पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – स्वामी स्वरुपदास

| कड़ी – १७८  | षोड़श मयूख | अंतिम पर्व
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित।
| व्याख्या: डा. चन्द्र प्रकाश देवल


।।षोड़श मयूख।।

अंतिम पर्व

वैशंपायन उवाच
दोहा
धृतराष्टर आदेश, धर्मपुत्र शिर पर धर्यो।
यथा सुयोधन लेश, कबहुँ न अंगीकृत कर्यो।।१।।
वैशंपायन मुनि आगे कहने लगे कि हे राजा जन्मेजय! धृतराष्ट की एक-एक आज्ञा को जिस प्रकार राजा युधिष्ठिर ने शिरोधार्य किया, उसी प्रकार दुर्योधन ने उनकी एक भी आज्ञा को नहीं माना था।

दोहा
स्नान दान गज गाय महि, भेजन सयन सुभाय।
प्रथम करै धृतराष्ट्र जब, पीछे नृपति सदाय।।२।।
श्रेष्ठ भाव से स्नान कर, हाथी, गायें एवं पृथ्वी का दान कर, भोजन और शयन आदि नित्य कार्य पहले धृतराष्ट्र करते उसके बाद धर्मराज युधिष्ठिर अपना नित्य कर्म निबटाते।

जो पदार्थ होवै निजर, करि धृतराष्ट्र विभाग।
विदुर युयुत्सु आदि दै, सबकौं देत सभाग।।३।।
राजा के समक्ष जिन-जिन पदार्थो का नजराना होता। उन सारी चीजों को महाराज धृतराष्ट्र पहले हिस्सा कर विदुर और युयुत्सु को देते उसके बाद शेष रही चीजों को दूसरे सभी लोगों में बँटवा देते।

कैद जुधिष्ठिर को कियो, दे धृतराष्ट्र सु छोर।
कैद कियो धृतराष्ट्र को, छोरि सकै न और।।४।।
राजा युधिष्टिर का कैद किया हुआ व्यक्ति तो धृतराष्ट्र की आज्ञा से छूट जाता था पर धृतराष्ट्र का कैद किया हुआ (द्वारा सजा दिया हुआ व्यक्ति) किसी और के आदेश से नहीं छोड़ा जा सकता था।

युधिष्ठिर उवाच
समरन पूर्व विरोध करि, करै पिता तैं द्वेष।
सो मेरा अति शत्रु है, वल्लभ जदपि विशेष।।५।।
एक दिन राजा युधिष्ठिर ने राज दरबार में यह घोषणा की, कि पुराने विरोध को याद कर, जो कोई मेरे पिता (महाराज धृतराष्ट्र) से ईर्ष्या करेगा। वह मेरा कितना ही प्रिय क्यों न हो मेरे लिए वह शत्रुवत हो जाएगा।

वैशंपायन उवाच
भयो परीक्षित को जनम, सब कुल कौं सुखदान।
दै कोटिन धन द्विजन कौं, कर्यो भूप सनमान।।६।।
वैशंपायन मुनि कहने लगे कि हे जन्मेजय! तब पूरे कुल को सुख देने वाले परीक्षित का जन्म हुआ। इस अवसर पर राजा ने ब्राह्मणों को करोड़ों मुद्राओं का दान दे कर, उनका सम्मान किया।

कीनी विदुर प्रधानता, नृपति पांडु की बेर।
सोइ युयुत्सु ने करी, कृपा युधिष्ठिर हेर।।७।।
जिस प्रकार पांडु राजा के समय में विदुर ने प्रधान का (महाआमात्य का) कार्य किया था, उसी प्रकार युयुत्सु को राजा युधिष्ठिर ने अपना प्रधान नियुक्त किया।

~~क्रमशः


****पूर्व में पब्लिश हो चुकी समस्त कड़ियाँ आप यहाँ देख सकते हैं****

अनुक्रमणिका

नाम विषय* (निम्नलिखित शीर्षक पर क्लिक करें)
प्रथम मयूख मंगलाचरण, अष्टादश पर्व सूची
द्वितीय मयूख छंद प्रकरण
तृतीय मयूख अलंकार तथा रस प्रकरण
चतुर्थ मयूख आदि पर्व
पंचम मयूख सभा पर्व
षष्टम मयूख वन पर्व
सप्तम मयूख विराट पर्व
अष्टम मयूख उद्योग पर्व (पूर्वार्ध)
नवम मयूख उद्योग पर्व (उत्तरार्ध)
दशम मयूख भीष्म पर्व
एकादश मयूख द्रोणपर्व (पूर्वार्द्ध)
द्वादश मयूख द्रोणपर्व (उत्तरार्ध)
त्रयोदश मयूख कर्ण पर्व (पूर्वार्ध)
चतुर्दश मयूख कर्ण पर्व (उत्तरार्ध)
पंचदश मयूख शल्य पर्व
शोड़स मयूख अन्तिम पर्वक्रमशः. . .

2 comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *