पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – अष्टम मयूख

अष्टम मयूख

उद्योगपर्व (पूर्वार्द्ध)

छंद पद्धरी
बैराटसुता उतरा बिबाह, अभिमन किय करग्रह जुत उछाह।
बिच सभा प्रात सब नृप पधारि, वसुदेव तनय को सुनि विचारि।।१।।
शिष्टासन बैठे नृप सधीर, वैराट द्रुपद वपुवृद्ध बीर।
तिनह अग्र युधिष्ठिर बासुदेव, भीमादिक तिन्हके अग्र भेव।।२।।
वैशंपायन मुनि कहने लगे कि हे राजा जन्मेजय! विराटराज की पुत्री उत्तरा के विवाह में अभिमन्यू ने उत्साह पूर्वक पाणिग्रहण किया। श्री कृष्ण के विचार सुनकर सवेरे सभी राजा राजसभा में आए। इनमें वयोवृद्ध वीर विराटराज और द्रुपदराज धैर्यपूर्वक श्रेष्ठ आसन पर बैठे और उनके पास ही श्री कृष्ण एवं युधिष्ठिर ने आसन ग्रहण किया। उनके पास ही अग्रिम पंक्ति में भीमसेन (अर्जुन, नकुल, सहदेव) आदि बैठे।

श्रीकृष्ण कथन
श्रीकृष्ण कहत भूपन सुनाय, लघु वृद्ध सुनहु सब चित लगाय।
संपूर्ण नीति विद्या सुजान, सब कहहु मंत्र बुद्धि बल समान।।३।।
कीन्हो दुर्योधन नृप अकाज, रचि कपट द्यूत हरि लियो राज।
नृप धर्म धर्मपथ सावधान, पन कियो था कीन्हों प्रमान।।४।।
बन बीच त्रयोदश वर्ष वास, तिहिमें सहि लीनी विविध त्रास।
अब चहत नृपति अपनो विभाग, पथ धर्म तथा बिन भये त्याग।।५।।
सगपन अपने इत उत समान, दोउ और कुशल चाहत निदान।
फिर श्री कृष्ण ने सभी राजाओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि यहाँ उपस्थित छोटे बड़े सभी नरेश ध्यान पूर्वक सुनें! आप सभी नीति, रीति और विद्या में सुजान हैं इसलिए स्व-विवेक से पूर्ण हैं। देखो, राजा दुर्योधन ने छल से जुआ खिला कर पाण्डवों का राजपाट छीन कर नहीं करने योग्य कार्य किया है। उधर धर्मराज ने अपने धर्म मार्ग पर अडिग रह कर सारी शर्तो का यथार्थ रीति से पालन किया है और तेरह वर्ष के वनवास को कई कष्ट तथा पीड़ा सहन कर पूरा किया है कहीं पर धर्म की राह को नहीं छोड़ते हुए। अब धर्मराज अपने आधे राज्य का अधिकार लेने को उत्सुक हैं। हम दोनों ओर के सगे हैं, हम सभी का कुशल चाहते हैं।

बलभद्र कथन
यह सुनि बोले शेषावतार, सतकारि अनुज वच बहु प्रकार।।६।।
पठवहू दूत कुल बुधि पुनीत, राजा अचक्षु प्रति विनय रीत।
सब कहे बात बिनती सुनाय, सुयोधन आदि सबकौं सुहाय।।७।।
यधिष्ठिर द्यूत बिच प्रमत होय, सहि लियो आज लौं कष्ट सोय।
अब पिता आप वह पुत्र आहि, ताको विभाग दीजैं सु ताहि।।८।।
नहिं दोष आपको है नृपाल, चल भयो युधिष्ठिर द्यूत चाल।
यों जोर बताये बिन अराध, अन्यथा सुयोधन है असाध।।९।।
कृष्ण की पूरी बात अच्छी तरह सुन कर, पूरा मान देते हुए बलभद्र बोले कि राजा धृतराष्ट्र के प्रति पूरी विनम्रता दिखाते हुए, पवित्र बुद्धिवाले दूत उनके पास भेजने चाहिए कि जो वहाँ जा कर दुर्योधन आदि सभी को रुचे वैसी बात कहे। साथ ही यह भी कहे कि धर्मराज ने उन्मत्त हो कर जुए में सभी कुछ हार कर आज तक सभी कष्ट सहे हैं। फिर यह भी कहे कि हे राजा धृतराष्ट्र! आप पिता हैं और युधिष्ठिर आपका पुत्र, इसलिए उसे उसका हिस्सा दें। जुए में युधिष्ठिर तो स्वयं को भी हार गए थे इसलिए इसमें आपका कोई दोष नहीं। इस प्रकार दबाव देने की बजाय विनम्र प्रार्थना की जानी चाहिए अन्यथा कोई अन्य उपाय निकाल कर दुर्योधन बात को बिगाड़ देगा।

युयुधान कथन
यह सुनत बचन युयुधान आप, परजर्यो हुतासन घ्रत प्रताप।
बलिभद्र सुनहु मम सत्य बात, तुम कहे बचन निंदत न तात।।१०।।
बचन ये क्लिव जे सुनैं बीर .उनकौ में निंदत हौं अधीर।
इक बृच्छ शाख ताकी अनेक, इक बांझ सुमन फल जुक्त एक।।११।।
बसि एक उदर इक सूरवीर, इक महा कुमति कातर अधीर।
ऐसो न युधिष्ठिर बीच आहि, तन-मन अपलच्छन कहै ताहि।।१२।।
अपलच्छ सुयोधन के अपार, बैठे सु आप तिनकौ बिसार।
इनको जो दूषन कहत आप, पापिष्ठ सखा ताको प्रताप।।१३।।
धर्म कौं नमावत कौन नीति, पग परहि सुयोधन सहित प्रीति।
नहिं नमै दुष्ट मद अंध नीच, (तो) बसवाहु सीघ्र जमलोक बीच।।१४।।
सात्यकि धनंजय धनुषधारि, महि करैं निकंटक दुष्ट मारि।
तिहुँलोक जीतबो सुलभ तात, बपुरो दुर्योधन कितिक बात।।१५।।
परिहै कि युधिष्ठिर नृपति पाय, कै भक्षहिं गृध श्रंगाल काय।
बलभद्र की बात सुन कर युयुधान (सात्यकि) स्वयं? जैसे आग में घी पड़ने पर भभक उठती है उसी प्रकार भभकते सुरों में कहने लगा कि हे बलभद्र! मेरी सत्य राय को सुनो। हे तात! आप के कहे वचनों की मैं निंदा नहीं करता हूं। जैसे एक पेड़ की अनेक शाखाएं होती हैं उनमें से एक फल-फूल रहित होती है और दूसरी फूल वाली। और एक ही कूख में पल कर जन्मने वाला एक शूरवीर होता है और एक अधीर? कायर और महाकुबुद्धिवान होता है। युधिष्ठिर में ऐसा कुछ नहीं कि कोई उसे अवगुणों वाला कह सके, परन्तु दुर्योधन में अपार अवगुण हैं। इसे आप भूल बैठे हैं। फिर आप जो यह युधिष्ठिर का दोष कह रहे हैं वह इसलिए कि आप दुर्योधन के मित्र हैं। आप धर्मराज को किस रीति के आधार पर झुकने का कहते हैं। उल्टा होना तो यह चाहिए कि दुर्योधन आ कर युधिष्ठिर के पाँव पड़े। यदि वह नीच मति का दुष्ट, अभिमान में अंधा हो कर न झुके तो उसे शीघ्र ही यमलोक भेज देना चाहिए। नहीं तो, अर्जुन और मेरे (सात्यकि) जैसे धनुषधारी, दुष्टों को मार कर पृथ्वी को शत्रु-रहित कर देंगे। हे तात! यदि तीनों लोकों को जीतना आसान है अर्जुन के लिए तो फिर उस बेचारे दुर्योधन की क्या बिसात है? अब या तो वह दुष्ट दुर्योधन धर्मराज के पाँव पड़ेगा या उसकी मृत देह भक्षण के लिए गिद्ध-सियारों के पाँवों में पड़ेगी।

