पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – चतुर्थ मयूख

चतुर्थ मयूख

महाभारत कथा प्रारंभ

आदिपर्व

विचित्रवीर्य वंशकारक और भारत ग्रंथकारक श्री वेदव्यासोत्पत्ति
पद्धरी छंद
भो मद्रकेत गंधर्वराज, अद्रिका त्रिया शोभा समाज।
तिहि रिषि सराप झख जोनि पाय, उद्धार ऋषिहि दीनो बताय।।१।।
कोउ मनुज वीर्य भजि पुत्रि होय, दंपत्ति निज गति तुम लहहु दोय।।
एक मद्रकेत नामक गंधर्वों का राजा हुआ, और समाज की शोभा रूप आद्रिका नाम की स्त्री थी। उसे किसी ऋषि का श्राप था जिससे वह मछली की योनि में थी। शाप के वक्त, अनुग्रह की याचना में स्तुति करने पर, मुनियों ने उसे उद्धार का रास्ता बताया कि यदि किसी पुरुष के वीर्य के सेवन से ही तुम्हें पुत्री लाभ हो तो इससे तुम दोनों स्त्री-पुरुष तुम्हारे गंधर्व राज की गति को प्राप्त होंगे।

वसु नाम कँवर आखेट काज, पितु वचन लागि गो जुत समाज।।
तिहि वाम नाम गिरिका सु ताहि, रुतिवति पठये शुक कँवर पाहिँ।।२।।
धरि नलिका वीरज शुकहि दीन, जमुना पर निकर्यो सो प्रवीन।।
सिंचान झपट मारी सु ताहि, वह वीर्य गिर्यो रविजा प्रवाहि।।३।।
इसके बाद कोई वसु नाम का राजकुमार, स्वयं के पिता के वचनों की आज्ञापालन में, शिकारियों के दल के साथ शिकार को वन में गया। उसी समय उसकी गिरिका नामक स्त्री ने ऋतुमती होने पर अपने पाले हुए तोते को शिकार पर गए अपने पति के पास भेजा। तोते द्वारा लाए सन्देश को पढ़ कर राजकुमार ने उसी समय एक नलिका में स्वयं का वीर्य भर कर तोते को दिया। आकाशगामी तोता नलिका लेकर यमुना नदी पर से होकर गुजरा, इसी समय बाज पक्षी द्वारा झपट्टा मारने पर उसके मुँह की नलिका टेढ़ी हो गई और वीर्य नदी में गिर पड़ा।

सो मीन निगलि जातिहि सुभाव, गर्भ स्थित भो ताहि प्रभाव।
सो जाल परी कहु कर्म जोग, विधि वाहि शाप को भो वियोग।।४।।
वीदीर्ण उदर इक पुत्रि पाय, सो करी कीर सेवा सुभाय।
पुनि भयो अंग यौवन प्रवेश, बिध बिधहि बढ़त शोभा विशेष।।५।।
उस वीर्य को मछली ने स्वभावगत निगल लिया, जिसके प्रभाव से गर्भ रहा। अपने कर्म योग से वही मछली धीमर के जाल में फँस गई। इस तरह वह अपने शाप से मुक्त हुई कि धीवर के पेट चीरने पर उसे एक पुत्री प्राप्त हुई। इसे उसने पाल पोष कर बड़ा किया। जब वह पुत्री जवान हुई तो उसकी सुन्दरता की सब ठौर चर्चाएं होने लगीं।

मछगंधा इक दिन सरित तीर, एकाकि भई अंतर अधीर।
द्विज परासर्य कहि तातकाल, मोहि पार कर हू मति नटहु बाल।।६।।
भयजुक्त नाव प्रेरी सुभाम, कन्या लखि रिषि भो विवश काम।
रति जाची ता पहँ रिषि अधीर, शर मन्मथ छेद्यो जिहि शरीर।।७।।
उस पुत्री का नाम धीवर ने मत्स्यगंधा रखा। एक दिन मत्स्यगंधा नदी किनारे गई, वहाँ अकेली होने की स्थिति में, मन ही मन डर रही थी कि उसी समय पराशर मुनि ने उससे कहा कि हे बाला! मुझे तू नदी पार करवा दे, ना मत कहना। यह सुन कर उस भली स्त्री ( भोली लड़की) ने डरते-डरते नाव खोली और मुनि को बैठा कर नाव खेने लगी। नाव में बैठे ऋषि पराशर अनिंद्य रूपवती उस कन्या को देख कर कामासक्त हो गए जैसे कि कामदेव के बाण ने उन्हें बींध डाला हो। मुनि ने अधीर होकर कन्या से संयोग करने की मांग रखी।

कन्या तब बिनती करी ताहि, इक दिवस बहुरि कन्यत्व आहि।
धूम्र तैं कयो रिषि अंधकार, पुनि कहो मोहि भजि सहित प्यार।।८।।
जो नटै श्राप देहूँ जरूर, कन्या न नटी रिषि लखि करूर।
खिण मात्र नाव बिच संग पाय, व्रतभ्रंग भयो रिषिवर लजाय।।९।।
कहि कन्या दूषण लग्यो मोहि, ताको प्रयत्न अब जुक्त तोहि।
तिहि वीर्य उपजि जद वेदव्यास, अवतार अंश सब जग उजास।।१०।।
इस पर कन्या ने निवेदन किया, मुनिवर, एक तो अभी दिन का समय है और दूसरा अभी मैं कुंवारी हूँ। यह सुन कर ऋषि ने अपने तप के बल पर एकदम अंधकार छा दिया और बोले-कि अब प्रीति सहित मेरे संग रमण कर, यदि ना कहेगी तो मैं जरूर तुझे श्राप दूंगा। मुनि को क्रोध में और निर्दय देख कर कन्या ने ना नहीं कहा। क्षण भर के लिए नाव में कन्या से संभोग कर मुनिवर पछताए कि उनका व्रत भंग हो गया। मुनि मन ही मन संताप कर रहे थे कि तभी कन्या ने कहा कि मुझ कुंवारी को जो यह कलंक लगा, मुनिवर अब इसका कोई उपाय बताइये मैं क्या करूं? तब ऋषि पराशर कहने लगे कि हे कन्या! इस वीर्य के द्वारा पूरे जगत को प्रकाशमान करने वाले श्री विष्णु के अंशावतार वेदव्यास तुम्हारी कोख से जन्म लेंगे। तुम धन्य हो जाओगी।

दोहा
अष्टादश जिन उक्ति तें, पूरन रचे पुरान।
एक लक्ष भारत कियो, वेदहु किय व्याख्यान।।११।।
इन वेदव्यासजी ने जन्म ले कर वाणी के प्रभाव से सारे पुराणों की रचना की तथा एक लाख श्लोकों की संख्या वाला महान ग्रंथ ‘महाभारत’ रचा साथ ही वेदों की व्याख्या भी की।

पुराण नाम कथन
कवित्त
ब्रह्म पद्म विष्णु शिव श्रीमत भविष्योत्तर,
नारद वराह लिंग ब्रह्मविवर्त जानिये।।
कूर्म मच्छ वामन रु स्कंद मारकंड कहि,
गरुड़ ब्रह्मांड अग्नि विधि सों पिछानिये।।
सामवेद ऋगवेद जजुर्वेद अथर्वेद,
चार हू के सूत्र वेद अंत कौं बखानिये।।
भारत निर्माण कीनो संहिता अनेक छाया,
श्रूपदास ताहिकौं विचारै गति मानिये।।१२।।

अठारह पुराण नाम तथा प्रत्येक की श्लोक संख्या कथन-

सामवेद-२५,०००, ऋग्वेद – २५,०००, यजुर्वेद २५,०००, अथर्ववेद २५,००० इन चार वेदों के सूत्र वेद रचे। इसके अतिरिक्त भारत (महाभारत) का निर्माण किया। वेदों की छाया से अनेक संहिताओं का सृजन किया। कवि स्वरूपदास कहता है कि इन ग्रंथों की संख्या और गुणवत्ता पर विचार करने से वेदव्यास के विशाल कृतित्व की कल्पना की जा सकती है।

सर्पयज्ञ में वेदव्यास आगमन
दोहा
जन्मेजय नृप करत ही, सर्पसत्र तिहि काल।
वेदव्यास सब शिषन जुत, आये मुनिवर चाल।।१३।।
राजा जन्मेजय ने जब सर्पयज्ञ करना आरंभ किया उस समय अपने सारे शिष्यों सहित मुनिवर वेदव्यास जी वहाँ आए।

ऋषिराज से राजा का प्रश्न
पूछी नृप रिखराज प्रति, निज पुरुखन की बात।
कैसे बंधु-बिरोध भो, कैसे जुध भो तात।।१४।।
तब राजा जन्मेजय ने ऋषिराज से अपने पूर्वजों की बात पूछी कि हे तात! कौरव और पांडव भाई थे फिर उनमें बन्धु विरोध किस कारण हुआ और युद्ध कैसे हुआ?

शिष्य को मुनि की आज्ञा
वैशंपायन शिष्य कौं, दी आज्ञा रिषिराय।
कुरु कुल की पूरब कथा, सबै कहत समझाय।।१५।।
यह सुन कर मुनिराज वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशंपायन को आज्ञा दी कि तुम कुरू वंश की पूरी पूर्व-कथा सभी को समझा कर कहो।

कथा प्रारंभ वंशावली
कवित्त
ब्रह्म अत्रि चंद्र बुध और है पुरूरवा त्यों,
आयु पुनि नहुष ययाती पुरु जानिये।।
रोधास्व रिचेयु अनाधृष्टि मतिनार तन्सु,
इलन दुष्यंत भर्त भूमन्यु बखानिये।।
भो सुहोत्र हस्ती अजमीड़ रुक्ष संवरन,
कुरु जन्मेजय ध्रतराष्ट्र गुन गानिये।।
ताके भो प्रतीप जाके तीन पुत्र देवापी रु,
शांतनु त्यों बाल्हिक ए चंद्रबंश मानिये।।१६।।
वैशंपायन ने सबसे पहले चन्द्रवंश की वंशावली का वर्णन किया-यथा ( १) ब्रह्मा ( २) अत्रि ( ३) चन्द्र (४) बुद्ध (५) पुरुरवा ( ६) आयु (७) नहुष ( ८) ययाति ( ९) पुरु ( १०) रोधश्व ( ११) रिचेयु ( १२) अनाधृष्टि ( १३) मतिनार ( १४) तन्सु ( १५) इलन ( १६) दुष्यन्त ( १७) भरत ( १८) भूमन्यु ( १९) सुहोत्र ( २०) हस्ती ( २१) अजमीढ़ ( २२) रुक्ष ( २३) संवर्ण ( २४) कुरु ( २५ ) जन्मेजय ( २६) धृतराष्ट्र इन सभी को अपने-अपने गुणों से जान लो। इस धृतराष्ट्र का पुत्र प्रतीप और प्रतीप का देवापी, शान्तनु तथा बाल्हिक ये तीन पुत्र हुए इस प्रकार चन्द्रवंश को जानो।

दोहा
देवापी तन कुष्ट तैं, बन सेवन तप कीन।
हथनापुर दैं शांतनू, बाल्हिक बाल्हिक दीन।।१७।।
देवापी ज्येष्ठ बन्धु (सबसे बड़े भाई) थे परन्तु उनके शरीर में कुष्ट रोग होने से उन्होंने राज्याधिकार ग्रहण नहीं किया और हस्तिनापुर शान्तनु को तथा बाह्‌लिक देश बाह्लिक को देकर वन में तपस्या करने चले गए (बाह्लिक जिसे बलख-बुखारा नाम से भी जाना जाता है)

देवव्रत शांतनु सुवन, गंगा तैं रनधीर।
विचित्रवीर्य चित्रांगद सु, मछगंधा तें बीर।।१८।।
शान्तनु राजा को गंगा ने वरा था, उन्हीं गंगा जी से शान्तनु को युद्ध में धैर्यवान देवव्रत नाम के पुत्र की प्राप्ति हुई। इसके अतिरिक्त मत्स्यगंधा से चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो वीर पुत्र पैदा हुए।

मर्यो जुद्ध गांधर्व तैं, बिन वय अग्रज भ्रात।
भे तब वीर्य विचित्र न्रप, हथनापुर बिख्यात।।१९।।
बड़ा भाई चित्रांगद छोटी वय में ही गांधर्व से युद्ध करते मारा गया, उसके बाद विचित्रवीर्य हस्तिनापुर का विख्यात राजा हुआ।

काशिराज की कन्यका, भीष्म हरण किय तीन।
एक शिखंडी कुंवर भो, द्वै लघु भ्रातहि दीन।।२०।।
गंगा पुत्र भीष्म ने काशी के राजा (काश्य के पुत्र अभिभू) की तीन कन्याओं का हरण किया। इनमें सबसे बड़ी अम्बा नाम की कन्या थी जो बाद में अगले जन्म में द्रुपद राजा के यहाँ शिखंडी कुमार बनी और दूसरी छोटी कन्याएँ अम्बिका एवं अम्बालिका थीं उन्हें भीष्म ने अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य को ब्याही।

खैन रोग तैं बन्धु सो, मर्यो न भो संतान।
जाचे माता पुत्र मिलि, वेदव्यास भगवान।।२१।।
विचित्रवीर्य क्षय रोगं के कारण निःसन्तान मर गया, इससे माता (मत्स्यगंधा) तथा पुत्र ( भीष्म) ने मिलकर विचित्रवीर्य की वंश वृद्धि के लिए वेदव्यास मुनि से प्रार्थना की।

