पुस्तक-प्रेम, पुस्तकालय-संस्कृति एवं पठनीयता के समक्ष चुनौतियां

विगत दिनों किसी मित्र ने बताया कि उसका पुत्र अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय एवं महाविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करके अभी अमेरिका में “व्यक्तित्व-विकास” की कक्षाएं लगाता है, जिनमें हजारों विद्यार्थी आते हैं। वहां बौद्धिक के साथ-साथ शारीरिक विकास हेतु सूक्ष्म-योगा भी करवाया जाता है। कक्षा प्रारंभ होने के समय एक युवती, जो कोई पुस्तक पढ़ रही थी, योग हेतु लगाई गई चटाई पर आने से पहले उसने अपने जूते उतारे तथा उस पुस्तक को अपने जूतों पर ही उलटा रख दिया ताकी वापस आने पर वहीं से पुनः पढ़ना प्रारंभ कर दे। कक्षा में सभी विद्यार्थी अमेरिकी थे, बस योग-शिक्षक भारतीय था। जैसे ही उस भारतीय की दृष्टि जूतों पर रखी पुस्तक पर पड़ी तो वो दौड़ कर गया और पुस्तक को उठाया। उसे सीस झुका कर प्रणाम किया तथा ससम्मान मेज पर रखा। जैसे ही विद्यार्थियों से मुखातिब हुआ तो उस लड़की ने आश्चर्य से पूछा “सर! यह क्या कर रहे हैं आप? कमोबेस पूरी कक्षा के मन में भी यही सवाल था। भारतीय शिक्षक ने समझाते हुए कहा कि हम भारतीय, उस हर वस्तु के प्रति श्रद्धा रखते हैं, जिससे हमें कुछ सीखने को मिलता है और पुस्तकें तो इस दृष्टि से सर्वाधिक श्रद्धा की पात्र हैं। यह घटना एक साथ कई सारे आयाम खोलती है, जिनमें से एक महत्त्वपूर्ण आयाम यह है कि ग्रंथों के प्रति श्रद्धा हमारा सहज संस्कार है। भारत के प्रत्येक गृहस्थ के घर में पुस्तक रहती ही है, भले ही वह उसके पूजा घर में रखी धार्मिक पुस्तक हो या फिर अतिथि-कक्ष या अध्ययन-कक्ष में रखी अन्य पुस्तकें।

ज्ञाननिधि होने के कारण पुस्तकों को हमारे यहां गुणज्ञ-गुरु, महनीय-मित्र एवं परम स्नेहिल परिजन सरिस श्रद्धा, स्नेह एवं सम्मान की सच्ची अधिकारिणी माना गया है। सामान्य लोक व्यवहार में भी “सौ झकी अर एक लिखी” अर्थात सौ बार मौखिक कहने की बजाय एक बार का लिखित बयान अधिक प्रभावी माना गया है। रचनाकार अपने वैयक्तिक अनुभव को अपनी संवेदना एवं संचेतना के बल पर व्यष्टिपरक से समष्टिपरक करते हुए सद्साहित्य सृजित करता है। वह साहित्य पुस्तक के रूप में ज्ञान का स्थाई भंडार बनकर भावी पीढ़ियों के लिए रवायत बनता है। अनुभूत-ज्ञान का अद्यतन उपलब्ध संग्रह होने के साथ ही पुस्तकें ज्ञान की प्रामाणिक निधियां मानी जाती हैं। इसी लिए लोक में यह कहावत प्रसिद्ध है कि “या तो लिखने योग्य जीओ या जीने योग्य लिखो” अर्थात व्यक्ति को ऐसा जीवन जीना चाहिए कि वो दूसरों के लिए मिसाल बन जाए या ऐसा साहित्य सृजित करो, जिसे पढकर पाठक जीवन जीने की कला सीख सके। रामचरणानुरागी महाकवि तुलसीदास, कृष्ण लीला के ललित रचयिता प्रज्ञाचक्षु कवि सूरदास, निर्गुण निराकार के गुणगायक फक्कड़ संत कबीर, कृष्ण-दीवानी भक्तिमती मीरां, रसों की खान कवि रसखान एवं ऐसे ही असंख्य संतों, भक्तों एवं कवियों को युगों बाद भी संसार जानता, मानता एवं सम्मान देता है तो उनकी जाति, पंथ या क्षेत्र के कारण नहीं वरन उनके द्वारा सृजित साहित्य के कारण देता है। इसी तरह बप्पा रावल, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज, दानी दधिची, गुरु गोविंदसिंह, महारानी लक्ष्मीबाई जैसी अनेक विभूतियों को उनके सुकर्मों की सुवास के कारण आज भी लोग बड़ी श्रद्धा के साथ याद करते हैं, तो वो उनके लिखने योग्य यशस्वी जीवन के कारण ही है। राजस्थानी डिंगल कवि “जेहिया” घोषणा करता है कि ये दुर्ग, कीले, देवल, जो अपने स्वामियों की शानोशौकत एवं रुआब के प्रतीक है, सब एक निश्चित समय के बाद ढह कर खाख में मिल जाएंगे। ये वृक्ष जो आज धरती का शृंगार एवं जीवन का आधार बने हुए हैं, एक दिन इंधन बन कर जलाने के काम आएंगे और भस्म हो जाएंगे। लेकिन “सुयश के अक्षर” युग-युगान्तर तक अमिट रहेंगे-

