सैणी-सुजस

।।दूहा।।
आरत सांभळ ईसरी, कवि सुधारण काज।
बीसहथी घर वेद रै, हिव आई हिंगळाज।।१

धर गुजर धणियाप धर, सैणल रूप सहाय।
आयल तनुजा ऊपनी, सदन वेद सुरराय।।२

अकन-कुंवारी रहण इळ, वसुधा राखण बात।
बुई सजा रथ बैलियां, गाळण हिमगर गात।।३

जुढिये आई जोगणी, पड़ियो लूणो पाय।
कोयर निरमळ नीर कर, महर लहर महमाय।।४

बीसहथी जुढिये विमळ, धरी तेंह धणियाप।
सोनथळी सज संकरी, अघहर राजै आप।।५

।।छंद – रेंणकी।।
लाळस कव लूण एक ही लिवना,
रात दीह हिंगळाज रटी।
वीदग रै घरै बेकरै बाई,
पह निज देवी तूं प्रगटी।
सकळापण जांण आंण ले सरणो,
नत हुय सुर नाग नमै।
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।१

बींझाणंद पात तणी सुण वीणा,
सुर झीणां पर रीझ रही।
बांधी निज फेर भांचलिये वचनां,
कव मन री इम मांड कही।
गूंघट तो तांण वणो मो घरणी,
थिर कर आणंद हाथ थमै।
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।२

तद ही सुरराय बींझ पर तूठी,
बात कही हिव पात वरां।
मांगूं सो आप मास खट मांही,
तूं पूरै अह वचन तरां।
पड़ियो नह पार बींझ रो पड़पच,
हिमगर बुही गळण हमै।
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।३

धरती गुजरात छोड मुरधर में,
वेदाई रथ जूप वळी।
सज लोवड़याळ झूलरां सांप्रत,
मारग सथ नवलाख मिळी।
ऊंचा ऐवास धोरियां ऊपर,
थळ करवा झट बैल थमै
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।४

पावन धर रेत बिछायत परकत, रसधर मारुत बाज रही।
सुंदर तर गहर नींबड़ा सोभत,
मिंमझर सूं दिस महक मही।
जिण पर सुमेहर लहर कर जाहर,
जुथ जुढिये इण काज जमै
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।५

लाळस कव लूण संकरी लुळ लुळ,
गुणियण चरणां छांह गही।
हरणी मन चिंत हेतवां हरदम,
समरथ आसा पूर सही।
लुणासर नीर गंग जळ लेखे,
तरणी पातां कियो तमै।
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।६

पड़ियो भड़ माल आय तुझ पावां,
कर जोड़ै निज हाल कहै।
सोनगरै तणो मरम लख सगती,
देखै भगती मूंछ दहै।
खीझी पतसाह सीस खिलजी रै,
देख त्रिसूळां दूठ दमै
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।७

आई धणियाप लाळसां ऊपर,
चहुंवळ बातां ऐह चलै।
थिरकर यूं थान थापियो थळवट,
तद जुढियो जोधांण तुलै
दैणी वरदांन दास दुख दाटण,
प्रातै चरणां तो प्रणमै
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।८

आवड़ धर रूप माडधर ओपै,
कोपै असुरां नास कियो।
चांचळवै तूंह सूरमदे चावी,
वसू राजला रूप बियो
गीगाई भीर तुंही गढवाड़ां,
परवाड़ां कुण पार पमै।
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।९

मालणदे तुंही बिराई मांहै,
देवल तूं धर धाट दिपै।
जांगळ मे तुंही करनला जोगण,
इळ देसांणै अणंद अपै।
बिरवड़ मेवाड़ गूजरधर बैचर,
नेस नागवी देस नमै।
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।१०

थळवट थांन दासोड़ी ठावो,
जग चावो बीकांण जठै।
राजै महँमाय चँदू हुय राजी,
तूं धर माजी रूप तठै।
शीलां सुरराय झिणकली जोगण,
थिर पातां पतवार थमै।
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।११

गढवी निज गांम दासुडी गिरधर,
आयल सुद्ध मन सुजस अखै।
तूं बिखमी वेर हेर नित टाळण,
पाळण सेवग आव पखै।
मानै महँमाय वंदना म्हारी,
कवि आखरां मेट कमै
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।१२

।।छप्पय (कल़श)।।
लाळस कवियण लूण, ओळख पड़ै पग आतां।
निरमळ जुढिये नीर, पह कियो कज पातां।
मूंछ बिनां भड़ माल, सधर मर लाज सदाई।
जिण तूठी जग साख, मूंछ दीनी महँमाई।
पवाडां असंख प्रथमी पुणै, जाणूं नह हूं जैणला।
टेरतां मात गिरधर तणो, (तूं)सुणजै हेलो सैणला।।१

ऊंचा थळ ऐवास, विमळ धर रेत बिछावण।
सोनथळी सज साथ, रास नवलाख रचावण।
नत हुय सुर नर नाग, नाक रख चरणां नम्मै।
सो रीझै सुरराय, गहर दुख दाळद गम्मै।
जुढियांणराय गिरधर जपै, वेदसधू सुण वैणला।
आधलै साद आवै अवस, सापरत मदती सैणला।।२

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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