नष्टतंतु कुरु बंश लखि, सुनि निज जननि पुकार।
तीन पुत्र उत्पन किये, विश्व बिख्यात उदार।।२२।।
कुरु वंश की वंश-बेल को नष्ट होता देख कर और अपनी माता मत्स्यगंधा की आर्त्त पुकार सुन मुनि वेदव्यास ने उदार एवं जगप्रसिद्ध तीन पुत्र उत्पन्न किये।

पांडु पुत्र अंबालिका, अंबिका सुत धृतराष्ट्र।
धर्म अंश दासी तनय, विदुर महामति शिष्ट।।२३।।
वेदव्यास ने अम्बिका से धृतराष्ट्र नाम का पुत्र उत्पन्न किया, अंबालिका से पांडु नामक और दासी से धर्म का अंश, अति उत्तम बुद्धिवान विदुर नामक पुत्र उत्पन्न किया।

जेष्ट भात अँगहीन कौं, भो न छत्र अधिकार।
पंडु तप्यो सब भूमि पर, गुरुजन कौं शिर धार।।२४।।
बड़े भाई धृतराष्ट्र के अचक्षु (जन्मान्ध) होने से उन्हें राज्याधिकार नहीं मिला इससे छोटे भाई पाण्डु ने भीष्म और धृतराष्ट्र की आज्ञा शिरोधार्य कर पूरे राज्य पर राज किया।

सब भूपन पर पंडु की, आज्ञा रही अखंड।
तापैं अग्रज अग्रज पै, बाह्लिक भीष्म प्रचंड।।२५।।
दूसरे सभी राजाओं पर पाण्डु राजा की अखंड आज्ञा (चली) रही और पांडु राजा पर धृतराष्ट्र की तथा धृतराष्ट्र पर बाह्लिक तथा भीष्म की उग्र आज्ञा प्रचलित रही।

भ्रग स्वरूप रिषि श्राप तैं, पंडु जुक्त बैराग।
उभय त्रिया जुत बन बस्यो, राजभोग किय त्याग।।२६।।
मृग रूप ऋषि के शाप से पांडु राजा, राज्यभोग का त्याग कर, स्वयं की दोनों पत्नियों (कुंती एवं माद्री) को साथ ले, वैराग्य युक्त मन से वन में जा बसे।

श्रीनरनारायण प्रागट्य कथन
नारायण वसुदेव ग्रह, पंडु गेह नर रूप।
भूमि भार के नाश हित, भये अवतार अनूप।।२७।।
पृथ्वी का भार हटाने के लिए वसुदेव के यहाँ देवकी के उदर से नारायण (श्री कृष्ण) और पाण्डु राजा के यहाँ कुंती के गर्भ से नर (अर्जुन) इन दोनों अनुपम अवतारों ने जन्म ग्रहण किया।

सुर अंशन तैं और भये, जादव पांडव जानि।
असुर अंश ब्रज गजपुरी, प्रगटे सकल प्रधान।।२८।।
देवताओं के अंश से दूसरे पांडवों (युधिष्ठिर आदि चार भाई) और यादवों के जन्म हुए यह जानें और दानवों के अंश से हस्तिनापुर तथा ब्रजदेश में सारे प्रधानों (कौरव एवं कंसादि) का जन्म हुआ।

बाह्लिक को सुत सोमदत, ताके त्रय सुत जान।
भयो जेष्ट भूरीश्रवा, भूरी शल दो आन।।२९।।
शान्तनु राजा के छोटे भाई बाल्हिक के सोमदत नामक पुत्र हुआ, उसके तीन पुत्र हुए, बड़ा भूरिश्रवा और दो छोटे भूरी एवं शल।

कौरवादि उत्पत्ति कथन
गांधारी के पुत्र सत, सुता दुशीला एक।
सिंधु नृपति जयद्रथ हि कौं, दीनी सहित बिबेक।।३०।।
धृतराष्ट्र की पत्नि गांधारी ने सौ पुत्र तथा दुःशला नाम की एक पुत्री को जन्म दिया इस कन्या (दुःशला) को सिंध देश के राजा जयद्रथ से ब्याहा।

वैशी सुत धृतराष्ट्र तें, भयो युयुत्सु फेर।
महारथी सुत धर्म तैं, मिल्यो जुद्ध की बेर।।३१।।
वैश्य जाति की स्त्री से धृतराष्ट्र को युयुत्सु नामक पुत्र हुआ जो युद्ध के समय महारथी के रूप में युधिष्ठिर से टकराया (लड़ा) था।

कवित्त
वसू भीष्म जीव द्रौण कलू तैं सुयोधन त्यों,
और बंधु दैत्यन के अंश तैं बताये हैं।
धर्म धर्म भीम वात इन्द्र नर कर्ण रवि,
अश्वनीकुमार दोउ माद्री पुत्र गाये हैं।
जातवेद धृष्टद्युम्न सौभद्रेय चंद अंश,
ऐसे ही अनुक्रम तैं और हू जताये हैं।
नीति तेज देखि देव अंशन में दैत्य अंश,
एकता रुचे न सो विरोध तैं अघाये हैं।।३२।।
वसु के अंश से भीष्म, व्रहस्पति के अंश से द्रोणाचार्य, कलियुग के अंश से दुर्योधन और उसके दूसरे भाई (दुःशासनादि) दैत्यों के अंश से उत्पन्न हुए। धर्मराज के अंश से धर्मराज (युधिष्ठिर) वायु के अंश से भीमसेन, इन्द्र के अंश से अर्जुन, सूर्य के अंश से कर्ण, अश्विनीकुमारों (देव वैद्य) के अंश से पांडु की दूसरी पत्नि 
माद्री के दोनों पुत्र (नकुल एवं सहदेव), अग्नि के अंश से द्रुपद राज का पुत्र धृष्ट्रद्युम्न, चन्द्रमा के अंश से सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु, इस प्रकार दूसरों की भी उत्पति हुई। देव अंशियों में नीति का तेज देखकर दैत्यअंशियों को ईर्ष्या हुई। जो बाद में विरोध स्वरूप भड़की।

द्रोण उत्पत्ति
दोहा
कोउ कारन तैं खलित भो, भरद्वाज को रेत।
धर्यो द्रोन बिच पुत्र भो, द्रोन नाम तिहि हेत।।३३।।
किसी कारण वश ऋषि भारद्वाज का वीर्य स्खलित हो गया जिसे डिबिया में रखा। उससे पुत्र उत्पन्न हुआ इसके कारण उसका नाम द्रोण रखा गया।

प्रषत नृपति पांचाल को, भरद्वाज तिहिं गाम।
बसत अभय सुत द्रोणयुत, सकल गुनन के धाम।।३४।।
पांचाल देश में प्रषत नामक राजा थे, उनकी राजधानी के गांव में सर्वगुण सम्पन्न भरद्वाज मुनि अपने द्रोण नामक पुत्र के साथ निर्भय हो कर निवास करते थे।

सुत कनिष्ठ नृप प्रषत को, जिज्ञसेन गुन आस।
सखाचार कर द्रोन तैं, रहत रिखिन के पास।।३५।।
राजा प्रषत का छोटा राजकुमार जिज्ञसेन ज्ञानोपार्जन की इच्छा से ऋषि-भरद्वाज के सानिध्य में रहता था। वह द्रोण के साथ सखा भाव रखता था।

उभय वेद सीख्यो करैं, उभय धनुष आचार।
कह्यो करै द्विज द्रोण कौं, जिज्ञसेन जुत प्यार।।३६।।
जिज्ञसेन तथा द्रोण दोनों सखा, आचार्य भरद्वाज से धनुर्विद्या और वेद विद्या सीखते हुए प्रेम से रहते थे। यज्ञसेन (जिज्ञसेन) कभी-कभी प्रेमभाव से अपने सखा द्रोण से कहा करता था-

म कदाच नृप होउँ तो, देउँ अर्ध तुहि राज।
गंगा तें दच्छिन दिशा, मैं उत्तर दिशि भ्राज।।३७।।
हे द्रोण! यदि सौभाग्य से मैं कभी राजा बना तो गंगा से दक्षिण दिशा का आधा राज्य तुम्हें दे दूंगा और उत्तर दिशा वाला आधा राज्य में अपने अधिपत्य में रखूंगा।

यज्ञसेन कों राज्यप्राप्ति
काल पाय अग्रज मर्यो, मर्यो प्रषत फिर बाप।
जिज्ञसेन पांचाल को, भयो नृपति तब आप।।३८।।
थोड़े समय के बाद यज्ञसेन का बड़ा भाई काल के गाल में समा गया और इसी तरह उसके पिता राजा प्रषत का भी देहावसान हो गया। इसके बाद यज्ञसेन स्वयं पांचाल देश का राजा बना।

कृप और कृपी की उत्पति
गौतम रिषि के शुक्र तैं, कृप रु कृपी इक साथ।
भये प्रगट बिच मुंज के, शांतनु किये सनाथ।।३९।।
गौतम ऋषि के वीर्य से कृप एवं कृपी ये दो पुत्र-पुत्री एक साथ मूंज की जड़ से उत्पन्न हुए। जिन्हें अनाथ देख कर राजा शान्तनु ने उनका पालन-पोषण कर उन्हें सनाथ किया।

अश्वत्थामा की उत्पत्ति
कृप कौं तो कुल गुरु कियो, कृपी द्रोन कौं दीन।
तिन तैं सुत द्रोनी भयो, वेद धनुष परबीन।।४०।।
(कृपाचार्य) कृप को बड़ा होने पर राजा शान्तनु ने अपना कुल गुरु बनाया और कृपी का विवाह द्रोणाचार्य से कर दिया। इनसे वेद विद्या और धनुर्विद्या में पारंगत द्रोणी ( अश्वत्थामा) नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

जथा अयोनी मातु पितु, तथा पुत्र द्युति रास।
दुग्ध पिवत लखि शिशुन कौं, हठत मातु पितु पास।।४१।।
जिस प्रकार माता और पिता (कृपी एवं द्रोण) दोनों अयोनिज थे अर्थात् योनि से उत्पन्न हुए नहीं थे और महातेजस्वी थे। उन्हीं की तरह उनका पुत्र (अश्वत्थामा) भी कांति का पुंज था। एक बार उसने दूसरे बच्चों को दूध पीता देख कर अपने माँ-बाप से दूध पीने का हठ किया।

द्रव्यहीन द्विज द्रोन ने, जिज्ञसेन पै जाय।
दुग्धपान हित पुत्र के, जाची एक हि गाय।।४२।।
द्रोणाचार्य विद्या में तो समर्थ थे पर द्रव्यहीन थे, इससे दूध पीने के पुत्र के हठ को पूरा करने के प्रयत्न में, वे राजा यज्ञसेन के पास गये। वहाँ उन्होंने अपने बालसखा राजा यज्ञसेन से एक गाय देने की याचना की।

कियो सखापन प्रगट सब, शिशुता को बिरतंत।
तूं भिक्षुक मैं छत्रधर, कीनो हास्य कुमंत।।४३।।
अपने गुरुकुल मे बिताए दिनों का और अपनी मैत्री का हवाला देते हुए द्रोणाचार्य ने जब पूरा वृतान्त सुनाया तो यज्ञसेन ने कहा कि हे द्रोण! तुम तो भिखारी हो और मैं राजा मेरे-तेरे बीच कैसी मैत्री? यह कह कर उस कुबुद्धि राजा ने द्रोणाचार्य का परिहास किया।

तांदुल धोय रु स्वेत जल, गुड़ बिच देहु मिलाय।
सुत पावहु पय समुझि है, मैं नहि देवहु गाय।।४४।।
मदोन्मत राजा ने कहा कि हे ब्राह्मण! चावल धो कर उसके सफेद धोवन में थोड़ा गुड मिला कर अपने बेटे को पिला। वह इसे सचमुच का दूध जान कर पी लेगा और अपना हठ छोड़ देगा। मैं तुझे गाय नहीं देने वाला।

पांचाल छोड़ के द्रोण का हस्तिनापुर आगमन
सभा बीच अपमान लखि, भो द्विज कौं निर्वेद।
कर्यो त्याग जलपान बिनु, ताको देश सखेद।।४५।।
इस प्रकार भरी सभा में अपना अपमान देख कर द्रोणाचार्य (ब्राह्मण) को ग्लानि हुई और उसने जलपान किये बिना ही वहाँ से जाना उचित समझा। यही नहीं उसने मन ही मन राजा के देश (पांचाल) को छोड़ने का निश्चय भी दुःखी मन से किया।

आय नागपुर भीष्म तैं, कह्यौ पूर्व बिबहार।
सौंप्यो भीषम द्रौन कौं, राजभार करि प्यार।।४६।।
वहाँ से चल कर हस्तिनापुर पहुँच द्रोणाचार्य ने राजा यज्ञसेन द्वारा किये गए अपमान का पूरा वृतान्त भीष्म से कह सुनाया। सुन कर भीष्म ने प्रीति पूर्वक द्रोणाचार्य को उनके अनुरूप हस्तिनापुर राज्य में कार्यभार सोंपा।

सोंपे त्यों ही द्रोन कौं, सब कुरु बंश कुमार।
सस्त्र अस्त्र विधि लैन कौं, आदि क्षत्र आचार।।४७।।
उसी समय भीष्म ने कुरु वंश के सारे राजकुमारों को अस्र-शस्र चलाने, शिक्षा देने का एवं वेद विद्या सिखाने का, गुरुत्तर दायित्व द्रोणाचार्य को सोंपा।