कोट खिसै देवल डिगै, वृख इंधण हो जाय।
जस रा आखर जेहिया, जातां जुगां न जाय।।

इन “सुयश के अक्षरों” का सुखसदन “पुस्तक” ही है। यद्यपि वाचिक साहित्य परंपरा भी अपने आपमें बहुत वृहद संप्रत्यय है, उसकी अपनी विलक्षणता उल्लेखनीय है लेकिन उसकी अपनी सीमाएं भी है अतः वाचिक काव्य को भी यदि पुस्तक रूप में सहेजा जाए, तो वह अधिक समय तक संरक्षित रह सकता है। संस्कृत के मनीषियों ने तो “काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्” कहकर समझदार व्यक्तियों के जीवन में पुस्तक को अहम अंग माना है। डिंगल कवि चाळकदान रतनू तो यहां तक घोषणा करते हैं कि यदि इस सृष्टि में रचनाकार नहीं होते और ग्रंथों का प्रणयन नहीं करते तो भक्ति, दान एवं वीरता की कीर्ति ही नहीं बच पाती-

सुकवि न होते सृष्टि में, रचते ग्रंथ न रीति।
भक्ति दान अरु सूर की, कैसे रहती क्रीति।।

भारतीय जीवन पद्धति में स्वाध्याय को जीवन का अहम अंग माना गया है। वृहद मात्रा में उपलब्ध प्राचीन पांडुलिपियां इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि हमारे यहां के लोगों का साहित्य-प्रेम अद्भुत था। संसाधनों की अत्यंत अल्पता एवं संचार माध्यमों की न्यूनता के बावजूद इतनी पांडुलिपियों, सुखद आश्चर्य का विषय है। कतिपय धार्मिक आध्यात्मिक ग्रंथ तो ऐसे पाठक-चहेते रहे हैं कि उनकी सैंकड़ों हस्तलिखित पांडुलिपियां मिली हैं। भगवान विष्णु के चैबीस अवतारों का आज तक उपलब्ध सबसे बड़ा ग्रंथ “अवतार-चरित्र” है, जिसके रचयिता कविश्रेष्ठ नरहरिदास बारहठ राजस्थान के नागौर जिले के छोटे से ग्राम “टेहला” के निवासी थे। यह तब की बात है जब प्रेस-मीडिया कुछ नहीं था, छापाखाना नहीं था। उसके बावजूद इस ग्रंथ की प्रसिद्धि इतनी फैली कि उस समय में भारतवर्ष के अलग-अलग स्थानों पर श्रद्धावान लिपिकारों द्वारा अवतार चरित्र की 100 हस्तलिखित पांडुलिपियां तैयार की गई। सन 2016 में यह ग्रंथ मनीषी विद्वान भंवरदान रतनू “मधुकर” खेड़ी द्वारा संपादित कर साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से दो खंडों में प्रकाशित करवाया गया है, जिसमें बड़े आकार के लगभग 1500 पृष्ठ हैं। इतने बड़े ग्रंथ की 100 से अधिक हस्तलिखित पांडुलिपियां हमारे बुजुर्गों की साहित्य के प्रति दीवानगी को दर्शाती है। आज अकेले राजस्थान में विविध विषयी साहित्य की जितनी हस्तलिखित पांडुलिपियां मिलती हैं, उतनी देश के किसी अन्य प्रदेश में नहीं मिलतीं। एक मोटे अनुमान के आधार पर राजस्थान में जैन एवं जैनेतर शास्त्र-संग्रहालयों में पाँच लाख से अधिक पांडुलिपियां हैं, जिनके केंद्र हैं- जैसलमेर, जयपुर, बीकानेर, जोधपुर, उदयपुर, अजमेर, भरतपुर, बूंदी के ग्रंथागार, जिनमें पांडुलिपियों के रूप में साक्षात सरस्वती एवं जिनवाणी के दर्शन होते हैं। (राजस्थान के जैन ग्रंथ संग्रहालय-डाॅ. कस्तूरचंद कासलीवाल, राजस्थान का जैन साहित्य-अगरचंद नाहटा, पृष्ठ 373)

