रतनू-रतनमाल़ा

मान कमध रै माथ, धणी रूठो छत्रधारी।
जद घिरियो जाल़ोर, भड़ चढै बल़ भारी।
हियै वीर हैकंप, धीरता छूटी धीरां।
उण वेल़ा अजरेल, गाढ तजै गँभीरां।
मयाराम नै नर मेघड़ो, कुशल़ इंद वर कीरती।
रणबीच झली उर रतनुवां, चढ तरवारां चीरती।।

जैत महाभड़ जोर, वाह कह दुरस बखाण्यो।
हुवो वीर हरपाल़, जगत सगल़ै जस जाण्यो।
कुशल़ धरी करवाल़, सकज्ज कुड़की सुधारण।
महादेव कज मेस, मरट धर अरियां मारण।
साम रै काम लख सूरमां, गरब शत्रुवां गाल़ियो।
ऊ माग मरण रतनू अवन, ईहग वरण उजाल़ियो।।

उर रा जिकै उदार, मही आदर सूं मानै।
प्रभातै जस पैल, करां कीरत वां कानै।
रतनू रायांमल्ल, रंग अनियो रीझाल़ू।
सांढां बांको सकव, प्रिथी धिन पंगी पाल़ू।
अजो नै गंग अवनी अमर, वित्त बत्थां भर बांटियो।
दिस दिसा नाम चावो दखां, लोभ करै जस लाटियो।।

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