पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – नवम मयूख

नवम मयूख

उद्योगपर्व (उत्तरार्द्ध)

युधिष्ठिर उवाच
दोहा
सूत गये बहु दिन भये, पीछे नाहि सँदेश।
तृतीय बसीठी कृष्ण तुम, गजपुर करहु प्रवेश।।१।।
वैशंपायन कहते हैं कि हे जन्मेजय! युधिष्ठिर श्री कृष्ण से पूछते हैं कि संजय को गये इतने दिन हो गए परन्तु उस ओर से कोई समाचार नहीं आया, इसलिए हे कृष्ण! अब आप सुलह का तीसरा प्रस्ताव ले कर स्वयं हस्तिनापुर पधारो।

मात पिता बृध अंध मम, सोइ मोहि शोक असाध।
तीजे उ माने नाहिं तो, का मेरो अपराध।।२।।
मेरे माता पिता (गांधारी और धृतराष्ट्र) दोनों वृद्ध और अंधे हैं, इसका मुझे असाध्य शोक है (रंज है) पर अब अगर इस तीसरे संधि प्रस्ताव को भी उसने (दुर्योधन ने) नहीं माना तब फिर मुझे दोष (मेरा दोष नहीं) मत देना।

कहै युधिष्ठिर कृष्ण तैं, करियो साम उपाय।
कुल विनाश को दास के, अंक लगे नहि आय।।३।।
राजा युधिष्ठिर श्री कृष्ण से बोले कि हे महाराज! समाधान निकालने का प्रयत्न करना। कहीं ऐसा न हो कि आपके मुझ दास पर वंश नाश का कलंक लगे।

भीम कथन
त्यों ही वृकोदर ने कह्यो, यों मृदु बोलहु आप।
संधि करे मद अंध नृप, लगे न कुल वध पाप।।४।।
युधिष्ठिर के वचनों से सहमत हो कर भीमसेन ने कहा कि हे महाराज कृष्ण! आप ऐसे मीठे वचनों का प्रयोग करना जिससे कि वह मदांध राजा (दुर्योधन) सुलह कर ले और हमें स्वगोत्री बंन्धुओं पर घात का पाप न लगे।

ऐसे ही अर्जुन नकुल के, वचन सुने यदुवीर।
कहि सहदेव रु सात्यकि, जुध थापहु रणधीर।।५।।
भीमसेन की बात सुन कर श्रीकृष्ण ने अर्जुन एवं नकुल की बात सुनी, इसके बाद सहदेव और सात्यकि ने कहा कि हे रणधीर कृष्ण! युद्ध का ही निर्णय लेना।

द्रौपदी कथन
ढरत जुगल पदमाक्ष तैं, जुगन कुंचन पर नीर।
कहत द्रौपदी कृष्ण तैं, धिक पांडुन की धीर।।६।।
इस समय अपने दोनों कमलनयनों से उर स्थल के दोनों ओर आंसू ढरकाते हुए द्रौपदी श्रीकृष्ण से कहने लगी कि इन पांडवों के धैर्य को धिक्कार है।

कवित्त
मेचक मृदुल लंबे बार को सुगन्ध सिंच्यो,
वाम पान लेकै जुरा कृष्ण कौं बतायो है।
याकों जिन हाथन तैं एंच्यो ते छिदैं न जौ लौं,
तौ लौं द्रोपदी को कोप नेक ना सिरायो है।
पुत्र वधू भीष्म अचक्षु, की कहाऊँ नाहिं,
जिनके समीप सभा बीच दुख पायो है।
गांजीव के गदा के धरैया कौं धिक्कार जो पै,
एते ही पै संधि को उपाय मन भायो है।।७।।
सुवासित तेल लगी अपने कोमल काले घने लंबे बालों की चोटी बाएं हाथ में ले कर द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को दिखाते हुए कहा कि हे कृष्ण! इन केशों को जिन हाथों ने खींचा, वे हाथ जब तक काटे नहीं जाते तब तक मेरा क्रोध जरा सा भी कम होने वाला नहीं! क्या मैं पितामह भीष्म और धृतराष्ट्र की बहु नहीं कहलाती हूं? अर्थात् कहलाती हूं। पर उनकी नजरों के आगे प्रत्यक्ष उनकी सभा में प्रताड़ित की गई। इससे गांडीव और गदा धारण करने वालों (अर्जुन और भीमसेन) को धिक्कार है कि इतना सब कुछ होते हुए भी जो संधि करने का प्रस्ताव मन में लाते हैं।

बंधु धृष्टद्युम्न पिता द्रुपद स्वयं भुवि मैं,
स्वसुर भो पांडु पांडुपुत्र भरतार हैं।
ताको भयो हाल सभा बीच ज्यों कंगाल को व्है,
तापै भीमसेन हू के संधि को विचार है।
रहो पाँचों, गंगापुत्र दौन हू के काल रुप,
और कुरुवंशिन के करता संघार है।
मेरो पिता मेरो बंधु मेरे पुत्र महावीर,
सुभद्रा को नंद एते जुद्ध कौं तयार है।।८।।
हे कृष्ण! मेरा भाई धृष्टद्युम्न है, पिता द्रुपदराज हैं और मैं अपने आप ही उत्पन्न (स्वयंभुवि) हूं फिर पांडुराज मेरे स्वसुर हुए। बाद में उनके जाये पुत्र (पांडव) मेरे पति बने। मैं अकेली और अनाथ कहाँ? फिर भी कुरु सभा में कंगाल और एक असहाय अबला जैसी मेरी हालत हुई। इस पर भी भीमसेन का सुलह करने का विचार है। भले ही मेरे पांचों पति ऐसा सोचें। संधि करने का विचार करते हैं तो करें। पर भीष्म तथा द्रोणाचार्य के काल रूप, और कौरव कुल संहार करने में समर्थ मेरे पिता, मेरा भाई, मेरे पुत्र एवं महा शूरवीर सुभद्रानन्दन (अभिमन्यू) ये सभी युद्ध करने के लिए तैयार हैं। इसलिए आप संधि का विचार मन में मत लाना।
(अप्रस्तुत प्रशंसा विशेष निबंधना)

दोहा
अति शीतल तन इन्दु को, होत ग्रहन बहु बेर।
उग्र तेज रवि कोउ समय, होत न तदपि अंधेर।।९।।
चन्द्रमा का अंग अत्यन्त शीतल है इससे उसे बहुत बार ग्रहण लगता है, और सूर्य प्रचंड तेजवान है इसलिए उसका कभी कभार ग्रहण होता हो पर क्या इससे सर्वत्र अंधेरा हो जाता है? अर्थात् पांडवों के शीतल (शान्त) रहने से उन्हें कई बार क्लेश-ग्रस्त होना पड़ा है, पर अब वे कब तक इस तरह शान्त बने रहेंगे?

