शरणाई राजपूत रै कारण अगन रो वरण

चारणां में बीठूजी री वंश परंपरा में गांम साठीका(बीकानेर) में बोहड़जी मोटा कवेसर हुया। इणां री ज वंश परंपरा में धींधोजी हुया। धींधोजी री वंश परंपरा में रासोजी धींधा हुया जिणांनै खाबड़ियां झिणकली(बाड़मेर) गांम दियो। कोई कैवै उदयसिंह खाबड़िया ओ गांम दियो तो कोई कैवै रिड़मल खाबड़िया ओ गांम दियो।

आं रासाजी री परंपरा में मेहाजी दूसलोत मोटा कवि हुया जिणांनै जोधपुर राव मालदेवजी खेड़ी गांम देय सम्मानित किया। इणी झिणकली गांम में आगै जायर महादानजी, भानोजी आद बीठू हुया। जोपियोड़ो कड़ूंबो अर भला मिनख। कनै घणी जमी घणो वित्त।

भानोजी रो ब्याव घूहड़ां रा घूहड़ नारायणजी री बेटी देमां साथै हुयो। देमां सत-शील अर अपणास री आगार रै सागै ई चारणाचार री आखड़ी पाल़ण वाल़ी लुगाई।

उण दिनां जैसलमेर माथै महारावल़ अमरसिंहजी रो राज। अमरसिंहजी वीर, धीर अर गंभीर मिनख। मोटा दातार तो साथै ई राजपूती रा प्रतीक पुरूष। कविराजा बांकीदासजी लिखै-

वैरी वेहल वरण रा, दीठा जिण जिण देस।
माड़ेचा तैं मेलिया, आभ धूंवा अमरेस।।

आं अमरसिंहजी मलोमली गुड़ा राणा साहिबखांनजी रा जोड में चरता 140 घोड़ा घेर जैसलमेर ले आया-

बल़धां खेती घोड़ां राज।
मिनखां सरै पराया काज।।

साहिबखांनजी रा घोड़ा उण दिनां घणा चावा हा। इण घोड़ां रै विषय में कानूंजी मोतीसर(माड़वा) लिखै-

घणमोला जेरै घोड़ा रै।
साखेता सोहड़ सजोड़ा रै।
दस देसां रमहर दबिया।
साहबिया बे साहबिया।।

साहिबखांनजी रो सुजस घणो पसर्योड़ो। मिनखाचार सूं मंडित अर रैयत रा रुखाल़ा मिनख। इणांरी सादगी अर उदारता विषयक ओ दूहो घणो चावो है-

धोबी कनै धुवाय, केयक नर गाहड़ करै।
मेलै कपड़ां मांय, सुजस तिहारो साहिबा।।

साहिबखांनजी पागियां सूं पतो करायो तो ठाह लागो कै घोड़ा जैसल़मेर रावल़जी लेयग्या। वै पुखता हा सो वाहर चढ नीं सकिया जणै नोरो-थोरो कर’र आधा-पूणा घोड़ा लावण नै आपरा आदमी मेलिया-

जे धन दीसै जावतो,
आधो लीजै बांट।।

पण डाकण बेटा देवै कै लेवै? वाल़ी बात ही। भाटी मांगिया घोड़ा देता तो ले जावता ई क्यूं? सो वां राड़धरां नै धक्का-मुक्की कर’र पाछा काढ दिया। इण धक्का-मुक्की में साहिबखांनजी रै भाई.. रो पोतियो पड़ग्यो। उणांनै माड़ेचां री चोरी अर शीना जोरी अखरी पण बल़ बिनां बुद्ध बापड़ी हुवै! सो उणां माथै ऊपर धूंमालो(शोक का प्रतीक) बांध लियो कै इण धक्का-मुक्की रो बदल़ो लियां ई पाघ बांधसी।

