पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – पंचम मयूख

पंचम मयूख

सभा पर्व

वैशंपायन उवाच
दोहा
मयदानव नृप धर्म की, नीके आयस पाय।
सभा चतुर्दश मास में, रचिकै दई बताय।।१।।
ता रक्षक अँतरिक्षचर, राक्षस अष्ट हजार।
दस हजार कर मध्य तैं, चारों तरफ प्रचार।।२।।
वैशंपायन मुनि कहने लगे कि हे राजा जन्मेजय! सुनो मयदानव ने राजा युधिष्ठिर से आज्ञा ले कर चौदह महिनों में (विपरीत) सभा का निर्माण कर दिखाया। जिसकी रक्षा का भार आकाश में उड़ने वाले आठ हजार राक्षसों पर था। इस सभा का चारों ओर का विस्तार दस हजार हाथ (गज का नाप) था।

सभा रचना
पद्धरी छंद
नानात्व जलाशय विटप तत्र, चहुँ खान जीव साक्षात चित्र।
अन्नेक रत्न दीरघ निवास, आभा सु मेघ चुंबत अकाश।।३।।
रत्न के कंज अन्नेक रंग, एक तैं एक ध्वज द्रुम उतंग।
जल होय तहां थल सो जनात, द्वार की ठौर भीत हि लखात।।४।।
जवनिका गोख आदिक वितान, अज्ञात परत विपरीत जान।
मय दानव ने उस सभागृह में विविध प्रकार के जलाशय (सरोवरादि) तथा वृक्षों की रचना की। इसके साथ चारों ही खाणी के प्राणियों के चित्र बनाए और अलग-अलग विशाल खण्डों में रत्न जड़े जिससे वहाँ प्रकाश हो। इन स्थलों की गगन चुंबी दीवारों पर नाना प्रकार के रत्नों से बने कमल जड़े थे। एक से बढ़ कर एक ध्वजाएँ और वृक्ष थे। जहाँ पानी था, वह जगह स्थल जैसी दिखती और जहाँ स्थल था वहाँ पानी जैसा आभास होता। जहाँ दरवाजा था वहाँ दीवार प्रतीत होती और जहाँ दीवार दिखती वहाँ दरवाजा होता। इसके अतिरिक्त नाना प्रकार के जाली-झरोखे भी बनाए और वे भी विपरीत आभास देने वाले थे।

राजसूय यज्ञ के लिये पांडु राजा का संदेश
इक दिवस आय नारद अचिंत, अवलोकि सभा हित जुत अनंत।।५।।
तित कह्यो पांडु संदेश ताहि, उत इन्द्रसभा बिच सुखी आहि।
राजसू करन तुहि कह्यौ पुत्र, तिहि सभा विजोग न होहि तत्र।।६।।
नृप धर्म तथास्तू कह्यौ ताहि, चहुँ दिशा विजय बिच हृदय चाहि।
एक दिन नारद मुनि अप्रत्याशित ही सभा में आए और अत्यन्त प्रेम सहित सभा का अवलोकन किया, उसके बाद उन्होंने पाण्डु राजा का सन्देश कह सुनाया कि वे इन्द्रसभा में सुख से हैं और उन्हें इस सभा का वियोग न सहना पड़े इसके लिए युधिष्ठिर तुम से उन्होंने राजसूय यज्ञ के आयोजन का कहलवाया है। यह सुन कर धर्मराज ने ‘तथास्तु’ कहा और चारों दिशाओं में विजय प्राप्त करने की इच्छा हृदय में धारी।

पांडवों को दिग्विजय
चहुँ भ्रात पाय आयस नरेश, दिशि जीति चार नृप देश देश।।७।।
प्राची सु भीम अर्जुन उदीचि, प्रतिची नकूल सहदेव ईचि।
कर द्रव्य नृपन तैं ग्रहन कीन, सब इन्द्रप्रस्थ पठवाय दीन।।८।।
जिन दयो दंड नहि कियो जुद्ध, सो पाय पराजय भये सुद्ध।
यों किये विजय चहुँ भ्रात आय, लीने सु युधिष्ठिर उर लगाय।।९।।
कृष्ण कौं निमंत्रण तिही काल, कीनो सु आय कुलजुत कृपाल।
मन में राजसूय यज्ञ की सोच कर राजा युधिष्ठिर ने अपने चारों भाइयों को देश जीतने का कहा। चारों भाई धर्मराज की आज्ञा पा कर चारों दिशाओं में राज्य जीतने को निकले। पूर्व दिशा में भीमसेन ने प्रस्थान किया, उत्तर दिशा में अर्जुन गया, पश्चिम दिशा विजय को नकुल निकले और अवाची अर्थात् दक्षिण दिशा में सहदेव ने प्रयाण किया। राजाओं से नजराने में प्राप्त धन इन्द्रप्रस्थ को भेजा गया। जिन राजाओ ने हार स्वीकार नहीं कर, धन (कर) नहीं दिया उनसे युद्ध कर उन्हें पराजित कर दण्ड वसूला। इस प्रकार चारों भाई दिग्विजय कर वापस इन्द्रप्रस्थ लौटे। युधिष्ठिर ने उन्हें गले लगाया और उसी समय श्री कृष्ण को बुला भेजा। वे भी सकुटुम्ब इन्द्रप्रस्थ पधारे।

श्रीकृष्ण से राजा धर्म का कथन
दोहा
कही युधिष्ठिर कृष्ण तैं, सब नृप जीते सूर।
जरासंध गिरिव्रजपति, रह्यौ अजय वह क्रूर।।१०।।
दोय अयुत अरु आठ सत, नृप तित कारागेह।
भोगत ते छूटे वगर, मख न सिद्ध मम येह।।११।।
तब युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण से कहा कि सारे शूरवीर राजाओं को जीत लिया गया पर गिरिव्रज का क्रूर शासक जरासंध अकेला अभी तक अजेय है। उसके राज्य में बीस हजार आठ सौ राजा बंदीगृह में सड़ रहे हैं। उन राजाओं को स्वतंत्र कराये बिना (छुड़ाये बिना) मेरा यह राजसूय यज्ञ अधूरा है।

श्री कृष्णादि का जरासंध पै जाना
पद्धरी छंद
नर कृष्ण भीम युत गमन कीन, लै विप्र रूप जुध जाचि लीन।
नृप जुर्यो भीम तैं द्वंद युद्ध, क्रीड़त दिन अष्टाविंश क्रुद्ध।।१२।।
धर्मराज के वचन सुन कर श्री कृष्ण तथा अर्जुन, भीम को साथ ले कर जरासंध के पास गए। वहाँ ब्राह्मण का वेश बना कर युद्ध की याचना की। इतने में जरासंध ने भीमसेन के साथ द्वंद आरंभ कर दिया। यह द्वंद युद्ध अति विकट था और पूरे अट्ठाईस दिनों तक चला।