निज पीतांबर पौंछि करि, अंशु द्रौपदी केर।
कहत कृष्ण तिहि बेर पुनि, अंशु जुक्त मुख हेर।।१०।।
इसके बाद श्री कृष्ण ने अपने पीतांबर से द्रौपदी के आंसू पोंछ डाले पर द्रौपदी की आखों को फिर से डबाडब भरी देख श्री कृष्ण कहने लगे –

ज्यों तव शोक न मिटत है, सुनि नृप द्रुपद कुमारि।
त्यों निमग्न मर्णांत लौं, ह्वैहै केउ नृप नारि।।११।।
हे द्रौपदी! सुन, जैसे तेरा शोक नहीं मिट रहा है, उसी तरह कई रानियां अपनी मृत्युपर्यन्त शोक में डूबी रहेंगी।

श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर गमन
यों कहि कीनो गमन पुनि, कृष्ण नागपुर ओर।
प्रसन भयो धृतराष्ट्र सुनि, विदुरहि कहत बहोर।।१२।।
ऐसा कह कर श्री कृष्ण हस्तिनापुर की ओर रवाना हुए। कृष्ण आगमन के समाचार सुनकर धृतराष्ट्र प्रसन्न हुए और विदुर से कहने लगे।

धृतराष्ट्र उवाच
करिहौं आतिथ कृष्ण को, विदुर सुनहू मम बात।
बिना प्रसव सत दासिका, करी अष्ट रथ सात।।१३।।
दैहों अष्टादश सहस, उत्तम अजिन दुशाल।
चीन देश के उर्ण पट, द्वै सहस्त्र तिहि काल।।१४।।
हे विदुर! मेरी बात सुन, मैं कृष्ण का भव्य सत्कार (महमाननवाजी) करूंगा और बिना प्रसव वाली सौ कुंआरी दासियों का समूह, आठ हाथी, सात रथ और इस अवसर पर अठारह हजार उत्तम मृगचर्म तथा चीन देश के दुशाले और ऊन के बने दो हजार वस्त्र भेंट करूंगा।

दुःशासन के महल जे, षट रिपु सुखद स्वरूप।
तहँ डेरा पुनि अवर हू, दैहौं रतन अनूप।।१५।।
अष्ट गुनौ सब साथ कौं, खान पान सुख दैन।
बिन दुर्योधन जायहैं, सनमुख तिन्हकों लैन।।१६।।
फिर दुःशासन के जो सुन्दर महल हैं, वे छहों ऋतुओं में सुखदायक हैं, वहाँ उन्हें ठहराने की व्यवस्था करूंगा और दूसरे अनुपम रत्न भेंट करूंगा। उनके साथ वाले तमाम लोगों को आठ गुना सुख देने का प्रयत्न करूंगा। अच्छे खानपान की व्यवस्था करूंगा और एक दुर्योधन के अतिरिक्त हम सभी लोग उन्हें लिवाने के लिए पेशवाही करेंगे।

विदुर वचन
आप बुद्धि वय वृद्ध व्है, करत लरकई बात।
अर्जुन प्यारो प्रान तैं, तजै कृष्ण क्यों तात।।१७।।
इस पर विदुर कहने लगे कि हे भाई! आप बुद्धिवृद्ध वयोवृद्ध हो कर कैसी बच्चों जैसी बातें करते हो, अर्जुन उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय है, कृष्ण भला उसे कैसे तजेंगे?

सर्व राज के लोभ तैं, होय न तेरे कृष्ण।
अर्ध राज दे धर्म कौं, क्षत्रिय हरि कुल प्रस्न।।१८।।
फिर हे भाई! चाहे तुम अपने सारे राज्य का लोभ ही दे दो। तब भी कृष्ण तुम्हारे नहीं हो सकते पर युधिष्ठिर (धर्मराज) को आधा राज्य दे देने से श्री कृष्ण आदि सभी क्षत्रिय अवश्य प्रसन्न होंगे।

पाय धुवावै अर्घ बिन, बिन जल कुंभन आन।
ग्रहन करैं सतकार नहि, कृष्ण अभक्ष समान।।१९।।
हे राजा! पाद प्रक्षालन के लिए पाद्य जल और, पूजा के लिए अर्घ्य जल के लिए इन भरे हुए घड़ों, के अतिरिक्त दूसरा कोई सत्कार उनके लिए अभक्ष्य समान (न करने योग्य) है इसलिए श्री कृष्ण कुछ भी ग्रहण नहीं करेंगे।

कवि कथन
विदुर कह्यो त्यों ही कृषण, पूजा ग्रहण न कीन।
रात विदुर के घर रहे, ताके ही भोजन लीन।।२०।।
कवि कहता है कि धृतराष्ट्र को विदुर ने कहा उसी प्रकार श्री कृष्ण ने धृतराष्ट्र की लालच भरी पूजा को नहीं स्वीकारा और रात्रि-विश्राम के लिए विदुर के घर रहे और वहीं भोजन किया।

विदुर कहै चहिये न इत, तव आगम ब्रजराज।
दुष्ट सुयोधन ना डरत, करत सुकाज अकाज।।२१।।
विदुर बोले कि हे ब्रजराज! आपको यहाँ हस्तिनापुर नहीं आना चाहिए था क्योंकि दुष्ट दुर्योधन सुकार्य को कुकार्य बनाते तनिक भी नहीं डरता।

श्री कृष्ण कथन
अपनो कहै सु तुम कही, जथा बिदुर धीमंत।
इन्हतैं मोकौं न नेक भय, समझहु अति मति संत।।२२।।
श्री कृष्ण उत्तर देते हुए कहने लगे कि हे बुद्धिमान विदुर! जिस प्रकार कोई स्वजन अपने स्वजन से कहता है, उसी प्रकार तुमने मुझ से कहा परन्तु हे धीमान सज्जन! तुम मन में यह पक्की तरह समझ लो कि मुझे उस (दुर्योधन) का जरा भी भय नहीं लगता।

सभा में श्रीकृष्ण का आगमन
प्रात सभा बिच नृपति सब, आये पुनि ऋषिराय।
त्यों आगम भो कृष्ण को, सबतैं आदर पाय।।२३।।
फिर सवेरे धृतराष्ट्र ने राज सभा बुलाई, जिसमें सभी राजा और ऋषिगण आए। उसी समय श्रीकृष्ण का आगमन भी सभा में हुआ। सभा में उपस्थित सभी ने उनका सत्कार किया।

कृष्ण कहै धृतराष्ट्र सुनि, न करि भूप कुल नष्ट।
दुष्टमति सोइ होत है, गिनै दिनन में भ्रष्ट।।२४।।
सभा में श्री कृष्ण कहने लगे कि हे धृतराष्ट्र! सुनो, तुम्हें राजाओं के कुल का नाश नहीं करवाना चाहिए और जो दुष्टमति वाले होते हैं वे गिने-चुने दिनों में नष्ट हो जाते हैं। इसका खयाल करो। (इसमें अर्थान्तरन्यास अलंकार है – स.)