पांडवों के विद्यादिक गुण कथन
शिशु वय तैं सुत पांडु रत, विद्या बिसन बिशेष।
पंच बंधु क्रीडा रहित, बिनय धर्म उपदेश।।४८।।
पाण्डु राजा के पुत्र बालवय से ही विद्या के व्यसन में विशेष प्रीति रखने वाले थे। पांचों भाई व्यर्थ खेल में अपना समय नष्ट नहीं करते थे और विनय धर्म के बोध को ग्रहण करने वाले, कुशाग्र बुद्धि थे।

विद्यारंभ कुंकुम तिलक, अक्षत जुत द्युति कंज।
अर्जुन गुन अनुराग बिच, सब गुन आश्रित पुंज।।४९।।
शिक्षा-दीक्षा के आरंभिक समय में कुमकुम के तिलक, अक्षत से शोभायमान भाल-वाले और कमल पुष्पों से कांतिमान अर्जुन ने अपना अनुराग विद्यागुरु पर प्रकट किया। इस प्रकार उसके अपने दूसरे अन्य गुणों में यह एक गुण और जुड़ गया।

ब्रह्मास्त्र प्राप्ति के लिये कर्ण का प्रयत्न
छप्पय
करन कह्यौ द्विज द्रौन, देहु ब्रह्मास्त्र मोहि अब।
द्रौन कह्यो बिन क्षत्रि, विप्र बिनु मिलै तुमहि कब।
करन गयो करि क्रोध, जहां द्विजराम तपत तप।
कह्यो विप्र हौं नाथ, देहु मोहि अस्त्र ब्रह्म जप।
इस दिवस ताहि धरि गोद शिर, जामदग्न सोवत भयेउ।
इक दैत्य श्राप जुत कीट तन, करन जंघ छेदत गयेउ।।५०।।
कुरुवंश के राजकुमारों को द्रोणाचार्य के सान्निध्य में विद्याभ्यास करते देख गुरु से कर्ण ने कहा कि हे ब्रह्मगुरु! मुझे भी आप बह्मास्त्र की विद्या सिखाओ। यह सुन कर द्रोणाचार्य ने प्रत्युत्तर दिया कि ब्रह्मास्त्र की विद्या भला ब्राह्मण और क्षत्रिय कुल के योग्य शिष्यों के अतिरिक्त तुझे कैसे दी जा सकती है? अर्थात् तुझे नहीं सिखाई जा सकती है। द्रोणाचार्य की यह बात सुन कर क्रोधित कर्ण वहाँ से परशुराम की तपस्थली को गया। वहाँ जाकर उसने प्रार्थना की, कि हे नाथ! मैं ब्राह्मण हूं, मुझे आप ब्रह्मास्त्र की विद्या का जाप मंत्र दें। ऐसा कह कर कर्ण ने ब्रह्मास्त्र की विद्या अर्जित की पर एक दिन जब आचार्य परशुराम उसकी जंघा पर अपना मस्तक रख कर शयन कर रहे थे। उसी समय एक शापित दैत्य कीट का रूप धर कर कर्ण की जंघा को छेदने लगा।

कर्ण का धैर्य
दोहा
गुरु निद्रा गति जानिकै, करन न सरक्यो रंच।
जागि उठे शिष प्रति कह्यो, इह धौं कवन प्रपंच।।५१।।
विद्या गुरु जामदग्न निद्रामग्न हैं, कहीं वे जाग न पड़ें यह सोच कर कर्ण पूरी पीड़ा को सहन करता रहा और अपनी जगह से हिला भी नहीं। इतने में गुरु जाग गए और कर्ण की व्यथित अवस्था देख कर बोले कि यह क्या प्रपंच है? यह रक्त कैसा?

करन कह्यौ यह रुधिर मम, कीट जंघ पल माहि।
मैं समझौ गुरु जागि है, तातैं सरक्यो नाहिं।।५२।।
गुरु के वचन सुन कर कर्ण ने कहा कि मेरी जंघा के मांस में एक कीट ने काट कर मुझे लहूलुहान कर दिया पर मैंने कहीं गुरु जाग न जाएं, यह सोच कर अपना आसन और मुद्रा नहीं बदली।

करन कौं श्राप प्राप्ति
द्विज कौं इह धीरज नहीं, तूं कोउ क्षत्री आहि।
अस्त्र जु लीने करि कपट, सफल गिनहु जिन ताहि।।५३।।
कर्ण के वचन सुन कर परशुराम ने कहा कि ब्राह्मण इतनी शारीरिक पीड़ा में धैर्य नहीं रख सकता, इसलिए मुझे लगता है तू ब्राह्मण नहीं वरन् क्षत्रिय है। चूंकि तुमने मुझसे झूठ बोल कर धोखे से यह विद्या अर्जित की है अतः यह सीखी हुई विद्या निष्फल रहेगी।

जज्ञ धेनु ऋषि की कोउ, शर लगि मरी अज्ञात।
दुतिय श्राप ताको भयो, होहि तोहि अरि घात।।५४।।
गुरु से यह शाप पाकर कर्ण लौट रहा था कि रास्ते में भूलवश अपने बाण से एक ऋषि के यज्ञ की गाय मारी गई। इससे कर्ण को ऋषि द्वारा दूसरा शाप मिला कि शत्रु के हाथ से मारे जाओगे।

तेरे रथ के चक्र कौं, भूमि निगलिहैं जत्र।
करत सपरधा, जाहि तैं सोई अरि मारहि तत्र।।५५।।
वह भी जब कि तेरे रथ के पहिए को पृथ्वी पकड़ लेगी, अर्थात जब रथ का चक्र जमीन में धंस जाएगा, ऐसे में तेरा वही शत्रु तुझे मारेगा जिससे तू स्पर्धा करता है।

सब विद्या द्वै श्राप लै, करन हि आयो गेह।
इतने सब शिष द्रौन के, पढ़ि गये निरसंदेह।।५६।।
अस्त्र-शस्त्र की सारी विद्याएं और दो श्राप ले कर कर्ण अपने घर आया और इधर इस अवधि में द्रोण के शिष्य सारी विद्याओं में प्रवीण हो गए।

शस्त्र अस्त्रन की परीक्षा
सस्त्र अस्त्र जुत शिषन की, दई परख इक द्यौस।
नर की बिद्या सुजश लखि, भयो सुयोधन रोष।।५७।।
इसके कुछ दिन बाद भीष्म के सम्मुख आचार्य द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों की विद्या का प्रदर्शन करवाया। अस्त्र-शस्त्र परिचालन में अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ जान कर सुयोधन को क्रोध आया।

कवित्त
अग्नि अस्त्र ही तें व्योम बीच कीनी ज्वाल माल,
मेघ अस्त्र ही तें ताइ ज्वाला कौं बुझाइकै।
वायु अस्त्र ही तें मेघ गिरी अस्त्र ही तें वायू,
ब्रज्र अस्त्र ही तें गिरि वृंद कौं मिटाइकै।
कबी भूमि अंतरिक्ष अश्व गज पीठ कबी,
कबी स्थूल सुक्षम अदृष्टता दिखाइके।
धन्य पृथा कूख जायो अर्जुन विलोक-जेता,
पांडुनंद ठाढो यों अनेक शोभा पाइकै।।५८।।
शस्त्र परीक्षा में सफल अर्जुन की विद्या ऐसी थी कि उसके अभ्यास से आकाश में एक अग्नि-पुंज बन गया और उसके बाद मेघास्त्र से अर्जुन ने उसे मिटा डाला। उसके बाद पवनास्त्र से मेघास्त्र को शान्त कर दिया। और पर्वतास्त्र से पवनास्त्र के वेग को रोक दिया। तत्‌पश्चात वज्रास्त्र द्वारा पर्वतास्त्र के समूह को बिखेर डाला। इससे कुछ मलवा पृथ्वी पर, थोड़ा आकाश में, कुछ हाथी घोड़ों की पीठ पर, कहीं थोड़ा बड़ा और कहीं पर सूक्ष्म स्वरूप रज-रज हो कर पृथ्वी पर आ गिरा। इस प्रकार पाण्डु राजा के पुत्र अर्जुन ने अपनी धनुर्विद्या का प्रदर्शन किया। कवि कहता है कि पृथा (कुंती माता) की कोख धन्य है कि उसने अर्जुन जैसे तीनों लोकों को जीतने वाला पुत्र उत्पन्न किया।

दोहा
कहत करन नर तैं करौं, द्वंद युद्ध तिहि बार।
सुनि उमग्यो धृतराष्ट्र सुत, लयो हृदय तैं धार।।५९।।
अर्जुन के इस अद्‌भुत पराक्रम प्रदर्शन को कर्ण सहन न कर सका और बोला कि मैं अर्जुन से द्वंद्वयुद्ध करने को तैयार हूं। यह सुन कर धृतराष्ट्र का पुत्र दुर्योधन प्रसन्न हुआ और उसने कर्ण को छाती से लगा लिया।

नृप सुत नृप सुत तैं लरैं, यह श्रुति आगम रीति।
लरै सूत नर तैं सु कृप, कहै यहे जु अनीति।।६०।।
कर्ण के ये चुनौती भरे वचन कृपाचार्य को सहन नहीं हुए और वे बोले कि नियमानुसार राजपुत्र से राजपुत्र ही लड़ सकता है, ऐसा वेदशास्त्रों का कथन है। यदि अर्जुन के साथ कोई सूतपुत्र (कर्ण) लड़े, यह अनीति कहलाएगी।

कहै सुयोधन सुनहु कृप, त्रिधा नृपतिता होत।
निज बल तैं पुनि सैन्य तैं, जन्म नृपन के गोत।।६१।।
कृपाचार्य के ऐसा कहने पर दुर्योधन ने कहा कि हे कृपाचार्य! सुनो, स्वयं के बल से, अपनी सेना के बल से और राज्यवंश में जन्म लेने से इन तीनों प्रकार से राजा पद प्राप्त होता है।

बल तैं कर्न असाध्य है, अंगदेश अब देत।
छत्र चमर यों कहि दिये, दिय अभिषेक सहेत।।६२।।
इसमें कर्ण स्वयं के बल में असाध्य (अविजित) है और मैं अब इसे अंग देश का राज्य अर्पण करता हूं। ऐसा कह कर दुर्योधन ने छत्र-चंवर दे कर कर्ण का राज्याभिषेक किया।

देखि सपरधा दुहुंन की, भीष्म विसर्जन कीन।
अस्त्र परीक्षा व्है चुकी, मति हो क्रोध अधीन।।६३।।
कर्ण और अर्जुन दोनों की परस्पर प्रतिस्पर्धा देख कर भीष्म ने धनुर्विद्या का परीक्षण अभ्यास बन्द करवा दिया और कहा कि अस्त्र परीक्षा अब समाप्त हो चुकी। व्यर्थ में अब कोई क्रोध न करे।

गुरु से शिष्यों की आज्ञायाचना
कह्यौ दीन तैं शिषन मिलि, दो आग्या गुरु नाथ।
कर्यो तोर अपमान नृप, द्रुपद हतहिं जुत साथ।।६४।।
इसके बाद सारे शिष्यों ने द्रौणाचार्य से कहा कि हे गुरुवर! अब आप यदि आज्ञा दें तो हम द्रुपदराजर ने जो आपका अपमान किया उसका प्रतिशोध लें और उन्हें अपने सहायकों सहित मार डालें।

तथा अस्तु सुनि द्रौन तैं, कीनो सैन्य प्रयान।
कर्यो जुद्ध नृप द्रुपद कौं, पकर्यो सहित प्रधान।।६५।।
द्रोणाचार्य के मुँह से ‘तथास्तु’ सुन कर शिष्यों ने अपनी सेना के साथ प्रयाण किया और द्रुपद के राज्य की राजधानी में आ पहुंचे और युद्ध कर द्रुपद को उसके सहायकों सहित बन्दी बना लिया।

द्रुपद से द्रौण के शिष्यों का कथन
शिषन कह्यौ तुं छत्रधर, यह भिक्षुक द्विज द्रौन।
या भिक्षुक बिन आपको, कहि अब रक्षक कौन।।६६।।
इसके बाद द्रोणाचार्य के शिष्यों ने कहा कि हे द्रुपद! तुम तो राजा हो और यह बेचारा गरीब ब्राह्मण है पर अब आपके इस भिक्षुक के अतिरिक्त आपका रक्षक कौन है? बोलो!