दुपद कथन
यह सुनत बोलि नृप द्रुपद येह, सात्यकि कहत तुम निःसंदेह।।१६।।
नमनता किये मदअंध नीच, बल गिनहि अधिक निज सैन्य बीच।
जड़ काष्ट तपै बिन नमत नाहिं, महासार दंड पशबृंद माहिं।।१७।।
करिबो तथापि सामादि काज, रहै प्रसन जथा बिध धर्मराज।
सात्यकि की बातें सुन कर द्रुपदराज बोले कि हे सात्यकि! तुम जो यह कह रहे हो, तुम्हारी बात निसंदेह सत्य है। कैसे कि विनम्रता दिखाने से अभिमान में अंधा हुआ नीच दुर्योधन अपने सैन्य दल को अधिक शक्तिशाली गिनेगा अर्थात् अपने पक्ष को बलवान मानेगा। फिर देखो, जैसे ठोस पदार्थ (लोहा) बिना लकड़ी जला कर तपाने के नहीं झुकते और पशुओं के टोले को डंडा ही ठीक कर सकता है (उन्हें ठीक दिशा में हांक सकता है, काबू कर सकता है) इसलिए शत्रु को झुकाना और दण्ड देना ही श्रेयष्कर है। फिर भी जिस रीति से धर्मराज प्रसन्न रहें, उसके अनुरूप कार्य हो तो उत्तम है।

राजपुरोहित का दुतत्व निर्णय
निज राजपुरोहित कौं बुलाय, सब कही रीत ताकौं सुनाय।।१८।।
जग चतुर खानि चतुरासि लक्ष, तिनमें बर जंगम है प्रतक्ष।
बुधिजीव तिनहि में अति विशेष, नरदेह तिनहि में अधिक देख।।१९।।
तिहिमें द्विज जन्म है श्रेष्ठ तात, वेदाध्यन नीतिन सो विख्यात।
तिनमें बर कहियत कर्मकार, तिनमें अद्वैतवादी विचार।।२०।।
तिनमें अध्ययनी आप तात, बेत्ता कुरु पांडव केरि बात।
विद्या तप कुल वय चतुर वृद्ध, सब नीति निपुण अरु मंत्र सिद्ध।।२१।।
पधारहु सीघ्र कुरु वृद्ध पास, सुनावहु मिष्ट अरु कटुक भास।
इसके बाद स्वयं के राजपुरोहित को बुलवा कर उसे अच्छी तरह सुना कर कहा गया कि हे तात! जगत में चार प्रकार की खांणी के चोरासी लाख जीवों में प्रत्यक्ष रूप से जंगम श्रेष्ठ हैं। इसमें भी बुद्धि बल से आजीविका कमाने वाले श्रेष्ठ हैं। उनमें भी मनुष्य देह अधिक उत्तम है। मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ, उनमें भी वेदों का अध्ययन करने वाले और नीति सिद्ध हों, वे श्रेष्ठ गिने जाते हैं। उनसे भी कर्मकांडी श्रेष्ठ हैं। कर्मकांडियों में भी अद्वैतवादी श्रेष्ठ हैं, और उनमें भी हे तात! आप विशिष्ट अध्ययन वाले होने से श्रेष्ठ हैं, और कौरवों-पाण्डवों की, सारी बात को जानने वाले हैं। आप विद्या में, तप में, कुल में, उम्र में इन चारों प्रकार से वृद्ध हैं। आप विचारसिद्ध तथा सर्वनीति में सुजान हैं। इसलिए आप शीघ्र ही धृतराष्ट्र और भीष्म के पास जा कर उन्हें मीठी और कड़वी, सत्य-असत्य दोनों प्रकार की बातें बताओ!

द्विज वंश वृद्ध तुमकौं न दोष, फिर दूत जानि करिहै न रोष।।२२।।
पुनि भीष्म द्रौण विदुर हि प्रधान, मिलि करहिं आपके बचन मान।
दुस्यासन सकुनी करण दुष्ट, सुनि बचन अनादर करहिं सुष्ट।।२३।।
इतने हम पठवहिं दूत और, निमंत्रण काज नृप ठौर ठौर।
सुयोधन करहि फूटे सँधान, जुध साज करहिं हम समय जान।।२४।।
करता जुध सैन्या सानुकूल, महा कोश शस्त्र साहित्य मूल।
तीन हू बात जाके तयार, महि राज करहि सोइ शत्रु मार।।२५।।
तुम ब्रह्मवंशी हो, वृद्ध हो, इसलिए तुम्हें किसी प्रकार दोष नहीं लगेगा। फिर तुम्हें दूत जान कर कोई तुम पर कुपित नहीं होगा। वहाँ भीष्म, द्रोण तथा विदुर प्रधान हैं। वे सभी मिल कर तुम्हारे वचन को मान्य करेंगे और दुष्ट दुःशासन, शकुनि और कर्ण तुम्हारे श्रेष्ठ वचन सुन अवश्य लेंगे पर मानेंगे नहीं। फिर हम और दूत भेज कर अन्य राजाओं को भी यहाँ निमंत्रित कर रहे हैं। यदि तुम्हारे वचनों से कदाचित्त वहाँ के प्रधानों (भीष्मादि) में फिरका पड़ जाए तो दुर्योधन उन्हें मनाने का प्रयत्न करेगा। इस समयावधि में हम युद्ध की तैयारियां कर लेंगे। क्योंकि अनुकूल युद्ध करने वाली सेना, समृद्ध खजाना और समृद्ध शस्त्रागार, ये तीन बातें जिसके पास होती है। वही शत्रु को मार कर पृथ्वी पर राज्य करने का अधिकारी हो सकता है।

श्रीकृष्ण कथन
श्रीकृष्ण कहै तुम गुरु समान, आज्ञावश हम सब शिष्य मान।
करिहो विचार जोइ आप काज, सब करहिं मान हम जुत समाज।।२६।।
हम हू अब द्वारापुरी जात, पुरोहित नागपुर कौं प्रभात।
माने न सुयोधन संधि मूढ़, हमकौं बुलाइ पठवहु अगूढ़।।२७।।
कहि कृष्ण द्वारिका गमन कीन, द्रुपद कौं निमंत्रण भार दीन।
फिर श्री कृष्ण बोले कि हे महाराज! आप गुरु समान हैं, और हम सभी आपकी आज्ञा मानने वाले शिष्य हैं आप ऐसा मानें। आप जिस कार्य का विचार करेंगे वह हम सभी को मान्य होगा। मैं अब द्वारकापुरी जाता हूं और कल राजपुरोहित हस्तिनापुर जाएंगे। यदि मूर्ख दुर्योधन संधि करना नहीं मानें तो किसी को मुझे बुलाने को भेज देना। ऐसा कह कर द्रुपदराज को अन्य राजाओं के बुलाने का कार्यभार सोंप कर श्री कृष्ण द्वारिकापुरी को सिधाए।

