शरणागत पंखी रै सारू मरणिया !!

महात्मा ईसरदासजी आपरी काल़जयी कृति ‘हाला-झाला रा कुंडलिया’ में लिखै कै “सिंह रा केश, नाग री मणि, वीरां रो शरणाई, सतवंती रा थण अर कृपण रो धन फखत उणां रै मरियां ईज दूजां रै हाथां पड़ै, जीवतां नीं। जे ऐ जीवता है ! अर कोई इणां री इण चीजा़ं रै हाथ घालै, तो घालणिये नै मरणो ईज पड़ै। उणां आ बात किणी अटकल़ पींजू डोढसौ री गत नीं लिखी बल्कि कानां सुणी अर आंख्यां देखी रै मेल़ सूं मांडी-

केहर केस भमंग मण, शरणाई सूहड़ांह।
सती पयोहर कृपण धन, पड़सी हाथ मूवांह।।

रजवट रै पारखी इण कवेसरां शरणागत री रक्षा अर सामधर्म रै सारू मरणिये नै सिरै मानियो। मध्यकाल़ीन वीरां रा दाखला देखां तो ऐड़ी घणी अजरी घटनावां आपांनै पढण कै सुणण मिलै। ज्यांनै पढियां कै सुणियां उण वीरां रै जीवणमूल्यां, जीवनादर्शां, अर जीवतै जमीर माथै अंजस आयां ई सरै।

ओ हो! कैड़ा बजराग हा जिकै खुद री रक्षार्थ नीं बल्कि शरण आय पड़णिये नै बचावण सारू प्राण होम आपरो अर कोम रो नाम अखी करग्या। सही है, जीवण है कांई ? अर मरण है कांई ? इण पेटे आपां रै मनीषियां रो विचार नितांत खुलो हो। उवां कह्यो है कै जस ई जीवण हैअर अपजस ई मरण है-

जस जीवण अपजस मरण, कर देखो सह कोय।
कहा लंकपति ले गयो, कहा करण गो खोय।।

जस देह सूं जीवणिये सूरां में एक गरवीलो नाम है मूंजैजी सोढै रो।
कवियां कह्यो है कै-

सोढा ऊमरकोट रा, गया जमारो जीत।
ज्यांरै मंगल़ धमल़ में, गवरीजै जस गीत।।

पण ओ वीर ऊमरकोट रो सोढो नीं हुय’र पारकरियो सोढो हो। सोढां में दो धड़ा है अर दोनूं ई धड़ीम।

सोढै धरापसाव रै बेटे दूरजणसाल री संतति धाटेचा अर आसराव री ऐल़ रा पारकरा सोढा बाजै।

पारकर माथै बारहवीं सदी में रतनसी सोढो राज करतो। उणां रै च्यार बेटा- अखोजी, आसोजी, लखधीरजी अर मूंजोजी।
रतनसी दातार मिनख हा। उणां परबतजी मीसण नै करोड़ पसाव कियो। बांकीदासजी आपरी ख्यात में लिखै-
“मूल़ी रै धणी रतन सोढै उवा(उगां) साथवियां (आथवियां) बिचै परबत मीसण नै करोड़ दीनो, पचास लाख नगद, पचास लाख भरणो।”

हालांकि कविराजाजी, रतनसी नै मूल़ी रो धणी लिख्यो है पण मूल़ी इणां रै बेटां बसाई।

कुजोग सूं पारकर रै धणी रतनसी रो मोटयार गाल़ै में सुरगवास हुयग्यो। जद इणां राम कियो उण बखत इणां रो बेटो मूंजोजी आपरी मा जोमाबाई री कूख में हो। इण सारू जोमाबाई सत नीं कियो अर आपरै बेटां नै हिंवल़ास दे मोटा किया। एक’र जोग ऐड़ो बणियो कै पारकर धरा माथै अराड़ो काल़ पड़ियो। मवेशियां रै चारै रो तोड़ो आयो जणै जोमाबाई आपरै बेटां नै कह्यो कै –
“जठै चारो हुवै अर लंबो झूंसरो हुवै उठै हालो।”

सोढां आपरो गोल़ गाडो घालियो अर सोरठ कानी बहीर हुवण लागा जणै सोढै अखजी आपरै भाई लखधीरजी नै कह्यो कै –
“तूं अर मूंजो गोल़ साथै जावो अर हूं अर आसो अठै बसी में रैवां।”

इणां री आ बात सुण’र जोमाबाई कह्यो कै –
“हूं ई गोल़ साथै जासूं। डीकरा पारकै देश जावै तो पछै हूं अठै कांई रुखाल़ूं ली?”

