रँग शीलां रखवाल़िया,जोर झिणकली झाड़!!

एक जमानो हो जद अठै रा नर-नारी मरट सूं जीवण जीवता अर सत रै साथै पत रै मारग बैवता। हालांकै धरती बीज गमावै नीं आज ई ऐड़ा लोग है जद ई तो ओ आकाश बिनां थांभै ऊभो है पण उण दिनां री बातां बीजी।

बीसवैं सईकै री बात है भाडली(जैसल़मेर) रा भाटी रुघजी मानसिंहजी रा (रुघराजजी /रुघनाथजी) धाट रै गांम छौल़ रै सोढां रै अठै परण्योड़ा हा। उणां री जोड़ायत सोढीजी, जापो करावण सारू आपरै पीहर छौल़ गयोड़ा हा। जापो हुयो। सोढीजी बेटे री मा बणिया। दोनां जागा बधाइयां बंटी। हरख हुयो।

रुघजी रै रावल़ै बात चाली कै सोढीजी नै आणो(लेने के लिए) मेलियो जावै। बात तय हुई कै जोगराजजी बीठू नै मेलिया जावै। वै जावै अर सोढीजी नै ले आवै। जोगराजजी नै बुलाय’र मा सा कह्यो कै-
“बाजीसा आप ऊँठ लेय’र पधारो अर छौल़ जाय’र बीनणीसा अर गीगलै नै ले आवो। आप तो उणरै माईत हो सो नीं उणरै संकोच री बात नीं आपरै।”

जोगराजजी झिणकली रा बीठू नैतसी रा बेटा हा। कंवारा ईज हा सो नीं लारै कोई उडीकणियो अर नीं आगै कोई बीजी हाकदड़बड़.। हथाई करण रो एकाएक काम। भाडली रा भाटी रुघजी, मोटमना अर कवियां री कद्र करणिया। रुघजी री दातारगी विषयक किणी कवि लिख्यो है-

हारां ओपम हीर, राजवियां ओपे रुघो।
बड चित बावन वीर, महिपत दाता मांन रो।।

इण सारू जोगराजजी रो मन अठै घणो राजी। अठै घणा विराजता।

जद मा सा कह्यो तो जोगराजजी ऊँठ पिलाण छौल़ गया। सोढां घणा कोड किया। सोढीजी नै हरख सूं सीख दी। जोगराजजी ऊँठ माथै सोढीजी नै चढाय ऊँठ नै ऊभो कियो। सोढां कह्यो कै – “आपरै तो म्हांरी बाई बेटी जैड़ी है आप लारलै आसण विराज जावो।”

आ सुणर जोगराजजी कह्यो – “हां, आपरी बाई म्हारै जाई जैड़ी पण हूं ऊँठ माथै नीं चढूं। हूं पाल़ो ई बुवो जाऊंलो।” आ कैय उणां ऊँठ खांचियो।

थोड़ी भांय गया सोढीजी मन में सोचियो कै – “बाजीसा म्हारै बाप रै सांयीणा। हूं मोटयार माल चढी बैऊं अर म्हारी बाप री उम्र रो एक चारण पगै पाल़ो बैवै! ओ म्हारै माथै पाप चढै।” इण गतागम में पांच-सात कोस रो पैंडो हुयग्यो।

सोढीजी अपराधबोध महसूस कियो। उणां आ सोच’र आपरै पग री पगरखी नीची न्हांखी कै पगरखी उठायर बाजीसा म्हनै झलावण नै ऊँठ ठांभैला तो हूं सोगन दिराय ऊँठ माथै चढण रो थोरो करूंली तो चढ जावैला।” ज्यूं ई पगरखी खिरी। आवाज सुणी। जोगराजजी पाछल फोर’र जोयो तो देखियो कै सोढीजी री पगरखी पग सूं निकल़ नीची पड़गी।

उणां सोचियो कै निसचै ई बाई रो पग ऊंगाणो। पगरखी अबार पैरीजै नीं पाछी पड़ जावैला सो उणां पगरखी उठाय आपरै पोतिये में बांधली। आ बात सोढीजी देखी तो भल़ै घणो पछतावो कियो। संकोच रै मारिया बोल नीं सकिया। पण पछतावै रो कोई पार नीं रह्यो। उणां सोचियो कै “म्है ओ कैड़ो पाप चढायो? म्हारो खेटर एक पूजनीक चारण नै उखणायो। पण हाथ मांयलो भाठो हो सो छूटो हमै पिछतायां कांई हुवै?”