द्रौण कथन
नृपति सखापन तोर मम, बन्यो नहीं बिनु राज।
तबहि अर्ध भू लैन कौं, कर्यो जतन मैं आज।।६७।।
तभी द्रोणाचार्य ने कहा कि हे राजा द्रुपद! मैं बिना राज्य के भिक्षुक था यही सोच कर तुमने मेरी मित्रता ठुकराई पर अब आज मैंने तेरे पूर्व कथन के अनुसार आधे राज्य को हथियाने का प्रयत्न किया है।

द्रुपद कथन
कृपा सखापन राखियो, अबहु अर्ध भू लेहु।
श्रेष्ठ हारिबो आपतैं, मोहि छोरि तुम देहु।।६८।।
द्रोणाचार्य के वचन सुन कर दुपद ने कहा कि हे महाराज! आप से हारना ही उत्तम है, अर्थात् मेरे राज्य का आधा भाग आप अभी लें, पर मित्रता कायम रखते हुए मुझे आप मुक्त करें।

द्विज कौं आधो राज दै, नृप आयो निज भौन।
कोउ ऐसो मम पुत्र ह्वै, जो मारे द्विज द्रौन।।६९।।
ऐसा कह कर द्रोण को आधा राज्य सोंप कर राजा द्रुपद अपनी राजधानी को लौट आया और मन ही मन विचार करने लगा कि काश मेरा भी ऐसा पुत्र हो जो ब्राह्मण द्रोण को मार कर मेरा प्रतिशोध ले।

शत्रु नाश के लिये द्रुपद का यत्न
नाश करै कुरु बंश को, ऐसो करत विचार।
कर्यो जज्ञ मिलि रिषिन तैं, बांट्यौ द्रव्य अपार।।७०।।
यही नहीं कुरु वंश का भी नाश करे, इसके लिए दुपद ने ऋषियों से मिल कर (ऐसी पुत्रोत्पत्ति के लिए) यज्ञ किया और पुष्कल द्रव्य का दान दिया।

इक इक द्विज कौं लक्ष गो, ऐसे दई अनेक।
हौनहार के जोर तें, कहां न दीनी एक।।७१।।
इसके अतिरिक्त राजा द्रुपद ने यज्ञ में आए प्रत्येक ब्राह्मण को एक लाख गायें प्रदान की परन्तु भविष्य की प्रबलता से पूर्व में द्रोणाचार्य के मांगने पर एक गाय भी देने से मना कर दिया था।

अग्नि कुंड तैं प्रगट भो, धृष्टद्युम्न अरि काल।
वेदी तैं कृष्णा भई, सात वर्ष की बाल।।७२।।
यज्ञ की पूर्णाहुति से हवन कुण्ड से शत्रु का नाश करने वाला, (शत्रुओं का कालरूप) धृष्टद्युम्न नामक पुत्र प्रकट हुआ और वेदी से (छोटे अग्निकुंड से) कृष्णा नामक सात वर्ष की बालकन्या उत्पन्न हुई।

आकाश वाणी
कहै व्योम बानी वचन, सुत करिहै द्विज घात।
सुता तोर कुरुवंश को, करिहै भूप निपात।।७३।।
और उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे द्रुपद राज! तेरा यह पुत्र ब्राह्मण को मारेगा और यह पुत्री कौरव वंश का नाश करने में सहायक होगी।

कवि कथन
सवैया
संग शिशून के द्रोनी शिशू तृन लावत और के बाछरु चारत।
ते मनुहारि कै याहिकौं दूध दयो पितु मातु तैं रोय पुकारत।
मोहिकौं गाइ मँगाइ दो यों सुनि द्रौन पांचाल कौं जाचबो धारत।
दास स्वरूप नट्यो नृप हांसि के भो यहि रीत तृनान तैं भारत।।७४।।
दूसरे बालकों की तरह अश्वत्थामा भी घास (त्रण) का गट्ठर उठा कर लाता और दूसरे लोगों के बछड़े चराता था। एक बार किसी पड़ोसी ने उसे थोड़ा दूध पीने को दिया, उसे पी कर पुनः दूध पीने की इच्छा हुई तो वह अपने मां-बाप के पास जा रो कर कहने लगा कि मुझे एक गाय मंगा दो। पुत्र के ऐसे आर्त्त वचन सुन कर द्रोण, पंचाल राज्य (द्रुपद) के राजा के द्वार पर याचना भाव ले कर गया। कवि स्वरूपदास कहता है कि जब ब्राह्मण गाय मांगने आया तब उपहास करते हुए इन्कार किया, उसी के फलस्वरूप युद्ध हुआ। कदाचित इससे ही त्रण-भारत (तिनके से भारत) नामक उक्ति उत्पन्न हुई हो। (इसे ही तिनके से भारत होना कहते हैं। )

कवित्त
कँवर पदे मैं नृप अर्ध राज दैन कह्यौ,
राज पाय गाय नट्यो हांसी अति कीनी है।
याही काज कोप्यो द्रौन अस्त्र शस्त्र विद्या सबै,
भार्गव तैं लीनी कुरुबंशिन कौं दीनी है।
कौरव दुपद ही कौं बांधि राज बांट्यौ तातैं,
धृष्टद्युम्न द्रौपदी की उत्पत्ती नवीनी है।
दोनों स्वसा भ्रात तैं भयो है पात क्षत्रिन को,
ऐसे गति भारत की तृन के अधीनी है।।७५।।
राजा द्रुपद ने अपने बाल्यकाल में द्रोण से आधा राज्य देने का कहा था पर बाद में राज्यपद पाने के बाद, राजमद में राज्य का हिस्सा देना तो दूर एक गाय देने से भी मना कर दिया। इतना ही नहीं सत्तान्थ हो कर उपहास किया जिसके फलस्वरूप द्रोण कुपित हुआ। कुपित हो कर उसने परशुराम से सीखी हुई सारी अस्त्र विद्या कुरुवंश के राजकुमारों को सिखाई। (द्रुपद ने पूर्व में ब्राह्मण जान कर अपमान किया था यह जान कर) कौरवों ने द्रुपद को बांध कर द्रोण को आधा राज्य दिलाया (इसके बाद द्रुपद ने यज्ञ किया उसमें से) धृष्टद्युम्न और द्रौपदी की अग्नि में से उत्पत्ति हुई। इन्हीं दोनों भाई-बहन से क्षत्रियों का विनाश हुआ, इस प्रकार तृन से (छोटी सी बात को ले कर) महाभारत हुआ।

पांडवों से कौरवों का विरोध होने का वर्णन
दोहा
यमुना जल क्रीड़त हुते, मिलि कुरुवंश कुमार।
दियो सुयोधन भीम कौं, मोदक के बिच मार।।७६।।
अब पाण्डवों का कौरवों से विरोध होने का वर्णन वैशंपायन ऋषि जन्मेजय राजा को कहते हैं कि एक समय कुरुवंश के राजकुमार यमुना नदी में नहाने गए। सभी जलक्रीड़ा करते थे, उसी समय दुर्योधन ने भीमसेन को लड्डु में विष मिला कर दिया।

बांधि बेलि के तंतु तैं, डार्यो यमुना नीर।
ले गये अही पताल में, निर्विष कियो शरीर।।७७।।
फिर जब भीमसेन अचेत हो गया तो उसे लता के तंतुओं से बांध कर यमुना के पानी में फेंक दिया तब नागलोक के निवासी उसे पाताल में ले गए और औषधोपचार (अमृतौषधि) कर उसे निर्विष किया।

अमृत पान करायकै, द्विगुन प्रबल करि ताहि।
माता ढिग दिन अष्टमे, पठयो गजपुर चाहि।।७८।।
इसके साथ ही अमृतपान करा उसे और बलवान बना कर आठवें दिवस हस्तिनापुर में उसकी माता (कुंती) के पास भिजवा दिया।

भीम वचन सुनि गुपत ही, कीनो विदुर प्रबोध।
अब नहि समय बिरोध को, करो क्रोध को रोध।।७९।।
दुर्योधन के विष देने की बात को जान कर भीमसेन ने कुपित हो कर दुर्योधन को जली कटी सुनाई। यह सुन कर विदुर जी ने समझाया कि अभी विरोध करने का समय नहीं आया, अतः अपने क्रोध को वश में करो।

धर्म कों राज्यप्राप्ति
विदुरादिक मन में समुझि, कोउ तैं प्रगट न कीन।
यतने पद नृप पांडु को, पिता धर्म की दीन।।८०।।
भीम के कुपित होने का कारण विदुर (भीष्म, द्रोण) आदि ने मन में समझ तो लिया पर उसकी चर्चा न की, उसे जाहिर नहीं किया। इतने में पाण्डु राजा का उत्तराधिकार पिता (धृतराष्ट्र) ने धर्मराज (युधिष्ठिर) को दिया।

दुर्योधन का ज्वलित होना
जर्यो सुयोधन आग बिनु, पितु तैं कहत निराश।
राज युधिष्ठिर कौं दियो, हमकौं नरक निवास।।८१।।
धर्मराज को राज्य मिला जान कर दुर्योधन बिना अग्नि के भी जलने लगा और हताश हो कर पिता से कहने लगा कि आपने युधिष्ठिर को राज्य दिया है और मुझे नरक निवास ऐसा क्यों?

याके पितु कीनो प्रथम, अब ये करिहै राज।
याके पुत्र रु पौत्र ते, करिहैं राज सु काज।।८२।।
इसके पिता ने पहले राज्य किया, अब यह (युधिष्ठिर) राज्य करेगा और इसके बाद इसके वंशज राज्य करेंगे धृतराष्ट्र ने उत्तर दिया।

जब हमकौं सब जानि है, ग्यात हीन भुवपाल।
दुष्ट कर्म तैं जीविका, करहिं परहिं दुखजाल।।८३।।
यदि पाण्डव ही राज्य करेंगे तब हमें तो दूसरे लोग (राजा लोग) जातिहीन समझेंगे और हमें हमारी आजीविका चलाने को नीच कर्म करने पड़ेंगे अतः हमें तो हर हाल में दुःख की ज्वाला में जलना पड़ेगा।

नीच हि सगपन जीविका, उभय राज बिनु पाय।
लुप्त पिंडोदक पितृ सब, बसहिं नर्क में जाय।।८४।।
दुर्योधन ने आगे कहा कि राज्य के बिना अच्छे सम्बन्ध (सगपण) और जीविका (जीवन निर्वाह) हमें नीची जाति से ही प्राप्त होंगे और हमारे पूर्वज नरक में ही निवास करेंगे।

अंगहीन तैं आप तो, लह्यो न नृप अधिकार।
मेरे अवयव हीन ना, क्यौं न दियो भुवभार।।८५।।
उसने आगे कहा, हे पिता! आप तो अंगहीन थे इसलिए आपने राज्य-भार नहीं लिया पर मैं तो विकलांग नहीं, फिर आपने राज्यभार मुझे क्यों नहीं सोंपा?

धृतराष्ट्र कथन
पांडू सासन में रह्यो, भयो मोहि सुख राज।
यों आज्ञा आधीन हैं, पांच पांडुसुत आज।।८६।।
दुर्योधन के वचन सुन कर धृतराष्ट्र कहने लगे कि हे दुर्योधन! आज तक पाण्डु राज मेरी आज्ञा में रहा इससे मुझे राज्य सुख मिलता रहा और इसी प्रकार पाण्डु के पांचों पुत्र भी मेरी आज्ञा के आधीन हैं।

तिनको कैसे त्याग मैं, करौं न करो विरोध।
दुहुँधा पटहि प्रधान कोउ, बढहि परस्पर क्रोध।।८७।।
फिर भला मैं उनका त्याग कैसे करूँ? और तुझे भी उनका विरोध नहीं करना चाहिए कारण कि विरोध से परस्पर वैमनस्य बढ़ेगा और अपने स्वजनों के भी आपस में बंटने पर विरोध होगा।

दुर्योधन कथन
विदुर बिना भीषम अरु, द्रौनादिक परधान।
कोउ न फटहिं तजि मोहिकौं, जानहु पिता निदान।।८८।।
इस पर दुर्योधन बोला कि हे पिता! विदुर के बिना भीष्म और द्रोण आदि प्रधान मुझे छोड़ कर नहीं जाएंगे, इसे आप अच्छी तरह जान लें।

वारणाख्य पुर पठहु तुम, मात सहित सुत धर्म।
मैं यतने इत राज को, करहु हाथ सब मर्म।।८९।।
हे पिता! आप धर्मराज को भाइयों तथा माता सहित काशी भेज दें। पीछे से मैं राज्य की पूरी व्यवस्था अपने हाथ में ले लूंगा। अर्थात् राज्य पर अधिकार कर लूंगा।

धृतराष्ट्र कथन
रुद्र महोत्सव होत है, वारणाख्य पुर पुत्र।
जाहु जुधिष्ठिर बंधु जुत, करियो रक्षा तत्र।।९०।।
अपने पुत्र की बात मान कर धृतराष्ट्र ने कहा कि युधिष्ठिर! काशी में रुद्र-महोत्सव हो रहा है, इसलिए इस महोत्सव में तुम अपने भाइयों सहित जाओ और यज्ञ की रक्षा करो।

पांडवों से विदुर का गुप्त उपदेश
विदुर गुप्त उपदेश किय, आवत जवन प्रधान।
रचहि पुरोचन लाक्षगृह, मंत्र सुयोधन मान।।९१।।
पाण्डवों के लिए पितृ आज्ञा अत्यन्त महत्वपूर्ण है, इस कारण उनका काशी प्रवास पर जाना तय जान कर, विदुर ने उन्हें गुप्त रीति से उपदेश दिया कि काशी में पुरोचन नामक यवन प्रधान है, वह दुर्योधन की मंत्रणा मान कर, वहाँ लाक्षागृह की रचना करेगा।

पटवहु गुप्त मजूर तित, रखिहैं गुप्त सुरंग।
अग्नि लगै निशि निकरि हौ, मात-भ्रात लै संग।।९२।।
इसके लिए हे युधिष्ठिर! तुम गुप्त रूप से अपने मजदूर वहाँ भेजो जो गुप्त सुरंग बना कर तैयार कर सकें, तुम्हारे वहाँ ठहरने पर रात में आग लग जाने की दशा में, तुम अपनी माता एवं भाइयों के साथ सुरक्षित निकल सको।