उण बखत इणां रै साथै दूजै सोढां टाल़ भाटी, रतनू, सुथार, राईका आद जात रा मिनख हा। भाटी अर रतनू खूमजी रा वंशज रतनू माड सूं मारवाड़ अर मारवाड़ सूं पारकर सोढां कनै गया परा अर उठै ईज बसग्या। जद सोढा, सोरठ कानी जावण लागा जणै ऐ ई इणां रै हेत बंधिया साथै गया परा।

लखधीरजी भगत अर इष्टबल़ी आदमी हा। उवै आपरै आराध्य देव रा दरसण कियां बिनां अंजल़ नीं करता। जठै गोल़ रातवासो लेतो उठै सूं लखधीरजी आपरी घोड़ी हंसली माथै जीण कर’र चढता जको परगाल़(सुबह) आपरै गांम भगवान रा दरसण कर’र अंजल़ करता। ओ थित रो नेम। तर-तर दूरी बधण लागी जणै भगत रो मन चल़विचल़ हुवण लागो। भगत रो मन आकल़बाकल़ देख एक रात भगवान लखधीरजी नै सुपनै में कह्यो कै-
“सवारै तूं देखजै कै थारी गायां मांय सूं कोई बाछड़ी जिण जागा खुराल़ी करै तो तूं अजेज उण जागा नै खोदजै। म्हारी मूरत निकल़सी। उवा मूरत साथै ले जाई अर दरसण कर लेई। थित पाछो गांम मत आई। आगै जठै-कठै ई थारै रथ री धुरी टूटे उठै ई देवाल़य थाप देई। म्हैं उठै ई थारै सागै हूं।”

सवार’र रा गोल़ रवाना हुयो अर मांडव गांम रै पाखती पूगा तो देखियो कै एक टोघड़की एक जागा पगां सूं खुराल़ी करै ही। लखधीरजी उठै खाडो खोदायो तो एक मूरती निकल़ी। उणां ‘मांडवराय’ नाम दिराय मूरत रथ में रखाई अर आगै बहीर हुया।
बैतां-बैतां गोल़ सोरठ री एक खल़कती नदी रै अधबीच पूगो। लखधीरजी देख्यो कै रथ री धुरी टूट चूकी है। जिणसूं रथ नीं आगै सिरक रह्यो है अर नीं पाछो। जणै उणां आपरै प्रभु सूं वीणती करी कै-
“हे नाथ! थारो आदेश है कै हूं थारी शरण में अठै ईज बसूं तो रथ नदी रै कड़खै ले हाल।”

किंवदंती है कै रथ अचाणक टुरियो अर नदी रै कांठै आयग्यो। लखधीरजी उठै मांडवरायजी री मूरत थाप दी अर गांम बसावण री तेवड़ उठै रै धणी सूं रजा लेवणी तेवड़ी। पतो करायो तो ठाह लागो कै आ धरती वढवान रै बाघेलां री है अर बाघेलां रै धणी रो नाम वीसलदेवजी है।

लखधीरजी आपरी घोड़ी चढिया अर वीसलदेवजी रै दरबार पूगा। उणां देखियो कै वीसलदेवजी चौपड़ रमै हा। चौपड़ में इतरा रमग्या कै उणां लखधीरजी कानी घणी ताल़ निजर ई नीं करी। जद निजर पड़ी तो वीसलदेवजी, लखधीर री धीरता अर गंभीरता सूं प्रभावित हुय’र बिनां ओल़खाण काढियां ई चौपड़ रमण नै तेड़िया। लखधीरजी चौपड़ में पारंगत अर मनमाफक पासा लावण में प्रवीण हा। उणां री इण चतराई सूं वीसलदेवजी रीझिया तो साथै परिचय अर आवण रो कारण पूछियो।
लखधीरजी हकीकत बताय’र फलाणी जागा गांम बसावण अर गोल ठांभण री रजा मांगी।

वीसलदेवजी कह्यो-
“म्हारै तो उवा जमी फांफरियो अर बंजड़ है। आप बिनां पूछियां बसता तो ई हूं ऊजर नीं करतो। हमे तो आप पूछ लियो जणै जी करता बसो पण गोचर छोड’र।”

लखधीरजी उठै गांम बसायो जिणरो नाम उणां आपरी धरमबैन मूल़ी रै नाम माथै ‘मूल़ी’ राखियो।