दूत रूप पुरोहित का हस्तिनापुर जाना
पुरोहित कियो गजपुर प्रवेश, सतकार कियो बुधिचख बिशेष।।२८।।
बैचित्रबीर्य परिषद बनाय, बिप्र कौं लियो सादर बुलाय।
इत कुशल पूछि उत की सुनाय, पूरन कुल बय सनमान पाय।।२९।।
पुनि बचन कहन प्रारंभ कीन, द्रुपदादि नृपन संदेश दीन।
भीम की दियो तुम विष अभीत, लाखगृह रचि अतिशय अनीत।।३०।।
रचि कपटद्यूत तुम हर्यो राज, लीनी त्रिय की बिच सभा लाज।
अपराध सबन को ढकन येहु, दुहुँ लोक सधे अध राज देहु।।३१।।
इते पर लोभवश नटहु आप, पुनि लखिहौं गांजिव को प्रताप।
ऐसो न देव नर है अनेक, अर्जुन तैं जीतै समर एक।।३२।।
अर्जुन रु भीम तैं जुर्यो आन, कोउ बच्यो सुन्यो अब लौं न कान।
दूत रूप पुरोहित ने हस्तिनापुर में प्रवेश किया तो प्रज्ञाचक्षु (धृतराष्ट्र) ने उसको उचित सम्मान दिया और दूत को आया समझ राजसभा का आयोजन कर पुरोहित को आदरपूर्वक वहाँ बुलवाया। पुरोहित ने सभा में आ कर राजा की कुशलक्षेम पूछी और पाण्डवों की कुशलता के समाचार दिये। पुरोहित ने अपने कुल एवं वय के अनुरूप सम्मान पाया। इसके बाद दूत ने संवाद की शुरूआत करते हुए द्रुपद आदि राजाओं के सन्देश कह सुनाये। वह इस प्रकार कि तुमने अभय हो कर भीमसेन को जहर दिया, इसके बाद लाक्षागृह में पाण्डवों को जला कर भस्म करने की अनीति की। यही नहीं, जुए के खेल में कपट से राज्य छीन लिया और भरी सभा में द्रौपदी की लाज ली। इन सारे अपराधों का अब यही प्रायश्चित है (ढंकाण) कि उन्हें उनका आधा राज्य सोंप दिया जाए। इससे लोक और परलोक में आप लोगों का यश होगा। इस पर भी लोभवश हो कर यदि तुम ना कहते हो तो फिर गांडीव धनुष का प्रताप देखोगे। देखो, यों तो देव तथा मनुष्य अनेक हैं पर युद्ध में अर्जुन को जीत ले ऐसा कोई नहीं। अर्जुन के साथ यदि भीमसेन मिल कर लड़ा तो मैंने अब तक उन दोनों से भिड़ कर किसी को बचा हुआ नहीं देखा।

कर्ण कथन
जिन सुनत करन कहि बचन जोर, बन द्वादशाब्द बसिहैं बहोर।।३३।।
पारिहैं दुयोधन के जु पाय, लैहैं सु तिन्है छतियहि लगाय।
किय प्रगट त्रयोदश वर्ष माहिं, बिन न्याय ग्राम एक मिलै नाहिं।।३४।।
बोलत भीमार्जुन भय बताहि, ऐसे न फूंक तैं गिरि उड़ाहि।
यह सुन कर कर्ण जोर से बोला कि पाण्डव अभी चार वर्ष और वन में रहने के बाद, यदि दुर्योधन के पाँव पड़े तो कदाचित वह उन्हें छाती से लगा लेगा। पाण्डवों को हम ने तेरहवे वर्ष में ही खोज निकाला है, इसलिए न्याय की बात तो यह कि एक गाँव भी नहीं दिया जा सकता। अब रही बात यह कि आप भीम और अर्जुन का भय दिखा कर डराना चाहते हो, तो सुनो फूंक से कोई पहाड़ उड़ने वाला नहीं है।

भीष्म कथन
गांगेय कहत प्रज्ञा गँभीर, बिसरे बहु दिन की बात वीर।।३५।।
द्रौपदी स्वयंवर घोष जात, तुम करो याद मति करो तात।
माजनो खोय बांधव मराय, जुत सैन्य विजय तें अजय पाय।।३६।।
बैराट अबहि बीती बिसारि, महिपन बिच बोलत गाल मारि।
ऐसे कि शिखावनि सुनि असाध, बिहुँ लोक करत तव पुत्र बाध।।३७।।
करै जोइ पुत्र तूं गिनत काज, रहिहै धृतराष्ट्र न वंश राज।
पितामह वचन कौं करि-प्रमान, नृप हटकि करन निज मुख निदान।।३८।।
कर्ण की बात सुन कर गंभीर बुद्धिवाले भीष्म पितामह बोले कि हे वीर! तू पुरानी बातें भूल गया लगता है। द्रौपदी स्वयंवर और घोष यात्रा की बात को तुम याद करो या कि न करो, परन्तु इज्जत गंवा कर, दुर्योधन को मार खिलवा कर, सेना सहित अर्जुन से पराजित हुए हो। फिर विराटनगर वाली ताजा विपत्ति को भी भूल गए और यहाँ सभा में बड़े-बड़े बोल, बोल रहे हो। हे धृतराष्ट्र! तुम्हारा हठीला पुत्र इस (कर्ण) की गलत सिखावन सुन कर इस लोक और परलोक में स्वयं के लिए दुःख उत्पन्न कर रहा है। तुम्हारा पुत्र जो करे (अकाज करे) उसे तुम कार्य गिनते हो, इस प्रकार तो तेरा वंश और राज्य दोनों रहने के नहीं। पितामह के वचनों को महत्वपूर्ण गिन कर धृतराष्ट्र स्वयं कर्ण को चुप कराते हुए कहने लगे।

दुर्योधन उवाच
दोहा
तुम बहुर्यो जीहौ बहुत, द्रौणादिक गांगेय।
भूमि न देहूँ पैंड भर, ठाढो करन अजेय।।३९।।
बीच में दुर्योधन बोल पड़ा कि हे पितामह! आप और द्रोणाचार्य आदि अधिक जीने की इच्छा करते हैं तो करें, पर जब तक अजीत कर्ण मेरे पक्ष में खड़ा है, तब तक एक कदम (डग) भर पृथ्वी भी पाण्डवों को नहीं दूंगा।

भीष्म उवाच
कवित्त
मेरो तो है वांच्छित सो चोथेपन कुरुक्षेत्र,
शस्त्रतीर्थ मृत्यु गुनी कीरत कौं गुनि हैं।
तेरे लोभ-मोह-मान-मत्सर-कपटताई,
ताके बीज बहे फल नीकी विधि लुनि हैं।
याद करि मेरे द्रौन विदुरादि हू के बोल,
गांजिव को तेज देखि पीछे शीष धुनि हैं।
मेंरें बैन नीति के निवास नाहिं सुनिहै तो,
करनादि बीर को विनास बेगि सुनिहैं।।४०।।
भीष्म ने उत्तर दिया कि हे दुर्योधन! मेरी इच्छा तो यह है कि इस उत्तरावस्था (वृद्धपन में) में शस्त्र रूपी तीर्थ में मृत्यु हो कि जिससे गुणीजन कीर्ति करें पर तेरे तो लोभ मोह, मान, मत्सरता और कपट है इसलिए जैसे बीज बोएगा वैसे ही फल तुझे मिलेंगे। मेरी, द्रोणाचार्य और विदुर आदि की कही बातों का स्मरण कर, नहीं तो फिर गांडीव धनुष का पराक्रम देखकर सिर धुनेगा। मेरे ये नीति भरे वचन यदि नहीं सुनेगा तो कर्ण जैसे वीरों का नाश भी तू शीघ्र ही सुन लेगा।

कर्ण उवाच
दोहा
जौ लौं सेनापति रहै, यहै भीष्म दुर्वाद।
तौ लौं शस्त्र न कर ग्रहौं, कर्न जुक्त आल्हाद।।४१।।
इस पर तुनक कर कर्ण ने कहा कि हे दुर्योधन! ये दुर्वाक्य बोलने वाले भीष्म पितामह जब तक सेनापति रहेंगे, तब तक मैं शस्त्र नही उठाऊंगा।

जा दिन गंगासुत मरहिं, टरहि परस्पर वाद।
ता दिन पांडुन मारि नृप, हरिहौं तोर विषाद।।४२।।
जिस दिन गंगासुत भीष्म पितामह मरेंगे उसी दिन तुम्हारा और पाण्डवों का परस्पर विवाद मिटेगा क्योंकि मैं उसी दिन पाण्डवों को मार कर हे दुर्योधन! तुम्हारा सारा विषाद मिटा दूंगा।