उण दिनां साहिबखांनजी रो बेटो भाखरसिंह महाराजा अभयसिंह जी री हाजरी में जोधपुर गयोड़ो हो। राजाजी सूं सीख लेय पाछो गुड़ै आयो तो उणनै पूरी बात ठाह लागी कै किणगत माड़ेचां उणरा घोड़ा उचका लिया अर उणरै मिनखां रो अपमान कियो। वो रीस में भाभड़ाभूत हुय’र आपरै टाल़वै मिनखां साथै चढियो।

उणनै मारग में बावड़ मिलिया कै उणरी दो घोडियां हरसाणी रै भाटी फतैसिंह रै घरै बंध्योड़ी है। भाखरसिंह हरसाणी रै पाखती डेरा देय भाटियां नै संदेशो पूगायो कै-
“म्हारी घोड़ियां अर चोर दोनूं म्हनै सूंपो!!”

भाटियां भाखरसिंह नै चीकणी-चौपड़ी बातां सूं राजी कर’र उठै धीजो दिरायो अर अठीनै फतैसिंह नै समाचार पूगाया कै “भाखरसिंह आय पूगो। घोड़ियां तो ले जावैला ई साथै तनै ई बेआबरू करैला।”

जणै फतैसिंह पूछियो कै – “तो म्हनै कांई करणो चाहीजै?

जणै भाइयां कह्यो कै “जितो बेगो अठै सूं निकल़ सकै जितो बेगो निकल़ अर जिती भां जाय सकै उतो आघेरो जा।”

फतैसिंह ऊभघड़ी निकल़ियो। राठौड़ां नै भाटियां रै रचियै तोतक रो ज्यूं ई ठाह पड़ियो उणी बखत उणां पग देख फतैसिंह रै लारै घोड़ा खड़िया।

घोड़ां रा लारै बाजता पौड़ अर उडती खेह सूं बीहतै फतैसिंह सोचियो कै कठै ई बिचाल़ै पकड़जीग्यो तो बुरा हाल हुवैला। इण सूं तो आ ठीक रैसी कै पाखती आए गांम झिणकली में चारणां रै अठै सरण ले लूं। आ सोचर वो झिणकली पूगो। आगै उण देखियो कै चारणां एक सहुआल़ी आपरै बाड़ै में गायां दूवै। उण आव देखियो न को ताव। सीधो जाय गाय दूहण वाल़ी रै पगां पड़तां बोलियो कै – “हूं फतो भाटी! थांरी शरण हूं। बचावो जणै आ घड़ी है।” अर पूरी हकीकत बताई।

गाय दूहण वाल़ा धानाजी री जोड़ायत देमां हा। उणां कह्यो-“रे भला मिनख! गोधां रै खसणै सूं बूझां रो खोनास है ! पण तूं करनी रा झाड़ जाण आय ई ग्यो तो निरभै हुय जा। कोई धंतरसिंह क्यूं नीं हुवै पैला म्हांरै गात घाव घालसी अर पछै थारै। जा घोड़ियां गांम में बांध दे अर उतारै में बैठ। झांकल़ कर।”

फतैसिंह दोनूं घोड़ै महादानजी रै उठै बांध’र ठयैसर बैठग्यो।

भाखरसिंह रै पागी बतायो कै फतो झिणकली गांम में बड़ग्यो। आ सुणर उण ई घोड़ा लारै धीबिया। आगै देमां माऊ आपरै बाड़ै में दूहारी करै हा। उणां देखियो कै घुड़सवार चढिया ई गांम री गल़ी में बड़ग्या!

उणां हाकल करी – “कुण हे रे करनी रा चोर? गांम चारणां रो है ! थांमे इतरो ई लोतर नीं? भला राजपूत दीखो। राजपूत ई इयां थपी मरजाद री पाज लांगसी तो पछै कुण पाल़सी?”

आ सुणर भाखरसिंह नै तमतमी आयगी। वो बोलियो – “परिया मरै कनी मरजाद बतावण वाल़ी।”

आ सुण’र देमां बोली कै – “मींडा भलै घर रो दीसै! इयां खावै ज्यूं कांई बोलै?”

आ सुणर उणनै भल़ै रीस आयगी अर बोल्यो- “बोली मरै कनी। ग्यान बगारती। म्हनै बोलणो सीखावै!”