आन देश छिपि विचरियो, पौरुख समय न आज।
काल पाय फिर करहिगो, बंधुन जुत नृप राज।।९३।।
वहां से निकल कर अन्य प्रदेश में छद्‌म रूप से विचरण करना, कारण कि अभी तुम्हारे पराक्रम प्रदर्शन का उचित समय नहीं। हाँ, अनुकूल समय आएगा और तुम अपने भ्राताओं संग राज करोगे।

लाक्षालय तैं पांडवों का बच के निकल जाना
कवित्त
नीति धर्मपुत्र की तैं उग्र धन्वी अर्जुन तैं,
बली जानि भीम अंधपुत्र अकुलाय कै।
वारणाख्य पूरी लाखालय कीनो जारिबे कौं,
जवन पुरोचन प्रधान कौं पठाय कै।
जरी एक भीलनी त्यौं भीलनी के पांचों पुत्र,
बचे एते विदुर प्रबोध पंथ पाय कै।
दोय कंध दोय गोद एक पीठ माता-बंधु,
लेकै भीम चल्यौ ताहि जवन जराय कै।।९४।।
युधिष्ठिर की नीति, धनुर्धारी अर्जुन के पराक्रम और भीमसेन के बल से स्पर्धा एवं द्वेष रखने वाले अंधे धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ने ईर्षा से अकुलाकर पाण्डवों को जीवित ही जला देने के इरादे से पुरोचन नामक यवन प्रधान को काशी भेज कर लाख का एक महल बनवाया। पूर्वजों की आज्ञा के अनुसरण में काशी गए पाण्डवों ने उस महल में रात्रि-विश्राम किया। रात के समय उसमे आग लग जाने पर एक भीलनी और उसके पाँच बेटे जल कर राख हो गए और विदुर के प्रबोध से कुंती और उसके पांचों पुत्र बच गए। मकान में आग लगी जान कर भीमसेन ने पुरोचन को पकड़ कर आग में फेंक दिया और दो भाइयों को कंधे पर बिठा, दो भाइयों को बगल में दबा कर एवं माता कुंती को पीठ पर बैठा कर स्वयं पहले से बनाई हुई सुरंग में से हो कर बाहर निकल आया।

हिडंब वध और पांडवों का द्रुपद के नगर में आना
बन में हिडंब मारि हिडंबा कौं धारि भीम,
पुत्र उपजाय एकचक्रा में पधारे हैं।
ब्राह्मण के वेष भिक्षा अन्न तैं जीविका होत,
विप्रन के संग देश द्रुपद सिधारे हैं।
गांधर्व अंगारपर्ण जीति अश्वविद्या लीनी,
भूप पुरी भृगु शाला आसन बिचारे हैं।
व्यास आसवास देकै द्रौपद पै गौन किनो,
अर्जुन ने भूपन के मान मलि डारे हैं।।९५।।
लाक्षागृह से सुरक्षित निकल कर वहाँ से आगे वन में हिडिंबासुर को मार हिडिंबा को स्वीकार कर भीमसेन ने पुत्र घटोत्कच उत्पन किया और बाद में अपने सभी भाइयों सहित एकचक्रा नामक नगरी में आया। ब्राह्मण के वेश में भिक्षा के अन्न से सभी का जीवन-निर्वाह हो रहा था, उस समय पाण्डव कुछ ब्राह्मणों के साथ द्रुपद राजा के पांचाल देश गए। वहाँ रास्ते में अंगारपूर्ण नामक गंधर्व को हरा कर अर्जुन ने अश्वविद्या सीखी। बाद में द्रुपदराज की राजधानी पहुंच कर, एक कुम्हार के घर शरण लेने की सोच कर वहाँ निवास किया। वहां व्यास मुनि ने आ कर उन्हें आश्वस्त किया तो सभी पाण्डव द्रुपदराज के पास गए। वहाँ अर्जुन ने द्रौपदी स्वयंवर में आए सभी राजाओं का मान मर्दन किया।

द्रौपदी स्वयंवर
दोहा
चार दिशा के नृपत सब, मिले द्रुपद पुर आनि।
कियो भूप सनमान अति, सुता स्वयंवर जानि।।९६।।
चारों दिशाओं से आमंत्रित राजागण द्रुपद के नगर में आ जुटे, स्वयं की पुत्री के स्वयंवर के अवसर पर राजा ने सभी आगन्तुक राजाओं का पूरे सम्मान के साथ स्वागत किया।

रंगभूमि दिन सौध सम, मंचन बैठै भूप।
धृष्टद्यूम्न सबतें कहत, भगनी संग अनूप।।९७।।
स्वयंवर के दिन रंगभूमि (स्थल) पर महलों जैसे सुशोभित ऊंचे ऊंचे मंडपों में राजा गण आकर आसीन हुए उसी समय धृष्टद्युम्न अपनी सर्वगुण सम्पन्न बहिन को साथ लेकर वहाँ आया और सभी राजाओं को कहने लगा।

या धनु तैं यह चक्र झख, करे बेध ततकाल।
हरे सोइ जश नृपन को, मम भगनी वरमाल।।९८।।
जो इस धनुष द्वारा इस मच्छ के चक्र को बेध दे, ऐसा वीर, यहाँ उपस्थित सभी राजाओं के यश को हरने वाला होगा और वही वीर धनुर्धर मेरी बहिन की वरमाला पहनने के योग्य भी।

कवि-कथन
कवित्त
षोडस वरष की है गति थके हंस की सी,
कटी भूखे सिंह की है बानी रिषि बीन की।
इन्दिरा सी आभा जाकी मृदूताइ किसलै की,
शीलता भवानी की सी नैन द्युति मीन की।
सुरभी वसंत की सी जोजन प्रमान चलै,
बिद्या सरस्वती की सी आगम अधीन की।
द्रुपद की कन्या धन्या रंग भू प्रवेश कीनो,
ऐसी नाहिं अन्या बानी भई लोक तीन की।।९९।।
कवि कहता है कि द्रुपद-कन्या सोलह वर्ष की वय वाली है, जिसकी चाल थके हुए हंस जैसी (धीमी), कटि भूखे सिंह जैसी (पतली), वाणी नारद ऋषि की वीणा जैसी (मधुर) है। जिसकी शोभा लक्ष्मीवत है। नई कोंपल के समान जिसके अंगों की कोमलता है और शीलत्व पार्वती के समान है। जिसकी आखें मीन सी और देहगंध बसन्त ऋतु की सुवास जैसी है। जिसकी विद्या सरस्वती के समकक्ष और जो सभी शास्त्रों में प्रवीण है। ऐसी द्रौपदी धन्य है इसके समान कोई कहीं नहीं। यह अपने जैसी एक अकेली है। (इसमें उपमा तथा अनन्वयालंकार है-सं.)

राजलोक परस्पर वचन
स्वयं भू कुमारी भ्रात स्वयं भू कौं अग्र करी,
अनन्य स्वरूप लिये रंग भू मैं ऊतरी।
तेज बिंब ही तैं सब भूप चकचौंधे भये,
चली मानों मोहनी कौं मोहिबे की पूतरी।
काके औ भतीजे पिता पुत्र मामे भागिनेय,
आपस में बकैं बानी भई जात तूतरी।
मेरी कन्या मेरी कन्या भये निरलाज बोलैं,
सरस्वती और अर्थ कीनो अदभूत री।।१००।।
अपने आप प्रकट (द्रुपद राजा द्वारा किए गए यज्ञ कुंड से) हुई कुमारी द्रौपदी अपनी ही तरह उत्पन्न हुए भाई को साथ लेकर, अनन्य सुन्दरता ले रंगभूमि में उतरी है। जिसके तेज पुंज की चमक से सभी राजा गण दिग्मूढ (चकित) हो गए। रंग भूमि में द्रौपदी ऐसे चल रही है मानों मोहनी माया को भी मोह लेने वाली पुतली चल रही हो। उसकी सुन्दर छवि को देख कर आगन्तुकों में उपस्थित कई काका-भतीजे, पिता-पुत्र, मामा-भानजे परस्पर तुतलाते बोलों में कहने लगे-‘यह मेरी कन्या है’ ‘नहीं, मेरी कन्या है’ और वे एकदम निर्ल्लज होकर ऐसा प्रलाप करने लगे, परन्तु वाणी की देवी ने इन पदों का अलग ही आश्चर्यकारक अर्थ किया। (अर्थात् यह मेरी पुत्री, नहीं, मेरी पुत्री ऐसा अर्थ किया)

कवि कथन
दोहा
भये निरुद्यम सकल नृप, धनुष चढावन काज।
कहां बेधवो चक्र झख, सोचत द्रुपद समाज।।१०१।।
मत्स्य वेध करने के लिए धनुष चढ़ाने में ही सभी राजागण असफल रहे तो फिर मत्स्य वेध कैसे होगा? यह सोच कर राजा द्रुपद चिंताग्रस्त हो गए।

मच्छ बेधवें कों अर्जुन का तत्पर होना
भीमानुज ठाढो भयो, कर समेटि शिर केश।
महा दीन द्विज वृंद में, बाढी प्रभा विशेष।।१०२।।
इतने मैं अर्जुन अपने सिर पर हाथ फिराते हुए, केशों को संवार कर खड़ा हुआ। जिसके कारण ब्राह्मण समूह की शोभा दुगुनी हो गई।

विप्रलोक परस्पर वचन
कवित्त
धनुष पै गौन महा बली पांडुनंदन को,
मत्त गजराज पै ज्यौं कहरी लसतु है।
दीन द्विज भेष अग्नि भसमावछन्न बेष,
देखि बाल-वृद्ध-युवा ब्राह्मण हसतु हैं।
सुयोधन आदी बड़े सूर देश देशन के,
भूपन के तेज राधा बेध तैं नसतु हैं।
नाना जे पटाम्बर की कमर खुलत जात,
देखो ए फटाम्बर की कमर कसतु है।।१०३।।
महाबलवान अर्जुन धनुष की ओर ऐसे लपका जैसे मस्त हाथी पर सिंह लपकता है। राख से ढके ( भस्म से आवेष्टित) शरीर पर फटे चिथड़े जैसे वेश में अर्जुन को देख कर छोटे-मोटे, बड़े-बूढ़े सभी ब्राह्मण हँस पड़े। दुर्योधन आदि बड़े-बड़े शूरवीर राजाओं के मत्स्य बेधन के प्रयत्न में रेशम के कमर-बंध खुल पड़े अर्थात वे असफल रहे। वहीं यह देखो वह फटाम्बर (फटे हाल कपड़े) से धनुष उठाने को कमर कस रहा है।

दोहा
दासिन के जर वसन ज्यों, फटे वसन वर नार।
त्यों अंतर नर नृपन में, विबुध उचरि तिहि बार।।१०४।।
यह हाल देख कर किसी विद्वान ब्राह्मण ने कहा कि हे ब्राह्मणो! तुम ठीक कहते हो पर जैसे किसी दासी ने जरी के वस्त्र पहने हो और श्रेष्ठ कुल की पतिव्रता नार फटे कपड़ों में हो इससे क्या, श्रेष्ठ तो वही गिनी जाएगी। यही अन्तर सुसज्जित वेश में यहाँ उपस्थित राजागणों और अर्जुन में है।

वय तै कुल तैं विभव तैं, विद्या तैं नहि होत।
अति पौरुष अति बुद्धिबल, पूरब कर्म-उद्योत।।१०५।।
अतीव पराक्रम और अति बुद्धिबल, ये दोनों वय से, कुल से, वैभव से कि विद्या से प्राप्त नहीं होते परन्तु पूर्व-कर्मो के फल के उदय से मिलते हैं।

कवित्त
बोलैं तपवृद्ध वयवृद्ध विद्यावृद्ध विप्र,
ऐसे जिन कहो द्विज बिन मापी रासी है।
कहीं तुम विप्रन की हांसी हु करावोगे ए,
क्षत्रिन की इहां कहां नहिं भई हांसी है।
पान कीनो सिंधु को अगस्त गिरि दाबि दीनो,
अर्बुद कौं ब्रह्मगर्त थापी कौन कासी है।
बाल है अवस्था याकी कृश है शरीर जाको,
को जानै? जो लक्षवेध यश को प्रकासी है।।१०६।।
उपस्थित समुदाय में जो तप, वय और विद्या में बड़े (वृद्ध) थे वे ब्राह्मण कहने लगे कि हे ब्राह्मणो! यह मत कहो कि यह ब्राह्मण बेचारा क्या करेगा? ब्राह्मण तो बुद्धि और बल में, नहीं नापा जा सकने योग्य समूह है, फिर तुमने कहा कि यह द्विज हम सभी ब्राह्मणों की हंसी करवाएगा परन्तु तुम्हीं कहो क्षत्रियों की यहाँ क्या कहाँ-कहाँ हंसी नहीं हुई? विशिष्ट ब्राह्मणों को तो देखो (उन्हें याद करो) जिनमें अगस्त्य ऋषि ने समुद्र का आचमन किया, विंध्याचल पर्वत को दबा कर सीधा कर दिया। ‘ब्रह्मगर्त’ नामक विशाल गड्ढे को अर्बुदाचल (अरावली) पर्वत से किसने भरा? कासी की स्थापना किसने की? अर्थात् ब्राह्मणों ने ही की। अब आप लोग इस ब्राह्मण की बाल वय और दुर्बल शरीर को देख कर हँसते हैं, कौन जाने लक्ष्यवेध में यही सफल हो। इस बात की किसे खबर है?

