिहि छत हर्यो धन अप्रमेय।।८०।।
श्री क्रष्ण की बात सुनकर अर्जुन यादवों की स्त्रियों को ले कर वहाँ से चला तो रास्ते में उन्हें रोकने को लुटेरे आ मिले। अर्जुन को कोई उपाय नहीं सूझा और उसके सारे अस्त्र-शस्त्र धरे रह गए। जैसे वे आयुध न होकर और आयुध का प्रपंच हों। अर्जुन से उनके सामने एक बाण भी नहीं छोड़ा गया। देवताओं और दैत्यों से अजेय अर्जुन के होते, उसके गांडीव के रहते भी कुछ न हुआ और लुटेरे उन स्त्रियों को लूट कर ले गए।

अकुलाय आपघात हि बिचार, व्यास तैं कहे पूरब प्रकार।
श्रीव्यास कही निज घात निष्ट, बड़न तैं बड़ी माया बलिष्ट।।८१।।
सोइ माया प्रेरक जगत ईश, उन ईश बिना सारे अनीश।
बहुतन तैं ऐसी बहुत बेर, व्है जात पुत्र रवि बिच अँधेर।।८२।।
इस पर अर्जुन ने अकुला कर आपघात करने की सोची, फिर व्यास मुनि से मिल कर उसने सारी बात कह सुनाई। तब वेदव्यास कहने लगे कि आत्महत्या करना तो जघन्य कर्म है। हे अर्जुन! बड़ों से बड़ी बलवान है माया। जगदीश्वर इस माया के प्रेरक हैं उनके बिना पूरा जगत अनाथ है। बहुत से लोगों से बहुत बार ऐसा हो जाता है इसलिए अफसोस मत कर। हे पुत्र! सुन, दिन में भी अंधेरा हो जाता है।

सुनि व्यास वचन कछु तजि विषाद, आयो हथनापुर अप्रमाद।
गिरि पर्यो युधिष्ठिर चरन बीच, अश्रुन तैं दीनी भूमि सींच।।८३।।
उठावत युधिष्ठिर उठत नाहिँ, मिलि रह्यो शीष दोउ चरन माहिँ।
वेदव्यास के वचन सुन कर अर्जुन का विषाद थोड़ा कम हुआ और वह हस्तिनापुर आ गया। आते ही राजा युधिष्ठिर के चरणों में गिर पड़ा और रो रो कर अपने आंसुओं से आंगन को गीला कर दिया। युधिष्ठिर ने उसे उठाने का प्रयास किया पर वह नहीं उठा। अपना सिर उनके चरणों पर रख कर रोता रहा।

युधिष्ठिर उवाच
इतनो प्रलाप किहि रीत तात, तूं कहत बात नहिँ कही जात।।८४।।
अनिमित्त भये इत हू अनेक, रौधरी वृषा आदी कितेक।
है सकुल कृष्ण तो कुशल तात, कछु कहहु मोर हिय फटत जात।।८५।।
अर्जुन की यह स्थिति देख कर युधिष्ठिर बोले हे भाई! इतना प्रलाप करने का क्या कारण है? तू बात कहने को तत्पर है पर तुझसे बात कही नहीं जाती। यहाँ से तेरे जाने के बाद रक्त की वर्षा आदि कई प्रकार के अपशकुन हुए हैं। हे भाई! अपने कुटुम्ब सहित श्री कृष्ण कुशल तो हैं ना? कुछ तो बोल! मेरा कलेजा फटा जा रहा है।

अर्जुन उवाच
नहिँ सकुल कुशल ते कृष्णचंद्र, जिनके प्रताप जीत्यो सुरेंद्र।
जिहि कृपा द्रौन भीषम मिटाय, इक छत्र राज तव कर्यो न्याय।।८६।।
जिहि बिटप छाँह सुख मिल्यो राज, वायो कुवायु ढहि पर्यो आज।
अर्जुन ने रोते रोते कहा, हे महाराज! जिनके प्रताप से मैंने इन्द्र को जीता था। जिनकी कृपा से हमने भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य जैसे अजेय योद्धाओं का नाश किया और एक छत्र राज्य की प्राप्ति हुई। वही कृष्ण अपने कुल सहित कुशल नहीं। जिस वृक्ष की छाया तले हमें राज्य वैभव का सुख प्राप्त हुआ, वही श्री कृष्ण रूपी महावृक्ष, कुवायु के बहने से ढह पड़ा, उखड़ कर गिर गया!