भीम द्वारा जरासंध का मारा जाना
बीते सु मगधपति मर्यो वीर, तहँ लँघे नृपति दुख सिंधु तीर।
सहदेव मगध सुत राज पाय, श्रीकृष्ण भक्त अपने सुभाय।।१३।।
युद्ध के अट्ठाईसवें दिन जरासंध, भीमसेन के हाथों मारा गया और बंदीगृह में कैद राजाओं ने दुःख रूपी सागर का किनारा देखा, अर्थात् वे आजाद हुए। इसके बाद श्री कृष्ण का भक्त और जरासंध का पुत्र सहदेव अपने गुणों के कारण से मगध देश का राजा बना।

श्रीकृष्णादि का इन्द्रप्रस्थ में आना
दै नृपन शीख अप आप भौन, किय इन्द्रप्रस्थ कृष्णादि गौन।
जरासंध की कैद से छूटे राजाओं को अपने-अपने राज्य में जाने की आज्ञा दे कर श्री कृष्ण, अर्जुन और भीमसेन को साथ ले इन्द्रप्रस्थ आए।

राजसूय यज्ञ में सब राजाओं का आना
सब भई क्रतू संभार सिद्ध, सब देशपति आये सनिद्ध।।१४।।
कुरुवंशि सुयोधन आदि सूर, कोउ और हु शिशुपालादि क्रूर।
इधर राजसूय यज्ञ की सारी तैयारी पूरी हो गई और उधर कुरुवंशी दुर्योधन आदि शूरवीर तथा अन्य कई जैसे शिशुपाल आदि क्रूर राजा मिल कर यज्ञ की तैयारी के समय नजदीक आ पहुँचे।

यज्ञ की भिन्न-भिन्न अधिकार प्राप्ति
छप्पय
भीम अन्न अधिकार, सुहृद सेवा नर धारिय।
दुर्योधन भंडार, दान अधिकार करन दिय।।
नकुल सौंज सहदेव, अखिल भूपन आराधन।
कृष्ण चरन द्विज शौच, लियो अधिकार महत गन।।
नृप त्रिया सुश्रूषा द्रुपदजा, करत जग्य बिच अनुक्रमहि।
युयुधान आदि भूरीश्रवा, जथा योग्य अधिकार लहि।।१५।।
राजसूय यज्ञ के आरंभ में भीमसेन ने अन्न पकाने की पाकशाला का दायित्व लिया, मित्र राजाओं के सत्कार का कार्यभार अर्जुन ने संभाला। दुर्योधन को धन-धान्यादि कोषाध्यक्ष का भार दिया, दानाध्यक्ष कर्ण बनाए गए। राजाओं की सेवा का भार नकुल ने ओढा, साथ ही सभी राजाओं के आराधन (चिंतन) करवाने का दायित्व सहदेव ने लिया। ब्राह्मणों के चरण पखालने का कार्य श्रेष्ठ गिनकर श्री कृष्ण ने लिया। रानियों के स्वागत-सत्कार का भार द्रौपदी ने लिया। युयुधान और भूरिश्रवा आदि ने भी यथायोग्य कार्य-सेवा अपने जिम्मे ली और यज्ञ का कार्य सम्पन्न करने लगे।

राज्य परिषद
दोहा
भयो सँपूरन जज्ञ तब, अवभृत कियो सनान।
जथा योग्य सब नृपति पुनि, परिषद बैठे आन।।१६।।
यज्ञ के सम्पूर्ण होने पर अवभृत स्नान कर सारे राजाओं ने सभा कक्ष में आकर यथायोग्य अपना आसन ग्रहण किया।

श्रीकृष्ण का आद्य पूजन जान के शिशुपाल का कुपित होना
प्रथम हि पूजा कौन की, कीजैं करत विचार।
पूजहु मिलि सहदेव कहि, यह श्रीकृष्ण उदार।।१७।।
करत हि पूजा कृष्ण की, कोप्यो नृप शिशुपाल।
सब नृप रिषि कौं छांडिकै, पूजत प्रथम गुवाल।।१८।।
राज्य सभा के पाण्डव विचार करने लगे कि प्रथम पूजन किसका हो? पाण्डवों के असमंजस की गुत्थी सुलझाते हुए महाप्रतापी सहदेव ने कहा कि हम सभी को मिलकर उदारमना श्री कृष्ण की पूजा पहले करनी चाहिए। श्री कृष्ण की पूजन का आरंभ होते देख कर राजा शिशुपाल क्रोधित होकर कहने लगा-यह क्या, सारे राजाऔं को छोड़कर सर्वप्रथम इस ग्वाले की पूजा?

दुर्वाद से शिशुपाल का वध होना
कहे एक सत कटु वचन, प्रेर्यो चक्र मुरारि।
छेद्यो शिर ता दुष्ट को, जय जय सुरन उचारि।।१९।।
यह कह कर शिशुपाल ने श्री कृष्ण को एक सौ एक कडुवे वचन (इसकी अलग कथा है) कहे। इस पर श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से दुष्ट का सिर काट डाला। इस को देख कर सारे देवताओं ने श्री कृष्ण का जय-जयकार किया।

द्वितीय परिषद
पद्धरी छंद
करी पूजा सबकौं बिदा कीन, उत रहे जिते संबँध अधीन।
मय सभा दुतिय दिन भूप आय, रहि भ्रातन जुत परिषद रचाय।।२०।।
इसके बाद पाण्डवों ने सभी आगन्तुक राजाओं की पूजा कर सभी को विदा किया पर जो सगे-सम्बन्धी थे, वे वहीं रहे फिर दूसरे दिन मय दानव कृत सभा कक्ष में राजा युधिष्ठिर ने अपने भाई सगों के साथ दरबार लगाया।

दुर्योधन का गर्वयुक्त सभा में आना
वह समय सुयोधन सभाथान, आयो सभ्रात मद अप्रमान।
जल जानि वसन संकुरित कीन, थल जान अभय छटकाय दीन।।२१।।
इस अवसर पर अपार मद वाला दुर्योधन अपने भाइयों सहित सभा कक्ष में आया। वहाँ उसने जल है ऐसा जान कर अपने कपड़े ऊँचे लिये और बाद में आगे चलते हुए स्थल जान कर कपड़े वापस नीचे कर दिये।

जल भीज गयो लज्जित अपार, हँसि परी सभा पुनि सकल नार।
निज वस्त्र युधिष्ठिर ताहि काज, पठये सु देखि कोप्यो अपार।।२२।।
पुनि द्वार जानि प्रविसत नचिंत, भाल तैं भई भट भेर भींत।।
इतने में उसके कपड़े पानी से भीग गए (वह जलाशय में गिर पड़ा) तो वह शर्म से पानी-पानी हो गया। इस अवसर पर सारे सभासद हँस पड़े। फिर युधिष्ठिर ने अपने पहनने के कपड़े भेजे, जिन्हें देख कर वह क्रोधित हुआ। इसके उपरान्त वह सामने दरवाजा जान कर बढ़ा कि सामने दीवार से अपना सिर टकरा बैठा।