अर्जुन का अद्‌भुत पराक्रम-कवि कथन
कौन अस्त्र शस्त्र की बराबरी करैया यातें,
पारथ की मैया एक जायो वार पाथ ही।
सुयोधन धृष्टकेतू जरासंध भूरीश्रवा,
और हू खिसाने नैंक छुये धनु हाथ ही।
गुन कौ चढान पंच बान को संधान ऐंचि,
छोरिबो रु वेधिबो लख्यो न हलनाथ ही।
पर्शन धनु को भूमि दर्शन निशान हू को,
देव पुष्प वर्षन दिखानो एक साथ ही।।१०७।।
कवि कहता है कि अर्जुन की माता ने (एक वीर) अर्जुन ही को जन्म दिया है। अस्र-शस्र में बराबरी करने वाला इसके समतुल्य कौन है? दुर्योधन, धृष्टकेतु जरासंध, भूरिश्रवा आदि अनेक राजा तो धनुष को छूने में ही खिसिया गए परन्तु अर्जुन का प्रत्यंचा पर पांच बाणों का संधान कर, प्रत्यंचा का खेंचना, बाणों का छोड़ना और मत्स्य-वेध आदि सभी कुछ इतनी त्वरा से हुआ कि सामने बैठे बलभद्र भी कहाँ देख पाए? अर्जुन का मत्स्य-वेध में धनुष का छूना, मत्स्य-वेध हो कर मछली का भूमि पर गिरना, और देवताओं का प्रसन्न हो कर स्वर्गलोक से पुष्प बरसाना ये तीनों बातें एक साथ हुई।

नमावत धनु शीष नमा दिये भूपन के,
मुरवी चढी त्यों चढी तेजी स्व शरीर पै।
सांधत ही डखु भयो सगपन संधान ताहि,
ऐंचत ही ऐंच्यो कन्या चित्त महा बीर पै।
छूटै मूठी छूटबो रसा को भार जान्यो गयो,
वारै मणी देववधू अर्जुन की धीर पै।
मच्छ का गिरानो मानों गजब गिरानो भये,
एकठे भुवाल के मनोरथ की भीर पै।।१०८।।
कवि कहता है अर्जुन के मत्स्य-वेध करने में, धनुष को नमाते ही सामने बैठे राजाओं सिर नँव गए। धनुष की प्रत्यंचा चढ़ते ही उसकी देह पर तेजस्विता चढ़ गई, बाण के संधान के साथ ही उसके सगपन (सम्बन्ध) का संधान हुआ, धनुष खेंचते ही द्रौपदी ने महावीर अर्जुन पर स्वयं के चित्त को खिंचा पाया और धनुष की प्रत्यंचा से अर्जुन की मुट्ठी छूटते ही पृथ्वी ने अपने भार को छूटा पाया। इस प्रकार अर्जुन के धैर्य पर प्रसन हो कर देवताओं की स्त्रियां अर्जुन पर मणियाँ न्योछावर कर रही है। वेधित होकर मत्स्य भूमि पर क्या गिरा मानों यहाँ एकत्रित सभी राजाओं के मनोरथ पर कहर गिरा।

जरे तरे आग तापै तेल को कटाह भरो,
तापै खड्‌ग पैनी धार पाय रोपि रहिबो।
ताल सात ऊंचो चक्र भ्रमै तापै मीन नैन,
ताको व्यंब तेल बीच अधोदृष्टि चहिबो।
दुसह कोदंड को चढान पंच बान तान,
ऊरध प्रहार मुष्ट व्योम को सो गहिबो।
बोले लोक बिना बीर बासवी के कैसे बनै,
ऐसो लक्षवेध कन्या कीरति को लहिबो।।१०९।।
कवि कहता है कि मत्स्य-वेध की प्रक्रिया कितनी संश्लिष्ट और कठिनतर थी कि नीचे अग्नि प्रज्वलित है, उस पर तेल मे भरा कड़ाव रखा है। उसके ऊपर रखी नंगी तलवार की तीखी धार पर पाँव रख कर खड़ा होना और सात ताड़ वृक्षों जितनी ऊंचाई पर रखे गए लक्ष्यवेधन चक्र में घूमती हुई मछली के प्रतिबिंब को उबलते हुए तेल में देख कर धनुष की प्रत्यंचा पर पांच बाण चढ़ाने के बाद प्रत्यंचा खींच कर ऊपर प्रहार करना। यह असाध्य सा कार्य ऐसा था मानों मुट्ठी में आकाश को पकड़ने का यत्न करना। कवि कहता है कि कीर्ति और कन्या को प्राप्त करने का कारण रूप ऐसा लक्ष्यवेध वीर अर्जुन के अतिरिक्त दूसरे किसी से कैसे बन पड़े ? ऐसा तीनों लोक बोल उठे।

वरमाल आरोपन
दोहा
मानहु भुव दधि मेखला, धरि छल रूप कुमारि।
अर्जुन कौं वर कर लयो, गर वरमाला डारि।।११०।।
कवि कहता है कि मत्स्य-वेध के होते ही मानों पृथ्वी की समुद्र रूप कटिमेखला ने कपट से द्रौपदी का रूप धर कर अर्जुन के गले में वरमाला डाल उसे वर के रूप में वर लिया हो।

द्रुपद दुल्हारी करन तैं, धारी नर वरमाल।
राज श्रिया सुत धर्म की, सब दुष्टन को काल।।१११।।
मत्स्य वेध के बाद द्रुपदराज की जिस पुत्री ने स्वयं के हाथ से अर्जुन को वरमाला पहनाई है वह राजा युधिष्टिर की तो साक्षात राज्य लक्ष्मी है और सारे दुष्टों के लिए काल स्वरूप है।

पांडवों का अपने स्थान पै आना
कहि सहदेव सु जननि तैं, लाये कछु जुत राग।
पृथा कह्यो तुम पंच हू, भुक्तहु जुक्त विभाग।।११२।।
द्रौपदी स्वयंवर के बाद पांचों पाण्डव अपने गृह स्थान को आए तब सहदेव ने माता कुंती से कहा कि हे माता! हम प्रीति पूर्वक कुछ लाए हैं। यह सुन कर माता ने कहा कि अच्छा, तुम पांचों भाई अपना-अपना हिस्सा कर उसे साथ-साथ भोगो!

युधिष्ठिर कथन
कह्यो युधिष्ठिर बचन सुनि, लाये नृपति कुमारि।
एक त्रिया हम पंच पति, यह कैसो आचार।।११३।।
कुंती का कहा सुन कर युधिष्ठिर ने कहा कि हे माता! हम तो राजकुमारी (द्रौपदी) लाए हैं, वह एक स्त्री और हम पाँच हैं। आपकी आज्ञानुसार आचरण कितना खराब कहलाएगा।

गुरूजन आज्ञा आज लौं, हम नहिं त्यागी मात।
पृथा कहै जो भविष्य है, ऐसे हि व्है हैं तात।।११४।।
हे माता! हमने आज तक गुरुजनों (अपने से अग्रजों) का कहना माना है, उनकी आज्ञा की अवज्ञा नहीं की। यह सुन कर कुंती ने कहा कि हे पुत्र! जो भविष्य में लिखा है वह ऐसे ही हो के रहेगा।

दुपद कों शोच होना
करी दुपद तैं प्रगट सब, भयो नृपति कौं शोच।
करै युधिष्ठिर अनय यों, इहधौं कैसो पोच।।११५।।
युधिष्ठिर और उसकी माँ कुंती के संवाद का समाचार जब राजदूतों ने द्रुपदराज तक पहुँचाया तो सुन कर उन्हें खेद हुआ। उन्होंने वेद व्यास के सम्मुख जा कर कहा कि देखो, धर्मराज अधर्म की बात कर रहा है, इससे अधिक अन्याय और नीच कर्म क्या हो सकता है?

कह्यो दिखायो व्यास ने, पूरब श्राप सु रूप।
द्रुपद शीख सुनि व्यास की, कीनो व्याह अनूप।।११६।।
द्रुपद राज की बात सुन कर व्यासजी ने द्रोपदी को मिले हुए पूर्व श्राप को कह सुनाया। व्यास के उपदेश सुन कर द्रुपद ने इसे भविष्य जान कर भुला दिया और द्रौपदी का अनुपम विवाह किया।

पांडव जीवते हैं सो दुर्योधनादि का जानना
सुनत सुयोधन आदि नृप, पांडव जीवत मान।
दुर्जन विष सज्जन अमृत, पान करत गये थान।।११७।।
राज सभा में वेद व्यास के मुँह से पाण्डवों के ये समाचार सुन कर कि वे जीवित हैं दुर्योधन आदि को बहुत कष्ट हुआ। इस समाचार को सुन कर दुर्जनों ने अपने द्वेष रूपी विष का सेवन किया और स्वजनों को अमृत पान का सा हर्ष हुआ। कृष्ण और द्रुपद का दायजा देना

कृष्ण द्रुपद दोनो दिये, गज हय रथ अरु दास।
कुछ दिन पांडव द्रुपदपुर, हरिजुत कियो निवास।।११८।।
विवाहोपरान्त द्रुपद राज तथा ननिहाल पक्ष से श्री कृष्ण ने पांडवों को दहेज में हाथी घोड़े, रथ और दास-दासी इत्यादि प्रदान किए। इस के बाद श्री कृष्ण और पाण्डव कई दिन द्रुपदराज के नगर में रहे।

शत्रुनाश के उपाय के लिये दुर्योधन का मंत्र
छंद पद्धरी
इह सुनी बात धृतराष्ट्र आप, सुत पांडु जियत बढते प्रताप।
करि हर्ष घोष दुंदुभि दिवाय, इह सुनत सुयोधन निकट आय।।११९।।
कहि हर्ष कियो क्यों शोक थान, मम शत्रु बढत सुनि अप्रमान।
नृप कह्यो विदुर की शंक काज, शोकहि छिपाय किय हर्ष आज।।१२०।।
पाण्डव अपने बढ़ते प्रभाव के साथ सकुशल हैं यह बात जब धृतराष्ट्र ने सुनी तो हर्ष के साथ दुंदुभि पिटवाई। यह सुन कर दुर्योधन ने अपने पिता के पास आ कर कहा कि हे पिता! मेरे शत्रुओं के बढते प्रभुत्व को सुन कर आपको शोक की जगह हर्ष हुआ, क्यों? प्रत्युत्तर में धृतराष्ट्र ने कहा कि पाण्डव जीवित हैं, यह सुन कर हर्ष न करूं और शोक ग्रस्त हो जाऊं तो विदुर मुझ पर नाराज हो जाएंगे। यही सोच कर (इसी आशंका से) मैंने आज शोक छिपा कर हर्ष प्रकट किया है।

किय मंत्र करन सकुनी बुलाय, अब करौ शत्रु नाशक उपाय।
कोउ पठवें द्विज अपने अधीन, दैं विष हि मारि डारे अरीन।।१२१।।
अथवा नप द्रौपद कौं फटाय, फिर मारि गेरहू बिन सहाय।
अथवा कछु छल व्है भीम नाश, बिन भीम सुलभ सब जुक्त त्रास।।१२२।।
इस पर दुर्योधन ने कर्ण और शकुनि को बुला कर मंत्रणा की, कि अब शत्रु नाश के कुछ उपाय करो। अपने किसी खास ब्राह्मण को बुला कर उसे वहाँ भेजो जिससे वह ब्राह्मण वहाँ भोजन में विष मिला कर पाण्डवों को खिलाये। अथवा एक उपाय यह भी हो सकता है कि द्रुपद राज और उनके बीच वैमनस्य करवा दें जिससे वे असहाय हो जाएं और हम उन्हें सहज ही मार सकें। यदि ये संभव न हो तो किसी तरह छल-कपट से भीमसेन का नाश कर दिया जाए तो उसकी अनुपस्थिति मैं त्रासयुक्त पाण्डवों को मारना सुलभ हो सकता है।

यों कहै सुयोधन मत अनेक, इत सुनत न मानी करन एक।
ए किये जतन तुम नृपति आदि, बिनु सिद्ध भये ते सकल वादि।।१२३।।
दै आज्ञा मोकहँ सैन्य कोश, बिनु सैन्य कोश अरि है निरोष।
जो प्रबल होहि ते हतहि मोहि, मैं प्रबल बिना अरि करिहु तोहि।।१२४।।
इस प्रकार दुर्योधन ने अपने कई मंतव्य दरसाए पर उसकी सारी बातें सुन कर कर्ण ने उन्हें मानने से इन्कार करते हुए दुर्योधन से कहा कि हे दुर्योधन! तुमने पहले भी ऐसे कई उपाय किये पर वे सारे व्यर्थ गए। अब मैं तुमसे कहता हूँ मुझे लश्कर और खजाना दे कर आज्ञा दो तो मैं शत्रु-नाश हित उनसे लड़ने जाऊं। कारण कि अभी शत्रु सेना विहीन है और खजाना भी साथ नहीं है। इस प्रकार वे अभी असत्तावान हैं। इस पर भी यदि वे पराक्रमी निकले तो मुझे मार देंगे और यदि मैं बलशाली हुआ तो उन्हें मार गिराऊंगा और तुम्हें शत्रु-रहित कर दूंगा।

कर्ण कथन
दोहा
निकट बिना पख बाल वय, मिटे न सुगम उपाय।
दूर सपक्ष किशोर तन, यों कस सकहि मिटाय।।१२५।।
इसके अतिरिक्त यह भी कहा कि हे दुर्योधन! जिस समय वे पास थे, छोटी वय में थे और असहाय थे, उस समय वे सुगमता से मारे जा सकते थे पर तुमसे समाप्त न किये गए। अब तो वे सोलह वर्ष के किशोर वय वाले हैं, उन्हें सहायता देने वाले भी विद्यमान हैं, ऐसी स्थिति में तुम उन्हें कैसे मिटाओगे?