पुरोहित का विदा होना
पद्धरी छंद
पुरोहित बिदा कीनो सप्रीत, राजन तैं जा बिध बनत रीत।
तुम पीछे पठवहु सीघ्र तात, विधि सुनिहै संजय कहहि बात।।४३।।
उपलव्य जाय नृप के अगार, सब कहे पुरोहित समाचार।
इसके बाद राजा धृतराष्ट्र ने पूरे सम्मान का प्रदर्शन करते हुए पुरोहित दूत को अपने यहाँ से विदा किया और कहा कि हे तात! आपके जाने के बाद मैं अपने सभी साथियों से मंत्रणा कर अपने निर्णय से अवगत कराने हेतु शीघ्र ही संजय को भेजूंगा। वह वहाँ आ कर सारी बात बता देगा। हस्तिनापुर से रवाना होकर पुरोहित विराटनगर के पास अवस्थित ‘उपलव्य’ नामक गाँव में आया और वहाँ रह रहे पाण्डवों को हस्तिनापुर के समाचार कहे।

अर्जुन का द्वारिका गमन
गयो अर्जुन न्योंतन बासुदेव, उत दुर्योधन आयो अजेव।।४४।।
पुरि बीच कियो दोउ सँग प्रवेश, कुरुराज उतै इत गुड़ाकेश।
पीढे तहां रुकमणिकांत पाय, वह समय बीर दोउ निकट आय।।४५।।
इक उर्ध्व बैठ इक अधोभाग, अभिमानी इक इक सहित राग।
बंदीजन बोलत बिमल बानि, गायक मिलि भैरव किया गानि।।४६।।
वह समय जागि श्रीकृष्ण आप, मिष भये प्रथम पारथ मिलाप।
फिर अर्जुन श्री कृष्ण को आमंत्रित करने द्वारिका गया पर वहाँ उसी समय हस्तिनापुर से अजीत दुर्योधन भी आया। इधर से अर्जुन ने और उधर से दुर्योधन ने एक साथ नगर में प्रवेश किया और श्रीकृष्ण को अपने महलों के शयन भवन में पोढ़े हुए पाया। जिस समय वे दोनों कृष्ण के पास गये तब स्वभाव से अभिमानी दुर्योधन तकिये की ओर तथा अर्जुन पायताने की और बैठा। बंदी जनों ने निर्मल वाणी से दोनों का स्तुति पाठ किया और गायकों ने भैरवी राग सुनाया। श्री कृष्ण स्वयं जागे तो सर्व प्रथम उनकी अर्जुन पर नजर पड़ी।

दुर्योधन कथन
सुयोधन कहत हम प्रथम आय, निमंत्रण काज ह्वैजै सहाय।।४७।।
संबंध सखापन है समान, दोउ तरफ आप जानत निदान।
पहले दुर्योधन बोला कि आपको आमंत्रित करने के लिए मैं सबसे पहले आया हूं इसलिए मेरे सहायक बनें। फिर दोनों ओर से बराबर सम्बन्ध और मित्रता है आपकी। यह आप भली-भांति जानते हैं।

श्रीकृष्णोवाच
इक लेहु मोहि बिन सस्त्र एक, इक लेहु शस्त्रजुत बल अनेक। ४८।।
लिय सैन सुयोधन प्रीति लाय, बिन सस्त्र कृष्ण अर्जुन सहाय।
मिलि सप्त अक्षोहिनि इत सुभाय, एकादश गजपुर मिली आय।।४९।।
श्री कृष्ण बोले कि एक ओर मैं निःशस्त्र अकेला और दूसरी ओर मेरी सारी सशस्त्र सेना इन दोनों में से आप एक-एक चुन लें। यह सुन कर दुर्योधन ने सहर्ष सेना ली और अर्जुन ने अपनी रक्षा हेतु निशस्त्र अकेले कृष्ण को चुना। इस से पाण्डवों की सेना की संख्या सात अक्षौहिणी रह गई और हस्तिनापुर की ग्यारह अक्षौहिणी सेना हो गई।

संजय का दूत होकर पांडवों के पास जाना
संजय नृप प्रेर्यो सावधान, हित कियो युधिष्ठिर पुज्य जान।
करि कुशल प्रश्न नृप की सुनाई, पुनि कहन लगो सतकार पाई।।५०।।
आपकौं युद्ध करिबो न आज, भिक्षान्न श्रेष्ठ नहिं श्रेष्ठ राज।
गुरुजन को कुल को करि सँहार, तुम से नहि बांच्छत राजभार।।५१।।
सब गुरुजन करिबो चहत संध, मानत न सुयोधन नृप मदंध।
इधर धृतराष्ट्र ने सारी बातें सावधानी पूर्वक समझाकर संजय को पाण्डवों के यहाँ दूत बना कर भेजा। संजय जब वहाँ पहुँचा तो युधिष्ठिर ने पूज्य जान कर स्नेह पूर्वक आवभगत की। फिर संजय ने धृतराष्ट्र की कुशलता के समाचार दिये और सत्कार पाकर कहने लगा कि हे धर्मराज! आपको अब युद्ध करने का विचार छोड़ देना चाहिए, इससे उत्तम तो भिक्षा का अन्न है। आपको कुलघातक राज्य की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। मैं जानता हूं आप जैसा राजा, अपने गुरुजनों, कुल और शुभचिंतकों का संहार कर राजपाट लेना नहीं चाहेगा। सभी वरिष्ठ अग्रज तो सुलह करने के पक्ष में हैं पर क्या करें गर्वोन्मत और मदांध दुर्योधन मानता नहीं है।

श्रीकृष्ण कथन
यह सुनत कृष्ण करि कोप आप, पुनि कहत दूत सों जुत प्रताप।।५२।।
नहि देत ग्राम इक सहित नीत, फिर भीख मँगावत कौन रीत।
केहि नीति मँगावत इनहिं भीख, क्यों दुष्ट सुयोधन कौं न सीख।।५३।।
देत हो भये असमर्थ दीन, नहिं कारागृह बिच करत लीन।
दिन पांच सात तित रह्यो दूत, सब कहि सँदेश किय बिदा सूत।।५४।।
संजय की बात सुन कर श्री कृष्ण को क्रोध आ गया, वे कुपित हो कर दूत से कहने लगे कि तुम नीति और न्याय संगत तरीके से तो एक गाँव भी देने को तैयार नहीं, फिर किस प्रकार भीख मांगने की बात कहते हो? आप किस नीति के तहत इनसे (पाण्डवों से) भीख मंगवाना चाहते हैं? आप उस दुष्ट दुर्योधन को राय क्यों नहीं देते? और आप शक्तिहीन हो गए हैं, आप क्यों नहीं दुर्योधन को कैद में डाल देते। कृष्ण के सारे वचन दूत संजय ने सुने। इसके बाद वह पाँच-सात दिन वहाँ रहा और अन्त में अच्छी तरह प्रत्युत्तर और सन्देश दे कर सूत (संजय) को पाण्डवों ने विदा किया।

संजय का हस्तिनापुर में आना
दोहा
उत विराट सों आयके, संजय परम सयान।
मतिचकक्षू नृप तें मिल्यो, लिय आयस प्रति थान।।५५।।
वहाँ विराटनगर से आ कर अत्यन्त सुजान संजय प्रज्ञाचक्षु (धृतराष्ट्र) राजा से मिला और अपने घर जाने की आज्ञा मांगी।