एक समय था जब हर नागर के घर में अपनी पसंद की चीजों का संग्रह हुआ करता था। संस्कृत, पालि, प्राकृत एवं अपभ्रंश के साहित्य का अध्ययन करते समय ऐसे उल्लेख मिलते हैं। संस्कृत के प्रसिद्ध नाटक मृच्छकटिकम के नायक चारुदत्त के घर में रात्रि के समय शर्विलक नामक चोर घुसा था। चोर ने बड़े आश्चर्य से देखा कि उस रसिक चारुदत्त के घर में कहीं मृदंग, कहीं दर्दुर, कहीं पणव, कहीं वीणा, कहीं वंशी और कहीं पुस्तकें पड़ी हुईं थीं। संस्कृत काव्य का यह उदाहरण भारतीयों के पुस्तक प्रेम का जीवंत उदाहरण है। निजी संग्रहालयों के साथ-साथ सार्वजनिक एवं राजकीय संग्रहालय एवं पुस्तकालय भी हमारे जीवन का हिस्सा रहे हैं।

इतिहास की आँख से देखें तो राजतंत्र के दौर मेें हमारे अनेक राजा-महाराजा स्वयं साहित्य, कला एवं संगीत के शौकीन ही नहीं पारंगत कलावंत हुआ करते थे। तब आज की तरह साहित्य में राजनीति नहीं हुआ करती थी वरन राजनीति में साहित्य हुआ करता था। स्वातंत्र्योत्तर भारत में भी राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर एवं देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के समय की एक घटना इस तथ्य को पुष्ट करती है। घटना का सार-संक्षेप यह है कि किसी मंच पर जाने हेतु सीढियां चढ़ते समय पं. नेहरू किसी कारणवश कुछ लड़खड़ा गए। पीछे-पीछे सीढ़िया चढ़ रहे कवि दिनकर ने उन्हें सहारा दिया और वे संभल गए। मंच पर पहुंचने के बाद पं. नेहरू ने कृतज्ञता जाहिर करते हुए कहा कि “दिनकरजी! आज तो आपने संभाल लिया वरना मैं गिर जाता”। कवि दिनकर अदभुत काव्य प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व थे, उन्होंने पं. नेहरू के कृतज्ञ भाव को स्वीकार करते हुए बड़ी विनम्रता से कहा “माननीय प्रधानमंत्रीजी! राजनीति जब-जब लड़खड़ाएगी, साहित्य ही उसे सहारा देकर गिरने से बचाएगा”। दिनकरजी का यह कथन सामान्य व्यक्ति एवं साहित्यकार के बीच का अंतर स्पष्ट करता है। अन्य कोई नेता होता तो वो व्यष्टिपरक ही बात करता तथा स्वयं तक सिमित रह जाता लेकिन साहित्यकार की दिव्यदृष्टि उसे व्यष्टि से समष्टिपरक होने का आदेश देती है। यही कारण रहा कि दिनकर ने पं. नेहरू को “राजनीति” एवं स्वयं को “साहित्य” की संज्ञाओं से अभिहित किया और इस संज्ञा के प्रयोग का ही परिणाम है कि यह घटना दशकों बाद भी हमारे स्मरण में है। अन्यथा कितने लोग होंगे जो लड़खड़ाते हुए नेताओं को संभालते ही नहीं कंधे पर बिठा कर ले जाते हैं, उनकी जय-जयकार करते हैं लेकिन कोई उनका नाम लेने वाला नहीं दिखता। खैर!

यदि पुस्तकालयों के इतिहास की बात करें तो न केवल भारत वरन अन्य देशों में भी प्राचीन काल में पुस्तकालय प्रायः विशाल मंदिरों और राजप्रासादों के साथ संबद्ध थे। ज्ञात सूत्रों के अनुसार मिश्र में सबसे पहला पुस्तकालय राजा ओसीमंडिया ने स्थापित किया था। उसने पवित्र पुस्तकों का एक विशाल संग्रह स्थापित किया था। राजा ओसीमंडिया ने पुस्तकालय के प्रवेशद्वार पर “आत्मा के लिए औषधि” शीर्षक पट्ट लगवाया था। प्राचीन असीरिया राज्य की राजधानी निनिमि नगर में असुरवाणीपाल राजा का पुस्तकालय अत्यंत प्रसिद्ध था। इस पुस्तकालय में ग्रंथों की संख्या 20,000 थीं और यह राजा के निजी प्रासाद में स्थित था। राजा असुरवाणीपाल बड़े साहित्यप्रेमी थे और इस पुस्तकालय की स्थापना में उन्होंने बड़ा योग दिया था। प्राचीन ग्रीस राज्य में पिसिष्ट्राटसन ने सर्वप्रथम एक पुस्तकालय की स्थापना की थी। इसके पश्चात अलेस गैलिस एवं महान दार्शनिक प्लेटो ने भी पुस्तकों के संग्रह स्थापित किए थे। ट्रावा के मतानुसार अरस्तू ही पहला दार्शनिक था, जिसने पुस्तकालय की स्थापना की, परंतु अलैक्जैंड्रिया का प्राचीन पुस्तकालय ईसा से लगभग 300 वर्ष पूर्व स्थापित हुआ था। अनुमान लगाया जाता है कि अलैक्जैंड्रिया के विशाल पुस्तकालय में लगभग 70,000 ग्रंथ थे। रोम की राजधानी में चैथी शताब्दी में लगभग 28 महान ग्रंथागार थे। इनके सिवा लिवर, कोमन, मिलान, अथेंस, स्मिर्ण, पाट्री और हाकूलेनियम आदि प्राचीन नगरों में भी पुस्तकालयों के होने का उल्लेख मिलता है। (वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी)