कवि कथन-भीष्म तथा द्रोणादि उवाच
कह्यो भीष्म अरु द्रोण कृप, नृप जीवहु जिय नीक।
तुच्छ बुधिंन के कहन तैं, नहिं विरोध यह ठीक।।१२६।।
दुर्योधन के ऊपर वर्णित विचारों की जानकारी होने पर भीष्म, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य ने राजा धृतराष्ट्र से कहा कि हे राजन्! क्या आप जीवित रहने के लिए ही जिन्दा हैं? अर्थात् इस प्रकार आपका जीना अच्छा नहीं कि आप इन तुच्छ बुद्धि वालों के कहने पर विरोध पर उतारू हैं, यह अच्छा नहीं है।

इनके अनुमत तैं विदुर, जेष्ट बंधु समझाय।
कह्यो अर्ध भू दीजिये, सब दूषण मिटि जाय।।१२७।।
भीष्म तथा द्रोणाचार्य के मत के अनुसरण में विदुर ने अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र को समझाते हुए कहा कि आधा राज्य पाण्डवों को देने से सारी कठिनाइयां दूर हो सकती हैं।

धृतराष्ट्र का पांडवों को बुलाय के अर्ध राज्य देना
छंद पद्धरी
धृतराष्ट्र भूप गुरू वचन धारि, सोइ नीति जानि कुल वृद्ध सारि।
विदुर कौं पठय तिन्ह लैन काज, दिय अर्ध भूमि सब राज साज।।१२८।।
दिय इन्द्रप्रस्त बैठक विशाल, किय राज्य युधिष्ठिर कछुक काल।
इक दिवस आय नारद रिषीश, इन्ह पूजा किय उन्ह दिय अशीष।।१२९।।
राजा धृतराष्ट्र ने अपने बड़कों (गुरुजनों) के वचनों को हृदय में धार कर सहविधि कुल की वृद्धि हो इस नीति को जान कर विदुर को पाण्डवों को बुलाने भेजा तब पाण्डव आये। उन्हें (छत्र, चंवर, सैन्य, कोशादि) सभी राज-साज के साथ आधे राज्य की भूमि सोंपी और राजधानी बनाने के लिए एक बड़ा नगर इन्द्रप्रस्थ सोंपा। इस के बाद युधिष्ठिर ने कई दिनों तक राज्य किया। एक दिन नारद मुनि पांडवों के यहाँ अतिथि बन कर आए। पाण्डवों ने उनकी अर्चना की तो ऋषि नारद ने उन्हें आशीर्वाद दिया।

सुंदोपसुंद आख्यान शुद्ध, समजाय कह्यो बांधव विरूद्ध।
सो भ्रात तिलोत्तम त्रिया व्याज, कट परे सुरन को भयो काज।।१३०।।
तुम हू जुत प्रीति सु नियम लीन, इक त्रिया पंच रहियो अधीन।
तथास्तु कह्यो मिलि पंच भ्रात, तुम कह्यो नियम हम करहिं तात।।१३१।।
इसके बाद नारद मुनि ने उन्हें सुंद और अपसुंद का आख्यान सुना कर उन दोनों भाइयों का परस्पर विरोध वर्णित करते हुए कहा कि हे पाण्डवो! ये दोनों भाई तिलोत्तमा नामक स्त्री के छल से आमने-सामने लड़ कर कट मरे और बिना ही श्रम के देवताओं का मनोरथ पूरा हुआ। तुम्हें भी इस आख्यान से शिक्षा ले प्रेम पूर्वक नियम ले कर, पांचों भाइयों को एक स्त्री (द्रौपदी) के वश में रहना है। पाण्डवों ने उनकी आज्ञानुसार आचरण करने का आश्वासन दिया।

द्रौपदी के लिये पांडवों का नियम
दोहा
दुपद सुता ढिग एक पति, हुय तहां द्वितीय न जाय।
जाय सु द्वादश वर्ष बन, जुत ब्रह्मचर्य बिहाय।।१३२।।
नारद ऋषि के उपदेशानुसार द्रौपदी बाबत पाण्डवों ने ऐसा नियम बांधा कि द्रौपदी के पास एक पति के रहने की अवधि में, वहाँ दूसरा न जाए। यदि कोई चला जाए तो उसे बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर वन-गमन करना पड़ेगा।

अर्जुन समीप इक ब्राह्मण की पुकार
छंद पद्धरी
कोउ दिवस गये इक विप्र आर्य, परिपंथि ले गये प्रबल साथ।
अर्जुन समीप किय द्विज पुकार, तुम महा छत्रि हम निराधार।।१३३।।
मम वित्त छुड़ावहु पृथानंद, करिये सब दुष्टन को निकंद।
पांडव उपरोक्त नियम का पालन करते हुए आराम से अपने दिन व्यतीत कर रहे थे कि एक दिन डाकुओं का एक दल एक ब्राह्मण की गायें जबरन घेर कर ले गया, इसकी फरियाद ले कर ब्राह्मण अर्जुन के पास आया कि आप महावीर क्षत्रिय है और मैं एक निराधार (अबल) ब्राह्मण, इसलिए हे पृथानंद! आप मेरी गई गायों को वापस लाएं और दुष्टों को इसका दण्ड दे कर उनका नाश करें।

अर्जुन उवाच
अंतःपुर मेरे अस्त्र आहि, तहां भूप त्रियहि जुत समय नाहिं।।१३४।।
कछु जेज करहु लावहु छुडाय, भयो विप्र सुनत व्याकुलत भाय।
अर्जुन द्विज आतुर लखि अभीत, लै शस्त्र समर करि शत्रु जीत।।१३५।।
द्विज कौं वित दै निज गृह पठाय, किय अरज युधिष्ठिर निकट आय।
कीजिये हुकम बनवास काज, वह कियो नियम सुध करहु आज।।१३६।।
ब्राह्मण की आर्त्त पुकार सुन कर अर्जुन ने कहा कि हे ब्राह्मण! मेरे शस्त्र अन्तःपुर में हैं और वहाँ अभी राजा युधिष्ठिर अपनी स्त्री (द्रौपदी) के साथ हैं इसलिए अभी भीतर जाने का समय नहीं है। थोड़ी देर प्रतीक्षा कर, मैं उन्हें (गायों को) छुड़ा लाऊंगा। यह सुन कर ब्राह्मण व्याकुल हो गया। अर्जुन से ब्राह्मण की यह दशा देखी नहीं गई और वह निर्भय हो कर अपने शस्त्र उठाने पहुँचा और शस्त्र ले कर थोड़ी ही देर में ब्राह्मण की गायें छुड़ा लाया और दस्युओं को मार गिराया। ब्राह्मण को अपनी गायें वापस कर अर्जुन ने घर आ कर युधिष्ठिर से अर्ज की, कि हे बड़े भाई! आप मुझे, हमारे बनाये नियम को तोड़ने के अपराध में, बनवास जाने की आज्ञा दें।

युधिष्ठिर उवाच
मैं करत हुतो नित नियम तात, कछु दोष नहीं तुम अनुज भ्रात।
तेरो विजोग मोहि असहमान, अत्र हि कछु करिये पुन्य दान।।१३७।।
अर्जुन के वचन सुन कर राजा युधिष्ठिर ने कहा कि हे भाई! तुम जब अन्तःपुर में आए उस वक्त में अपने नित्यनेम (पूजा पाठ) में निमग्न था, और चूंकि तुम छोटे भाई हो इससे अपने बनाए नियमानुसार तुम्हारा कोई दोष नहीं हुआ। फिर तुम्हारा वियोग मुझसे सहन नहीं होगा, इसलिए यहीं रह कर प्रायश्चित स्वरूप कुछ दान पुण्य करो।

कवि कथन-अर्जुन उवाच
नर करी अरज आधीन होय, छल धर्म न साधैं महत लोय।
आचरन बड़न को लखि विरुद्ध, चहुं बरन होय विपरीत बुद्ध।।१३८।।
धर्मराज के वचन सुन कर अर्जुन विनयपूर्वक कहने लगा कि हे अग्रज! बड़े आदमियों को कपट से धर्म-रक्षा नहीं करनी चाहिए। बड़ों को धर्म विरूद्ध आचरण करते देख, चारों वर्ण वालों के विपरीत बुद्धि होने का अन्देशा है।

अर्जुन का वनगमन
यहि कहि रु विजय वन गमन कीन, कोटेक स्वर्न रिषि संग लीन।
जमुना तट संध्या करत बेर, ऊलुपी नागकन्या सुहेर।।१३९।।
रति काज नरहि जाच्यो सु नारि, ब्रह्मचर्य कह्यो अर्जुन बिचारि।
ऊलुपी कह्यो ऐसो नकार, करि होत भ्रूणहा नर उदार।।१४०।।
इक निशा रह्यो नर अहिनिकेतु, भो इरावान सुत तास हेतु।
इतना कह कर अर्जुन ने असंख्य मोहरें (अशर्फियां) और ऋषियों को संग लेकर वन गमन किया। फिर एक दिन यमुना नदी के किनारे पर संध्या करते समय अर्जुन को ऊलूपी नामक नागकन्या ने देखा और आशक्त हो गई। नागकन्या ने ऋतुमती होने के कारण अर्जुन से संभोग की प्रार्थना की, इस पर अर्जुन ने विचार कर कहा कि मेरे अभी ब्रह्मचर्य व्रत है, तब उलूपी ने कहा कि हे उदार अर्जुन! तुम ने अभी ना कह कर भ्रूणहा (बालक की संभावना वाले गर्भ से इन्कार) होने का पाप किया है। यह सुन कर अर्जुन एक रात नाग निवास में रहा, इस से उसे ईरावान नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।

कोउ काल प्राचि दिशि गमन कीन, तीर्थाटन दक्षण पंथ लीन।
पथ बिकट जानि नर जुत अनंद, सब किये विसर्जन विप्रव्रंद।।१४१।।
मणिपूर नग्र कीनो प्रवेश, नर लखी तहां पुत्री नरेश।
जाची नृप पै नृपसुता जाय, नृप कहत नरहि कारन सुनाय।।१४२।।
थोड़ा समय वहाँ काटने के बाद अर्जुन ने पूर्व दिशा में प्रयाण किया। उसके बाद तीर्थाटन हेतु दक्षिण दिशा का पथ लिया। इस मार्ग को विकट जान कर अर्जुन ने अपने साथ आए सारे विप्रवृदों को लौटा दिया। उन्हें विदा कर अकेला पार्थ आगे से आगे चलता गया, बहुत सारा पंथ पार कर वह मणिपुर नामक नगर पहुंचा। इस नगरी में अर्जुन ने वहां की राजकुमारी को देखा तो आशक्त हो गया। इसके बाद वह राजकुमारी के पिता अर्थात् मणिपुर के राजा के पास गया और उनसे उसने उनकी पुत्री का हाथ मांगा।

नृप उवाच
दोहा
शिव वर तैं मम बंश ही, एक हि संतति होय।
मेरे इह पुत्री भई, तुमहि समरपौं सोय।।१४३।।
याके जो कोउ पुत्र व्है, देहु राज मम काज।
अर्जुन कह्यो तथास्तु तब, कियो ब्याह जुत साज।।१४४।।
इस पर चित्रवाहन (राजा) ने कहा कि हे अर्जुन! महादेव के वरदान स्वरूप मेरे वंश में एक ही संतान उत्पन्न होती है। ऐसे में मुझे यह केवल एक पुत्री है वह भी मैं तुम्हें देता हूं पर इस शर्त पर कि यदि इससे पुत्र उत्पन्न हो तो उसे तुम्हें मुझे लौटाना पड़ेगा। मेरे राज्य का उत्तराधिकारी भी चाहिए। यह सुन कर अर्जुन ने कहा कि ऐसा ही होगा तब राजा ने उसका विवाह अपनी पुत्री के साथ पूरे ठाट बाट से किया।

वभ्रूवाहनोत्पत्ति
बभ्रुवाह ताको भयो, तीन वर्ष गये बीत।
तजि सुत जुत चित्रांगदा, अर्जुन चले नचिंत।।१४५।।
इस राजकुमारी चित्रांगदा से वभ्रुवाहन नामक पुत्र उत्पन हुआ। वादानुसार अर्जुन पुत्र और उसकी माता चित्रांगदा को यहीं छोड़, हर्ष पूर्वक तीन वर्ष यहाँ बिता कर, अर्जुन निश्चिंत हो वहाँ से आगे चल पड़ा।

अर्जुन का पंचतीर्थादि में गमन
अच्छर पंच इन्द्रलोक की, रिषि श्राप कौं पाय।
पंचतीर्थ भइ ग्राहनी, नर विचरत तहां आय।।१४६।।
करि उनको उद्धार पुनि, किय आनर्त प्रवेश।
रैवतगिरि उत्सव तहां, मिलि जदुवंश अशेष।।१४७।।
आगे चलते हुए अर्जुन वहाँ आया जहाँ इन्द्रलोक की पांच अप्सराएं जो किसी मुनि के श्राप से पंचतीर्थ में ग्रहिणियां बन गई थीं, निवास करती थी। अर्जुन ने उनका शाप से उद्धार किया। उसके बाद अर्जुन चल कर आमर्त प्रदेश में आया। उस समय गिरनार पर्वत पर उत्सव होने से सारे यदुवंशी वहाँ एकत्र हुए थे।

सुभद्राहरण
पद्धरी छंद
कृष्णादि मिले अति हेत कीन, नित होत तहां उच्छव नवीन।
यक दिवस गिरि हि परिक्रमति आइ, लखि नरहि सुभद्रा अति लुभाई।।१४८।।
परसपर देखि नर भगनि प्रीत, मुसक्याय कह्यो हरि जगतमीत।
यां कहा लखत नर त्रिया ओर, चित कह्यो नर जु मम लियो चोर।।१४९।।
वहाँ उपस्थित कृष्ण आदि सभी यादव उससे प्रेम पूर्वक मिले। वहाँ के समारोह में नित्य नया उत्सव हो रहा था। एक दिन वहाँ स्त्री समुदाय जो पर्वत की प्रदक्षिणा करने आया था, उसमें सुभद्रा भी अपनी सखियों सहित उपस्थित थी। सुभद्रा की नजर जब अर्जुन पर पड़ी तो वह आशक्त हो गई। स्वयं की बहन की और अर्जुन की परस्पर प्रीत देख कर जगत के हितेषी श्री कृष्ण ने हँस कर कहा कि हे अर्जुन! यह स्त्री तुम्हारी ओर क्यों निहार रही है? यह सुन कर कृष्ण सखा अर्जुन ने उत्तर दिया कि इस मोहनी ने मेरा मन मोह लिया है।

श्रीकृष्ण कह्यो मम भगनि सोय, करि जाहु हरण जो प्रीति होय।
बलभद्र सहोदर जुत विधान, दुर्योधन कौं किय चहत दान।।१५०।।
अपनो रथ दारुक जुत उदार, दिय कृष्ण कियो नर हरन नार।
सुनि कोपे जदुकुल सकल सूर, तन कसे कवच रन बजे तूर।।१५१।।
इह सुनत बोलि हलधर अहेत, करिहौं नर कौरव भू निकेत।
अर्जुन के वचन सुन कर श्री कृष्ण बोले कि हे सखा! यह स्त्री मेरी बहिन सुभद्रा है। यदि इस पर तेरी आशक्ति हो तो इसका हरण कर ले क्योंकि मेरे बड़े भाई बलभद्र इसका विवाह दुर्योधन से करने की इच्छा रखते हैं। इतना कह कर श्री कृष्ण ने अपने सारथी दारुक सहित स्वयं का रथ दे कर कहा, यही अवसर है। इस पर अर्जुन ने सुभद्रा का हरण किया। यह सुन कर यदुकुल के सारे योद्धा कुपित हुए और अपने अपने कवच पहन, रणसिंगा बजाने लगे। बलभद्र को पता चला तो वे अत्यन्त क्रोध पूर्वक बोले-कि मैं कुरु वंश को समाप्त कर जमींदोज कर दूंगा।

श्रीकृष्णोवाच
दोहा
छत्रिन की कन्या अपन, लई हरन कर लार।
अर्जुन लै गयो आपनी, यामें कहा विचार।।१५२।।
बिगर जुद्ध जदुवंश के, हरन भयो जश रीत।
जुध तैं लै जैहै अजश, है अर्जुन जग जीत।।१५३।।
बलभद्र को शान्त करने के लिए श्री कृष्ण बोले कि हे भाई! हम क्षत्रियों की कन्याओं का हरण कर लाए हैं अब यदि अर्जुन हमारी कन्या भगा ले गया तो इसमें अनहोनी क्या हुई। युद्ध के बिना हरण हुआ है इससे तो यदुवंशियों का यश बना रह गया क्योंकि अर्जुन महावीर और विश्व विजेता है। यदि वह युद्ध करता भी तो हमें जीत कर ले जाता। इससे हमारा अपयश होता। अर्थात् जो कुछ हुआ, भैया! वह अच्छा ही हुआ, ऐसा कह कर श्री कृष्ण ने बलभद्र के क्रोध को शान्त किया। 

यदुवंशियों का दायजा देने को जाना
छंद पद्धरी
अब तो दत कारन दासि दास, हय गज रथ लै चलिये हुलास।
बलभद्र कह्यो तुम चहत सोय, करिये विचार क्यौं बिलम होय।।१५४।।
सब चले साज चतुरंग सेन, दायजो सुभद्रा काज देन।
आभरन बसन हय गज अनेक, कुरु-जदुन परस्पर दिये केक।।१५५।।
प्रति रहे केउक दिन इन्द्रप्रस्थ, शीख लै चले जदुवंश स्वस्थ।
अब तो भाई सुभद्रा को दायजा (दहेज) देने के लिए हाथी, घोड़े, रथ, दास-दासियां आदि ले कर हर्ष पूर्वक हमें वहाँ जाना चाहिए। इस पर बलभद्र बोले कि हे भाई! यदि तेरी ऐसी ही इच्छा है तो फिर देर किस बात की? विलंब क्यों करना। यह सुन कर सारे यदुवंशी अपनी चतुरंगिनी सजा कर सुभद्रा को दायजा देने के लिए रवाना हुए और इन्द्रप्रस्थ पहुँचे। वहाँ उनका यथायोग्य स्वागत-सत्कार हुआ। इसके बाद यादवों ने हाथी घोड़े, वस्त्र-आभूषण आदि भेंट किए जिन्हें पाण्डवों ने सहर्ष स्वीकार किया। थोड़े दिनो तक यादव वहाँ ठहर कर वापस निज स्थान को चले।

खांडव वन दहन वर्णन
श्रीकृष्ण रहि अर्जुनहि संग, इक दिवस ग्रीष्म ऋतु धरि उमंग।।१५६।।
खांडव ढिग जमना जल विहार, तिन काज भये नर हरि तयार।
लै सीख युधिष्ठिर उभै बीर, तरुनीन जुक्त रवि सुता, तीर।।१५७।।
जुत खानपान नाटक विधान, कोउ काल रहे क्रीडा समान।
बिहु बैठे पुनि एकांत बीर, तिहि समय अग्नि धरि द्विज शरीर।।१५८।।
कहि बचन खांडु बन दग्ध काज, मम भयो अजीरन मिटहि आज।
श्री कृष्ण वहीं अर्जुन के संग रहे। एक दिन ग्रीष्म ऋतु में उमंग कर खाण्डव वन के पास यमुना नदी के जल में विहार करने की इच्छा कर अर्जुन और श्री कृष्ण तैयार हुए और दोनों ने धर्मराज की आज्ञा चाही। युधिष्ठिर की आज्ञा पा कर वे स्त्रियों को साथ ले कर यमुना नदी के किनारे खानपान और नृत्य-नाटक का विधान रच, कई देर तक जलक्रीड़ा में निमग्न रहे। इसके बाद दोनों वीर वहीं नदी किनारे एक एकान्त स्थान पर बैठ वार्तालाप करने लगे कि इतने में ब्राह्मण के वेश में अग्निदेव वहाँ आए और कहने लगे-‘मुझे जो अजीर्ण हुआ है वह आज मिटे’। इतना कह कर उन्होंने खांडव वन को जलाने का कहा।

कहि अर्जुन हरि जुत प्रणित कीन, यह वन सुरेंद्र रक्षा अधीन।।१५९।।
ऐसेहु व्है वाहन अस्त्र मीत, तब तृप्त करैं सुर-असुर जीत।
लै दयो ब्रह्मरथ अग्नि पाथ, गांडीव धनुष द्वै अखय भाथ।।१६०।।
कृष्ण कौं सुदर्शन दयो तत्र, जारिबे खांडुबन लग्यो जत्र।
सुनि इन्द्र खांडु रक्षक पुकार, त्रिभुवनाधीश किय जुध तयार।।१६१।।
विप्र वेश में अग्नि देव के वचन सुन कर अर्जुन ने कृष्ण सहित अर्ज की, कि हे विप्रदेव! यह वन इन्द्र की सुरक्षा में है, इसलिए उपयुक्त अस्त्र-शस्त्र और वाहन हो तो मैं सुर और असुरों को जीत कर तुम्हें तृप्त कर सकता हूं। अर्जुन की शर्त सुन कर अग्निदेव ने ब्रह्मा के पास से रथ, वरुण देव से गांडीव नामक धनुष तथा अक्षय और शत्रुजीत ये दो तरकश अर्जुन को ला दिये। वहीं श्री कृष्ण को सुदर्शन चक्र दिया। अग्निदेव के दिये वाहन और शस्त्र ले कर अर्जुन खाण्डव वन को जलाने लगा कि खाण्डव वन के रक्षकों की पुकार सुन इन्द्र ने त्रिभुवनाधीश से युद्ध करने की तैयारी की।

इन्द्र और अर्जुन का युद्ध
इक ओर इन्द्र अहि दनु अपार, उक ओर पृथानंदन उदार।
कछु काल भयो संग्राम क्रुध, बढि पर्यो पिता पुत्र हु बिरुद्ध।।१६२।।
दिय आज्ञा घन कौं देव देव, इत रच्यो सरा पंजर अजेव।
द्वादश बन अहुटे हीन दर्प, मय दैत्य बच्यो पुनि एक सर्प।।१६३।।
खग चार रिषापुत्रन विहीन, वन भौ दैत्यन जुत भस्म लीन।
नहिं भयो मेघ जुत बन बचाव, गो इन्द्र स्वर्ग शांतिक सुभाव।।१६४।।
एक तरफ नाग और अपार दैत्य सहित इन्द्र और दूसरी ओर स्वभाव से उदार अर्जुन, कितनी ही देर तक भयंकर युद्ध होता रहा। इतने में पिता से पुत्र का विरोध बढ़ गया तब इन्द्र ने मेघराज को आज्ञा दी। इधर अर्जुन ने बाणों से एक (पंजर) रचा जो किसी से नहीं जीता जा सके। बारह मेघ उमड़ आए। वे गर्वहीन हुए अर्थात् उनसे कुछ भी न हो सका और खाण्डव वन सर्पों एवं दैत्यों सहित जल कर भस्म हो गया। उनमें से मय नामक दैत्य, एक तक्षक नाग का पुत्र अश्वसेन और मंदयाल ऋषि के सारंग पक्षी रूप चार पुत्र इतने ही बच पाये। बारह मेघों सहित इन्द्र से कुछ भी बचाव न हो सका। बाद में वह परास्त हो कर स्वर्ग को चला गया।

अर्जुन को मयदानव से सभा आदि की प्राप्ति
मारते चक्र मय कौं मुरार, शरणागत अर्जुन लिय उबार।
तिन दई सभा विपरीत तत्र, जल थल हि भ्रांत अध उर्ध्व जत्र।।१६५।।
इक गदा भीम कारन अनूप, शंख देवदत्त सुंदर स्वरूप।
इतने पदार्थ लै गेह आय, सब कहे युधिष्ठिर कौं सुनाय।।१६६।।
कोउ दिवस रहे हरि नृपति भौन, किय मांगि सीख निज पुरी गौन।
श्री कृष्ण जब मयदानव को सुदर्शन चक्र से मार रहे थे तो वह भाग कर अर्जुन की शरण में चला गया, इससे अर्जुन ने उसे बचा लिया। इसके बदले में अर्जुन ने उससे विपरीत सभा बना कर देने का कहा। वह इस तरह की, कि जल की ठौर स्थल की भ्रांति हो, और स्थल की जगह जल का धोखा हो। इसी प्रकार नीचे की जगह ऊंचे की प्रतीति हो और ऊंचे स्थल से नीचे की भ्रांति हो। मयदानव ने यह सब कर देने का कहा और साथ में उसने भीमसेन के लिए एक अनुपम गदा दी और देवदत्त नामक सुन्दर सा शंख अर्जुन को भेंट किया। इतनी सारी भेंट ले कर श्री कृष्ण और अर्जुन घर आए और सारी हकीकत धर्मराज को कह सुनाई। इसके बाद कई दिनों तक श्री कृष्ण राजा युधिष्ठिर के मेहमान रहे, फिर आज्ञा लेकर स्वयं की पुरी (द्वारिका) को प्रस्थान कर गए।

द्रौपदी और सुभद्रा को पुत्रों की प्राप्ति
पांच हू पतिन तैं पांच पूत, द्रौपदी प्रगट कीने अभूत।।१६७।।
प्रतिविंध युधिष्ठिर सों प्रधान, श्रुतिसोम भीमसेनहि समान।
श्रुतिकीर्ति दुतिय अर्जुन स्वरूप, नाकुली सतानीक सु अनूप।।१६८।।
श्रुतिकर्मा सहदेवहि समान, अनुक्रम हि भये बल अप्रमान।
सुभद्रानंद अभिमन्यु सूर, कुरुवंश बीज विधु अंश कूर।।१६९।।
द्रौपदी को पाँच पतियों से ऐसे अपूर्व पाँच पुत्रों की प्राप्ति हुई, जिनमें सबसे बड़ा प्रतिबिंध युधिष्ठिर से, भीमसेन के समान बलशाली श्रुतिसोम नामक पुत्र भीमसेन से, अर्जुन का ही दूसरा प्रतिरूप श्रुतिकीर्ति अर्जुन से, अनुपम शतानीक नकुल से और सहदेव जैसा श्रुतिकर्मा सहदेव से उत्पन्न हुआ। इस प्रकार अपूर्व बल वाले पुत्र हुए। शूरवीर अभिमन्यू सुभद्रा का पुत्र जो अर्जुन से उत्पन्न हुआ वह कुरुवंश की वृद्धि का कारण रूप और चन्द्र का अंश होने से अतीव त्वरा वाला था।

।।इति चतुर्थ मयूख।।

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