संजय उवाच
श्रमजुत पथ रथ खेद तैं, अब मैं निज गृह जात।
पांडुन के संदेश सब, कहो सभा बिच प्रात।।५६।।
धिक नृप तेरी बुद्धि कौं, त्यागे बिन अपराध।
पांडुपुत्र निज पुत्र कौं, गिनत असाधहि साध।।५७।।
संजय ने कहा कि हे धृतराष्ट्र! रास्ते में रथ की यात्रा से अत्यन्त थका होने से मैं घर जाने की आज्ञा चाहता हूं। पाण्डवों का पूरा सन्देश मैं कल प्रातः राजसभा में आ कर कहूंगा, परन्तु हे राजा! पाण्डवों ने आपको बेकसूर मान कर तजा है, और आपका पुत्र (दुर्योधन) जो असाधु (दुर्जन) है जिसे आप साधु (सज्जन) गिनते हैं, इसके लिए आपकी हेतबुद्धि को धिक्कारा है।

विदुरागमन
गो संजय स्वस्थान निशि, नृप बुलाय लघु भ्रात।
कह्यो सुनावहु नीति कौं, निद्रा लगत न तात।।५८।।
इतना कह कर संजय रात्रि-विश्राम के लिए अपने घर गया। उधर राजा (धृतराष्ट्र) ने अपने छोटे भाई (विदुर) को बुलवाया। विदुर के आने पर राजा ने कहा कि हे भाई! मुझे नींद नहीं आती इसलिए मुझे कुछ उपाय (नीतिगत) बताओ।

धृतराष्ट्र उवाच
दै अवलंबन मोहिकौं, गो संजय निज गेह।
कहिहै संदेशो कहा, उपजत भय संदेह।।५९।।
इसके अतिरिक्त धृतराष्ट्र ने कहा कि पाण्डवों का सन्देश कल प्रातः सुनाने का कह कर मुझे दिलाशा दे कर संजय अपने घर गया है। अब वह सवेरे आ कर क्या सन्देश सुनाएगा? मुझे इस बात का भय और संशय सता रहा है।

विदुर उवाच (नीति वाक्य)
परत्रिय रत परद्रव्य हर, तिनहि प्रजागर होय।
आप अबल रिपु प्रबल तैं, करै बैर पुनि सोय।।६०।।
महात्मा विदुर कहने लगे कि हे राजा! सुनो, जो पराई स्त्री से प्रीत करने वाला हो, दूसरे का धन हरण करने वाला हो और स्वयं निर्भय हो कर अपने से प्रबल शत्रु से वैर करे उसे अनिद्रा में रहना पड़ता है। उसे अनिद्रा रोग सताता है।

इतै कहा? नित दोष तैं, बंधन हो महाराज!।
निद्रा लगत न आपकौं, इहै कौन गति आज?।।६१।।
इसलिए हे महाराज! मेरे बताये सभी दोषों से आप बंधे हुए नहीं क्या? अब आप ही सोचें कि आज आपको नींद क्यों नहीं आ रही इसके क्या कारण हैं?

इक तैं दोय विचार करि, जीति चार तैं तीन।
पांच रोकि षट जानि करि, सात तजै सुख लीन।।६२।।
सुनों राजा जो एक से दो प्रकार का विचार कर, चार भेदों से तीन जन को जीत कर और पाँच को रोक कर, छः को जान कर, सात को तजे, वही सुख पाता है।

कवित्त
एक बुद्धि वृत्त ही तैं कारज अकारज को,
नीके कै बिचार, शत्रु मित्र उदासीन को।
कोप्यां साम लोभ्यां दाम भीतै भेद हीनै दंड,
चार तैं या रीत जीते पूर्व कहै तीन कौं।
पांच इन्द्रि वेग रोकि संधि बिग्रहादि षट,
जानि सप्त व्यस्न तजै और संग हीन को।

द्यूत सुरा मृगया स्त्री तंद्रा छल क्रूरताई,
दोनों लोक भ्रष्ट जानि सात के अधीन को।।६३।।
उपरोक्त दोहे (संख्या ६२) के वाक्यों का विशेष अर्थ यह है कि एक बुद्धि से कार्य तथा अकार्य इन दोनों प्रकारों को अच्छी तरह विचार करना। शत्रु, मित्र तथा उदासीन में से कुपित को साम (साम उपाय से), लोभी को दाम (धन से) से भय वाले को भेद से और नीच को दण्ड से, इस प्रकार राजनीति के चार प्रकार से पहले कहे गए शत्रु, मित्र और उदासीन (सम वृत्ति वाले) इन तीन जनों को जीतने से। पाँच इन्द्रियों (कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, नाक) के वेग (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) को नियमपूर्वक रख कर संधि और विग्रह, आदि छः गुणों को जान कर सात व्यसन तथा नीच का संग तज देना चाहिए। खास कर जुआ, मद्यपान, मृगया, पर-स्त्री, आलस्य, कपट और क्रूरता ये सात प्रकार के व्यसन के वश में होने वाला इस लोक और परलोक में भ्रष्ट हो जाता है। ऐसा जानों।

दोहा
जा दिन विद्या धर्म को, यश को लाभ न होय।
विदुर कहै धृतराष्ट सों, बंध्य काल है सोय।।६४।।
आगे विदुर कहने लगे कि हे राजा! जिस दिन विद्या का, धर्म का और यश का लाभ न मिले उस दिन को निष्फल गया जानों।

उत्पति विद्या न्याय धन, करहु अमर तन मान।
खरचहु आतुर होय मनु, काल ग्रसे कच आन।।६५।।
शरीर अमर है यह सोच कर विद्या, न्याय और धन कमाना चाहिए और जैसे काल ने आकर चोटी पकड़ी हो यह जान कर (उतावले बन कर) सदव्यय करना चाहिए।

मनसा वाचा कर्मणा, राजनीति की रीति।
विदुर कहै धृतराष्ट्र सों, सुनहू लाय प्रतीति।।६६।।
मन, वचन और कर्म से यह तीन प्रकार की राजनीति की रीति है, विज्ञ विदुर कहते हैं कि हे राजा! आप विश्वास कर सुनें।

मनसा उदाहरण
कवित्त
केतिक उपत मेरे खरच कितोक आहि,
केतो पुन्यदान केतो कीरति को दान है।
केती चढ़ी प्यादी सैन केते शत्रु केते मित्र,
कैसा देश कैसो काल वैभव निधान है।
कौन सामखोर को हरामखोर मेरे पास,
कौन कृपापात्र कौन साधारन श्यान है।
जहां तहां जबै तबै नृपति बिचार्यो करै,
विदुर बखानै राजनीति को विधान है।।६७।।
मेरी आय कितनी है? खर्च कितना है? पुण्य का दान कितना है? कीर्ति का दान कितना है? घुड़सवार आदि वाहनों वाली सेना कितनी है? पैदल चलने वाली कितनी? शत्रु कितने हैं? मित्र कितने हैं? मेरा देश कैसा है? समय कैसा है? वैभव का भंडार कैसा है? मेरे पास स्वामीभक्त कौन है? हरामखोर कौन है? मेरे कृपापात्र कौन हैं? मेरे सामान्य जन और सुजान कौन हैं? यह राजनीति की रीत विदुर बताता है जिसे प्रत्येक राजा को, जहाँ हो, वहाँ विचार करना चाहिए।

दोहा
तीनहु राखै दृष्टि में, तीन न बिगरन देत।
तीन पिछानै बिमलमति, सबकौं बश करि लेत।।६८।।
जो तीन (आय, खर्च और खजाना) हमेशा नजर में रखे। और तीन (धर्म, अर्थ, काम) को बिगड़ने न दे। साथ ही निर्मल बुद्धि से तीन (वेद रीति, लोक रीति, कुल रीति) को पहचाने वह (राजा) सभी को वश में कर लेता है।

वाचा उदाहरण
सत्य और उपकारमय, मिष्ट वचन अविरुद्ध।
श्रूपदास हरिभक्ति जुत, सोई वाणि है शुद्ध।।६९।।
कवि स्वरूपदास कहता है कि जो वाणी सत्य, उपकारमय, मीठी, विरोध विहीन और श्रीहरि की भक्तिमय हो, वही वाणी शुद्ध कहलाती है।