देखि युधिष्ठिर की छमा, तव सुत को अपराध।
बिगरी सुधरै धर्म कौं, अबहु राज दै आध।।२५।।
आगे कहने लगे कि युधिष्ठिर की क्षमा (सबूरी) को देखो धृतराष्ट्र और अपने पुत्र का अपराध भी। इसलिए अभी भी वक्त है धर्मराज को आधा राज्य दे कर, हे राजा! बिगड़ी हुई बात को सुधार लो।

सुयोधन उवाच
विद्या धन कुल विभव को, दान सूरता जोर।
मेरे सो उन्हके कहां, छिमत तबहि दुख घोर।।२६।।
इसी बीच दुर्योधन बोल उठा कि विद्या, धन, कुल, वैभव और दान का बल तो मुझमें है, ऐसा उन पाण्डवों में कहाँ? इसीलिए वे इतना कठिन दुःख सहन कर रहे हैं।

श्रीकृष्णोवाच
सवैया
वंश तैं नाहिं महानता है न महानता लाखन ग्रंथ पढ़ै तैं।
उम्मर तैं न महानता है न महानता कोटिक द्रव्य बढ़ै तैं।
दान तैं नाहिं महानता है न महानता सूरता जुद्ध चढ़ै तैं।
जो मग धर्म धनंजय को सु महानता ता मग बीच कढ़ै तैं’।।२७।।
सुन कर कृष्ण कहने लगे कि वंश से बड़प्पन नहीं होता, लाख ग्रंथ पड़ लेने से विद्या नहीं आती, उम्र से बड़प्पन नहीं होता, करोड़ों का धन एकत्रित करने से कोई बड़ा नहीं हो जाता। दान में भी बड़प्पन नहीं, वीरता पूर्ण युद्ध लड़ने से ही कोई महान नहीं बन जाता परन्तु जो राह युधिष्ठिर और अर्जुन की है उसके अनुसरण में अवश्य बड़प्पन निहित है।

(इस सवैया में आवृत्ति दीपकालंकार है-सं.)

सुयोधन उवाच
सुयोधन कहै पिता और हू सभासद कौं,
बातें या गुवाल की भुवाल कैसे मानों हो।
ऐहो श्याम द्रौणादिक सब ही भ्रमाये आप,
इनके भरोसे कहा एहू चित आनो हो।
सुची अग्र दबै एती भूमि कौन दैन कहै,
कर्नादिक चार हू को मत ना पिछानो हो।
गोरस की जानो कृष्ण तो कैसे बसीठी करो,
गोरस की जानो हो कै गोरस की जानो हो?।।२८।।
दुर्योधन अपने पिता और सारे सभासदों को सुना कर बोला कि इस ग्वाले की बातें आप राजागण कैसे मान रहे हैं? इस कृष्ण ने यहाँ आ कर द्रोणाचार्य आदि को भ्रमित कर दिया है पर आप सभी क्यों भ्रमित होते हो? सूई की नोक के बराबर पृथ्वी देने की कौन कहता है? कर्ण आदि (दुःशासन, शकुनि तथा मैं) हम चारों का मत जानते नहीं क्या? इसलिए हे कृष्ण! पृथ्वी के रस की बात जानते होते तो फिर सुलह की बात क्यों करते? आप पृथ्वी के रस की बात जानते भी हो कि मात्र दूध-दही की बात के जानकार हो? (इस के अन्त में यमकालंकार है-सं.)

श्रीकृष्णोवाच
कृष्ण कहै सुयोधन मानत न मेरी तातैं,
भई परतीत भीम बांच्छित कौं पावैगो।
अजश तिहारो त्यों ही सुजश जुधिष्ठिर को,
रहिहै अखंड खंड खंड में कहावैगो।
आय रंगभू में मोकौं नाहिन दिखाय ऐसो,
खाकी ओट जाय निज प्रान तू बचावैगो।
जावैगो समूल गर्व भीम की गदा तें धुनि,
बिजै धारी मारि बिजै बिजय बजावैगो।।२९।।
सुनकर कृष्ण कहने लगे कि हे दुर्योधन। तू मेरी बात मानेगा नहीं इसका मुझे इल्म हो गया फिर तू भीमसेन का सोचा हुआ पाएगा। उसमें तुम्हारा अपयश होगा और युधिष्टिर का यश बढेगा, जो ठौर-ठौर पूरे राज्य में अखंड रूप से व्याप्त होगा। युद्ध की रंग भूमि में आ कर कोई तेरे प्राणों की रक्षा करे ऐसा मुझे यहाँ कोई नजर नहीं आ रहा। भीमसेन की गदा के प्रहार से तेरा गर्व मूल सहित नष्ट हो जाएगा और विजय ध्वनि को धारण करने वाला अर्जुन, शत्रुओं को मार कर विजय घोष करेगा।

दोहा
अहो सुयोधन अहर्निशि, सेवत हठहि सदीव।
तजि रन कौं जैहै तथा, जैहैं भूमि रु जीव।।३०।।
हे दुर्योधन! तू रात-दिन सदा हठ की ही साधना करता है पर मैं कहता हूं कि तू युद्ध से भाग जाएगा और तेरी पृथ्वी ही नहीं तेरे प्राण भी जाएंगे।

सुयोधनोवाच
कवित्त
जादौन को मान मोरि किरीटी सुभद्रा लैगो,
तुमने निहार्यो तैसे मैं तो ना निहारिहौं।
बैर बांधि करै प्रीति राजनीति की न रीति,
शत्रु सेन नाव सिंधु आहव में बोरिहौं।
मेरी या गदा तैं जमराज लोक वृद्धि पैहैं,
भीमादिक सूरन के कंधन कौं तोरिहौं।
छोरिहौं न टेक एक कहिहै अनेक मेरो,
नाम रनछोर नाहिं कैसे रन छोरिहौं।।३१।।
दुर्योधन बोला कि हे कृष्ण! यादवों का मान-मर्दन कर अर्जुन सुभद्रा को हर ले गया और आपने जैसी विनय प्रदर्शित की, वैसी मैं करने वाला नहीं। वैर बांध कर प्रीति करना यह राजनीति की रीति नहीं। मैं तो शत्रु की सेना रूपी नाव को युद्ध के समुद्र में डुबा कर रहूंगा। मैं अपनी इस गदा से भीमसेन के कन्धे तोड़ डालूंगा जिससे यमलोक में वृद्धि होगी। मुझे यही बात कई लोगों ने अलग-अलग तरह से कही है, आप भी कह रहे हो पर मैं अपनी टेक (हठ) छोड़ने वाला नहीं। फिर हे कृष्ण! मेरा नाम आप की तरह रणछोड़ नहीं इसलिए मैं रण को नहीं छोडूंगा। (इस के अन्तिम पद में वक्रोक्ति मूलक परिकरांकुरालंकार है सं.)