इणी उधेड़बुन में भाडली पूगा। सोढीजी मांयां रावल़ै में गया अर जोगराजजी उतारै। सोढीजी मांयां जावता ई आपरै बेटे नै एकै कानी सूंवाणियो अर आप बैठ गया। टाबरियो भूख सूं रूनो। जणै सासू कह्यो-“बीनणी गीगलै नै चूंघा। ओ रोय रह्यो है नीं। “पण सोढीजी कोई गिनर नीं करी अर अठीनै टाबरियो आड़ै चढियो। जणै रुघजी री मा मांयां आय सोढीजी नै कह्यो कै – “कांई बोल़ी है? तूं सुणै नीं ओ नैनियो जाराको रोवै अर तूं जाणगैली बण्योड़ी सुणै ई नीं। कांई बात है?”

आ सुण’र सोढीजी कह्यो कै – “ई चारण म्हारै माथै ऐसान चढायो। म्हारै बाप री उम्र रै होय म्हारी पगरखी माथै उखणी! हूं पाप में डूबी। सो ओ पाप कीकर ई उतरै ऐड़ी बात करो तो हूं गीगलै नै हांचल़ दूं नींतर नीं।”

सासू कह्यो – “बडभागण ! बाजीसा रो ऐसान कैड़ो? ऐ तो थारा माईत ! एक बाप आपरी जाई री पगरखी कठै ई राखो इण में कैड़ो पाप अर कैड़ो पिछतावो? गूंगी है कांई जको ऐड़ी बिलल़ी बात करै?”

आ सुणर सोढीजी कह्यो – “नीं मा सा ! ओ सरासर पाप चढियो। एक चारण म्हारी पगरखी माथै राखी, इणसूं बत्तो पाप कैड़ो?नीं उतरै जितरै नीं तूं हूं अन्नजल़ करूं अर नीं इण गीगलै नै थण चूंघाऊं।”

बात रावल़ै सूं निकल़ कोटड़ी पूगी। सगल़ां ई सोढीजी री बात सूं सहमति दरसाई। सोढीजी नै पूछियो कै – “आप बतावो, बाजीसा रो ऐसान कीकर उतार्यो जावै? बाजीसा नै धन-माल दैणो चाहीजै कै जमी जागा दी जावै कै भल़ै कोई बीजी बात करी जावै?”

आ सुणर सोढीजी कह्यो कै – “बाजीसा रै धन-माल घरै घणो। जमी-जागा आगली ई भाई खड़ै। बाजीसा तो कंवारा है सो इणां रो घर बंधावो।”

आ सुणतां ई बाकी रां कह्यो कै – “बाजीसा तो पचासां ढल़िया है हमै कुण आपरी बेटी धैड़ में न्हांखैला?”

सोढीजी कह्यो कै – “म्हनै ध्यान नीं। ओ काम जितै नीं हुवैला उतै म्हैं म्हारै पण माथै कायम हूं।”
आ सुण’र किणी कह्यो कै – “बाजीसा नै ई पूछ लियो जावै कै परणीजणा चावै है कै नीं ? जे नीं चावै जणै पछै थे क्यूं आधैसांसै पड़ो!”

जणै किणी दूजै कह्यो कै – “हां, बात ठीक रैसी। बाजीसा नै पूछ्यो जावै।”

जणै उठै बैठे किणी आदमी जोगराजजी नै पूछ्यो कै – “बा! सोढीजी जिद पकड़ लियो कै आपरी गवाड़ी बांधी जावै।”

आ सुणर जोगराजजी कह्यो कै – “भोल़ी बातां करो ! अबै म्हनै अधबूढ नै कुण आपरी कन्या देवैला? दीयै जैड़ा भाग होवता तो रातींधो ईज क्यूं होवतो? कदै ई जवानी में ब्याव को होवतो नीं? सोढीजी नै हूं थोरो करूंला कै ऐड़ी कलायां नीं करै। उवां कह्यो सो म्हारै ब्याव सूं बधीक बात।”

जोगराजजी जाय सोढीजी नै कह्यो कै – “आप ऐड़ी कलायां मत करो। म्हनै अधबूढ नै कुण बेटी देवै?”

आ सुण’र सोढीजी कह्यो कै – “बा! आप म्हनै बेटी मानो जणै आपनै म्हारी आण है म्हनै पाछो कीं कह्यो तो। चारणां सूं बेटी भाटी मांगसी। थांनै परणावण रो म्है खण लियो।”

आ सुण’र जोगराजजी कह्यो – “तो हवा, धणी रो धणी कुण? रावल़ी मरजी।”

रुघजी, मौजीज भाटी बुलाय सलाह करी कै सोढीजी रो पण कीकर पूरो करणो रह्यो?” आ सुणर बीजोड़ां कह्यो कै  – “बीठुवां रै रतनू आदू गिनायत। आपां रा रतनू मोटा भाई। सो आपां मांगणो करांला।” आ तय हुयर सगल़ां ई सोढीजी नै कह्यो कै “आप टाबर नै हांचल़ दो। म्हांरो पण है कै म्हे जोगराजजी री गवाड़ी बंधावांला।”

भाटियां पतो करायो कै रतनुवां में किणरै मोटो टाबर है? जणै किणी कह्यो कै कोडां गांम रै रतनू शंकरदान सायबदानोत रै बाई खासी मोटी है सो रुघजी खुद मांगैला तो शंकरजी नीं नटैला।

रुघजी आपरी घोड़ी चढ कोडां आया अर रतनुवां नै भेल़ा करर कह्यो कै झिणकली रै बीठू जोगराज नैतसिंहोत नै शंकरदानजी री बाई शीलां दिरावो। आ सुणर लोगां कह्यो कै – “कांई बात करो हुकम! कठै अधखड़ जोगराजजी अर कठै कालै री शीलां?आ जोड़ कीकर बणै?” रुघजी कह्यो कै “म्हैं थांरै भरोसै सोढी नै जबान दी। राखो तो आ बखत है ! नींतर ग्योड़ी है ही।” आ सुणर उठै विराजिया शंकरदानजी कह्यो कै – “रुघजी ! थे बाको फाड़र बाई रो मांगो कियो सो बाई दी। थां सूं मीठी बाजरी है सो खायां भूख भागै। थांनै पगां साम्हीं जोवता नीं जावण दां।”

जोगराजजी बीठू रो लगैटगै पचास वरसां री उम्र में शील़ां रै साथै ब्याव हुयो। जान बहीर हुवण लागी जणै शंकरदानजी, रुघजी नै कह्यो कै – “शीलां आज सूं आपरै धरम री बेटी। आ थांरै खोल़ै दी।”

रुघजी शीलां नै जाई सूं बत्ती करर राखी। जोगराजजी रै शीलां री कूख सूं च्यार बेटा हुया – रुघजी, आवड़जी, करणजी अर सारंगधरजी।