नकुल उवाच
दोहा
जहां वज्रमणि हंस हैं, नील मनिन के मोर।
गरुतमान मणिमय लता, इह प्रवेश की ठौर।।२३।।
दुर्योधन का सिर टकराया देख कर नकुल बोला कि हे भाई! जहाँ वज्रमणि (हीरे) के हंस और श्याम मणियों से मयूर बने हैं और जहाँ हरी मणियों की लता बनी है, वहाँ दरवाजा है।

दुर्योधन का कुपित होके पीछा लौटना
इह सुनि पुनि कोप्यो अधिक, लखि दर्पन बिन घ्रान।
द्रुपद सुता को हास सुनि, गयो नागपुर थान।।२४।।
पिता रु मातुल करन तैं, कही मरम की बात।
देखि युधिष्ठिर को विभव, अति ही चित अकुलात।।२५।।
नकुल के ये वचन सुन जिस प्रकार नकटा (कटे नाक वाला) दर्पण दिखाने पर चिड़ता है उसी प्रकार दुर्योधन अत्यधिक कुपित हुआ। इसी समय द्रौपदी हँसी, उसे सुन कर दुर्योधन तिलमिलाता हुआ हस्तिनापुर गया और वहाँ जा कर पिता, मामा और कर्ण से इन्द्रप्रस्थ के सारे समाचार कहे। साथ ही मर्म की यह बात कही कि युधिष्ठिर का वैभव देख कर मेरा चित्त अकुलाने लगा है।

वैभव कथन दुर्योधन उवाच
कवित्त
कव्यादा पारदा शिवि, काश्मीरा बाह्लिका शका,
अंबष्ठा कौंकरा पांडया, ताम्रलिप्ता अंगा जे।
सागरा द्रावडा मद्रा, केकया त्रिगर्ता मत्स्या,
मागधा मालवा क्षुद्रा, वोडकल्पा वंगा जे।
स्यंघला केरला खसा, सैसिका हंसका गोपा,
वस्त्रपा पल्हवा तार्क्ष्या, दरदा कलिंगा जे।
वसातय पौंड़्रका, सुमेरु ढिग बासी आदि,
रोकै द्वार धर्म के निहारे बलि संगा जे।।२६।।
कव्याद, पारद, शिवि, काश्मीर, बाह्लिक, शक, अवंष्ट, कीकर, पांड्य, ताम्रलिप्त अंग, सागरक, द्रविड़, मद्र, केकय, त्रिगर्त, मत्स्य, मगध, मालव, क्षुद्र, वोडकल्प, बंग, सिंहल, केरल, खस, सैसिक, हंसक, गोप, वस्त्रप, पल्हव, तार्क्ष्य, दरद, कलिंग, वसातल और पौंड्रिक तथा सुमेरु पर्वत के पास के निवासी आदि बलवान राजाओं और उनके साथ आए हुए जो-जो राजा थे, उन सभी को राजा धर्मराज के द्वार पर रुके हुए (रोके गए) मैंने देखा, ऐसा दुर्योधन ने धृतराष्ट्र से कहा।

कवित्त
सर्व अंग रोमा जे अरोमा तीन नेत्रा नर,
शृंगवान एक पाय वान केते आये ते।
भक्ष वस्त्र वाद्य अलंकार अंगराग,
यान त्रिया भोग अष्ट अंग भेद लाये ते।
मित्रता तैं यादव संबंध तैं द्रुपद राज
न्यौत द्रव्य लाये करदाता ना कहाये ते।
और सबै नाना रत्न कर के नजर करि,
अर्जुन की आज्ञा तैं प्रवेश नैंक पाये ते।।२७।।
कितने तो सर्वांग पर रोंए वाले, कितने ही बिना रोंए वाले, कितने ही तीन नेत्र वाले पुरुष, कई सींगदार और कई एक पाँव वाले भी आए थे। १. भक्ष्य (खाद्य पदार्थ) २ वस्त्र ३ शस्त्र ४. वाजिंत्र (वाद्य-यंत्र) ५ आभूषण ६ कस्तूरी आदि सुगंधित पदार्थ ७ वाहन ८. स्त्रियां, ये आठों अंग, (राज्य भोग के प्रकार) कई राजा लाये थे। यादव मित्रता वश आए थे और द्रुपदराज संबंधी होने से आए। यज्ञ में आगन्तुक राजा जो जो द्रव्य लाए थे। वे सभी दानी कहलाएं इसलिए नहीं, अपितु आमंत्रण के उपकार का कर भरने को लाए थे। इसके अतिरिक्त बाकी सारे राजा विविध प्रकार के रत्नों का युधिष्ठिर को नजराना दे रहे थे। और इन सभी राजाओं का प्रवेश थोड़ी देर के लिए और वह भी अर्जुन के आदेश से होता था।

दोहा
नर आज्ञा सब नृपन पै, मैं देखी महिपाल।
सुरभी आदर शिर जथा, पुष्प सकंटक माल।।२८।।
इसके बाद दुर्योधन कहने लगा कि महाराज! तमाम राजाओं पर मैने अर्जुन की आज्ञा को चलते इस प्रकार देखा जैसे सुगंध के लिए कांटेदार फूलों का हार गले में पहना जाता है।

मेरे व्है यह विभव सब, ऐसो करहु उपाय।
जो करिहो मति विदुर की, तौ मरिहौं बिष खाय।।२९।।
इसलिए हे पिता! यह सारा वैभव मुझे प्राप्त हो, ऐसा उपाय आप करें और यदि आप विदुर की बुद्धि के अनुसार आचरण करेंगे तो मैं जहर खा कर अपने प्राण दे दूंगा।

धृतराष्ट्र उवाच
कवित्त
लोक विषे कीर्ति परलोक विषे धर्म पूंजी,
देह विषे तेज गृह विषे सुधन छीजै ना।
चार कौं बचाय इन्द्री भोग काज भूपन के,
सोइ पांच भ्रात सजैं तातैं द्वेष कीजै ना।
तेरे ही विभौ अनंत और को धरै क्यों चिंत,
पिता कहै पूत सेती ऐसे कौं पतीजै ना।
कीजै ना कुटुंब द्रोह पीजै ना हलाहल कौं,
लीजै ना अतोल भार मोकौं दुख दीजै ना।।३०।।
धृतराष्ट्र कहने लगे है कि हे दुर्योधन! इस लोक में कीर्ति, परलोक में पुण्य रूपी पूंजी, देह में तेज और राजगृह में धन न घटे ये चार साधन राजाओं को इन्द्रियों के भोग से बचाने चाहिए। यही वे पाँचों भाई कर रहे हैं इसलिए तू उनसे द्वेष मत कर, फिर तेरे भी अनन्त वैभव है। तू दूसरे का वैभव छीनने की चिंता क्यों धारे बैठा है? हे सुत ! इन बातों पर विश्वास मत कर अथवा अनदेखा कर क्योंकि ऐसे व्यक्ति का कोई भरोसा नहीं करता। कुटुम्ब द्रोह मत कर, जहर पीने का न सोच। ईर्षा तथा अभिमान का अजाना भार मत उठा और मुझे दुःखी मत कर।

दुर्योधन उवाच
द्वार जानि करत प्रवेश मेरो फूटो सीस,
हँसे नर नारी ता समै तैं पछिताऊं मैं।
भीजी गये वस्त्र मेरे युधिष्ठिर भेजे और,
ऐसे दुख पेट बीच कब लौं पचाऊं मैं।
माद्रीपुत्र दोनों रत्न चित्र के दिखावैं द्वार,
इतै ह्वै प्रवेश करो क्यों न अकुलाऊं मैं।
कैसे धीर लाऊं कै तो पाऊं मन वांछित कौं,
नातो जरि जाऊं विष खाऊं मरि जाऊं मैं।।३१।।
दुर्योधन ने कहा हे पिता! सभा में प्रवेश करते समय द्वार जान कर मैं बढ़ा तो दीवार से मेरा सिर टकराया। इसे देख कर वहाँ उपस्थित सारे स्त्री-पुरुष हँसे उसी समय से मैं पश्चाताप कर रहा हूँ। फिर स्थल के भरोसे निश्चित हो कर जाते हुए मेरे वस्त्र भीग गए, यह देख कर युधिष्ठिर ने दूसरे वस्त्र भेजे, इस दुःख को मैं कहाँ तक पचाऊँ? यही नहीं मुझे माद्री के पुत्र, रत्नों से चित्रित द्वार दिखलाएं और यह कहें कि यहाँ से हो कर प्रवेश करो, यह सुन कर मैं क्यों नहीं अकुलाऊं? किस प्रकार धीरज धरूं? या तो मन की इच्छा पूर्ण करूं नहीं तो जल मरूं अथवा जहर खा कर अपने प्राण तज दूं।

धृतराष्ट्र उवाच
दोहा
कहि सकुनी अब का करौं, मरे जेष्ट मम पूत।
पांडव की सब राजश्री, हरि लेहू रचि द्यूत।।३२।।
यह सुन कर धृतराष्ट्र ने कहा कि हे शकुनि! अब मैं क्या उपाय करूँ? मेरा बड़ा बेटा मरने पर उतारू है, इसलिए पाण्डवों की सारी राज्य लक्ष्मी को तू द्यूतक्रीड़ा का जतन कर हर ले।

शकुनि उवाच
वचन न खंडहि आपको, धर्म पुत्र जुत भ्रात।
इत बुलाई चोपट रमहु, इहै सुनावहु बात।।३३।।
शकुनि बोला कि हे महाराज! युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित कभी भी आपका वचन नहीं लोपेगा इसलिए उन्हें यहाँ बुला कर चोपड़ खेलने को कहो।

विदुर वचन
विदुर कहै धृतराष्ट्र तैं, वंश नाश के बीज।
बोवत नृप पछिताइ है, कहत उठाये धीज।।३४।।
पाण्डवों के विरूद्ध प्रपंच की यह बात जान कर विदुर बोले कि हे धृतराष्ट्र! तुम वंश नाश के बीज बो रहे हो। मैं निश्चय कर यह बात कहता हूँ कि आप एक दिन पछताएंगे।

पांडवों का हस्तिनापुर आना
पद्धरी छंद

विदुर को वचन सुत वचन त्रास, लोप्यो भुवाल आगम विनास।
जुधिष्ठीर निमंत्रण पठय दूत, इत रच्यो द्यूत मंदिर अभूत।।३५।।
जुधिष्ठीर धर्म रक्षक अभंग, गुरुजन अदेश क्यों करे भंग।
द्रुपदा युत आये नागथान, मिल कर्यो कपट तैं इनहि मान।।३६।।
धृतराष्ट्र ने भविष्य में विनाश होने के डर से (पुत्र के वचन के आधार पर) विदुर की राय को अनसुना कर युधिष्ठिर को बुलाने दूत को भेजा। और अपने यहाँ द्यूतक्रीड़ा का स्थल बनवाया। युधिष्ठिर ठहरा धर्म का अडिग रक्षक, वह भला अग्रजों (पूर्वजों) की आज्ञा कैसे लोपे? द्रौपदी सहित पाण्डव आए, उनका दुर्योधन ने पूरे कपट के साथ बड़ा सम्मान-सत्कार किया।

कपट कृत शकुनि की द्यूतक्रीड़ा
दिन दुतिय द्यूत क्रीड़ाहि काज, धृतराष्ट्र कहो राजाधिराज। ‘
युधिष्ठिर इतै उत सुबल पुत्र, मिलि करहु हारि अरु जीति मित्र।।३७।।
माया जुत सकुनी कपटकार, सब राज अंग जीते संभार।
सहदेव नकुल नर भीम सूर, करि अनुक्रम हार्यो कर्म कूर।।३८।।
दूसरे दिन द्यूतक्रीड़ा के लिए महाराज धृतराष्ट्र ने कहा कि एक ओर युधिष्ठिर और दूसरी तरफ सुबल पुत्र (शकुनि) मिल कर हार जीत की बाजी लगाओ। धृतराष्ट्र की आज्ञानुसार सभी मिल कर द्यूत की बाजी खेलने बैठे, इनमें कपट करने वाला शकुनि, राज्य के अंगों को एक एक कर जीतता चला गया तब भी युधिष्ठिर नहीं ठहरा और राज्य हारने के बाद भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव को भी क्रमशः हार बैठा।

धर्म का सर्वस्व हार जाना
फिर रम्यो भूप आपौ लगाय, सकुनी बहुरी जीत्यो सु भाय।
कहि सकुनी यक तव रही नारि, सोऊ लगाइ नृप गयो हारि।।३९।।
ढरि अंसु विदुर गये निकरि द्वार, सब कहत युधिष्ठिर कौं धिकार।
किंकरन सुयोधन हुकम कीन, इत ल्याउ द्रुपदजा करि अधीन।।४०।।
तदुपरान्त धर्मराज ने स्वयं को दाँव पर लगा कर खेला, इस बार भी शकुनि चाल से जीत गया। इसके बाद वह कहने लगा कि हे महाराज! अभी तक तुम्हारी स्त्री एक सम्पत्ति रूप शेष है। यह सुन कर युधिष्ठिर ने द्रौपदी को भी दाँव पर लगाया और हार गया। यह देख कर विदुर की आंख में पानी छलछला आया और एक आध आंसू ढरक पड़ा। वह धर्मराज को बार बार धिक्कारने लगा। इसी समय दुयोर्धन ने अपने दासों को हुक्म दिया कि द्रौपदी को यहाँ लाओ।