वीसलदेवजी रै दरबार में लखधीरजी रो रुतबो बधतो गयो जिणसूं उठै रा स्थानीय राजपूत चभाड़ ईसको करण लागा तो मन ई मन में आ तेवड़ली कै किणीगत इण भुरट नै अठै सूं काढियो जावै।

एक दिन चभाड़ां देखियो कै लखधीरजी अर वीसलदेवजी चौपड़ रमै हा। डाव बेगा सल़टण वाल़ा नीं हा सो चभाड़ आपरा पांचसौ आदमी ले शिकार रै मिस मूल़ी माथै चढिया। उणां मारग में एक झखलर(तीतर) माथै बाण कै गोफणियो छोडियो। ज्यूं-त्यूं ई तीतर बचियो अर उडियो जको जोमाबाई रै पूजा रै बाजोट नीचै जाय मूल़ी में लुकियो। चभाड़ ई उडतै तीतर रै लारो ई लार मूल़ी ढूका। घोड़ां री पोड़ां सुणी तो सोढा ई सजिया। चभाड़ां आवत़ां ई कह्यो कै –
“म्हारो शिकार उरिया(इधर) देवो।”

इन्नै माल़ा फेरती जोमाबाई देखियो कै एक अबोल पंखी फतकतो बाजोट नीचै छापल़ियोड़ो है। उणां हाथां में लेय दुलारियो। प्रेम री भाषा पशु अर पंखी सब समझै। तीतर रै जीव में जीव आयो। अठीनै चभाड़ां हाको कियो कै-
“म्हारो शिकार देवो नीतर मरण संभो।”

हाको सुण जोमाबाई बारै आई अर चभाड़ां कानी खरी मींट सूं देखतां कह्यो-
“कांई स्याल़ियां दांई हूकी-हूकी कर रह्यो हो? गाभां सूं तो राजपूत अर आचरण सूं चंडाल़ लागो!! कांई थांनै ठाह नीं है कै ओ राजपूतां रो बास है। राजपूत शरणाई खातर मर सकै पण शरणाई नै नीं सूंपै। आ बात थे नीं जाणो? पछै ओ पंखीड़ो तो म्हांरै नीं मांडवरायजी री शरण आयो है अर धणी रो आदेश है कै म्हैं नकतूण्यां बायरो फरूकै जितै इणरी रक्षा करां।”

चंभाड़ तो बियां ई लड़ूं-लड़ूं हुयोड़ा हा ई अर पछै माजी रा बोल सुण विभरग्या अर बोल्या तो –
“संभो इण एक तीतरिये कारण मरण नै।”

“जावो रै कांगां! राजपूत कोई लाभ देख’र शरणाई री रक्षा थोड़ी ई करै? राजपूत आपरी रजपूती री रक्षार्थ शरणाई खातर मरै। जे नीं मरै तो पछै आ करद क्यूं धारै? इण करद रै डर सूं ई तो जमदूत इण अवधूतां सूं कानो लियां बैवै-

जमराण पाव पाछा धरै,
देख मतो अवधूत रो।
किरतार हाथ दीधी करद,
ऐह विरद रजपूत रो।।

“तो कांई थांरी इण हल़काई सूं डर’र सोढा ओलो तकैला अर थे म्हांरै हाथ सूं इण तीतर नै झपट लो ला?” जोमाबाई कह्यो।
जोमाबाई रै इण अंतस भावां सूं मेल़ खावतो एक गीत किसनसिंह गौड़ रो ई है। कवि लिखै कै जिण सूर री पीठ शत्रु अर जिण स्त्री रो शरीर जार देखले तो पछै किसो तो उवो वीर है अर किसी उवा स्त्री है? धूड़ है दोनां रै सूरमापणै अर सूरत री सुंदरता में-

पेखे पिंड पिसण जिकां रो पूठो,
देखे जार बदन उणिहार।
किसन कहै सूरत सत केहा,
नर केहा अर केही नार।।

जोमाबाई आपरै बेटे मूंजैजी नै आज्ञा दी कै –
“बेटा जिको राजपूत सेर सूत धारै उवो जे शरणाई री रक्षा में शंको करै तो उणरै माजनै में धूड़ है। आज म्हारो दूध ऊजल़ो करण रो अवसर है। इण अबोल तीतर री रक्षा कर। आ मत सोचजै कै ऐ घणा अर थे थोड़ा हो। जस हमेशा सतधारियां रो रैवै। राजपूत तो आगै ई कीरत रै कारण सीस कटावता आया है-