कर्मणा उदाहरण
सत्य, शील शम दम दया, विद्या सकुलता दान।
जगवल्लभता सूरता, पावत दश पुनवान।।७०।।
सत्य, शीलत्व, सम (मनोनिग्रह), दम (इन्द्रिय निग्रह), दया, विद्या, श्रेष्ठ कुलत्व, दान, जगप्रियता (लोकप्रियता) और वीरता ये दस चीजें पुण्यवान पुरुष ही प्राप्त करता है।

पुनर्यथा
छिमा मानुषी विपति में, दैवापदि संतोष।
औगुन तिनमें एक नृप, गिनत अशक्त सदोष।।७१।।
(लोकिक) मनुष्य की ओर से आने वाली विपत्तियों में क्षमा रखनी चाहिए और देवाधीन विपत्तियों में संतोष रखना चाहिए, परन्तु हे राजा! इसे निर्बलता का दोष वाला अवगुण गिना जाता है।

वार्ता- धुनि तें युधिष्ठिर में दो! द्रष्टान्त घटावे हैं।
उपर्युक्त दोनों दृष्टांत युधिष्ठिर में पाए जाते हैं।

सर्व चर्म आच्छन्न भुव जाके पद पदत्रान।
आतपत्र जिहि शीष पर, नभ आछन्न बितान।।७२।।
विदुर कहने लगे कि हे धृतराष्ट्र! जिसके पाँवों में जूते हों, वह पूरी पृथ्वी को ही चमड़े से मढ़ी हुई समझता है, और जिसके सिर पर छत्र हो, उसे पूरा आकाश शामियानों से ढका हुआ प्रतीत होता है।

कवित्त
पुत्र त्रिया काज धन रक्षा नीके कीजतु है,
पुत्र त्रिया रक्षा सोहि आत्मा के सु काज है।
पुत्र त्रिया नासन ही आपकौं बचाय लीजै,
पुत्रादिक फेर ह्वै न अंग को इलाज है।
द्रव्य जातां राखै कुल कुल जातां राखै जीव,
जीर जातां राखि लीगै जाको गये गयो मानगमन।
लाज गये गई कीर्ति कीर्ति गये गयो मान,
मान गये जीवत ही मृत्यु को समाज है।।७३।।
पुत्र और स्त्री के लिए सभी तरह से धन का संचय करना चाहिए पर पुत्र और स्त्री की रक्षा स्वयं के लिए करनी चाहिए। पुत्र और स्त्री के नाश होते स्वयं की आत्मा को बचा लेना श्रेयष्कर है, क्योंकि पुत्र आदि की प्राप्ति फिर से हो सकती है परन्तु शरीर के नाश होने पर उसका कोई (इलाज) उपाय नहीं। धन के जाते कुल को बचाना चाहिए और कुल के जाते स्वयं के जीव की रक्षा करना चाहिए पर प्राण को गंवा कर (जाते) जिसे रखना है उसे लाज कहते हैं। लाज जाने से कीर्ति चली जाती है, कीर्ति के जाने से मान चला जाता है और मान के नष्ट हो जाने से तो व्यक्ति जीवित ही मृतक के समान है।
(उपरोक्त कवित्त में श्रंखला अलंकार है – सं.)

पुनर्यथा
सो न सभा जामें कोउ वृद्ध को प्रवेश नाहिं,
सो न वृद्ध होय समै पाय नीति बोलै ना।
सो न नीति जातें कुल-लोक-बेद की न रीति,
सो न रीति जामें सांच-जूठ नीके तोलै ना।
सो न तोलिबो है जामें पक्षपात बोलै छल,
स्वारथ बिचारि जैसी होय तैसी खोलै ना।
सोइ भूमिपाल एते दोष बिन बानी सुनि,
ताको अंगिकार करै इतै उतै डोलै ना।।७४।।
जिस सभा में किसी वृद्धजन का प्रवेश न हो वह सभा नहीं, समय (अवसर) पा कर जो वृद्ध नीति के वचन न बोले वह वृद्ध नहीं कहलाता। जिस नीति में कुल की, लोक की और वेद की मर्यादा न हो वह नीति नहीं। जिसमें सत्य और झूठ की यथार्थ रूप से तुलना न हो वह मर्यादा नहीं कहलाती। जिसमें पक्षपातपूर्ण छलपूर्ण वाक्य कहे जाएं और स्वार्थ का विचार कर, सत्य न कहा जाए वह तुलना नहीं। इतने दोष टाल कर जो बात सुने, सुन कर स्वीकार करे और इधर-उधर न करे वही राजा कहलाता है (राजा कहलाने योग्य है)। (इसमें भी श्रंखला अलंकार अर्थात् अेकावली अलंकार है सं.)

दोहा
कारागृह दें पुत्र कौं, धर्मपुत्र कौं राज।
टरै प्रजागर आपको, कुल को ह्वै न अकाज।।७५।।
इस प्रकार नीति के वाक्य सुना कर विदुर कहने लगे कि हे धृतराष्ट्र! तुम्हारे पुत्र को तुम्हें कारागार में डाल देना चाहिए और धर्मपुत्र (युधिष्ठिर) को राज्य दे देना चाहिए। यदि ऐसा करोगे तो तुम्हारा अनिद्रा रोग मिट जाएगा और कुल का नाश न होगा।

त्याग एक हित ग्राम के, ग्राम त्याग हित देश।
देश त्याग हित प्रान के, वाणी विदुष विशेष।।७६।।
हे राजा! यदि पूरे गाँव की भलाई हो तो एक जने को त्याग देना चाहिए और इसी प्रकार देशहित में गाँव को त्यागना श्रेष्ठ है और स्वयं के प्राणों की रक्षार्थ देश त्यागना श्रेयष्कर है। ऐसा विद्वजन कहते हैं।

धृतराष्ट्र उवाच
विदुर कहत तूं सत्य सब, सुहृद रीत समझाय।
जथा भविष ह्वैहै तथा, पुत्र न त्यागो जाय।।७७।।
विदुर की सारी बातें सुनकर धृतराष्ट्र बोले कि हे विदुर! तू एक भाई के नाते समझा कर सारी बातें कह रहा है, वे सत्य हैं अब जो भविष्य में लिखा है, वह होगा पर मुझसे अपने पुत्र का त्याग तो संभव नहीं।

भीष्पादि का सभा में मिलना
भीष्म द्रोण कर्णादि सब, सत पुत्रन जुत भूप।
मिले सभा बिच प्रात भये, बाल्हिक आदि अनूप।।७८।।
फिर सवेरा होते ही भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण आदि सभी के साथ राजा धृतराष्ट्र ने अपने सौ पुत्रों सहित सभा का आयोजन किया। जिसमें अनुपम राजा बाल्हिक भी सम्मिलित हुआ।

संजय का सभा में आना
बोलि पठायो दूत सोइ, संजय तिन्ह ढिग आय।
भीम किरीटी के वचन, सबकौं कहत सुनाय।।७९।।
सभा जुड़ने के पश्चात् राजा धृतराष्ट्र ने दूत संजय को अपने घर से बुला भेजा। इस पर संजय आ कर सभा में सभी को सुना कर, भीमसेन और अर्जुन का सन्देश सुनाने लगा।