कवित्त
भाग्यो डरि उत्तर सो गह्यो विपरीत दौरि,
ताही वेष हू मैं पीठ अरि कौं बताई ना।
अखय निखंग खय भये बन बीच शिव,
कपट निषाद तात तो हू क्षमा आई ना।
नाग देव दैत्यन तैं विजय करैया मेरो,
नाम ही विजय कृष्ण बिना विजै पाई ना।
गांजिब अखय तून जुक्त मो छतै ही लुटि,
जादौन की शेष गई बनिता बचाई ना।।८७।।
हे महाराज! जहले जब विराटराज की गायों को घेरने वाले संग्राम में उत्तरकुमार शत्रुओं से डर कर भागा था, उस समय उसे मैंने दौड़ कर पकड़ लिया था उस कुवेश (बृहन्नला के भेष) में भी मैंने शत्रुओं को अपनी पीठ नहीं दिखाई। श्री शंकर भगवान कपट रूप भील हो कर वन में मेरे सामने आए, उस समय मेरे अक्षय तूणीर का क्षय हो गया था, तब भी मैं नहीं रूका, बराबर लड़ता रहा। मैंने अपने नाम विजय के अनुरूप नागलोग, देवलोक और दैत्यों पर विजय पाई, पर यह सभी कुछ श्रीकृष्ण का प्रताप था। मैंने कुछ नहीं जीता, क्योंकि वही मैं, अपने गांडीव धनुष और अक्षय तूणीर के रहते, यादवों की शेष रही कुछ स्त्रियों की रक्षा न कर सका और वे मेरे देखते-देखते लूट ली गईं।

छंद पद्धरी
नृप सुनत विजय मुख विषम बात, भो बिबस जथा वस सन्यपात।
कछु काल बीति सुधि भई भूप, किय दान मही आदी अनूप।।८८।।
परिक्षीत तरुन शिर छत्र धारि, सौंप्यो युयुत्सु कौं राज्यभार।
अर्जुन के मुँह से ऐसी विषम (कड़वी, खेद की) बात सुन कर राजा (युधिष्ठिर) जैसे सन्निपात में आ कर कोई बेभान हो जाए वैसी हालत में आ गए। थोड़ा समय बीतने के बाद राजा फिर से सचेत हुए, तब उन्होंने पृथ्वी आदि का (जागीर रूप) अनुपम दान किया और अभिमन्यू के पुत्र राजकुमार परीक्षित के सिर पर स्वयं का मुकुट उतार कर रख दिया और राजकार्य का सारा भार युयुत्सु को सोंप दिया।

छंद कुरंगडांण
राज पै विराज कै, सबंधु धर्म काज।। तीस षष्ठ वर्ष कीन, एक छत्र राज।।
दीन तैं अधीन और रुष्ट शीष दंड।। आयकै परत पाय, देख खंड खंड।।८९।।
धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने बन्धुओं सहित राज्य सिंहासन पर बैठ कर छत्तीस वर्ष तक राज्य किया। एक छत्र इस चक्रवर्ती राजा ने गरीबों की सहायता की, उनकी रक्षा की और दुष्टों का संहार किया। खंड-खंड के देशपति आकर उनके चरणों में अपना मस्तक झुकाते थे।

दै अनेक दान विप्र, वृंद्ध कौं उदार।। तीन अश्वमेध कीन, टारि भूमिभार।।
नाग नाम ग्राम पै, परीक्षितैं बिठाय।। बज्रनाभ कौं पुरी सु, माथुरा पठाय।।९०।।
पृथ्वी से अनाचार मिटा कर उन्होंने तीन अश्वमेघ यज्ञ किए और ब्राह्मण समूह को अनेक प्रकार का दान दिया। हस्तिनापुर में परीक्षित को राज्यासन पर बिठाया और वज्रनाभ (अनिरुद्ध के पुत्र) को मथुरापुरी में भेज कर, वहाँ उसका राज्याभिषेक करवाया।