अन्य देशों की भाँति भारत में भी पुस्तकालयों की समृद्ध परंपरा रही है। यहां की सिंधु घाटी सभ्यता, जो कि लगभग छह हजार वर्षों पूर्व मानी जाती है, उस समय भी पुस्तकालय संस्कृति अपने चरम पर थीं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा नगरों की खुदाई से ऐसे अनेक प्रमाण प्राप्त हुए हैं। संभवतः उस काल में चित्रलिपि का विकास भारत में हो चुका था। इतिहासकार मानते हैं कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में अनेक पुस्तकालय थे। सिंधु सभ्यता के पतन के पश्चात लगभग 3000 ई. पूर्व भारत में आर्यों का आगमन हुआ। इन्होंने ब्राह्मी लिपि का आविष्कार किया। भोजपत्रों एवं ताड़पत्रों पर ग्रंथ लिखे जाते थे, परंतु शिष्यों के लिए उनका उपयोग सीमित ही था। गुरुओं के पास इस प्रकार की हस्तलिखित पुस्तकों का संग्रह रहता था, जिसे हम निजी पुस्तकालय कह सकते हैं। वैदिक काल में वेदों, इतिहासों और पुराणों, व्याकरण और ज्ञान की अनेकानेक शाखाओं से संबंधित ग्रंथों को लिपिबद्ध किया गया। इस काल में अनेक विषय गुरुकुलों में छात्रों को पढ़ाए जाते थे।

भारत में तक्षशिला एवं नालंदा जैसे शिक्षा केंद्र बौद्धकाल की महनीय देन थे, जिनमें विविध विषयों के अध्ययन की समुचित सुविधा थी। पुस्तकालय को विद्यामंदिरों का आभरण मानते हुए इन केंद्रों में समृद्ध पुस्तकालयों का विकास किया गया। तक्षशिला के पुस्तकालय में वेद, आयुर्वेद, धनुर्वेद, ज्योतिष, चित्रकला, कृषिविज्ञान, पशुपालन आदि अनेक विषयों के ग्रंथ संगृहीत थे। नालंदा का पुस्तकालय तो अपने आपमें विलक्षण माना जाता है। “धर्मजंग” नाम का यह पुस्तकालय रत्नोधि, रत्नसागर और रत्नरंजम नामक तीन भागों में संचालित था। ईसा से पाँच शताब्दी पूर्व के इस पुस्तकालय का वर्णन चीनी यात्री फाहीयान, ह्वेनसांग और इत्सिंह ने अपने यात्रावृत्तांतों में किया है। अनेक विदेशी विद्वान यहां अध्ययन हेतु आया करते थे। इसी श्रेणी में राजा धर्मपाल द्वारा स्थापित विक्रमशिला पुस्तकालय में भी अनेक हस्तलिखित ग्रंथ थे। वल्लभी में भी बड़ा पुस्तकालय था, जिसका संपूर्ण व्यय राजकोष से वहन किया जाता था। दुर्भाग्यवश शताब्दियों से संरक्षित और पोषित ज्ञान के इन अनन्य केंद्रों को बख्त्यार खिलजी की कुदृष्टि का शिकार होकर नष्ट होना पड़ा। मुगल काल में अकबर के यहां लगभग 25 हजार ग्रंथों वाला पुस्तकालय था। तंजीर में राजा शरभोजी का पुस्तकालय आज भी जीवित है। इसमें 18 हजार से अधिक ग्रंथ तो केवल संस्कृत भाषा में ही लिपिबद्ध हैं। विभिन्न विषयों से संबंधित भारतीय भाषाओं के अति प्राचीन दुर्लभ ग्रंथ भी यहाँ सुरक्षित हैं।