प्रतिकामी का दौपदी के पास जाना
दोहा
द्रुपद सुता ढिग जाय तब, कहि प्रतीप जुत हासि।
हार्यो तुहि पति चलि सभा, होहु सुयोधन दासि।।४१।।
दुर्योधन की आज्ञा पा कर प्रतिकामी द्रौपदी के पास जा कुटिल मुस्कराहट के साथ बोला-द्रौपदी! तुम्हें तुम्हारा पति द्यूतक्रीड़ा के दाँव में हार गया है इसलिए अब सभा में चलो और दुर्योधन की दासी बन कर रहो।

द्रौपदी वचन
यह प्राकृत नर ना करै, मोहि हार्यो नृप आज।
और राज सब साज पर, परी कहा गजि गाज।।४२।।
ऐसा कर्म तो कोई अतिसाधारण पुरुष भी न करे और राजा आज मुझे हार गया तो राज्य के दूसरे सारे साज बाजों पर भी गाज गिरी है क्या?

सेवक-वचन
राज हारि चहुँ बंधु पुनि, आपो हारि भुवाल।
तुहि हार्यो बत का करत, सीघ्र सभा उठि चाल।।४३।।
द्रौपदी के प्रश्न को सुन कर राजा के सेवक ने कहा कि धर्मराज पहले राज्य, उसके बाद चारों भाइयों को, उसके बाद स्वयं को दाँव में हार गए। तत्‌पश्चात तुम्हें भी दाँव में हार बैठे। आप किसकी बात करती हैं? शीघ्र खड़ी हों और राज्य सभा में चलें।

द्रौपदी वचन
सभासदन तैं पूछि तूं, मेरो न्याय अनूप।
प्रथम मोहि हार्यो कि उन, आपो हार्यो भूप।।४४।।
यह सुन कर द्रौपदी ने कहा कि तू राज्य सभा में जा कर सभासदों से मेरा न्याय पूछ कि राजा पहले मुझे हारे थे कि स्वयं खुद को हारे?

सेवक का पीछा लौटना और दुःशासन का जाना
पद्धरी छंद
कह सब प्रतीप द्रुपदा कहाव, भयो सुनत सुयोधन कुपित भाव।
अनुज कौं दई आज्ञा अधीर, तुम ल्याहु नीच यह डरत वीर।।४५।।
दुश्यासन कहि चलि सीघ्र दासि, पूछहु संदेह निज पतिन पासि।
इक वस्त्र रजस्वल मलिन आज, मोहि सभा प्रवेशन कवन काज।।४६।।
इस पर सेवक वापस राज्य सभा में आया और द्रौपदी का कहा दुर्योधन से कह सुनाया। सुन कर दुर्योधन आगबबूला हो गया। अधीर हो कर उसने अपने भाई दुःशासन को आज्ञा दी कि हे वीर! तुम जा कर द्रौपदी को ले कर आओ, यह सेवक डरता है। बड़े भाई की आज्ञा पा कर दुःशासन द्रौपदी के पास आया और बोला कि हे दासी! चल जल्दी! और यदि कोई संशय है तो चल कर अपने पतियों से पूछ। यह सुन कर द्रौपदी ने कहा कि मैं मलिन वेश में हूं अर्थात् रजस्वला हूं, ऐसी अवस्था में मेरा सभा में क्या काम?

दुःशासन का द्रौपदी को राज्यसभा में लाना
सुनि दुष्ट केश पर हाथ डारि, गइ भाजि गँधारी शरन नारि।
लै चल्यो झँझोरत पकरि बांह, गांधारि कह्यो सो सुन्यो नांह।।४७।।
गज तें ज्यों कदली विकल अंग, उत सभा बीच ल्यायो उमंग।
द्रौपदी प्रसँग पूछ्यो सु दीन, नहिं करै उतर सब भीत लीन।।४८।।
यह सुनते ही दुष्ट दुःशासन ने द्रौपदी के सिर के केश पकड़ने को हाथ डाला। इससे घबरा कर द्रौपदी दौड़ कर गांधारी की शरण में गई। पर दुःशासन ने वहाँ जा कर जबरन द्रौपदी का हाथ पकड़ा और खींचता हुआ सभा को ले चला। उसने गांधारी की ना को भी अनसुना कर दिया। जिस प्रकार हाथी के झपाटे से केले का पेड़ कांपता है, उसी तरह कांपती और डरी हुई द्रौपदी को वह राजसभा में लाया। सभा में द्रौपदी ने बड़े दीन भाव से इस अभद्र व्यवहार का कारण पूछा परन्तु दुर्योधन के भय से सभा में किसी ने उत्तर नहीं दिया।

विकर्ण कथन
दोहा
कहि विकरन धृतराष्ट्र सुत, कोउ तो बोलहु न्याय।
नहिं बोलत तो मैं कहत, जैसी मोहि लखाय।।४९।।
यह सुन कर धृतराष्ट्र के पुत्र विकर्ण ने कहा कि अरे सभासदो! कोई तो न्याय की बात करो (बोलो)। इस पर भी कोई नहीं बोला तब उसने कहा जैसा मेरा मत है, वह कहता हूँ।

नृप के हारे अनुज सब, जाय न्याय यह रीत।
द्रुपदा हारी एक तैं, जाय सो परम अनीत।।५०।।
राजा युधिष्ठिर के हारने से उसके छोटे भाई भी सभी हारे हुए गिने जाएं यह तो न्याय की बात है पर एक धर्मराज के हारने से द्रौपदी (जो पांच पतियों की स्त्री है) भी साथ हारी हुई मान ली जाए यह अनीति की बात है।

फिर नृप हार्यो आपकौं, पीछे द्रुपद कुमारि।
कित है पति सामर्थता, देखहु नेंक विचारि।।५१।।
फिर युधिष्ठिर स्वयं को पहले हारे हैं उसके बाद द्रौपदी को हारे हैं। हे सभासदो! तनिक न्याय की बात विचार कर देखो कि एक स्वयं हारे हुए पति को यह अधिकार कैसे?

कर्ण कथन
कोप जुक्त तहां करन कहि, करत लरकयी बात।
तो बिन एते वृद्ध सब, बोलत कोउ न लखात।।५२।।
विकर्ण के न्याय की गुहार सुन कर कर्ण ने कहा हे विकर्ण! तुम एकदम बचकानी बात करते हो, सभा में इतने गुरुजन (अग्रज) उपस्थित हैं, इन्हें बोलना नहीं आता क्या?