पांच बंधु द्रौपदी, समेत छांडि भौन।। हेम अद्रि ह्वै प्रवेश, धारि स्वर्ग गौन।।
द्रौपदी समेत चारि, बंधु देह खीन।। भूप मृत्यु देह तैं सु, नाक गौन कीन।।९१।।
फिर द्रौपदी के साथ पाँचों भाइयों ने राजप्रसाद का त्याग कर, स्वर्ग में जाने की सोच कर हिमालय में प्रवेश किया। इसमें भी द्रौपदी और चार भाइयों का शरीर हिमालय में क्षीण हो कर गल गया और धर्मराज सदेह स्वर्ग लोक को गए।

व्योम गंग न्हायकै सु, दिव्य देह धारि।। वंश तै मिल्यौ नरेंद्र, इंद्र पै पधारि।।
जौन अंस जौन को सु, तौन बीच लीन।। ह्वै गयो सु धर्मराज, गौन तैं अधीन।।९२।।
वहाँ आकाशगंगा में स्नान कर, धर्मराज ने दिव्य देह धारण की। फिर इन्द्र के पास जा कर अपने वंश के अग्रजों एवं पूर्वजों से मिले। इस तरह धर्मराज की देह में व्याप्त रहा जिस-जिस का अंश था, वह फिर से अपने-अपने स्रोत में जा मिला और उसमें लीन हो गया।

अनुष्टुप छंद
वैष्णवानां यथा शंभू, देवानां गरुड़ध्वज:।
नदीनां च यथा गंगा, शस्त्राणां भारती कथा।।९३।।
वैष्णवों में जिस प्रकार अग्रगण्य महादेव शिव हैं, देवताओं में जैसे श्रीमन्नारायण (विष्णु भगवान) हैं और नदियों में जैसे गंगा सर्वोत्तम है उसी प्रकार शास्त्रों में अग्रगण्य महाभारन की कथा है।

इदं भरतमाख्यानं, य: पठेच्छृणुयान्नरः।
अश्वमेघाऽधिकं पुण्यं, लभते नात्र संशयम्।।९४।।
यह भारत का आख्यान है, इसका जो मनुष्य पठन-श्रवन करे, वह अश्वमेध यज्ञ के फल से भी अधिक फल प्राप्त करेगा। इसमें संशय नहीं।

इदं श्रुत्वा यथा शक्त्या, ब्राह्मणान् भोजयेन्नर:।
हत्वा सोऽघ समूहं च, ह्यंते विष्णुपदं व्रजेत।।९५।।
इस को (महाभारत की कथा को) सुन कर यथाशक्ति (जो मनुष्य) ब्राह्मणों को भोजन कराए उसके सारे पापों का नाश हो जाता है और वह श्री विष्णु भगवान के चरणों को प्राप्त होता है।

दोहा
मोहि जश सुनौ कि ना सुनौ, जन जश सुनौ जरूर।
ऐसो श्रीमुख को वचन, सुन्यौ निकट अरु दूर।।९६।।
यहाँ कवि श्री स्वरूपदास जी भगवान के भक्त की महिमा बताते हैं कि श्री मुख (भगवान) के सामीप्य (गुरुमुख) वचन और दूर (ग्रंथों में) के वचनों से ऐसा सुना है कि (हे मनुष्यो!) मेरा यश सुनो कि ना सुनो, परन्तु मेरे भक्त का यश जरूर सुनो।
(कवि के कहने का तात्पर्य है कि मैंने यह जो यश वर्णन किया है, वह भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त पांडवों का सुयश है। इसलिए यह भगवत्प्रेमियों के लिए अवश्य सुनने योग्य है। )

फिरि चाकर जश हौन तैं, ठाकर को अधिकार।
दरसत यह विख्यात है, मैं का कहौं पुकार।।९७।।
फिर सेवक का यश होने से स्वामी की महत्ता अपने आप प्रकाशित हो जाती है, इसलिए मैं ऊंची आवाज में पुकार-पुकार कर अधिक क्या कहूँ?