कापिया ज्यां सीस कीरती कारण,
खत्रियां आगै कहै खंगार। “

मा रा ऐ बोल सुण सोढो मूंजोजी मरण मतै हुय रण मैदान में आयो। किणी कवि लिख्यो है कै जिकै अडगता रै साथै बगतर पैर’र आपरै सीस माथै रूठिया बैवै उणां सूं दई(ईश्वर) ई चांपो खावै-

पहरण बगतर अडगपण, हीयो वडधर ज्यांह।
सिर ऊपर रूठा फिरै, दई डरप्पै त्यांह।।

जोर जुद्ध हुयो। जिणमें सोढै मूंजैजी आपरी खाग रो पाणी बताय टणकां रै आडी टग्ग दी पण पग पाछा नीं दिया। एक तीतर पंखी नै अभयदान देवण सारू एक वीर फूंटती मूंछां रै साथै वीरगती वर सुरग पूगो-

खागां वागां खिर पड़ै, परतन छोडै पग्ग।
रंग अणी रा रावतां, टणकां आडी टग्ग।।

जिण वंश में भोज, जगदे अर विक्रमादित्य जैड़ा दातार जनमिया उणी ऊजल़ कुल़ में मूंजो जनमियो-

जिण कुल़ में जगदे जिसा, भोज जिसा दातार।
जिण कुल़ बीको जनमियो, अइयो वंश पंवार।।

इण तीतर री रक्षार्थ हुई लड़ाई रै पेटे बांकीदासजी आपरी ख्यात में लिखै-

“पड़ै छवाहड़ पांच सौ, सोढा वीसां सात।
ऐकण तीतर वासतै, इण राखी अखियात।।
छवाहड़ां नूं मार पराकरां सोढां मूल़ी लीधी।”

यानी तीतर नै मारण री तेवड़ आयोड़ाका चभाड़ 500सौ मरिया अर रुखाल़ी करणिया फखत 140 मिनख मरिया।
आ बात उल्लेखणजोग है कै तीतर री रक्षार्थ मरणियां में महाभड़ मूंजैजी रै साथै 45 सोढा, 24 मसाणी साधू, 20 राईका, 12 भाटी, 3 रतनू चारण, 16 सिपाई, 5 पटेल, 7 सुथार, अर 8 वजीर वीर हा। जिकै एक तीतर री रक्षार्थ सुरगपथ रा राही बण आ सिद्ध कर दीनी कै मरणो ई है तो जसनामो कर’र मरणो। मावदानजी रतनू आपरी पोथी ‘यदुवंश जस प्रकाश’ में तीतर सारू मरणिये भड़ां रो एक जूनो दाखलो इण गत दियो है–

पैंताल़ीस पमार, मुवा वीस खेर मसाणी।
बार भाटी वरदेव, त्रण रतनू खूमाणी।
रण चौबीस रायका, सोल़ लसकरी सिपाई।
जंग रच्यो चहूं ओर, घणा आवै बहु घाई।
पट्टेल पांच सुतार सात, बेढक आठ वजीर अति।
रण बांधी खाग रतनेस रो, मुंजो लड़ियो महमती।।

ज्यूं ई इण लड़ाई री बात वीसलदेवजी रै दरबार पूगी तो लखधीरजी घोड़ी चढ मूल़ी आया। उणां देखियो कै उणांरी मा जोमाबाई मूंजै नै खोल़ै में लियां लखधीर नै उडीकै ही। ज्यूं ई उणांरी अर लखधीरजी री आंख्यां मिल़ी जणै लखधीरजी कह्यो –
“मा मूंजो तो सुरग रो वटाऊ हुयो। शरणाई री रक्षा कर’र आपरो धरम निभायो। सो इणरै मरण माथै आंसू मत नांखजै।”

इतरो सुणतां ई जोमाबाई कह्यो-
“नीं, रे डीकरा। रजपूतण बेटे नै मोटो ई कारणै ई करै कै वो रजपूती रै चावल़ चढावै। रोवती तो हूं जणै कै मूंजो कायरोपणो जतावतो। ओ तो म्हारै कैवण सूं मोत नै ललकार’र मरण नै धिन कियो है। हमे हूं ई रै साथै ई सुरग जासूं। जिण दिन थारै बाप राम कियो हो उण दिन ओ म्हारै पेट में हो सो हूं थारै बाप साथै काठ नीं चढ सकी पण आज डीकरै नै खोल़ै लेय सुरग जाऊं। थे लारै सुबस बसजो अर सत मत छोडजो।”

धिन है ऐड़ै सतधारी नर-नारियां नै जिकै निस्वार्थ भाव सूं एक पंखी रै कारण मरण मारग अंगेज’र आपरो मिनखाधरम निभायो।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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