राजस्थान के संदर्भ में बात करें तो यहां अनेक प्रतिभा सम्पन्न राजे-महाराजे हुए हैं। यहां के राजाओं द्वारा स्थापित जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर, जयपुर, भतरपुर, कोटा के ग्रंथालय इसकी पुष्टि करते हैं। यहां के प्राच्य विद्या प्रतिष्ठानों एवं श्रेष्ठिजनों द्वारा स्थापित अनके नगरों के पुस्तकालय आज भी शोधार्थियों एवं अध्येताओं की आशा के केंद्र हैं। राजस्थान में साहित्य-सम्मान की समृद्ध परंपरा रही है। स्वयं राजा-महाराजा साहित्य एवं साहित्यकारों का बेहद सम्मान करते थे, उन्हें पुरस्कार स्वरूप ग्राम एवं जागीरें भेंट किया करते थे। राजस्थान के राजाओं ने तो यहां तक माना है कि भले ही उनका गढ़-कीला चला जाए, या फिर संपूर्ण राज-पाट चला जाए, इसकी रत्तीभर भी चिंता नहीं लेकिन यदि उनके दरबार से कविराज चले गए, तो गजब हो जाएगा। अन्वय से अर्थ निकलता है कि राजा के लिए कविराजा बहुत आवश्यक था। यहां यह तथ्य भी ध्यातव्य है कि वर्तमान काल से पूर्व अधिकांश साहित्य काव्य रूप में ही लिखा जाता था अतः उस समय साहित्यकार के लिए कवि संबोधन ही प्रचलन में रहा है। उदयपुर महाराणा राजसिंह ने तो यहां तक कहा कि विगत इतिहास की घटनाओं, अनुभूत सत्य एवं ऐतिहासिक गौरव को यदि कोई जिंदा रखते हैं तो ये साहित्यकार रखते हैं। आज राम-लक्ष्मण तथा कृष्ण-बलदेव तो इस संसार में नहीं है लेकिन रामायण एवं भागवत-पुराण है, जिनके माध्यम से हम राम-लक्ष्मण तथा कृष्ण-बलदेव को जान पाते हैं। वाल्मीकि, शुकदेव, वेदव्यास यदि साहित्य सृजन एवं कथा-कविता नहीं करते तो आज राम एवं कृष्ण के स्वरूप की साधना करने वाला एवं उनका ध्यान लगाने वाला कौन मिलता? व्यक्ति को मरने के बाद अमर करने का हुनर किसी के पास है तो, वो साहित्यकार के पास है अतः साहित्यकारों की चरणवंदना करनी चाहिए।

कहां राम कहां लखण, नाम रहियो रामायण।
कहां कृष्ण बलदेव, प्रगट भागोत-पुरायण।
वालमीक सुक व्यास, कथा कविता न करंता।
कवण सरूप सेवंत, ध्यान मन कवण धरंता।
राजसिंह कहै जग राण रो, सुणो सजीवण अक्खरां।
जग नाम अमर चाहो जिकै, पूजो पाव कवेसरां।।

पुस्तक एवं पुस्तकालय की उपयोगिता एवं उपादेयता सभी कालों में निर्विवाद रही है। किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत के रूप में वहां का साहित्य रहा है। साहित्य के संग्रहणकेंद्र होने के नाते पुस्तकालयों को सांस्कृतिक वैभव के पहरुवे के रूप में सम्मान मिलता रहा है। इतिहास इस बात का गवाह है कि आक्रमणकारियों ने राजप्रासादों एवं मंदिरों को लूटने तथा तोड़ने के साथ ही वहां के पुस्कालयों को भी लूटा एवं नष्ट किया। जूलियस सीजर ने 47 ई. में अलैक्जैंड्रिया पर आक्रमण किया तो वहां के पुस्तकालय के सभी ग्रंथ जला कर राख कर दिए। अरस्तू के निजी पुस्तकालय को रोम के विजेता अपने यहाँ ले आए थे। भारत के पुस्तकालयों को नष्ट करने की बात पहले कर चुके हैं। इससे यह तथ्य स्वतः स्पष्ट होता है कि किसी देश या समाज से दुश्मनी निकालनी हो ता वहां के साहित्य को समाप्त कर दिया जाए। पाश्चात्यीकरण की मार एवं साम्यवादियों के विचारों ने हमारे सांस्कृतिक वैभव पर दूसरी मार मारी है। इन्होंने प्रगतिशीलता एवं विकास के नाम पर साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसे वर्ग को पैदा कर दिया, जो हमारी पुरातन परंपरा एवं सनातनी संस्कृति से विमुख है तथा पानी पी-पीकर इसे कोसने में लगा है। इसका कुप्रभाव यह हुआ है कि आज की पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग अपनी जड़ों से कटता हुआ दृष्टिगोचर हो रहा है। यह प्रवृत्ति पुस्तक, पुस्तकालय एवं पठनीयता तीनों के लिए भारी है। सजग बुद्धिजीवियों को इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।