सुधरी अग्रज की सबै, तूं अब देत बिगारि।
सर्वस हार्यो धर्मसुत, तामें द्रुपद कुमारि।।५३।।
वह आगे कहने लगा कि हे विकर्ण! तुम जो अपने बड़े भाई की सुधरी हुई बात को बिगाड़ देना चाहते हो, सुनो-युधिष्ठिर स्वयं सभी कुछ हारे हैं, उसमे द्रौपदी को भी हारे हैं।

द्रौपदी से दुर्योधन का दुर्वाद
छंद पद्धरी
बताइ सुयोधन जंघ वाम, इत बैठ द्रुपदजा सहित काम।
द्रौपदी कही इह जंघ बीच, बैठिहै भीम की गदा नीच।।५४।।
इसके बाद दुर्योधन ने अपनी बांईं जांघ दिखाते हुए कहा कि द्रौपदी! आ मेरी इस जंघा पर बैठ। यह सुन कर द्रौपदी ने कहा कि हे दुष्ट! इस जंघा पर तो भीमसेन की गदा बैठेगी।

कर्ण का दुर्वाद
अति कहत कटुक बच करन और, पति करहु न हारे तुहि बहोर।
इस पर कर्ण ने अत्यन्त कड़वा वचन कहा-कि हे द्रौपदी! तुम्हें दूसरा पति कर लेना चाहिए जो तुम्हें इस तरह हारे नहीं।

द्रौपदी वस्त्र हरन
किय सैन बसन नृप हरन काज, जब बंधु पंच तजि दिये साज।
शिर जंघा वेष्टन बिना सूर, तजि चर्म ओट ह्वै रहै दूर।।५५।।
इतने में दुर्योधन ने अपने भाई दुःशासन को द्रौपदी के वस्त्र का हरण करने का संकेत दिया और पाँचों भाई अपने शस्त्र तज कर कायरों की तरह अपने-अपने घुटनों के बीच सिर दे कर बैठ गए। यह असम्मान जनक दृश्य न देखना पड़े इसलिए नीचे देखने लगे और ढालों की ओट करली।

द्रौपदी चीर खैंच्यो सु दुष्ट, करि थक्यों दुसासन अधिक कष्ट।
लै सकै द्रुपदजा कौन लाज, बैठे हरि जहँ बनिकै बजाज।।५६।।
संकेत पा कर दुःशासन द्रौपदी का वस्त्र खींचने लगा। उसकी अत्यधिक बलशाली भुजाएं चीर खींचते-खींचते थक गईं। जिसके रक्षार्थ श्री हरि बजाज बन कर बैठे हों, ऐसे भक्त की लाज कौन ले सकता है?

श्रीहरि से कवि की विज्ञापना
कवित्त
गज हो पुरुष प्रहलाद हू पुरुष हुतो,
जहां भये आतुर सो कहानी कहात है।
याही की सुबेर दुरयोधन दुसासन के,
खंड खंड किये होते ऐसी रीसु आत है।
पांच दिगपाल जैसे भरता निबल भये,
श्रूपदास जाके हो जो बिना पक्षपात है।
द्रौपदी की आपतैं पुकार क्यों न लगी नाथ,
सुधी आये मेरो तो करेजो फट्यो जात है।।५७।।
कवि कहता है कि नाथ! ग्राह द्वारा ग्रसा हुआ हाथी नर था और भक्त प्रहलाद भी नर था। आप जिन जिनकी सहायता को आतुर हो कर धाये इसकी कथा प्रख्यात है। पर यह द्रौपदी तो मादा जाति की है-इस समय तो आपको दुर्योधन और दुःशासन जैसे दुष्टों के टुकड़े-टुकड़े कर देने चाहिए थे, मुझे ऐसा क्रोध आ रहा है। फिर दिग्पालों जैसे पाँच-पाँच पति निर्बल हो कर बैठ गए। स्वरूपदास कहता है आप जैसे पक्षपात रहित रक्षा करने वाले स्वामी के भी कान तक द्रौपदी की आर्त्त पुकार क्यों नहीं पहुँची? कर्ण की बात सुन कर तो मुझ जैसे और निर्बल व्यक्ति का कलेजा फट जाए!

अन्तर्यामी का प्रत्युत्तर
उर ही में बैठे ईश उत्तर उचार कीनो,
ऐसी ही वा समै बीच मोकों रिस आई है।
सबही रसा को भार दूर करतव्य हुतो,
ता तैं छिमा याचक की पूरी लै पचाई है।
द्रौपदी के कोप ही की दारूमय आग ताकौं,
चतुर्दश संबत की दाट दै दबाई है।
ताही छिन मारतो चंडाल चोकरी ही को तो,
वाही बीच सेती केती क्षोहिनी खपाई है।।५८।।
कल्पना में कवि अन्तर्यामी के प्रत्युतर का वर्णन करते हुए कहता है कि प्रभु बोले-हे कवि! सुन, दुष्टों के कृत्य पर जैसा क्रोध तुम्हें आया, ठीक वैसा ही क्रोध मुझे भी आया परन्तु पृथ्वी को सारे दुष्टों के भार से रहित करने के विचार से मैं एक याचक का संपूर्ण धैर्य ले कर अपने क्रोध को पचा गया। यही नहीं मैंने द्रौपदी की कोप रूपी काठ की अग्नि को चौदह वर्ष के भारी दाब से दबा दिया। इस चंडाल चौकड़ी (दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण और शकुनि) को तो मैं उसी समय मार डालता पर उनके बहाने कितनी ही अक्षौहिणी सेना का भी साथ ही नाश करना आवश्यक था, यही सोच कर नहीं मारा।

भीमसेन का कोप
खूले केश रजस्वला सभा बीच दुसासन,
लायो सो पुकार रही सारे सभाचारी कौं।
आदि मोकौं हार्यो किंधौ आदि आपो हार्यो नृप,
करन बिगारी बात विकर्म सुधारी कौं।
भीम कहै ऐंच्यो चीर तेइ भुज ऐंचे जेहैं,
दिखावे है जंघा सो दिखैहौं तोरि डारी को।
द्रुपद दुलारी खुली लटै करि दैहौं सारी,
एक नृप नारी ना अनेक नृप नारी कौं।।५९।।
जब खुले केशों में रजस्वला द्रौपदी को दुःशासन खींच कर भरी सभा में लाया तब द्रौपदी ने सभी सभासदों से पुकार की थी ”कि राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं को हारे हैं उसके बाद मुझे। एक स्वयं हारा हुआ व्यक्ति दूसरे को दाँव पर लगाने का अधिकार नहीं रखता” मेरी इस बात को विकर्ण ने रखा पर कर्ण ने बनती बात बिगाड़ दी। द्रौपदी के ऐसा कहने पर भीमसेन ने कहा कि जिन हाथों ने द्रौपदी का वस्त्र खींचा है, में उन हाथों को खींच कर उखाड़ दूंगा और जो जंघा दिखाई गई थी उसे तोड़ कर दिखाऊंगा। इन लोगों ने तो एक द्रुपद कुमारी को खुले केश किया हैं मैं एक भी अधम राजा नहीं छोडूंगा जिसकी स्त्री खुले केश न हो, अर्थात् विधवा न हो।