ता तै कीनी चंद्रिका, मेरी मति अनुमान।
भक्त संग अरु भक्ति को, देहु कृपानिधि दान।।९८।।
कवि कहता है कि यही सोच कर मैने अपनी बुद्धि के अनुसार यह चंद्रिका (पाण्डव यशेन्दु चन्द्रिका) रची है। इससे हे कृपानिधि भगवान! आप मुझे भक्त का संग दें और भक्ति का वरदान भी।

दोहा
पंगुल गूंगो रोगजुत, बनिक क्षुधातुर जीव।
भयजुत बालक त्रिय अचख, सुनत अनाथ सदीव।।९९।।
अपंग, गूंगा, रोगी, बनिया (नफा नुकसान के द्वंद्व में फंसा), भय युक्त जीव, बालक, स्त्री और अंधा ये सभी अनाथ गिने जाते हैं, ऐसा मैंने सुना है। (कवि स्वयं को सभी प्रकार से अनाथ मानता है, यह भगवान को दिखाने के लिए सभी अनाथ गिनाये है)

कवित्त
ज्ञान और बिराग दोउ पायन बिना हौं पंगु,
भक्ति रसना तैं हीन गुंग ही निहारोगे।
त्रिधा ताप रोगी कर्म बानिज बनिक हौं मैं,
भूखे दशधा को केउ जन्म को बिचारोगे।
काल-भीत बाल-बुद्धि आतमा है अबला औ,
अंध तत्व-अंजन बिना हौं नेक धारोगे।
एक अंग के अनाथ, ताके बिके सुनै हाथ,
आदि अंत मैं अनाथ, नाथ क्यों बिसारोगे।।१००।।
कवि कहता है कि हे प्रभु! मैं ज्ञान और वैराग्य रूपी दोनों चरणों के बिना अपंग हूं। भक्ति रूपी जीभ न होने से मूक हूं, अब आप ही कृपा कर मेरी ओर निहारें! तीन तरह के तापों (आधि-देविक, आधि-भौतिक, आध्यात्मिक) का मारा रोगी हूं। वाणिज्य धर्म (नफा नुकसान रूप कर्म) से मैं बनिक हूं। और कितने ही जन्मों का दस (पांच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेंन्द्रिय) प्रकार से भूखा हूं अर्थात् जन्म जन्मान्तरों से यह भूख बनी हुई है। मृत्यु के भय से युक्त हूं। आत्मा से अबला, बुद्धि से बालक हूं और ब्रह्मतत्व के अंजन बिना अंधा हूं। इनका थोड़ा ख्याल करें। हे नाथ! जो एक अंग से अनाथ था, ऐसे (भक्त) के हाथ आप बिके हैं ऐसा सुना है। पर मैं तो आदि-अंत अनाथ हूं, इसलिए आप मुझे नहीं बिसारोगे। आप मुझे सनाथ करोगे।

छप्पय
पँगु कुबज्या संपाति, गंगा जमलार्जुन गावत।
रोगी माधवदास, बनिक तिरलोचन ध्यावत।।
क्षुधित सुदामा विप्र, भीतजुत ब्रज की भामनि।
बालक ध्रुव प्रह्लाद, अबल द्रुपदादिक कामनि।।
हैं अंध सूर लौं हम सुने, हाथ बिके तिनके हरी।
जग के निवास सब गुनन जुत, श्रूपदास बिनती करी।।१०१।।
कवि कहता है कि हे नाथ! कुब्जा (कंस की दासी) और संपाति (जटायु का भाई) ये अपंग थे। यमलार्जुन (शाप रूप दो वृक्ष) वाचा रहित थे ऐसा महापुराण (श्रीमद्‌भागवत) कहता है। माधवदास रोगी थे और त्रिलोचन नामक बनिया, दिन रात प्रभु के नाम स्मरण में संलग्न रहते थे अर्थात् भक्त थे। ब्राह्मण सुदामा भूखा (गरीब) था, ब्रज की स्त्रियां भययुक्त (कंस से) थीं। ध्रुव और प्रहलाद बालक थे। द्रौपदी आदि अबलाएं (अबला) थीं और सूरदास अंधे थे। हमने सुना है कि इन सारे अनाथों को आपने अपनी कृपा से सनाथ किया। आप उनके रक्षक बने। कवि स्वरूपदास कहता है कि ऐसे सर्व गुण सम्पन्न, जगत के पति रूप हे प्रभु! मैं भी सनाथ (आपके हाथों) होने के लिए विनती कर रहा हूं।