श्रीकृष्णोवाच
आन थान हाटक को कोमल स्वभाव सदा,
अग्नि नीरफेट तहां कठिन महान है।
आन धातु आन थान कठिन महान है पै,
नीरसोर यंत्र तहां सबही की हान है।
साचवान धर्मत्रान पांडुपुत्र कोमल हैं,
युद्ध के प्रयान इन्द्र रुद्र के समान हैं।
आन धातु के समान जान तेरे बंधु तू ही,
प्रान हान ह्वै है मान बचन निदान हैं।।३२।।
दुर्योधन का कहा सुन कर श्री कृष्ण कहने लगे हे दुर्योधन! दूसरी जगह पर (गर्म कर के खेंचने के अतिरिक्त) सोना स्वाभाविक रूप से सदा कोमल होता है परन्तु अग्नि की (तपाने की क्रिया) टक्कर झेलने में अत्यन्त कठिन है। जब कि दूसरी धातुएं अन्य ठिकानों पर कठिन होती हैं पर नीरसोर यंत्र में (तेजाब में गलाने की क्रिया की आंच में) नष्ट हो जाती हैं और सोना कायम रहता है अर्थात् उल्टा कुंदन बनता है। इसी प्रकार सत्य और धर्म की रर्क्षा करने वाले पाण्डव कोमल दिखते है पर युद्ध में प्रयाण करते समय वे इन्द्र और रुद्र के समान पराक्रमी हो जाते हैं और तू, तेरे भाई और सेना ये सभी अन्य धातुओं के समान नष्ट होने वाले मान। इसलिए मेरी इस बात को पक्का जान कि युद्ध में तू अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा।

सुयोधनोवाच
कहै कुरुवीर वृष्णिवीर तैं कहो हो तुम,
देव अंश पांडव तैं जीतिबे को लाग ना।
धर्मराज वायु इन्द्र अश्वनीकुमार पांचौं,
होत अवतार तो तो होतो राज त्याग ना।
ह्वै है होनहार राज करिहैं भरतबंशी,
जीव को रु जीविका को मोकौं अनुराग ना।
नर के संघार ह्वै हैं नर के जुरे तैं तोहू,
धर के विभाग ह्वै हैं धर के विभाग ना।।३३।।
दुर्योधन ने प्रत्युतर में कहा कि हे कृष्ण! तुम कहते हो कि देवों के अंश वाले पाण्डवों से जीतना आसान नहीं परन्तु यमराज, वासुदेव, इन्द्र और अश्विनी कुमारों इन पांचों के, पाण्डव (धर्मराज, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव) यदि अवतार होते तो उनका राज्य नहीं छिनता। अब तो जो होना होगा वह होगा। अन्त में जो भरत वंशी बचेंगे वे राज करेंगे। मुझे अपने जीव (प्राणों) का और आजीविका का मोह नहीं। अर्जुन के साथ युद्ध करने में मनुष्यों का संहार हो तो हो, मेरे धड़ के विभाग हो सकते हैं पर धरा (पृथ्वी) के नहीं। (इसके अन्तिम पद में यमकालंकार है-सं.)

जीव जीविका तैं मान प्यारो मोकौं वासुदेव,
जेते देहधारी ते ते काल को अहार है।
भीष्म-कर्ण-द्रोन-मद्रपति-दुसासन,
सबै शत्रु सैन्य को संघार करतार है।
हारिहैं तौ आप तैं न ह्वैहै उपहास मेरो,
याहि तैं न और कुछ चित्त को बिचार है।
यो तौ है जर्यो अहार लोक परलोक ही को,
गदा के प्रहार ही तैं सुख के बिहार है।।३४।।
दुर्योधन आगे कहने लगा कि हे कृष्ण! अपने जीव और आजीविका से भी मुझे मान अधिक प्रिय है। फिर जितने भी जीवधारी हैं वे सभी काल का आहार हैं। भीष्म, कर्ण, द्रोण, अश्वत्थामा, शल्य और दुःशासन ये सभी शत्रुओं की सेना का नाश करने वाले हैं। इसके बावजूद भी यदि मैं तुमसे हार जाता हूं तो भला इसमें उपहास की क्या बात। अब तो युद्ध के अतिरिक्त मेरा कोई विचार नहीं। क्षत्रियों के लिए युद्ध तो इस लोक और परलोक की खुराक है इसलिए गदा के प्रहार में भी सुख का विहार है। अतः मुझे कोई चिन्ता नहीं।

धृतराष्ट्र उवाच
भीम भीम वात है धनंजय धनंजय सो,
गांजिव अखय तून इन्धन को ढारि है।
कर्नादिक जरिहैं उखरिहैं दुसासनादि,
युधिष्ठिर छमा शील महो दबि मारिहै।
जल है नकुल सहदेव व्योममंडल है,
नाव पंथ कौन तोकौं पार जो उतारिहै।
पांच महा तत्व जेसे पांचों भ्रात तेजपुंज,
छठे वासुदेव मेरो मूल छेदि डारिहैं।।३५।।
बीच में धृतराष्ट्र कहने लगे कि हे दुर्योधन! भीमसेन भयंकर पवन के समान है और अर्जुन अग्रि के समान। गांडीव धनुष और अक्षय तूणीर जैसे काठ का ढेर है, इस अग्रि में कर्ण आदि जल जाएंगे और दुःशासन आदि भस्म हो कर निर्वंश हो जाएंगे। इसके अतिरिक्त युधिष्ठिर की क्षमा रूपी पृथ्वी तुझे दबा कर मार देगी। नकुल जल और सहदेव आकाशमंडल रूप हैं फिर तेरी नोका का कौन सा पंथ है जो तुझे पार उतारे? इस प्रकार ये पाँच महातत्व जैसे तेजपुंज पांचों भाई तथा छठे वासुदेव (कृष्ण) मेरी जड़ें काट कर रहेंगे।

श्रीकृष्णोवाच
फेरि जदुराज कुरुराज समुझाबे काज,
कहत समाज बीच हित की सुबानी है।
मेरे कहिबे की सुनि लीजै नीके श्रोन देकै,
पांडुन कौं दैबो भाग नीति की निशानी है।
ना तौ सब छिति हू के छत्रिन को ह्वैहै नाश,
होनहार होनी सो तो जाहर ही जानी है।
एक घरहानी दूजी धन हू की हानी जानि,
महा प्रानहानी ए कहानी की न हानी है।।३६।।
श्री कृष्ण फिर से दुर्योधन को समझाने के लिए हित की वाणी में कहने लगे कि हे दुर्योधन! मेरी कही बातों को अच्छी तरह कान दे कर सुन, पाण्डवों को उनका अधिकार, उनका हिस्सा देना नीति संगत है, नहीं तो पृथ्वी के सारे क्षत्रियों का नाश हो जाएगा। जो होने की है वह हो कर रहेगी यह बात तुम अच्छी तरह जानते हो पर तुम्हारे हठ से एक राज्य कुल की हानि होगी, दूसरी धन हानि होगी और बड़ी हानि प्राणों की है, यह किसी किस्से की हानि नहीं। अर्थात् सर्व रूपेण यथार्थ हानि है।