आ सुणर देमां कह्यो – “भाऊ म्हनै लागै कै तूं मोत रै खांचियो आयो है! थारै माथै मोत भमै।”

भाखरसिंह बोल्यो – “ऐड़ी सतवादी है जणै म्हारी मोत बतावै कनी?”

“जा थारी मोत छठै महीणै हुय जावैली।” देमां कह्यो तो भाखरसिंह कह्यो-
“म्है राजपूत हूं! मोत सूं लड़तो बैवूं। छवू महीणां में किणी जुद्ध में काम आयग्यो तो लोग-बाग थारा वचन सिद्ध हुवणो मानलै। ऐड़ी डफरायां सूं बीजां नै डरावजै।”

माऊ कह्यो – “जा मूरख थारो तीजो अर म्हारो बारियो एक ई दिन हुसी!!”

“अरे जा ! जा! थारै तो अजै ई एक ई माथै री लट धोल़ी नीं हुई ! तूं मोटयार है ! कद मरै?” भाखरसिंह रीस में कैतै उण गाय रै तड़ी बाई जिणनै देमां दूवै हा। तड़ी लागतां ई गाय कूदी जिण सूं चरवड़ी छूटगी, दूध ढुल़ग्यो।

ओ खिलको देखतां ई देमां नै रीस.आयगी। बोली – “मूढ जिण जीभ सूं थूं म्हनै कटुवचन बोलियो है, वा सवारै सूरज ऊगतां ई पाणी पीवतां ई झड़ जासी। कोजी तरियां मरसी।” इतरो कैय पाखती ई झूंपड़ै रै लांपो लगाय देमां सूरज री साख में जमर चढी।

भंवरदानजी बीठू “मधुकर” (झिणकली) लिखै-

जल़िये कर जम्मर गात गनीझर,
मात देमां जगतंब मुणै।
कड़की जिम इंदर मेघ सजाकर,
हाथल़ वज्जर कंस हणै।
पड़ियो मुरछाकर भाखर पाधर,
भैरव धोखर कंध भगी।
दल़ियो भल सब्बल़ मात देमां दल़,
प्रब्बल़ हाथल़ दैत पुगी।।
**

विटल़ वाद बधियो वल़ै,
मांग लीध उण मोत।
देमां कह्यो उण दूठ नै’
बोल लियो मुख बोत।।
भास ऊगतां भाखरा,
पड़ै जीब परभात।
तूं मरसी मूरख तरां,
मुदै कह्यो मुख मात।।
(सगती सुजस माल़ा-गि.रतनू)

अगन री उठती अराड़ी झाल़ां सूं बाकी रा राजपूत डरग्या पण भाखरसिंह तो काल़ै लोही रो हो! माथै मोत चकारा काढै ही।
उण साथलां नै कह्यो – “मरी जकी गी! इयां डरियां राज कीकर संभैला? डरो मत अर आंरै घरां मांय सूं धान काढ लावो जको घोड़ां नै पावरो दां।”

जैड़ो धणी वैड़ा चाकर। साथला गया, जको अन्न ले आया।

भाखरसिंह रै साथै एक उसमान नाम रो मुसल़माण ई हुतो। उणरी घोड़ी आगै ई अन्न मेलियो तो उण आपरी घोड़ी नै कह्यो –
“भटारी ! ओ दाणो चारणां रो है! पछै रगत सूं रंग्योड़ो है! तनै म्हारी आण है जे होठ पुरपुयाया तो!!”

वाह! रै घोड़ी वाह!! इण सारू ई इण पशु नै देवअंशी मानियो है। उण, उण दाणां कानी जोयो ई नीं। भंवरदानजी झिणकली लिखै-

चारण रो अन्न मत चरै, आण दीधी उसमान।
धिन घोड़ी तुझ धीरता, धर्यो नहीं मुख धान।।

इणी मिनखां मांय सूं एक मिनख भाखरसिंह नै कह्यो कै – “महादानजी रै घरै थांरी घोड़ियां बंध्योड़ी है!!” आ सुण’र उण कह्यो तो – “पछै खोली क्यूं नीं?”