क्षमा याचना
दोहा
रस रु अलंकृत ग्रंथ मैं, लिखे नाहिँ इह भाय।
समझहि बुधजन बिनु लिखे, अबुध लखै न लिखाय।।१०२।।
पिंगल डिंगल संसकृत, सब समझन के काज।
मिश्रत सी भाषा करी, छिमा करहु कविराज।।१०३।।
यहाँ कवि स्वयं विद्वान कवियों से क्षमा याचना करते हुए कहता है कि, इस ग्रंथ में जहाँ-जहाँ रस-अलंकार होंगे, वहाँ-वहाँ सुजान लोग बिना लिखे ही समझ लेंगे और जो अजान (अविद्वान) जन हैं, वे लिखने पर भी नहीं समझेंगे। यही सोच कर मैंने हर जगह अलंकार टांकने का प्रयत्न नहीं किया है।
पिंगल (ब्रजभाषा का राजस्थान में प्रचलित नाम), डिंगल (मरुभाषा) और संस्कृत भाषा को मिला कर मैंने मिश्रित सी भाषा का प्रयोग सर्वसाधारण के आसानी से समझने के लिए किया है। इसके लिए हे कविराजाओ! मुझे क्षमा करना।

सोरठा
नृप रस को बल नीक, भूषित ध्वनि आदिक भयो।
दूषन खर नजदीक, भारवाह मेटहि कि भा? ।।१०४।।
पृथम अर्थ (सावयव रूपकालंकार रूप) – इस ग्रंथ में रसरूप राजा का, ध्वनि (अलंकार) आदि सभी तरह से शोभायमान सैन्य (रथ, हाथी आदि) है। इसके पास (इस में) दूषण रूपी खल पुरुष भी नजर आएं तो विद्वजन उन्हें मिथ्या निंदा रूपी भार उठाने वाले मान कर, नजरअन्दाज कर देंगे।
दूसरा अर्थ (श्लेषालंकार रूप) इस ग्रंथ के (कद्रदान, विद्वान) महाराजा (बलवन्तसिंह जी रतलाम) को ध्वनि (अलंकार) से भूषित रस का सर्वविधि ज्ञान है। उनके पास दूषण रूपी खल पुरुष भी नजर आएं तो वे उन्हें मिथ्या निंदा रूपी भार ढोने वाले मान कर नजरअन्दाज कर देंगे।

दोहा
कलजुग छोटे ग्रंथ कौं, लिखे पढ़ै सब लोक।
तातैं श्र्लोक हजार त्रय, सर्व ग्रंथ को ओक।।१०५।।
इस कलियुग में छोटे ग्रंथ को सभी लोग लिख पढ़ सकते हैं यही सोच कर पूरे ग्रंथ (महाभारत, एक लाख के लगभग श्लोक वाली) को अधिक से अधिक तीन हजार श्लोक (छंद) वाला आकार ही दिया है।

कविता की रचना भई, वाच छंद बच लीन।
नई उक्ति कवितान मैं, कथा सँकीरन कीन।।१०६।।
इस काव्य की रचना में वाणी को छन्दोबद्ध करने का प्रयत्न है, और कई छन्दों में नई उक्तियों का सहारा ले कर, मूल कथा के आकार को संक्षिप्त किया है।

नहि कविता को धर्म है, नहिँ भारत की बात।
निक मैं चंचलता करी, करहु क्षमा कवि व्रात।।१०७।।
इस ग्रंथ में कविता के धर्म को भी यथार्थ रूप से नहीं निभा पाया हूं और न मैं पूरी महाभारत की कथा को यहाँ निरूपित कर पाया हूं। कवि कहता है कि यहाँ मैंने धैर्य न रख कर थोड़ी चंचलता से कार्य किया है मेरी इस बात को है कविगणो! आप क्षमा करना।