सभासद भीषम से द्रोण कृपाचार्य जैसे,
भूप धृतराष्ट्र जैसे विदुर निहारिये।
पांतीदार शीतल सुभाव है युधिष्ठिर सो,
पांच ग्राम मांगे तौ सँतोष को बिचारिये।
मो सो है बसीठी समुझाइबै कौं कृष्ण कहै,
चाहत हौं जैसे तैसे भू सँघार टारिये।
एत्ते ही पै मेरो कहो वायु के बधूरे बह्यो,
ह्वैहैं भावी चह्यो ताहि कैसे कै निवारिये।।३७।।
इसके बाद श्री कृष्ण सभासदों को सम्बोधित कर कहने लगे भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र और विदुर जैसे सभासदो! आप देखो, शान्त स्वभाव वाला युधिष्ठिर आप से मात्र पाँच गाँव मांग रहा है, उसके संतोष को विचार देखो। इसके अलावा मेरे जैसा आप सभी का भला चाहने वाला समझावनहार है। जैसे तैसे कर पृथ्वी के इस संहार को टाला जा सके, यही मेरी इच्छा है। इस पर भी यदि मेरा निवेदन (कहा) हवा के बगूले सा ऊपर ही बह कर निकल जाए तो, फिर तो भावी प्रबल है, उसे कौन मिटा सकता है?

कवि कथन
दोहा
केद कर्यो चहै कृष्ण कौं, धर्यो चँडालन घाट।
डर्यो सुयोधन देखि हरि, धर्यो रूप बैराट।।३८।।
कवि कहता है कि श्रीकृष्ण के उपर्युक्त वचन सुन कर भी उन्हें कैद करने की इच्छा से चांडालों ने चाल खेली, यह देख कर श्री कृष्ण ने विराट रूप धारण कर लिया, जिसे देखकर दुर्योधन डर गया। (इसमें शब्दालंकार वृत्यानुप्रास है-सं.)

कह्यो सुयोधन कृष्ण को, गन्यो न आगम मर्न।
कृष्ण चले नृप सीख लै, गो पोंचावन कर्न।।३९।।
स्वयं की साक्षात मौत देख कर भी दुर्योधन ने कृष्ण की बात (सुलह की) को नहीं स्वीकार किया तो राजा (धृतराष्ट्र) की रजा ले कर श्री कृष्ण विदा हुए, जिन्हें पहुँचाने के लिए कर्ण गया।

श्रीकृष्ण कथन
तूं क्षेत्रज गुरु पांडुसुत, होहु द्विरदपुर नाथ।
परे युधिष्ठिर तोर पग, तजहु सुयोधन साथ।।४०।।
तब श्री कृष्ण ने कर्ण से कहा कि तू पांडुराज का बड़ा क्षेत्रज (एक उदर से उत्पन्न हुआ) पुत्र है, इसलिए तू हस्तिनापुर का स्वामी है। यदि तू दुर्योधन का साथ देना छोड़ दे तो युधिष्ठिर तेरे पाँवों में पड़ जाएंगे।

करणोवाच
कहो आप जैसे हि करौं, निर्लोभी सुत धर्म।
तजौं सुयोधन रन समय, कहा बनै इह कर्म।।४१।।
इस पर कर्ण बोला कि हे कृष्ण! आप कह रहे हैं वैसा करूं भी। मैं यह भी जानता हूं कि युधिष्ठिर निर्लोभी है परन्तु अब युद्ध के समय, मैं दुर्योधन को छोड़ दूं यह मुझसे कैसे हो सकता है? अर्थात् असंभव है।

खुल्यो मिल्यो क्षत्रीन कौं, दुलभ स्वर्ग को द्वार।
फिर हरि संधि कपाट दै, मत रोकहु यह बार।।४२।।
फिर क्षत्रियों के लिए जो दुर्लभ है, अब भाग्य से वही स्वर्ग का द्वार खुला हुआ मिला है, इसलिए अब हे कृष्ण! आप सुलह रूपी कपाट जड़ कर इसे बन्द न करें। (इसमें रूपकालंकार है – सं.)

कहि इतनी पीछो फिर्यो, करत सदन नित नेम।
पृथा आइ ताहि समय, दिय आशिष जुत क्षेम।।४३।।
इतना कह कर कर्ण रास्ते से मुड़ कर वापस लौटा और सीधा स्वयं के घर पर पहुँच कर नित्य-नियम का पूजा-पाठ करने लगा। इसी समय कुंती ने वहाँ आ कर आशीर्वाद दिया।

कुन्ती कथन
कुंता जाच्यो कर्न कौं, तूं मम पुत्र प्रधान।
पांच अनुज जुत करहु सुत, राज नागपुर थान।।४४।।
‘तू मेरा पुत्र है’ ऐसा कह कर कुंती ने कर्ण से याचना की, कि हे पुत्र कर्ण! तू अपने पांचों छोटे भाइयों सहित हस्तिनापुर का राज्य वैभव भोगते हुए राजा बन।

करण कथन
मात करन इक छत्र बिन, कियो आज लौं राज।
कीन्हे जज्ञादिक पुनि, ब्याह महोत्सव साज।।४५।।
कर्ण ने कहा कि हे माता! एक छत्र बिना मैंने आज तक राज्य ही किया है और यज्ञ आदि महोत्सव सब तरह के पवित्र कर्म भी किये हैं।

नृपति सुयोधन प्रीति तैं, ताहि तजौं क्यौं आज।
माता गांधारी पिता, धृतराष्ट्र महाराज।।४६।।
यह सभी कुछ मैंने राजा दुर्योधन की स्नेह भरी सहायता से किया है, उसका आज मैं त्याग कैसे करूं। मेरी तो गांधारी माता है और धृतराष्ट्र पिता।

कुन्ती कथन
तजै सुयोधन कौं न तो, पांच पुत्र दे मोहि।
हते न तूं तव वश परै, तिन्ह हित जाचत तोहि।।४७।।
यह सुन कर कुंती ने कहा कि हे कर्ण! यदि तू दुर्योधन को नहीं छोड़ सकता है तो मुझे मेरे पाँच पुत्रों का जीवन दान दे। यदि युद्ध में वे तेरे सम्मुख पड़ जाएं तो तू उन्हें छोड़ देगा, यही मांगती हूं।

करण कथन
हतौं विजय कौं वश परै, तव सुत बनिहौं बहोर।
हते किरीटी करन कौं, तउ रहै पांचहु और।।४८।।
कर्ण ने कहा कि हे माता! यदि अर्जुन मेरे वश में आ गया और मैंने उसे मार दिया तो फिर मैं आपका पाँचवा पुत्र हो जाऊंगा, इस तरह आपके पाँच पुत्र सदा रहेंगे और यदि अर्जुन ने मुझे मार दिया तो भी आपके पाँच पुत्र शेष रह जाएंगे।

श्रीकृष्ण का पांडवों के समीप आना
हथनापुर तैं आयकै, कृष्ण कहत जुत रोष।
तीन बसीठी हो चुकी, अब तुमकौं नहिं दोष।।४९।।
हस्तिनापुर से लौट कर श्री कृष्ण पाण्डवों के पास आये और रोषयुक्त स्वर में कहने लगे कि पाँडवो! तीन बार सुलह के प्रयास और प्रस्ताव हो चुके, अब तुम में कोई दोष नहीं है।

अंधपुत्र मतिअंध नृप, दै नहिं पैड प्रमान।
जुरहिं भीम अर्जुन जबहि, दैहि भूमि अरु प्रान।।५०।।
वह अंधे का पुत्र दुर्योधन स्वयं मति-अंध है, वह एक कदम भर जमीन भी देने को तैयार नहीं है। हां, जब भीमसेन और अर्जुन युद्ध में डटेंगे तब वह जमीन और अपने प्राण अवश्य देगा।

भीमोवाच
कवित्त
कृष्ण को कहाव दुष्ट मान्यो ना सुयोधन ने,
क्षत्रिकुल नाश काज ग्रह के अदिन कौं।
किरीटी को जेठी ऐसे बोलि उठ्यो ठोकि भुजा,
करिहौं गदा तैं सीघ्र अरि के कदन कौं।
बड़े बड़े भूपन के हीय हहराय दैहौं,
माला पहराय दैहौं पंच ही वदन कौं।
महा सिंग आसन पै अग्रज बिठाय दैहौं,
कौरव पठाय दैहौं जम के सदन कौं।।५१।।
क्षत्रिय कुल का नाश होने के कुदिन को टालने हेतु श्री कृष्ण का कहना दुर्योधन ने माना नहीं, यह जानकर अर्जुन का बड़ा भाई भीमसेन अपनी भुजा ठोकते हुए कहने लगा कि मैं अपनी गदा से शीघ्र ही शत्रुओं का नाश कर डालूंगा। बड़े-बड़े वीर राजाओं के दिलों को दहला दूंगा और रुद्र के गले में मुंडमाल पहना दूंगा। मैं सर्वोच आसन अर्थात् राज्यसिंहासन पर धर्मराज को आसीन कर दूंगा। और कौरवों को यमराज के घर भेज दूंगा।

पांडवों के पास दूत का भेजना
दोहा
इतनै चौथे दूत करि, मातुल पुत्र सिखाय।
पठय सुयोधन धर्म प्रति, कहि कटु घूक सुनाय।।५२।।
तूं तपसी मांजार गति, कुल-कुठार मति नीच।
अन्तर्कपटी धर्मसुत, बन्यो साधु जग बीच।।५३।।
इस बीच दुर्योधन ने दूत भेजने का निश्चय कर शकुनि के पुत्र (उलूक) को युधिष्ठिर के पास भेजा। यह चौथा अवसर था दोनों ओर से दूत भेजने का। दूत धर्मराज के पास आ कर कड़वे वचन बोल कर कहने लगा कि हे धर्मराज! दुर्योधन ने कहलवाया है कि आप बिल्ली की तरह के तपस्वी हैं, नीच बुद्धिवाले अपने कुल के लिए कुल्हाड़ा हैं और मन के कपटी हैं। आप सिर्फ जग में साधू जैसे दिखने का ढोंग करते हैं, हैं नहीं।

जो नाच्यो बैराट बिच, वेणी शीष गुंथाय।
सो अर्जुन कर्नादि कौं, बोलत भीत बताय।।५४।।
दुर्योधन के शिर सदधि, बँधी भूमि इह बेर।
डर दिखाय कोउ खोसि लै, ऐसो कहा अँधेर।।५५।।
फिर जो अर्जुन स्त्री की तरह चोटी गुंथवा कर विराटनगर में नाचता रहा वह आज बड़े बोल बोल कर कर्ण जैसे वीरों को भय बताने की चेष्टा कर रहा है। पर इस बार पृथ्वी समुद्र सहित दुर्योधन के सिर-से बंधी है, उसे कोई भय बता कर खोस ले, ऐसा अंधेर नहीं है।

प्रत्युत्तर
सवैया
नित प्यास दुसासन श्रोणित की चित भीम को यों अकुलावत है।
छिन जाम लौ बीतत जाम जे द्यौष लौं द्योष ते मास लौं जावत है।
फिर मातुलपूत उलूक कौं मेलिकै क्यों कटु वाद सुनावत है।
नृप तेरि अनीति को नाक लौं नीर बढ्यो अब स्वास न आवत है।।५६।।
दूत उलूक की सारी बातें सुनकर प्रत्युत्तर में युधिष्ठिर ने वापस कहला भेजा कि हे दूत! तू जा कर अपने दुर्योधन से कहना कि दुःशासन के रक्त की प्यास भीमसेन के चित्त को प्रतिदिन अकुलाती है। वह भी इस प्रकार कि एक क्षण बीतता है तो उसे प्रहर जितना लगता है। प्रहर, दिन जितना, दिन, महिने जितना महसूस होता है। फिर तू अपने मामा के पुत्र उलूक को यहाँ भेज कर कडुवे वचन क्यों सुनवाता है? तेरी अनीति का पानी बढते-बढते अब हमारे नाक तक आ गया है जिससे हमारा श्वास लेना भी कठिन है।

दोहा
पुत्रहीन ह्वैहैं पिता, मात अंध मम शोक।
मरतो मारे अवध कौं, आवहि शीष अलोक।।५७।।
मुझे इस बात की चिन्ता है कि मेरे अंधे माता-पिता बिना पुत्र के हो जाएंगे। वह दुष्ट स्वयं तो मरेगा ही पर अपने साथ उन स्नेही अग्रजनों को भी मरवायेगा और यह अपयश मेरे सिर आएगा।

अर्जुनोवाच
नचि छोरे बैराट में, करनादिक के प्रान।
गांजिव जुत नचि रीझ मैं, अब हरि लैहौं निदान।।५८।।
अर्जुन ने कहलवाया कि हे दूत! दुर्योधन से जा कर कहना कि मैंने विराटनगर में नाच कर तो कर्ण आदि के प्राण छोड़ दिये थे पर इस बार गांडीव धनुष सहित नाच कर, उसके इनाम में निश्चय ही उसके प्राण ही लूंगा।

कवि कथन
इतै सात ग्यारह उतैं, मिलि अक्षोहणि आन।
कुरुक्षेत्र डेरा किया, लखि निर्दूषण थान।।५९।।
इधर पाण्डवों की सात अक्षौहिणी और उधर कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना आ जुटी और कुरुक्षेत्र को उपयुक्त स्थान जान कर वहाँ मुकाम किया।

रथी
रथी रथी तैं युद्ध करि, राखै परिकर सोय।
वृद्ध जोई बल पुरन तैं, ताही की जय होय।।६०।।
रथी के सम्मुख युद्ध कर जो रथी स्वयं के परिवार (पाद रक्षकों) को बचा ले और युद्ध में अपने बल को उत्तरोतर वृद्धि की ओर बढ़ाए, उसकी विजय होती है और ऐसा योद्धा रथी कहलाता है।

महारथी
एक लरै दश सहस तैं, राखि लेत रथ साज।
सारथि हय उपसारथी, चक्र रक्ष निज काज।।६१।।
जो अकेला दस हजार से लड़े और अपने रथ, सारथी, घोड़े, उपसारथी, रथ के पहिये और स्वयं को बचा ले, उसे महारथी- जानों।

अतिरथी
राखि लेत निज रथहि कौं, करि अगणित तैं युद्ध।
कहत ताहिकौं, अतिरथी, जे हैं बुद्धि विशुद्ध।।६२।।
असंख्य योद्धाओं से युद्ध करते हुए स्वयं के रथ आदि सभी उपकरणों को बचा ले, उसे विशुद्ध बुद्धि वाले विद्वानों ने अतिरथी कहा है।

पांडवों के वीरों की गणना
सोरठा (डिंगल भाषा)
लाखांइ लशकर लार, धर्मपुत्र जिसड़ो धणी।
भारतवाळो भार, भीमा अर्जुन रै भुजां।।६३।।
जिसके पीछे लाखों की संख्या में लश्कर (सेना) है और धर्मराज जैसा स्वामी हैं पर महायुद्ध का पूरा भार तो भीमसेन और अर्जुन की भुजाओं पर टिका है।

है महारथी हजार, जुजुधान शिखंडी जिसा।
भारतवाळो भार, भीमा अर्जुन रै भुजां।।६४।।
युयुधान (सात्यकि) और शिखंडी जैसे हजारों महारथी हैं पर युद्ध का पूरा दारमदार तो भीम और अर्जुन की भुजाओं पर टिका है।

धृष्टद्युम्न धनुधार, श्रुतिकीर्ति श्रुतिवरम सा।
भारत वाळो भार, भीमा अरजुन रै भुजां।।६५।।
उत्तर कुँवर उदार, द्रोपद नकुल विराट द्रढ।
भारतवाळो भार, भीमा अरजुन रै भुजां।।६६।।
धनुष धारण करने वाले धृष्टद्युम्न, श्रुतिवर्मा और श्रुतिकीर्ति जैसे योद्धा उपस्थित हैं पर युद्ध का भार तो भीमसेन और अर्जुन की भुजाओं पर ही टिका है।
वैसे तो उत्तर कुमार, द्रुपदराज, नकुल और विराटराज जैसे अडिग योद्धा विद्यमान है पर युद्ध का पूरा भार तो भीमसेन और अर्जुन की भुजाओं पर ही टिका है।

परगह असुर अपार, कँवरां मुगट घटोतकच।
भारतवाळो भार, भीमा अरजुन रै भुजां।।६७।।
अभिमन तेज अपार, सुभद्रानंदन विजयसुत।
भारतवाळो भार, भीमा अरजुन रै भुजां।।६८।।
राजकुमारों का शिरोमणि घटोत्कच भी सेना में अपना मोर्चा लिये हुए है पर युद्ध का सारा भार तो भीमसेन और अर्जुन की भुजाओं पर है।
सेना में उपस्थित सुभद्रा और अर्जुन का पुत्र अभिमन्यू अपार पराक्रमी गिना जाता है पर युद्ध का सारा दारोमदार तो भीम और अर्जुन पर टिका है।

श्रुतीसोम हुँशियार, प्रतिबिंध सहदेव सु प्रगट।
भारतवाळो भार, भीमा अरजुन रै भुजां।।६९।।
सतानीक ग्रहसार, धृष्टकेतु विकितान धृत।
भारतवाळो भार, भीमा अरजुन रै भुजां।।७०।।
पाण्डवों की ओर कुशल योद्धा श्रुतिसोम, सहदेव और विख्यात वीर प्रतिबिंध भी दिखाई दे रहे हैं पर युद्ध का सारा भार तो भीमसेन और अर्जुन की भुजाओं पर टिका है।
वज्रास्त्र धारी विराटराज का भाई शतानीक, शिशुपाल का पुत्र धृष्टकेतु और चेकितान जैसे रणधीर पाण्डवों के साथ हैं पर युद्ध का भार तो भीमसेन और अर्जुन की भुजाओं पर टिका है।

जुद्ध सहदेव जुझार, जरासंधसुत जोमरद।
भारतवाळो भार, भीमा अरजुन रै भुजां।।७१।।
केकय नृपति कुमार, कुंतीभोज पुरुजित कहर।
भारतवाळो भार, भीमा अर्जुन रै भुजां।।७२।।
जरासंध का पुत्र जवांमर्द सहदेव कि जो रण में जूझने वाला है और वीरता से भरा पूरा योद्धा है पर पूरे युद्ध का भार तो भीमसेन और अर्जुन की भुजाओं पर टिका है।
केकयराज के राजकुमार पुरुजीत और कुंतीभोज जैसे विकट योद्धा पाण्डवों की सेना में शामिल हैं पर युद्ध का सारा भार तो भीम और अर्जुन की भुजाओं पर है।

कौरवों के वीरों की गणना
सल्य भूरिश्रव सार, दुरजोधन सळ सोमदत।
भारतवाळो भार, करण द्रोण भीषम करां।।७३।।
कृपाचार्य युधकार, जैद्रथ भट द्रोणी जिसा।
भारतवाळो भार, करण द्रोण भीषम करां।।७४।।
कौरवों के पक्ष में शल्य, भूरिश्रवा, दुर्योधन, शल और सोमदत्त आदि सारे के सारे कुशल योद्धा हैं पर युद्ध का गुरुत्तर भार तो कर्ण, द्रोण और भीष्म की भुजाओं पर टिका है।
कौरवों की ओर कृपाचार्य, जयद्रथ, अश्वत्थामा जैसे धुरंधर योद्धा हैं पर युद्ध का सारा दारोमदार तो कर्ण, द्रोण और भीष्म पर है।

नृप बाल्हिक निरधार, कृतवर्मा भगदत्त विकट।
भारतवाळो भार, करण द्रोण भीषम करां।।७५।।
अलमासुर आधार, दुःसासन विकरण दुसह।
भारतवाळो भार, करण द्रोण भीषम करां।।७६।।
बाल्हिक राज, कृतवर्मा, और भगदत्त ये तीनों भयंकर योद्धा कौरवों के पक्ष में लड़ने को सन्नद्ध हैं पर युद्ध का गुरुत्तर, भार तो द्रोण, कर्ण और भीष्म की भुजाओं पर है।
अलमासुर, दुःशासन और विकर्ण जैसे रणबांकुरे कौरव सेना के आधार स्तंभ हैं पर युद्ध का सारा भार तो भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण की भुजाओं पर टिका है।