जोगराजजी रै घरै सह बातां रो थाट। आगो दियो पाछो पड़ै। चैन री वंशी बाजै। गवाड़ी दांतै चढी। कुजोग सूं जोगराजजी राम कियो(स्वर्गवास होना)। मोत री झाट जकै घरै लागै उणनै सूंवो हुवण में वरस बीतै। शीलां माऊ रै माथै ई गवाड़ी रो भार आयो। किरको कर’र दुख रै आगै माठ (धीरज) झाली। पण उण दिनां रीतां ही कै पति री मृत्यु पछै छव महीणा, बारै महीणा लुगाई एक आश्रम सूं बारै नीं आवती। दैनिक कामकाज रात रै अंधारै कै भाखफाटी सूं पैला करती। इणनै ‘खूणै’ में बैठणो कैवता। सो दैनिक कामकाज करण सूं पैला ‘खूणो’ छोडणो जरूरी हो। ‘खूणो’ छोडावण सारू पीहरिया आय तेड़’र ले जावता अर पाछी पूगावता जणै छोडीजणो मानीजतो।

शीलां माऊ भाडली रा भाटी रुघजी री धरम री बेटी हा सो भाटी आया अर शीलां माऊ नै खूणो छोडावण नै भाडली लेयग्या।
लारै सूं जोग ओ बणियो कै अंग्रेज सरकार रै आदेशां री पाल़णा में रजवाड़ां री सीमाबंधी हुवणी शुरू हुई सो जैसलमेर अर मारवाड़ री सीमा ई पाछी मुकर्रर हुवण सारू मपण लागी।

जैसलमेर रै कानी सूं ‘खाबड़’ कानली सीम मापण रो जिम्मो अठै रा हाकम जोरजी पुरोहित अर मूहता मूल़चंद कनै। आंरो मुकाम ‘लखा’ गांम री गढी में। लखा, नीमली, भाडली, जिंझणयाल़ी, अर कोहरो गांम में ‘खोखर’ राजपूत ई बसता। चूंकि ऐ कोई जागीरदार नीं हा बल्कि आडा राजपूत हा। इण सारू कोहरो अर लखा रा खोखर झिणकली रै चारणां री जमीन ई हासल सूं जोतता। ऐ जिकी जमीन जोतता वा नेपाल़ू जमी ही अर ढाकणिया खड़ीन रै नाम सूं चावी ही।

खोखरां रो मन बदल़ियो कै ऐड़ी उपजाऊ जमी कीकर ई चारणां सूं खोसली जावै। सो खोखरां जैसलमेर रै हाकम नै कह्यो कै पैला जमी अठीनै सूं मापी जावै। चारण मारवाड़ रा वासी है पण अरड़फबाऊ जमी माड़ री दबियां बैठा है। आ सुणर हाकम आदेश दियो कै जमी ढाकणियै खड़ीन कानी सूं मापी जावै। आ बात जद झिणकली पूगी तो मौजीज चारणां आय जैसलमेरियां नै समझाया कै आ जमी म्हांरी कदीमी। जैसलमेर रो ई में लावलेश ई नीं। आ सुणर खोखरां कह्यो कै – “म्हे जैसाण रा वासी ओ खड़ीन खड़ां। थे सगल़ा आ बात जाणो।”

जणै चारणां कह्यो-“रे गुणचोरां ! एक तो जमी थांनै जोतण नै दी। हासल थे दियो जियां लियो। गुण मानियो जको तो दीठो उलटी म्हांरी ई जमी दबो!”

खोखर मानिया नीं। वाद बधियो। समकालीन कवि गुलाबजी ऊजल़ (ऊजल़ां) लिखै-

मूल़ो महतो मेल, चौड़ै ज कीना चाल़ा।
मूल़ो महतो मेल, रैवस्यां गांम रुखाल़ा।
मूल़ो महतो मेल, खान भेल़ा खूटोड़ा।
मूल़ो महतो मेल, तीन जादम तूटोड़ा।
ऐतरी फौज लियां अवस, नसते दरहे नार री।
रणबीच आज फौजां रमै, हुई बात हुंकार री।।

जमी मपण लागी जणै चारणां भेल़ो हुय विचार कियो कै आपां कनै इण अत्याचार रो प्रतिकार करण रो एकमात्र उपाय है जमर करणो। पण जमर करणो कोई सहल़ नीं। कुण जमर करै? सेवट ओ तय हुयो कै शीलां माऊ समझणा, दाठीक अर हिम्मत वाल़ी है। उणां सूं सलाह करी जावै। वै जिण मारग घालसी आपां पड़ांला। जणै शीलां माऊ नै भाडली सूं लावण सारू उणां रै बेटे सारंगधरजी नै मेलिया।