पुस्तक एवं पुस्तकालयों की यह संक्षिप्त एवं परिचयात्मक जानकारी इतना तो अवश्य ही सिद्ध करती है कि पढ़ने-पढ़ाने के संस्कार यहां सदा से रहे हैं। पुस्तकों के सृजन, अनुशीलन एवं संग्रहण-संरक्षण यहां के लोगों की रुचि का विषय रहा है। कमोबेस आज बदलते दौर में भी पुस्तकों के प्रति हमारा प्रेम कम नहीं हुआ है लेकिन सोशल मीडिया एवं दृश्य-श्रव्य संसाधनों तथा संचार माध्यमों ने पुस्तकों के प्रति लोगों के नजरिए में अन्तर ला दिया। एक समय था जब लोग महाकाव्यों का अध्ययन-अनुशीलन करते थे। समय की गति कुछ तेज हुई तो व्यक्ति के पास कार्य-आधिक्य हुआ। नये कार्य एवं नई रुचियों के कारण उसके पास साहित्य-अध्ययन के लिए समय की न्यूनता हुई। इस कारण महाकाव्यों से खंडकाव्य, स्फुट-काव्य एवं आज लघु काव्य एवं क्षणिकाओं तक पहुंच गए। कभी हासिए पर रहने को अभिशप्त रही विधाएं आज साहित्य का प्रतिनिधित्व करने लगी हैं। आज सोशल मीडिया पर साहित्य-सृजकों की बाढ़ आ रखी है। यह तथ्य एक तरफ सुखद लगता है लेकिन इन रचनाओं की स्तरहीनता मन को दुखी करती है। साधन तो बढ़े हैं लेकिन श्रद्धा घट गई है। गहन गंभीर अध्ययन की दृष्टि से देखें तो आज का जमाना बेहद चिंताजनक है। जमाने की हवा ऐसी चली है कि सब कुछ औपचारिकता एवं दिखावा पसंदगी की जकड़न में जाता नजर आ रहा है। आज आम व्यक्ति नाखुन कटवाकर शहीदों की सूची में अपना नाम अंकित करवाने को बेताब हैं। बुजुर्गों के प्रति सम्मान एवं सेवा-सुश्रूषा की भावना की बजाय स्वयं को सबसे बड़ा सेवाभावी साबित करने की हौड़ में लगे हैं। मंदिरों के दालानों मंे भीड़ बढ़ गई लेकिन आस्थावान लोगों की बहुत कमी दृष्टिगोचर होती है। यही बात पुस्तक, पुस्तकालय एवं पठनीयता पर भी हुबहू लागू होती है। पुस्तक, पुस्तकालय एवं पठनीयता तीनों संकट के दौर से गुजर रहे हैं, आज इनके समक्ष अनन्त चुनौतियां हैं।

आज पुस्तकें लिखने, खरीदने एवं संगृहीत करने का प्रचलन पहले की बजाय अधिक बढ़ा है लेकिन यह प्रचलन भी दिखावे की भेंट चढ़ गया। दायरों की विस्तृतता पर विचारों की संकीर्णता हावी हो रही है। आज का रचनाकार इतनी त्वरा में है कि उसे किसी अन्य की रचना पढ़ने की फुर्सत तो छोड़ो, स्वयं के लिखे हुए को फिर से पढ़ लेने की फुर्सत भी नहीं है। यही कारण है कि संख्यात्मक वृद्धि के साथ गुणवत्ता में कमी आती जा रही है। एक समय था जब महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वान अपने समय के रचनाकारों की रचनाओं हेतु संशोधन सुझाव दिया करते थे। वे अपनी सरस्वती पत्रिका में प्रकाशानार्थ प्राप्त होने वाली रचनाओं को परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं की तरह जाँच कर उनकी कमियों का अंकन करके रचनाकार के पास पुनः भेज दिया करते थे। आज ना तो ऐसी कोई पत्रिका है और ना ही वैसे संशोधक। छंद से मुक्ति के नाम पर आज की कविता गद्य बनने को आमादा है। कहानी एवं उपन्यास में यदि परंपराओं को नहीं तोड़ा जाए और अश्लीलता को नहीं जोड़ा जाए तो शायद पूर्णता ही नहीं मिलती। पठनीयता की जगह कट-पेस्ट की संस्कृति हावी होने लगी है। आज व्हाट्सएप, फेशबुक, ट्वीटर एवं ऐसे ही अनेक माध्यमों के कारण पुस्तक के पाठकों की भारी कमी दिखाई देती है। महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के पुस्तकालय छात्रसंघों की ऊटपटांग गतिविधियों के केंद्र बनते जा रहे हैं। आज का विद्यार्थी पाठ्यपुस्तकों की बजाय पासबुक एवं वनवीक सीरीज पर निर्भर हो गया। संदर्भ ग्रंथों का संप्रत्यय तो उसकी समझ से ही परे है। इसी तरह सरकारी एवं सार्वजनिक पुस्तकालयों में नियमित पाठकों का अकाल पड़ गया है। एक समय था जब सार्वजनिक पुस्तकालयों में भीड़ रहा करती थी। 50 से अधिक उम्र वाले बहुत से लोग आज भी अपने समय की अनेक पत्र-पत्रिकाओं तथा कहानी-कविताओं का सटीक बखान करते नजर आ जाते हैं लेकिन 50 से नीचे की उम्र में ढूंढने से भी ऐसे लोग नहीं मिलते जो अपनी पसंद की 5 पुस्तकों के नाम एवं कथ्य को बता पाएं। आज विशेषज्ञ की बजाय सर्वज्ञ अनने वालों की हौड़ है। आज के व्यक्ति को थोड़ा-थोड़ा तो सबके बारे में जानकारी है लेकिन गहन जानकारी एक विषय की भी नहीं है। जो कुछ पढ़ा, उसे तुरंत साझा करने की प्रवृत्ति ऐसी बढ़ी है कि व्यक्ति अप्रामाणिक सूचनाओं को सार्वजनिक कर देते हैं। साहित्य में गैर जिम्मेदारी का ऐसा दौर पहले कभी नहीं रहा। पुस्तक-प्रेम एवं पुस्तक संस्कृति के सामने यह बहुत बड़ा संकट है। आज अधिकांश घरों में पुस्तकें साज-सज्जा का साधन मात्र बनने को अभिशप्त नजर आती है। यही हाल निजी एवं सार्वजनिक पुस्तकालयों का हो गया है। अधिकांश पुस्तकालयों में आज पुस्तकें साज-सज्जा की सामग्री मात्र बन कर रह गई हैं। कुछ धीर-गंभीर संचालक यदि पुस्तकालयों को सही अंदाज में संचालित करना चाहते हैं तो उनके यहां पाठकों का अकाल पड़ गया है।