अलायुधी इक तार, व्रषकेतू कांबोज विंद।
भारतवाळो भार, करण द्रोण भीषम करां।।७७।।
कृत दुर्मुख जयकार, चित्रसेन अनुविंद विचित्र।
भारतवाळो भार, करण द्रोण भीषम करां।।७८।।
कौरवों के पक्ष में अलायुध, वृषकेतु, कांबोजराज विंद ये सारे लगातार युद्ध करने में सक्षम योद्धा हैं। इनके अतिरिक्त दुर्मुख चित्रसेन, और अनुविंद जैसे युद्ध में अपनी जयकार करवाने वाले वीर हैं पर युद्ध का भार तो कर्ण, द्रोण और भीष्म के हाथों पर है।

सुदक्षण ग्रहियां सार, चित्रकेत जसड़ा अचळ।
भारतवाळो भार, करण द्रोण भीषम करां।।७९।।
कौरवों की सेना में तलवार धारण करने वाले (कांबोजराज के पुत्र) सुदक्षण और चित्रकेतु जैसे अडिग योद्धा उपस्थित हैं पर युद्ध का भार द्रोण, कर्ण और भीष्म की भुजाओं पर है।

सकुनी जुध साधार, सूशर्मा सरखा सुभट।
भारतवाळो भार, करण द्रोण भीषम करां।।८०।।
युद्ध के आधार रूप शकुनि और सुशर्मा जैसे वीर भी साथ हैं पर कौरवों की ओर से युद्ध करने का गुरुत्तर भार तो भीष्म, द्रोणचार्य और कर्ण की भुजाओं पर टिका है।

दुर्धर चित्त उदार, कुळ भूषण लछमण कँवर।
भारतवाळो भार, करण द्रोण भीषम करां।।८१।।
जे बांकाह जुझार, सलसुत दुःसासन सुवन।
भारतवाळो भार, करण द्रोण भीषम करां।।८२।।
कौरवों की सेना में उदार चित्त वाला पर प्रबल योद्धा, अपने कुल का भूषण लक्ष्मण कुमार भी है पर युद्ध का भार तो कर्ण, भीष्म और द्रोण की भुजाओं पर टिका है।
शल्य पुत्र और दुःशासन का बेटा ये दोनों रणबांकुरे और मरने से नहीं डरने वाले योद्धा कौरवों के सेंन्य दल में शामिल हैं पर युद्ध का असली भार तो भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण की भुजाओं पर है।

धख कुरु पांडव धार, आह्मा साह्मा उळझिया।
भिड़ सेना दुइ भार, भीष्म द्रोण अरजुन भुजां।।८३।।
क्रोध युक्त हो कर कौरव और पांडव परस्पर लड़ने लगे। दोनों सेनाओं के युद्ध नेतृत्व (सेनापतित्व) का जिम्मा भीष्म, द्रोणाचार्य और अर्जुन की भुजाओं पर आया।

कुछ सूचनाओं हेतु टिप्पणियां –

पांडव सेना की छावनी

महर्षियों के आश्रम, तीर्थ, देवमन्दिर तथा शमशान को छोड़ कर, खूब घास और कष्टों से भरापूरा, बहुत मनोहर रसकस वाला, पवित्र एवं पुण्य प्रदेश (कर्मभूमि) में महागतिवान राजा युधिष्ठिर ने स्वयं का पड़ाव किया। वहाँ भी कृष्ण ने सुन्दर बहती पवित्र हिरण्यवती नदी के समीप स्वयं की रक्षा के लिए एक खाई खुदवा दी यही नहीं रक्षार्थ और चौकसी के लिए आज्ञा दे कर एक सैन्य चौकी की स्थापना की? श्री कृष्य ने पाण्डवों की छावनियां अपनी देखरेख में बनवाई? इसी प्रकार दूसरे मित्र राजाओं के लिए भी कई छावनियां तैयार करवाई। ये छावनियां रसद सामग्री से भरी पूरी थी प्रत्येक छावनी में बड़े यंत्र, धनुष की डोरियां कवच, शस्त्र, तूणीर, फरसे, ऋष्टियां, मद, घी, जल, घास, अग्नि और लाख का ढेर लगा था
(अधिक विवरण के लिए देखें महाभारत, उद्योगपर्व अध्याय १५२)

कौरव सेना की तैयारी

दुर्योधन ने अपनी ग्यारह अक्षौहिणी सेना को युद्ध के नियमानुसार अलग- अलग बाँट दी। मनुष्यों, हाथियों, रथों और घोड़ों में से उत्तम-मध्यम छांट कर अलग-अलग सेनाओं के भाग में तैनात करने की आज्ञा दी। तूणीर, उपसंग, विखंग, शक्ति (सांग), ऋष्टि, सरासन, तोमर, पाथ आदि एवं अन्य प्रकार के आयुधों सहित एक-एक रथ के पीछे, दस-दस हाथी, एक-एक हाथी के पीछे दस-दस घोड़े और एक घोड़े के पीछ दस पैदल सैनिक लगा कर, अलग-अलग टुकड़ियाँ बनाई।

अक्षौहिणी नाम तथा संख्या

पांच सौ रथ और पाँच सो हाथियों की एक सेना बनती है। दस सेनाओं से एक पृतना बनती है और दस पृतना की एक वाहिनी गिनी जाती है। सेना, वाहिनी, पृतना, ध्वजनी, चमू तथा वरूथिनी ये सारे (अलग-अलग संख्याओं के आधार पर) अक्षौहिणी के ही नाम हैं।

दो सौ पचास सैनिकों को एक पत्ति कहते है, तीन पत्तियों का एक सेनामुख अथवा गुल्म कहलाता है और तीन गुल्मों का एक गण कहलाता है? दुर्योधन की सेना में कई गण युद्ध करने की इच्छा से शामिल हुए थे।

दुर्योधन के सेनापति

(१) कृपाचार्य (२) द्रोणाचार्य (३) शल्य (४) जयद्रथ (६) सुदक्षिण (६) कृतवर्मा (७) अश्वत्थामा (८) कर्ण (९) भूरिश्रवा (१०) शकुनि (११) बाल्हिक राजा। इन सभी के मुख्य सेनापति भीष्म थे (अधिक विवरण के लिए देखें – महाभारत, उद्योग पर्व अध्याय- १५५)

सेना ले कर सहायता को आए अक्षौहिणी के स्वामी

पाण्डवों की ओर कौरवो की तरफ
सात्यकि (युयुधान) भगदत्त
चेदी राज भूरिश्रवा
धृष्टकेतु (चेदी राज का पुत्र) शल्य
जयत्सेन (जरासंध का पुत्र) कृतवर्मा
द्रुपदराज सुदक्षिण (कांबोज राज)
विराज राज नीलराज (महिष्मती का राजा)
पांड्य राज विंद (अवंति के राजा)
अनुविंद (अवंति के राजा)
केकय कुमार

(उद्योग पर्व, अध्याय १९)

।।इति नवम मयूख।।

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