सारंगधरजी जाय आपरी मा नै कह्यो कै – “माऊ इणगत आपांरै खड़ीन ढाकणिया माथै वाद बधियो। चारण भेल़ा हुया पण बात बणी नीं। सेवट तय हुयो कै जमर करांला। जणै आपनै तेड़ाया है कै आगै चारणां नै कांई करणो चाहीजै?”

आ सुणतां ई शील़ां रा बाल़ चरड़ दैणी ऊभा हुयग्या। आंख्यां लाल चुट हुयगी। वै बोल्या – “इणमें सलाह री कांई बात ? हूं मरी थोड़ी हूं! जीवती बैठी हूं! जमी रै कारण हूं जमर करसूं” –

जमी काज आद जल़णो जरूर।
कियो काल़का रूप धारण करूर।
~अनोपदानजी बीठू

इतरी कैय वै आपरै बेटे नै कह्यो – “हाल डीकरा।”

शीलां रो ओ विकराल़ रूप देख भाटियां री सहुवाल़ियां कह्यो – “बाईसा आप इयां मत जावो। रुघजी ठाकर गांमतरै ग्योड़ा है उणां नै आवण दो। म्हे आपनै पाछा पूगावण हालसां।”

आ सुण’र शीलां कह्यो – “नीं व्हाला! हमै हूं अठै एक पल ई नीं रुक सकूं। म्हनै नवलाख रो बुलावो आयो।” आ कैय वै आपरै बेटे साथै टुर पड़िया। आगै शीलां माऊ अर लारै भाडली रा केई मिनख। सीधा ढाकणिया ढूका।

शीलां माऊ आवतां ई कह्यो – “रे खूटोड़ां! खज खायां पेट भरीजै अखज खायां नीं। आ जमी म्हांरी नै म्हांरै बाप-दादां री। थे कुण हो मापणवाल़ा?”

आ सुणर खोखरां कह्यो कै – “इण हाकलां सूं डरणिया बीजा। म्हे राजपूत हां। ऐड़ी डफरायां सूं नीं डरां।”

इतरी सुणतां ई शीलां रै क्रोध रो कोई मापो नीं रह्यो। उणां चारणां नै कह्यो “इण कुछत्र्यां रा दिन खूटा। जमर री तैयारी करावो।”

आ सुणर उठै बैठा घूहड़ां रा घूहड़ गोमजी कह्यो – “आप जमर करोला ! म्हे कीकर पतीजां? म्हांनै धीजो दो।”

शीलां माऊ उणी बखत गांम सूं सीधै रो समान मंगायो। उणनै अगन माथै चढाय आपरै हाथां उकल़तै घी में सैंतल़ सेक सीरो बणाय चारणां नै पुरसियो। लोगां देखियो कै शीलां रै हाथां रै कीं नीं हुयो।

शीलां माऊ लोगां नै जीमाय पाछी धाकल करी कै म्हारै जमर री तैयारी करावो। आ सुणर भल़ै गोमजी पाछो कह्यो कै – “आप पकांयत जमर करोला ईज आ कीकर मनै?”

इतरी सुणतां ई शीलां आपरै बेटे कनै सूं कटारी लेय दोनूं थण चीर’र थाल़ में लेय अगन में आपरै हाथां होमियां-

थण काट आपरा भरै थाल़।
होमिया अगन में निज हथाल़।
~अनोपदानजी बीठू

अर करड़ी मींट सूं गोमजी साम्हो जोवतां पूछियो कै – “बगनीघोन पतियायो कै नीं?” माऊ रै आंख्यां सूं बरसती अगन सूं डर’र गोमजी पगां पड़तो बोलियो – “माऊ भूल हुई। माफी दे।” शीलां कह्यो “चिता री चिणावो।”

चिता चिणीजी। हाकम आपरै हजूरिया नै कह्यो कै – “जावो रे चिता बिखेरदो। ऐ भोपाडफरी घणी ई दीठी।”

आ सुण’र सात हजूरियां आगै पैंड दिया। हजूरियां नै आगै बढता देख’र शीलां माऊ रो ख्वास भभूतोजी मरण संभियो पण माऊ रै तेज सूं हजूरी चिता रै हाथ लगावण सूं पैला ईज तड़ाछ खाय पड़िया। जको पाछो सूंवो ई नीं हुइज्यो। आ देख हाकम आपरै साथै आए मेहर मुसल़मानां नै कह्यो – “जावो रे! थे आ चिता बिखेर दो।” मेहरां कह्यो कै – “म्हे लड़़ण जरूर आया हां। म्हे भलांई मुसल़मान हां पण जतियां-सतियां रो स्वभाव जाणां। जिकै जीवतै शरीर जल़ावै उवां सूं देव थरका करै पछै बापड़ै मिनखां री कांई जनात? म्हे ऐड़ो अजोगतो काम न आज करां अर नीं काल।”

शीलां माऊ रै चिता माथै बैठतां ई देवजोग सूं अगन प्रजल़ी–

शीलां अगन सिनान, ऊजल़ कियो उण वारां।
जल़ै कोई जीवतां, जस रहसी जुग चारां।
अगन री बात पड़ती अवस, आपो जीव उबारणां।
सत्त तो आज शीलां कियो, चावल़ चाढ्यां चारणां।।
~गुलाबजी ऊजल़

अगन प्रजल़तां देख’र जैसल़मेर राज रा मिनख पड़ छूटा। पण जको लायणो लगायर गया उणरी आंच सूं मूहतै अर हाकम रै घर साथै खोखरां रा घर ई नीं बच सकिया। हाकम जोरजी पुरोहित रो बेटो उणी दिन कुजोग सूं जांफली रै कुए में पड़ग्यो अर मरग्यो तो मूहतो खुद रात रो गढ में सूतो अर दिनूगै मर्योड़ो लाधो। खोखरां रै घरै घणा कुटाणा हुया। महारावल़ रणजीतसिंह रो एकाएक बेटो लालसिंह उणी रात पलंग माथै पड़ियै चिरल़ाट करी अर तड़ाछ खाय पलंग सूं पड़ियो। पड़तै रा ई प्राण नीसरग्यो। रणजीतसिंह निरवंश गयो–

खोखर सब खाया दुष्ट दबाया, गांम झिणकली जस गाया।
रणजीत रुल़ाया गर्व गल़ाया, गढ सूना कर गणणाया।
चारण हरखाया परचा पाया, वंश बधाया जस वरणी।
शीलां सुख करणी आयां सरणी, दे धन धरणी दुख हरणी।।
~भंवरदानजी बीठू झिणकली

जैसल़मेर रै किलै में घणा विघन हुया। शीलां रै डर सूं रात रो गढ में सरणाटो पसर्योड़ो रैवतो–

सूनो कोट सांभरै, करै भणणाट जु भाल़ी।
आधी रात जो उपड़, करैसणणाट सचाल़ी।
सगत्यां नवलाख साथ, तड़ित रमती नित ताल़ी।
जादम जिण जोविया, डारण घंटियां डाढाल़ी।।

शील़ां चारणाचार नै मंडित कियो-

दोहूं पख दीपिया, आप दोहूं उजवाल्या।
रतनू बीठू राण, दोय धरा जस चाड़्या।।
~गुलाबजी ऊजल़

शील़ां माऊ देवी रै रूप में पूजीजै–

घूघर पद घुरत रमत नित रामत,
इल़ आवड़ अवतार इसी।
शंकर घर जलम लियो जे शीलां,
दुसमण डरप्या दिसो दिसी।
करनल ज्यां कोप व्हैण जे बंका,
जस डंका जुग च्यार जमै।
सिमर्यां नित साद सुणंती सांप्रत,
राजल शीलां रास रमै।।