वस्तुतः पुस्तकालय तो किताबों से प्यार करने वालों का खास आश्रयस्थल माना जाता है। आज बदलते जमाने में पुस्तकालय की किताबें बुक-शेल्फ से निकल कर कम्प्यूटर के माध्यम से डिजिटल हो गई हैं और इंटरनेट और मोबाइल ने इसे और भी आसान बना दिया है। आज पुस्तकालयाध्यक्ष का काम केवल किताबों को इधर से उधर रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हाईटेक काम में तब्दील हो चुका है। लाइब्रेरियन का काम पढ़ने योग्य सामग्री को संगठित करना, उसे डिजिटल लुक देना, सामग्री को प्रभावी ढंग से प्रयोग करने में सहायता करना और पाठक को सही समय पर सही सूचना प्रदान करना है। लाइब्रेरी अब केवल किताबों के रखने और पढ़ने की जगह भर नहीं रह गई है, बल्कि नॉलेज सेंटर में तब्दील हो चुकी है। आज सूचना एवं प्रोद्योगिकी के सहारे अधिकतर पुस्तकालयों को वीडियो-लाइब्रेरी, कैसेट-सीडी लाइब्रेरी, कम्प्यूटर-लाइब्रेरी, साइबर-लाइब्रेरी, इंटरनेट-लाइब्रेरी, फोटो-लाइब्रेरी, सॉन्ग-लाइब्रेरी (रेडियो स्टेशन या एफएम चैनल्स में), स्लाइड-लाइब्रेरी के रूप में बदल रही हैं। इसके लिए ट्रेंड प्रोफेशनल्स की जरूरत है। आज देश के सभी विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के पुस्तकालयों को डिजिटल रूप दे दिया गया है। आजकल विषय विशेष से संबंधित पुस्कालय (सब्जेक्ट स्पेसिफिक लाइब्रेरी) खोलने का चलन बढ़ रहा है। यहां तक कि परम्परागत पुस्तकों एवं धार्मिक ग्रंथों को भी डिजिटल किया जा रहा है। मोबाइल और कंप्यूटर का चलन बढ़ रहा है, इसलिए प्रकाशक अपनी किताबों को डिजिटल बनाने में जुटे हुए हैं। आजकल ऑनलाइन लाइब्रेरी का चलन बढ़ रहा है। ऑनलाइन लाइब्रेरीज इंटरनेट पर उपलब्ध रहती है। आज नए जमाने के लोग नए तरीके से पुस्तक एवं पुस्तकालयों का उपयोग करते हैं लेकिन सुदुपयोग करने वालों कर संख्या बहुत कम है। मोबाइल, कम्प्यूटर, लैपटाॅप एवं ऐसे ही अन्य इलेक्ट्रोनिक उपकरणों की उपयोगिता है, उसे नकारा नहीं जा सकता। तेज गति से दौड़ती दुनियां से बराबरी करने हेतु इन सुविधाओं की आवश्यकता है। आज घर बैठा शोधार्थी अनेक जगह के संदर्भ खोज सकता है लेकिन आॅनलाइन पढ़ने की अपनी सीमाए हैं। पुस्तक से पढ़ने का अपना अलहदा आनंद है, उसका कोई विकल्प नहीं हो सकता। पुस्तकालय संचालकों को चाहिए कि वे संपूर्ण आधुनिक तकनीक को काम में लेने के साथ ही परंपरागत पुस्तक-पठन को जारी रखने हेतु अधिकाधिक प्रयास करें। अच्छी पुस्तकंे पुस्तकालयों के लिए आभूषण कहलाती है लेकिन अच्छे पाठक पुस्तकालय की पहचान होते हैं। इस पहचान को बनाएं रखना आज चुनौती से कम नहीं है।