भीम कथन
कवित्त
भीमसेन कह्यो सूत कहियो सुयोधन तैं,
जेते शत्रु तो से तेते केते मारि डारे हैं।
द्रोपदी के क्लेश सभा बन के विराट हू के,
कैसे सहै जात धर्मराज काज धारे हैं।
युधिष्ठिर साम हू तैं मांगे बिना जुद्ध किये,
दैन कौं न पंच ग्राम हम ना बिचारे हैं।
मान लैनवारे, नांहि आन लैनवारे हम,
दान लैनवारे नाहिं प्रान लैनवारे हैं।।८०।।
संजय बोला कि मुझे भीमसेन ने कहा है कि मैं दुर्योधन से यह कह दूं कि तेरे जैसे जितने भी हमारे शत्रु थे, उन्हें मैंने मार डाला है। फिर द्रौपदी को हुए सभा के, वन के तथा विराटनगर के क्लेश किस प्रकार सहन किये जाते? पर धर्मराज के होने से उठाने पड़े हैं। फिर युधिष्ठिर बिना युद्ध किये संधिरूप (साम रूप) पाँच गाँव मांग रहे हैं, वह भी तू देने से मना करता है। पर अब हमने ये गाँव इस तरह (मांग कर) लेने का विचार त्याग दिया है क्योंकि हम मान से लेने वाले हैं, दूसरी रीत से लेने वाले नहीं और हम अब तेरा दान लेने वाले नहीं, हां, तेरे प्राण लेने वाले अवश्य हैं।

दोहा
हिडँब जटासुर बक असुर, जरासंध पुनि जान।
कीचकादि बल कुबुधि तैं, सब भये तोर समान।।८१।।
और हे दुर्योधन! हिडंब अथवा जटासुर, बकासुर, जरासंध, कीचक आदि दुष्ट बल तथा कुबुद्धि में सभी तुम्हारे जैसे थे अर्थात् वे सभी जिस प्रकार हमारे हाथों मारे गये, उसी प्रकार तू भी मारा जाएगा।

कवित्त
द्युतक्रीड़ा ही में कालक्रीड़ा सी दिखाय देतो,
अग्रज को धर्म राखिबे कौं नाहिं मारे हैं।
लाखागृह बन के बिराट द्रौपदी के क्लेश,
ऐसे दुख भीम निशा द्यौष ना बिसारे हैं।
करिये विलोम बास तिहारो युधिष्ठिर को,
प्रान रखै चाहै तो निदान तोकौं प्यारे हैं।
क्लीव लेनवारे हैं सदीव दान भिक्षा हम,
सींव लेनवारे नाहिं जीव लेनवारे हैं।।८२।।
हे दुर्योधन! मैं तुझे सूतक्रीड़ा में ही कालक्रीड़ा सिखा देता परन्तु बड़े भाई (युधिष्ठिर) के धर्मपालन की मर्यादा के कारण तुझे सिखाई (मारा) नहीं। फिर लाक्षागृह, वन, विराटनगर के क्लेश और द्रौपदी का दुःख मैं भूला नहीं हूं। और दुर्योधन! तुझे अवश्य अपने प्राण प्यारे हैं यदि इन्हें रखना चाहता है तो तुझे युधिष्ठिर से स्थान परिवर्तन कर लेना चाहिए अर्थात् तुझे वन में जाना चाहिए और युधिष्ठिर को राजगद्दी पर बिठाना चाहिए। तू क्या सोचता है, हम सदा ही कायरता से भिक्षा का दान लेने वाले रहेंगे? तेरा यह सोचना कि हम तेरे राज्य की सीमा लेने वाले हैं, वे हम नहीं है अपितु अब हम तो तेरे प्राण लेने वाले हैं।

कुटुम त्रिया की लीनी लाज और राज साज,
पाजी है स्वभाव ताके एही बात ताजी है।
हत तो चंडाल तोकौं केद तैं छुराय दीनो,
अग्रज की आज्ञा क्षात्रधर्म ही तैं राजी हैं।
तोकौं तो भयो त्रिदोष राज सैन्य वैभव को,
ऐसा रोग काटिबे कौं किरीटी इलाजी है।
स्थान न छुड़ावै सब कानन पठावैं नाहिं,
बानन के पासे अब प्रानन की बाजी है।।८३।।
फिर तुम ने कुटुम्ब की स्त्री (द्रौपदी) की लाज ली और राज्य का ठाट-बाट हथिया लिया, ऐसा तेरा कुटिल स्वभाव है। यह बात तो अभी ताजा है कि हे चांडाल! हमने अपने बड़े भाई की आज्ञा से तुझे गंधर्व की कैद से छुड़ाया क्योंकि हम क्षत्रिय धर्म को निभाने में प्रसन्न रहते हैं। तुझे तो राज्य, सेना और वैभव का सन्निपात हो रखा है तेरी इस बीमारी को काटने का इलाज अर्जुन अच्छी तरह जानता है। जिस तरह तुम ने हमें घर छुड़ाकर वन में भेज रखा है उस तरह हम तुम सभी को वन में भेजने वाले नहीं हैं, हम तो तुम्हें स्वर्ग में भेजने वाले हैं। अब तो हम मात्र तुम्हारे प्राणों के प्यासे हैं। अर्थात् तुम बाणों से प्राणों को खोओगे।

दोहा
दै टँकार गाँजीव को, कहे वचन फिर पाथ।
इंद्र अशनि रव दशहु दिशि, भो पूरित इक साथ।।८४।।
इसके आगे संजय कहने लगे कि हे दुर्योधन! अर्जुन ने गांडीव की टंकार दे कर मेरे साथ कहलवाया कि मैं तुम से यह सब कुछ कह दूं। गांडीव की टंकार से दशों दिशाएं दहल गई थी मैंने स्वयं देखा था।

अर्जुन कथन
कवित्त
तेरो बंधु तुही मेरो मातुल औ सूतपुत्र,
चंडाल चौकरी ज्यों ही और मिले सारे हैं।
धर्मराज लोक बीच धर्मराज याद कीने,
धर्मराज कोप भरे लोचन उघारे हैं।
ब्रह्म हू के रुद्र हू के शरन बचोगे नाहिं,
गांजिब कौं धारिकै किरीटी यों बकारे है।
ढाल कर्नवारे हम ख्याल कर्नवारे नाहिं,
साल कर्नवारे हम काल कर्नवारे हैं।।८५।।
अर्जुन ने कहा कि हे संजय! तुम दुर्योधन को कहना कि तेरा भाई (दुःशासन), तू, तेरा मामा (शकुनि) और सूतपुत्र (कर्ण) यह चांडाल चौकड़ी और उनके जैसे दूसरे दुष्ट सभी एकत्रित हो गए हो इससे तुमको धर्मराज (यमराज) के लोक में धर्मराज (यमराज) ने याद किया है क्योंकि यहाँ धर्मराज (युधिष्टिर) ने क्रोध भरे अपने नेत्रों को उघाड़ा है। अब चाहे तुम ब्रह्मा और महादेव की शरण में भी चले जाओ तब भी तुम्हारा बचना संभव नहीं है। गांडीव धनुष को उठा कर प्रत्यंचा फटकार कर वह बोला था कि हम कोई तलवार के समक्ष ढाल करने वाले अथवा बनावटी खेल करने वाले नहीं हैं, हम तो तुम्हें मारने वाले, तुम्हारे काल स्वरूप हैं।

छप्पय
जबहि भीम रन जुरहि, प्रान तिहि बंधुन हरता।
जबहि भीम रन जुरहि, करी सेना क्षय करता।
जबहि भीम रन जुरहि, त्रसहि बल भजहि जितहि तित।
जबहि भीम रन जुरहि, कहहि सब सरन लहहि कित।
रन जुरहि भीम दुर्जय दुसह, समझ कष्ट परिहै सबहि।
मदभ्रष्ट दुष्ट धृतराष्ट्र सुत, तपिहै दुर्योधन तबहि। ८६।।
संजय आगे बताने लगा कि सुनो दुर्योधन! उन्होंने कहा है कि जिस समय तुम्हारे सारे भाइयों का प्राण हरने वाला भीमसेन युद्ध में उतरेगा, और हाथियों की सेना का नाश करने वाला भीमसेन जब युद्ध में जुड़ेगा तब तुम्हारी सेना त्राहि-त्राहि करती इधर-उधर भाग खड़ी होगी। जब भीमसेन युद्ध को सन्नद्ध होगा उस समय तुम सारे किसकी शरण में जाओगे? फिर जब अविजित भीमसेन युद्ध में उतरेगा तभी तुम सभी को दुःख क्या होता है? इसकी खबर पड़ेगी और मदांध बना धृतराष्ट्र का पुत्र तू-दुर्योधन भी तभी कष्टाग्नि में तपेगा।

जबहि सात्यकि जुरहि, कठिन गन शत्रु निकंदन।
जबहि अभीमन जुरहि, पांडु सुभद्रा कुल नंदन।
जबहि शिखंडी जुरहि, भीष्म के मर्म बिदारहि।
धृष्टद्युम्न रन जुरहि, प्रबल भट द्रौन प्रहारहि।
सुशर्मा शकुनी के प्रानहर, जुरहिं माद्रि के पुत्र जबहि।
मतिभ्रष्ट दुष्ट धृतराष्ट्र सुत, तपिहै दुर्योधन तबहि।।८७।।

कठिन शत्रु समूह का निकंदन करने वाला सात्यकि जब युद्ध में जुड़ेगा, जब पांडु वंश का सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु युद्ध में संलग्न होगा, फिर जब शिखंडी कुमार युद्ध में उतरेगा और भीष्म के मर्म स्थान भेदेगा। जब धृष्टद्युम्न रण को सजेगा और प्रबल शूरवीर द्रोणाचार्य पर प्रहार करेगा, जब सुशर्मा एवं शकुनि के प्राणों को हरने वाले माद्री पुत्र युद्ध में सन्नद्ध होंगे तब बुद्धिभ्रष्ट धृतराष्ट्र का पुत्र दुष्ट दुर्योधन तू कष्टाग्नि में तपेगा।

स्वेत अस्व रथ जुरहि, ध्वजा वातात्मज गर्जहि।
देवदत्त गांजीव, घोष गन शत्रुन तर्जहिं।
वात वेग तिहि रथहि, कृष्ण समर बिन प्रेरहिं।
कहां जाइ का करहि, सूर मिलि इत उत हेरहिं।
गन बान छुटहिं गांजीव तैं, जीव अमित हरहिं जबहि।
मतिभ्रष्ट दुष्ट धृतराष्ट्र सुत, तपिहै दुर्योधन तबहि।।८८।।
जब अर्जुन के रथ में श्वेत घोड़े जुतेंगे और ध्वजा में हनुमान गर्जना करेंगे। देवदत्त शंख और गांडीव धनुष की टंकार जब शत्रु नाश करने लगेंगे। जब पवन वेगी रथ को श्री कृष्ण रणांगन में हांकेंगे तब शूरवीर मिल कर कहाँ जाएंगे? क्या करेंगे? जब गांडीव धनुष से बाणों का झुण्ड छूटेगा और अपार जीवों का हरण होगा तभी बुद्धि भ्रष्ट हुआ धृतराष्ट्र का दुष्ट पुत्र तू दुर्योधन हुताग्नि में तपेगा।

सुयोधन कथन
दोहा
कहत सुयोधन मोर तैं, देव हु समरथ नाहि।
जुरन जुद्ध बिच नरन तैं, कहु डर उपजै काहि।।८९।।
पाण्डवों का कहलाया हुआ सन्देश सुन कर दुर्योधन बोला कि मुझ से सामर्थ्यवान तो देवता गण भी नहीं, तब फिर कहो कि मनुष्यों से युद्ध में भिड़ते हुए मुझे किसका डर लगेगा?

जौ लौं शिर धर पै रहै, तौ लौं मिलै न क्यारि।
जब ही शिर धर पै रहै, तब सब लेहि सँभारि।।९०।।
फिर जब तक मेरा सिर अपने धड़ पर विद्यमान है तब तक एक क्यारी जितनी जमीन नहीं मिलने वाली। हाँ, जब मेरा सिर कट कर जमीन पर गिर पड़े तब भले ही पूरी पृथ्वी का राज ले लेना।

धृतराष्ट्र कथन
भो गांधारी तोर सुत, करत भरत कुल नाश।
गुरुजन की सीख न गिनत, है नित कुमति हुलास।।९१।।
दुर्योधन के गर्व भरे वचन सुन कर धृतराष्ट्र गांधारी से कहने लगे कि हे गांधारी! यह तुम्हारा पुत्र भरत कुल का नाश करने वाला है, अपने से बड़ों का कहना मानता नहीं और सदा कुबुद्धि का प्रदर्शन करने में प्रसन्न रहता है।

गांडिव जुत प्रतिकूल ह्वै, खांडिव दियो जराय।
सानुकूल पांडव सकल, सुर अरि दिये मिटाय।।९२।।
जिस गांडीव धनुष युक्त अर्जुन ने प्रतिकूल हो कर खांडव वन को जला डाला। यही नहीं इस पांडव (अर्जुन) ने देवताओं के पक्ष में रह कर सारे शत्रुओं का नाश कर डाला।

सहस्त्र अर्जुन पांच शत, छोरत इक छिन बान।
सोइ द्वै भुज तैं पांडुसुत, को तिहि पुरुष समान।।९३।।
सहस्त्रार्जुन क्षण भर में पाँच सौ बाण छोड़ता था वैसे ही पाँच सौ बाण अर्जुन अपने दोनों हाथों से छोड़ता है, उसकी बराबरी करने वाला इस लोक में कौन है?

गांधारी वचन
वृद्ध अंध माता पिता, भो सुत हमकौं देख।
पुत्र शोक को दुसह दुख, जीव मात्र बिच लेखे।।९४।।
गांधारी कहने लगी कि हे दुर्योधन! तेरे माता-पिता वृद्ध और अंधे हैं, चूंकि तू हमारा पुत्र है इसलिए हमारी ओर देख (तरस खा)। पुत्र शोक का दुःख असह्य दुःख होता है सारे प्राणियों में देख ले।

सुयोधन कथन
कवित्त
अहो महा कष्ट धृतराष्ट्र हू कहत ऐसे,
ह्वैहै वंश नाश या समर्थता का भ्रष्ट हैं?।
पृष्ठ है सदैव राधापुत्र तैं गरिष्ठ हूं मैं,
जातैं कोउ शूरवीर जेष्ट ना कनिष्ट हैं।
कर्ण मामा दुःसासन इष्ट हैं हमारे तेउ,
शत्रुन कौं मारिकै अभीत भये तिष्ठ हैं।
औरन की बानी कटु नेक न सुहानी मोहि,
बानी तीन हू की तीन काल हू में मिष्ट हैं।।९५।।
दुर्योधन कहने लगा कि अहो (घोर आश्चर्य)! कितने दुःख की बात है कि धृतराष्ट्र भी कहते हैं कि वंश का नाश हो जाएगा, तो मेरा पराक्रम नष्ट हो गया है क्या? मेरी ओर हमेशा कर्ण है उससे में निश्चिंत हूं। कर्ण से कोई शूरवीर वीरता में बड़ा नहीं, सारे छोटे हैं। फिर मैं यह जानता हूं कि कर्ण, शकुनि, दुःशासन ये हमारे मित्र, अपने शत्रुओं को मार कर, निर्भय हो कर जीवित हैं इन्हें दूसरों के कड़वे बोल सहन नहीं होते। इसीलिए मुझे तीनों लोकों में, इन तीन जनों की वाणी ही फकत मीठी लगती है, और किसी की नहीं।

कवि वचन
दोहा
नैकहु मानी नाहिं नृप, संजय जुत यह सीख।
भावी नासक नृपन की, परी सबन कौं दीख।।९६।।
संजय के साथ राजा (धृतराष्ट्र) की भी सीख को दुर्योधन ने तनिक भी नहीं माना। कवि कहता है कि तभी सारे जगत को यह पता चल गया कि राजाओं के सर्वनाश का समय अब करीब आ गया है।

।।इति अष्टम मयूख।।

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