शीलां माऊ रै नाम माथै चारणां उणी दिन 600बीघा जमीन गोचर कर दीन्हीं। जठै आज गायां चरै अर पुन्न बधारै। शीलां माऊ रै सुजस री सोरम आखै राजस्थान में पसरी कै किणगत इण चारणी अत्याचार अर हठधर्मिता रै प्रतिकार सरूप अगन में जीवत सिनान कर’र आपरी कुल़ परंपरा री इण बात नै अखी राखी कै अत्याचार रै सामनै मर जाणो पण झुकणो नीं।

पूर्ववर्ती कविया़ं रो अंजसजोग काव्य पढियां पछै इण ओल़्यां रै लेखक ई कीं ओल़्यां शीलां माऊ रै सुजस में लिखी–

गीत झिणकलीराय शीलां माऊ रो

।।दूहा-सोरठा।।
होवै ना होडांह, सगत शीलां री सांपरत।
कीरत धर क़ोडांह, रीझ दिराई रतनुवां।।1

सतवट मारग साज, कुऴवट दीधी कीरती।
इऴ धिन कोडां आज, ऊजऴ रतनू आपसूं।।2

जाहर बातां जोगणी, मारवाड़ धर माड़।
रँग शीलां रखवाऴिया, जोर झिणकली झाड़।।3

।।गीत प्रहास साणोर।।
तूं शंकर रै सदन अवतार ले शंकरी,
पखो नित धार रखवाऴ पातां।
जगत में जाण जयकार मुख जापियो,
साच सुख सार ज्यां दियो सातां।।1

ताकड़ी बहै इम केहरी ताणवां,
सिमरियां भाणवां साय शीलां।
पाणवां शूऴ धर रचै हद प्रवाड़ा,
हाणवां उपाड़ै हियै हीलां।।2

धरा धिन रतनवां मात बण धीहड़ी,
दुरस जग बात आ बहै दीठू।
जोगड़ा साथ गंठजोड़ नै जामणी,
विमऴ जद जात तैं करी बीठू।।3

चाड सुण चढी तूं मदत झट चारणां,
हाड निज होमिया नकू होडां।
गाढधर झिणकली अरिदऴ गंजिया,
कीरती माडधर दीध कोडां।।4

ढाकणियो लोवङी पलै इम ढाकियो,
राखियो लोयणां कोप रातां।
जोय जैसाण रां भऴै नीं झाँकियो,
वीदगां भाखियो सुजस बातां।।5

गीत कथ कीरती रखण थिर गहरता,
डीकरां जीत नै धरा दीधी।
रूठ नै रुऴायो राव रणजीत नैं,
साख आदीत नैं लेय सीधी।।6

झिणकली तणा रखवाऴिया झाडखा,
गरब तैं गाऴिया विघनगारां।
वीदगां तणा धिन विमल़ दिन वाऴिया।
टाऴिया विघन चढ जमर तारां।।7

अमर अखियात आ इऴा रै ऊपरै,
गढवियां गुमर धिन बात गाढी।
सुमर कथ अंजसियो पी’र नै सासरो,
चमर कर लाख-नव सिंह चाढी।।8

खोखर खऴ खपाया उणिपुऴ खीझ नै,
कोप कुऴ केविया शीश कीधो।
चावऴ तैं चढाया वंश इऴ चारणां,
दोयणां गेह में ताप दीधो।।9

वसुधर ऊजऴी जात सह वीसोतर,
वऴोवऴ ख्यात री बहै बातां।
मात तन होम नै सांसणां मंडिया,
जाय ना जिकै ऐ जुगां जातां।।10

भणै कवि गीधियो गीत ओ भाव सूं,
चाव सूं यादकर तनै चंडी।
तुंही मम उबारै सोच अर ताव सूं,
जात री आब रख आभ झंडी।।11

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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