व्यक्ति जब कोई काम करता है तो उसके पीछे दो उद्देश्य साफ-साफ होते हैं-पहला वो काम उसे अच्छा लगता है और दूसरा उस काम में उसका कोई न कोई हित जुड़ा हुआ है। पठनीयता के साथ भी से दोनों तथ्य जुड़े हुए हैं। आज के जमाने में तुलसी की तरह स्वांतःसुखाय रघुनाथ गाथा रचने, पढ़ने एवं सुनाने वाले लोग नहीं के बराबर हैं। अतः पढ़ना लोगों की चाहत नहीं रहा। अब तो पढ़ना इसीलिए है कि उससे कोई न कोई हित सधेगा। आज के विद्यार्थी मात्र परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए पढ़ते हैं, शिक्षक विद्यार्थियों को व्याख्यान देने मात्र के लिए पढ़ते हैं। नेता जनता को फंसाने एवं लुभाने के तथ्य मात्र ढ़ूढने को पढ़ते हैं। शोधार्थी अधिकाधिक संदर्भ के जुगाड़ मात्र हेतु पढ़ते हैं। और तो और तथाकथित विद्वान भी अपने भाषण को लच्छेदार बनाने मात्र के लिए पढ़ते हैं। समग्र रूप से साहित्य अध्ययन करने वाले लोगों की संख्या बहुत न्यून रह गई है। पठनीयता के समक्ष यह बड़ा संकट मुंह बाए खड़ा है।

इतना कुछ होने के बावजूद भी मेरा मानना है कि पुस्तक, पुस्तकालय एवं पठनीयता के प्राचीन मापदंड आज भी हमारे लिए बहुत प्रासंगिक एवं उपादेय हैं। पुस्तक से पढ़ने, पुस्तकालय में नियमित जाने तथा स्वाध्याय करने का अपना विशिष्ट महत्त्व सदा से रहा है और रहेगा। हमें आशावादी दृष्टि रखते हुए अपनी नयी पीढ़ी को इस तरफ आकृष्ट करना चाहिए। आज के बच्चों में पठनीयता के संस्कारों की कमी का एक बड़ा कारण हमारे एकल परिवार तथा पति-पत्नी दोनों का कामकाजी होना भी है। जिन घरों में बच्चों को दादा-दादी एवं नाना-नानी दुलार मिलता है, उन्हें स्वाभाविक रूप से कहानी कविता आदि सुनने एवं सुनाने का अवसर मिल जाता है। साहित्य तो आत्मा की औषधि है, एक बार इसके रस को प्राप्त कर लिया तो फिर बार-बार रसास्वादन को मन बनता रहता है। आज के अभिभावकों को चाहिए कि स्वयं भी पुस्तक पढ़ने एवं पुस्तकालय जाने की आदत डालें तथा अपने बच्चों को भी इस हेतु प्रेरित करें। आज सब घरों में फिल्म, क्रिकेट एवं धारावाहिकांे की चर्चाएं होती है वहां अपनी पसंद की किसी रोचक पुस्तक की कथावस्तु की चर्चा करना शुरु करें। अपने बच्चों से कविताएं सुने, सुनाए। उन्हें ट्विंकल-ट्विंकल वाली रटंत विद्या की बजाय आनंद देने वाली रचनाओं से जोड़े। गंभरता से सोचने पर आज भी लगता है कि हम में से हर व्यक्ति चाहता है कि उसे कोई कहानी याद हो, कविता याद हो, प्रसंगवशात सुनाने हेतु काव्यपंक्तियां, चुटकुले एवं अन्य प्रवाद याद हों लेकिन इसके लिए जिस माहौल की आवश्यकता है, वह उसे मिल नहीं पा रहा है। मुझे लगता है कि अभी यह नाव तो सही-सलामत है, बस लहरों के लालच भरे निमंत्रण को देखकर नाविक की निष्ठा में कुछ कमी आ गई है, इसे दूर करने मात्र की दरकार है, फिर से हम पुस्तकों के प्रति आकृष्ट होने लगेंगे। अंत में मेरी एक राजस्थानी कविता के इस अंतरे के साथ विचारों की शृंखला को एक बार यहीं विराम देते हैं-

है नाव अजे लग सावजोग, बस नाविक री निष्ठा घटगी।
लहरां रै लोभ निमंत्रण में, आंख्यां झट उणरी जा अटकी।
पतवार संभाळो निज हाथां, बातां सूं पार पड़ै कोनी।
जातां-पातां नैं भूल्यां बिन, घातां रो दौर रुकै कोनी।
तो समै-साच री कथा सुणावण, खुद वीरभद्र बणणों पड़सी।
समदर री साख बचावण नैं, सुण कलम साच बोल्यां सरसी।। शक्तिसुत।।

~~डॅा. गजादान चारण “शक्तिसुत”

 

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