हृन्नयनांजन तैं सुमत, उक्ति चंद्रिका थान।
बुद्धि विभव वृतिबोध तैं, श्रूपदास को जान।।१०८।।
ग्रंथ कर्त्ता की विनती है कि हे सुजान जनो! मेरे ‘हृन्नयनांजन’ ग्रंथ से मेरा (स्वरूपदास का) मत-सिद्धान्त जान कर, ‘पांडव यशेन्दु चन्द्रिका’ से मेरे युक्ति चमत्कार और ‘वृत्तिबोध’ ग्रंथ से बुद्धि वैभव का आकलन करना।

।।इति षोड़श मयूख।।

।।परिशिष्ट।।

(यहाँ दी जा रही सामग्री रुद्रसिंह तोमर द्वारा संपादित कृति से है जो इस प्रति में समाहित की गई सामग्री के अतिरिक्त है)

दोहादिक छंद के प्रबंधन के आल बाल,
बीरन की कीर्ति बनस्पति सी लगाई है।
शब्द पत्र अलंकार पुष्प नाना रंग भरे,
बारा रस जुदे-जुदे फलों की निकाई है।
हरी हरीदासन कों जस है फलों को रस,
मूके गरे जरे नांहि सर्वदा सहाई है।
कवि लोग रसिकों की उदासी उचाटिकासी,
वाटिका सी ‘श्रूपदास’ चंद्रिका बनाई है।।
दोहा आदि अनेक छंदों के सहारे मैंने वीरों की अक्षय कीर्ति रूपी गाछ-बिरछ और लता-द्रुम की पौध लगाई है। जिससे विकसित नानाविध वनस्पति में शब्द रूपी पत्ते हैं और अलंकार रूपी भांति-भांति के रंग रंगीले पुष्प हैं। यही नहीं मैंने बारह प्रकार के विविध रस रूप फलों का सृजन किया है। हरि (कृष्ण) और हरि भक्त (अर्जुन) का यश इन फलों का रस है। इस वाटिका के पेड़-पौधों के भक्ति- फल कभी न सूखने वाले, न गलने वाले और न कुम्हला कर गिरने वाले है। काव्य रसिकों और कविजनों की उदासी को क्षण भर में मिटा कर उनका मन प्रफुल्लित कर देने वाली एक वाटिका सी यह पाण्डव यशेन्दु चंद्रिका मैंने बनाई है। सुह्रद पाठक इसकी सैर अवश्य करें।

दोहादिक छंद के प्रबंधन के महलों पै,
अनोठी जो उक्ति हू की ध्वजा फहराई है।
चोहटा प्रसाद काव्य ब्योपारी कविन काज,
साहित्यिकी साहिति की गूदरी लगाई है।
कर्नादिक-कीरति सो रय्यत अबाद राखी,
पावन हरी को जस भूप छवि छाई है।
है तो मति बिगरी सी कोविद क्षमासी कीज्यो,
‘श्रूपदास’ नगरी सी ‘चंद्रिका’ बसाई है।।
दोहा सहित अन्यान्य छंदों की सहायता से निर्मित काव्य-महल पर अपनी अनूठी उक्तियों की मैंने फहरती ध्वजा बनाई है। इस काव्य के प्रसाद गुण रूप में मैंने अनेक चौराहों का निर्माण किया है जहाँ काव्य-रसिक पाठकों और साहित्यप्रेमी कवियों के लिए गुदड़ी बाजार सी हाट सज सके। इस नगरी में कर्णप्रिय कीर्ति रूपी प्रजा आबाद है और पवित्र हरि का यश, राजा रूप विद्यमान है। मेरी मति कुछ बिगड़ी हुई सी है (अल्पज्ञ हूँ) अतः सुविज्ञ कविजनो। मुझे क्षमा करना पर इस पाण्डव यशेन्दु चन्द्रिका रूप मेरी बसाई नगरी का अवलोकन अवश्य करना।

।।इति पांडव यशेंदु चन्द्रिका।।

 

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