उण आदमी कह्यो – “हुकम उठै ऊभी एक चारण कन्या रै तेज आगै म्हारी आसंग नीं पड़ी!!”

जा रे गैलसफा! एक रे तेज रो पल़को तो तैं हणै दीठो ई हो! ले दूजोड़ी रो तेज देखलां।” इतरी कैय वो महादानजी रै घरै गयो अर घोड़िया खोलण लागो जितै महादानजी री बेटी लाछां हाकल़ करी – “खूटोड़ा असली है कै कमसल? राजपूत अर चारण री मरजाद ई नीं समझै। इयां ऐ घोडियां कीकर खोलण दूं ला?”

इतरी कैय लाछां, भाखरसिंह रै हाथ सूं वाग पकड़ी। भाखरसिंह रीस में भाभड़ाभूत हुयोड़ै लाछां रै हाथ झाटको बायो जको आधो हाथ आगो जाय खिरियो।

“जा खूटल तूं गुड़ै रा रूंख नीं देखेला।” इतरो कैय लाछां ई जमर झाल़ा़ं सांपड़ी।

उणी बखत एक चिरल़ाट रै साथै भाखरसिंह उछल़र पड़ियो। आंख्यां रा कोइया भमग्या। राफां फाटगी। शरीर टैंटीजग्यो।
बात खंचगी। आसै-पासै रा चारण ई भेल़ा हुया। इण राड़ में फतैसिंह भाटी री रक्षार्थ 14 चारणां गल़ै कटारी खाय प्राणांत कियो। इण लड़ाई में फतैसिंह भाटी ई काम आयो।

कविराजा बांकीदासजी आपरी ख्यात में लिखै-
“मोकल़सर रै धणी उदैराज खीमकरण अखैराजोत रै महाराज अभैसिंघजी री आग्या सूं कीटनोद रो धणी भाटी फतैसिंघ अमरावत मारियो गुड़ा रो राणो सूरजमल भाखरसी साहिबखानोत री मदत लेनै।”

ओ चकासो देख’र भाखरसिंह रा मिनख उणनै घोड़ै माथै बांध पड़ छूटा जको डाबड़ कनै जावतां सूरज ऊगो। भाखरसिंह नै कोई होश नीं हो। साथलां उण रा होठ भीजोया। जीभ रै पाणी लागतां ई उणरी जीभ साचाणी बारै आय पड़ी अर खुद ई घोड़ै सूं नीचो पड़’र मर पूरो हुयो-

मागणां सत देख कमध्धज मूरख,
चालण काज तुरी चड़ियो।
थड़ियो हय पीठ थकोय थरथ्थर,
पोर तीजो पथ में पड़ियो।
पड़गी झड़ कंठ जबान प्रभातिय,
प्राण तज्यो गल़ गाय पुगी।
दल़ियो भल सब्बल़ मात देमां दल़,
प्रब्बल़ हाथल़ दैत पुगी।।
(देमां रा छंद-भं.म.झि.)

साथै वाल़ां जाय साहिबखांनजी नै पूरी हकीकत बताई। पूरी बात सुणतां उण सुक्षत्रिय कह्यो – “ऐड़ै नीच रो म्हनै मूंडो मत बताजो। हरामखोर चारण चूंथ र गुड़ै रै गुल़ी लगाई। उणनै उठै ई दाग दे दो।” पण आखिर हा तो बाप अर पछै भाखरसिंह वीर ई हुतो सो राणाजी रै मूंडो सूं निकल़ियो कै –

अरे भाखरा तूं निकल़ियो तो माड़ नै चींथणनै पण हे वीर ! तैं चारण चूंथर कोई जसजोग काम नीं कियो-

मारण गयो थौ माड़, चारण व्हैतां चूंथिया।
ऐ बातां अवनाड़, भली न की थे भाखरा।।
(साहिबखांनजी गुड़ा)

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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