भीम की भयंकर प्रतिज्ञा
दोहा
गांधारी सत सुवन बिच, जो एकहु बचि जाय।
मोर गदा तैं मोहि तौ, होहि नरक गति न्याय।।६०।।
सुनी प्रतिज्ञा भीम की, कुरु कुल व्याकुल रूप।
गांधारी वह समय लखि, समझावत पति भूप।।६१।।
यह कह कर भीमसेन ने प्रतिज्ञा की, कि यदि मेरी गदा से गांधारी के सौ पुत्रों में से एक भी बच जाए तो न्याय पूर्वक मुझे नरक की गति मिले। यह प्रतिज्ञा सुन कर सारे कुरुवंशी व्याकुल हो गए और गांधारी इस विकट परिस्थिति का आकलन कर, अपने पति को समझाने लगी।

गांधारी कथन
सवैया
मात सुयोधन की भरतार कौं द्रौपदि कष्ट लख्यो समझावै।
क्यों घर जाये लराइकै छोकर या पण चौथे में पद्वित पावै।
कौतुक हार व्है तीजे तिहात ज्यों हाय क्यों जीवत लोक हंसावै।
या जग बातनि साख करी तुम गेह जरै निज मंगल गावै।।६२।।
दुर्योधन की माता गांधारी, द्रौपदी का कष्ट देखकर अपने पति धृतराष्ट्र को समझाने लगी कि आप पुत्रों को स्नेहवश लाड़ लड़ा कर (उन्हें जिद्दी बना कर) अपनी अवस्था के चौथे पड़ाव में (वृद्धावस्था) ईर्षा का ऐसा माहोल रच कर कैसे घर को चले? जैसे कोई कौतुक देखने वाला दर्शक हो, हाय-हाय! आप स्वयं के रहते क्यों जग हँसाई करवाते है? खुद का घर जले और मंगल गावे (स्वयं) वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं आप।

कवित्त
गांधारी कहत भरतार क्यों न सोचै मन,
सुयोधन करी भीमसेन स्यंघ रूप है।
मरे हू तैं सिंह को स्वभाव बैर भाव नाहिं,
जाय ये बिख्यात बात उपमा अनूप है।
मृत्यू गज मांस की बयार तैं व्है वायु वृद्धि,
मृत्यू सिंह तैल तैं ता वायु को विलूप है।
भूपन को भूप है तूं व्हैहै दीन हू तैं दीन,
पूत कौं निवारै नाहिं पर्यो मोह कूप है।।६३।।
गांधारी अपने पति से कहती है कि हे स्वामी! तुम मन में सोचते क्यों नहीं? दुर्योधन (मदोन्मत) हाथी रूप है और भीमसेन (उसे मारने वाला) सिंह रूप है। जगत में यह बात विख्यात है कि सिंह अपनी देह छोड़ देता है पर वैर भाव नहीं छोड़ता। मरे हुए हाथी के मांस से हवा में दुर्गंध की वृद्धि अवश्य होती है पर मरे हुए सिंह की वसा (चर्बी) से दीपक जलाने पर अशुद्ध वायु शुद्ध हो जाती है (गज वायु लोप जाती है)। इसी उदाहरण से आप भीम और दुर्योधन के वैर भाव को समझें। आप राजाओं के राजा हैं पर भिखारी के भिखारी जैसी गति हो जाएगी, कारण कि आप पुत्र मोह के अंधे कूएं में पड़े हैं आप अपने पुत्र को समझा कर रोकते क्यों नहीं?

धृतराष्ट्र का द्रौपदी को वरदान
दोहा
कहि धृतराष्ट्र सु द्रुपदजा, तू मम प्राण समान।
पुत्रवधुन मैं श्रेष्ठ है, लै मोपै बरदान।।६४।।
गांधारी के आकरे बोल सुन कर धृतराष्ट्र ने द्रौपदी को अपने पास बुला कर कहा कि हे द्रौपदी! तू मेरी सारी बहुओं (पुत्रों की पत्नियों) में सर्वश्रेष्ठ है और मुझे अपने प्राणों से अधिक प्रिय है। माँग, मुझसे कोई वरदान माँग।

द्रौपदी कथन
मेरो पांचौं पतिन युत, दास भाव छुटि जाइ।
मेरे पति रथ शस्त्र युत, मम गृह देहू पठाय।।६५।।
इस पर द्रौपदी ने कहा कि हे तात! मुझे और मेरे पाँचों पतियों को दासत्व से छुटकारा मिले और वे सभी अपने-अपने शस्त्रों और रथों सहित अपने घर को जा सकें। आप ऐसा वर दें।

बहुरि लेहु वर एक बर-लायक तूं न लखाइ।
कह्यो द्रुपदजा एक बर, मेरे सत बर पाइ।।६६।।
यह सुनकर धृतराष्ट्र बोले कि द्रौपदी! इसके साथ दूसरा वरदान भी मांग, कारण कि तू एक ही वरदान मांगने लायक नहीं! इस पर द्रौपदी ने कहा कि मेरा यह एक वरदान मुझे सौ वरदानों के समतुल्य है।

क्षत्रि एक द्वै वैश्य कौं, विप्रन काज अनेक।
लेने देने वर स्वसुर, तातैं लैहों एक।।६७।।
शास्त्रों में कहा है कि क्षत्रियों के लिए एक, वैश्यों के लिए दो और ब्राह्मणों को अनेक वर लेना शोभा देता है। हे ससुर जी! यही सोच कर मैं आपसे मात्र यही एक वर मांगती हूँ।

पांडवों को विदा करना
कही तथास्तु किये बिदा, भूप पांच हू भ्रात।
कही दुसासन सकुनि दोउ, सुनी सुयोधन बात।।६८।।
धृतराष्ट्र ने तथास्तु (ऐसा ही हो) कह कर पांचों भाइयों को विदा दी। पर इसी समय दुर्योधन को शकुनि और दुःशासन ने जो कहा, वह भी राजा के कानों में पड़ा।

दुर्योधन कथन
कारे अहि पितु तैं कही, पूंछ चांपि दिय छोरि।
भीमार्जुन दोउ भ्रात मम, वंश कि रखहिं बहोरि।।६९।।
इतने में दुर्योधन ने अपने पिता के पास जा कर कहा कि हे पिता! आपने यह क्या किया? काले सर्पों को पूंछ से पकड़ कर वापस छोड़ दिया। ऐसे सर्परूप भीमसेन और अर्जुन अब अपने वंश को रखेंगे क्या?

