रजवट राखी रीत

(गोपाल़सिंह जी खरवा नै समर्पित)

।।दूहा।।
मुरधर चावो नरसमँद, बात जगत विखियात।
नखतधारी नर निपजिया, रसा उजाल़ण रात।।1

समै सार के सूरमा, हुवा इयै धर हेर।
जस नै ज्यां तो जोरबल़, घाल्यो घर में घेर।।3

समै किया चाल़ा सहज, मरदां बदल़्यो मन्न।
लाज बेच सुख लेयबा, धुर ज्यां चायो धन्न।।4

पराधीन हुय पापियां, दुख भोग्यो भरपूर।
खरवै ली खागां खरी, सज नर गोपै सूर।।5

नह डरियो गोरां नजर, करियो धिन वड काम।
इल़ गोपै उजवाल़ियो, नवकोटी रो नाम।।6

साहस रख स्वाभिमान सथ, रजवट राखी रीत,
कुलवट पोखी कमध वड, पोह धर खाग पवीत।।7

भूरां रै भोताड़ के, लुकिया दरां लँकाल़।
उण वेल़ा अगराजियो, गंजण अरि गोपाल़।।8

फैल फिरंगी फैलियो, दापल़ झाली देस।
खरवै झाली खाग कर, रिपुवां देवण रेस।।9

गिड़ नाहर डरिया गजब, हुकी स्याल़ियां सांभ।
साहस धरियो उण समै, थिर कर खागां थांभ।।10

खरवै मांझी खाग रो, आंझी रो अगवांण।
गोपाल़ै वरियो गुमर, महि चिर थापण मांण।।11

गोपाल़ो धर गाढ रो, रहियो रजवट रूप।
पण आजादी पाल़ियो, जुथ नर आगल़ जूप।।12

खाग तणी वा खैरवै, घालण गोरां घाव।
बिखम वाट बहियो सदा, दिया न हीणा दाव।।13

गोरां कुड़ के गूंथिया, जोरां पटकण जाल़।
उण वेल़ा लखियो अडर, गुणधर नर गोपाल़।।14

मूंछड़ियां बांको मरद, सांको कियो न सूर।
आंको कीधो इल़ अमर, चित्त हित गोरां चूर।।15

बांमीबंध ज्यूं बांम वट, बहियो अणभै वीर।
मछर भूरां रो मेटियो, निज कुल़ चाढ्यो नीर।।16
मेड़तियो भिड़वा तणी, पढियो पाटी पेख।
सुज मुड़वा नह सीखियो, तर तर राखी टेक।।17

वीरम जैमल इण वसू, अडर हुवा अजरेल।
जिण घर गोपो जलमियो, खागां रमवा खेल।।18

मेदपाट रै मरट कज, जँग भिड़ियो जयमल्ल।
हिव धिन धरती हिंद कज, भिड़ियो गोपो भल्ल।।19

जलम्यो जिण रो मरण जो, महियल़ निसचै मान।
समझै सो राखै सही, जस लारै, दे जान।।20

राख मरट घरवट रखी, घट पिंड रजवट गाढ।
गयो गोप सथ गुमर ले, चार पखां जल़ चाढ।।21

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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