पुनः द्यूत प्रपंच
पिता कही अब का करौं, सुत कहि एक उपाय।
कौल सु द्वादश वर्ष करि, यक फिर ख्याल खिलाय।।७०।।
तब पिता ने कहा कि अब क्या हो सकता है? इस पर पुत्र ने एक उपाय बताया कि आप बारह वर्ष वनवास की शर्त पर दूसरी बार द्यूतक्रीड़ा के लिए धर्मराज को बुलायें।

जो हारे सो राज तजि, द्वादशाब्द बन जाइ।
गुप्त रहे एक वर्ष पुनि, कोउ तैं कदा लखाइ।।७१।।
पुनि भुक्ते द्वादश बरष, बनोवास दुख युक्त।
भूप बुलायो धर्मसुत, सुनी पुत्र की उक्त।।७२।।
द्यूत की बाजी जो हारे वह अपना राज्य तज कर बारह वर्षों के लिए वन में जाए फिर एक वर्ष के लिए अज्ञातवास में रहे। इस अवधि में यदि वे पहचान में आ जाएं तो उन्हें फिर से बारह वर्ष का वनवास भोगना हो। दुर्योधन की शर्तें सुन कर धृतराष्ट्र ने धर्मराज को वापस बुला भेजा।

धर्मराज फिर धर्मयुत, उत्तर दियो न जाय।
बहुरि पिता आदेश तैं, खेल्यो राज लगाय।।७३।।
जीत्यो सकुनी कपट जुत, कियो धर्म बन गौन।
पंच भ्रात युत द्रौपदी, रही मात गुरु भौन।।७४।।
धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा धर्मयुक्त होने से उत्तर नहीं दिया गया कि मै अब नहीं खेलता। वह पिताज्ञा मान कर पुनः द्यूत खेलने में संलग्न हो गया। इस बार फिर छल-कपट से शकुनि की सहायता से दुर्योधन की मन जानी हुई। धर्मराज हार कर बारह वर्षो के लिए भाइयों और द्रौपदी सहित वन को गए। उनकी माता कुंती गुरु (कृपाचार्य) के घर रही।

कुंती को विदुर का आस्वासन
पांडू पुत्रन के गये, कछु दिन बीते आय।
विदुर प्रबोधत भ्रात त्रिय, बिध बिध बिपत बटाय।।७५।।
भावी लखि सुनिये पृथा, वृथा शोक अब मात।
करहि राज सब भूमि को, तब सुत शत्रु अजात।।७६।।
पांडवों के वन-प्रस्थान के कई दिनों पश्चात्, विविध प्रकार की विपदाओं में धैर्य बंधाने की गरज से विदुर ने अपने भाई की पत्नि कुंती को संबोधित किया कि हे पृथा! सुन, भविष्य का विचार कर अब शोक करना व्यर्थ है क्योंकि जो भाग्य में बदा है वह हो कर रहेगा। ध्यानपूर्वक सुन कि तेरा पुत्र अजातशत्रु है वह (युधिष्ठिर) पूरी पृथ्वी पर राज करेगा। थोड़ा धैर्य रख।

कुंती कल्पांत कथन
कवित्त
स्तुति बंदिजन की तैं गान गायकन के तैं,
जागत जो तिन्हें शिवा जंबुक जगाइ हैं।
मिष्ठ कटू तिक्त लौन खाटे औ कषाय लाखों,
जिमते जिमाइ काचे पाके फल खाइ हैं।
पहरत जिनों के दास नाना पट अंबर जे,
खाखांबर चर्मांबर अंग लपटाइ हैं।
क्षुधावान बाल सहदेव कौं खवाइ है को,
निद्र समै सेज कौं बिछाइ को सुबाइ हैं?।।७७।।
पुत्रों के वियोग को याद कर कुंती विलाप करती कहने लगी कि जो बंदी जनों की स्तुति और गायकों के गायन से जागते थे (मेरे पुत्र) उन्हें अब सियारों का रोना जगाएगा। जो १ मीठा २ कटु ३. तीखा ४. खारा ५ खट्टा और ६ तुर्श इन छः रसों वाला भोजन दूसरे असंख्य लोगों को खिला कर खाते थे, वे अब कच्चे पके फल खाएंगे। जिनके दास भी विविध रेशमी वस्त्र पहनते थे, वे स्वयं विभूति और चर्म के वस्त्रों से अपनी लज्जा ढकेंगे। अरे, भूखे सहदेव को समय पर कौन भोजन देता होगा, वहाँ वन में? मेरी सबसे बड़ी चिंता तो यह है कि उस छोटे से सहदेव को नींद के समय बिस्तर कौन बिछा कर देता होगा?

पुनर्यथा
जिनके मुखारविंद छत्र-छांह रहते सो,
आतप अपार ही तैं कुम्हलाने होइ हैं।
पांच पांच खंड के अवास ही गलादूं बीच,
सोवत ते कंकरन बीच कैसे सोइ हैं।
कुंती कहै धन्य पांडु माद्री परलोकबासी,
मोहि दुख भोगनी कौं बिपदा बिगोइ है।
ताही में बड़ी है शोच मेरो जे लड़ैतो बाल,
सहदेव क्षुधा समै काको मुख जोइ हैं।।७८।।
जिन के चेहरे प्रतिदिन छत्र की छाया में रहने के आदि थे, वे सूर्य के तेज आतप से कुम्हला गए होंगे। जो अपने पाँच-पाँच खंडों वाले महलों के गलीचे युक्त शयनागार में सोने के आदी थे, वे अब वहाँ वन में कंकरों के बीच कैसे सोते होंगे? कुंती कहती है कि पाण्डु राजा और रानी माद्री कितने भाग्यशाली हैं कि वे परलोकवासी हो गए और मुझ अभागिन को यह सब देखने के लिए विपदा में छोड़ गए। इस पर भी मुझे बड़ी चिंता इस बात की है कि वह सुकुमार सहदेव भूख लगने पर किसका मुँह जोहता होगा?

दोहा
कैसे सहिहै बन विपत, द्रुपदसुता सुकुमार।
मम दुख जानत मोर मन, किन ढिग करौं पुकार।।७९।।
इसके अतिरिक्त वह कोमल बदना द्रौपदी वन की विपत्ति को भला कैसे सहती होगी? मेरा दुःख मेरा मन ही जानता है, किसके आगे जा कर पुकार करूं?

।।इति पंचम मयूख।।

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