श्री इंन्द्रबाईसा अन्दाता के जन्म-दिवस पर – राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर

संम्वत गुनी’सै त्रैसटियां, साणिकपुर सामान।
शुकल पक्ष आसोज मे, श्री हिंगऴाज सुथान।।

चराचर जगत की हलचल की हर भांति की गतिविधियां अपने अपने नियत निर्धारित परिसंचरण तंत्राधिन सक्रिय सहयोग कर ब्रह्माण्ड संचालन में परम सत्ता के प्रति उत्तरदायित्व का परिपोषण करती है। इसी नियम से ही आसुरी शक्तियों के उद्भव को पराभूत पराजित करने के लिए श्रृष्टि चक्र मे अवतार अवतरण की सनातन परम्परा चलती आ रही है, जिसमें शक्ति अवतार की श्रृंखला भी समय समय पर सदा-सर्वदा चलती रही है।

शक्ति अवतारों को अवतरण के अनुकुल, शाक्त संप्रदाय परम्परा पूजक चारण जाति सदैव ही अभिष्ट रही है और श्रीआवड़जी, श्रीकरणीजी, बांकलजी, खोडलजी, सोनलजी, राजलजी, व अनेक शक्तियों की इस जाति मे अवतारों के अवतरण की श्रंखला रही है व सकल समाज का इन देवियों ने सदा भला कर स्थापित मान्यताओं को पुष्ट कर भला किया है।।

इस नियमित शक्ति अवतार की पूज्य परम्परा में ही (गेढा-खुर्द) गांव मे शिव दान जी रतनूं के सुपुत्र सागरदान जी रतनूं व उनकी धर्मपरायणां धर्मपत्नि श्रीमती धापुबाई जागावत के कुक्षि से नियमित अवतार के रूप में श्रीइंन्द्र कुँवरी बाईसा का अवतार विक्रमी संवत १९६४ के आसाढ सुदी नवमीं शुक्रवार को सन्ध्या के समय स्वाति नक्षत्र की शुभ वेला में हुआ था। जिस के लिए माँ हिंगऴाज की पावन परिषद में शक्तियों के अखाड़े में भैरूंनाथ के प्रस्ताव निवेदन पर माँ श्रीहिंगऴाज ने आवड़जी को आदेशित किया कि आप को अमुक जगह अवतार लेना है।

भैरव की सुणि बिनती, हुकुम दियो हिंगऴाज।
आवड़ जावहो अवनिपर, करण सुसेवकां काज।।

आवड़ मुख इमि आखह्यौ, गवन करूं किण गेह।
कहो जेम तुम, मैं करूं, धर हूं मानुष देह।।

शक्ति-अवतार परम्परा की पृष्ठभूमि पूर्णरूपेण परिपुष्ट थी, सागरदानजी रतनूं के पूर्वज श्री करण जी रतनू जैसलमेर रियासत के सम्मानीय सरदार व जागीरदार थे जो कि अनायास अघटित घटना घटने से जैसाण छोड़ जोधाण निवास कर मेड़तिया पट्टी के गेढा-खुर्द गांव के जागीरदार बन गये व भगवती भजन की अक्षुण्ण भावना परिवार में करनी दान जी से शिवदानजी व सागरदान जी तक बराबर बनी रही, सागरदान जी ने सतत रूप से सात बार श्री आवड़ माँ के स्थान की पदयात्रा, श्री करणी जी के पिताश्री मेहाजी किनियां के श्री हिंगऴाज धाम की पैदल यात्रा की भांति ही अनन्य भक्ति भाव से की थी, माँ श्रीआवड़ ने भी सागरदान जी भक्ति पर प्रसन्न होकर उन्ही के घर कन्यारूप में अवतरण का अपना मंतव्य शुभलक्षण से स्पष्ट कर दिया था।

गौड़ाटी गेढो-नगर, मरूधर देश मंझार।
सागर रतनूं रे सदन, आप लेवो अवतार।।

भगवती भवानी की मातुश्री भी भव भय भंजनी भवानी की अनन्य उपासिका व जागावत चारण वंश की धिया धापूबाई, धीर स्वभाव की सद गृहणी थी, जो कि माँ श्रीकरणी जी की महतारी देवलबाई आढी के तुल्य थी।

जागावत धापू जननी, उणरो तप अछैह।
जाय जनम लेवो जिकां, देवल री दुजि देह।।

श्री हिंगऴाजधाम बलूचिस्तान के शक्तियों के पावन परिषद अखाड़े की तिथी (संवत १९६३ आश्विन सुदी नवरात्री) के समय के सही नव महिना पश्चात विक्रम संवत १९६४ के आसाढ की पावन नवरात्री वेला मे ही माँ श्रीआवड़जी ने श्रीइन्द्रबाईसा के रूप मे अवतार लिया।

सक चौषठ उगणीस सै, साढ शुकल शुभ जानि।
हुकम लेय हिंगऴाज रो, आवड़ प्रकटी आनि।।

माँ भगवती के इस अवतार के समय को सुकवियों ने सरस व सुन्दर भाषा व भाव की सुक्तियों से सहेजा है।।

संवतसर विक्रम छत्तीस कम बै संहस,
मास आसाढ तिथी शुक्ल नौमी।
वार शुक्र नखत स्वाति संध्या समय,
भवानी औतरिया श्री खुड़द भौमी।।

नमो देस मारूधरा कोट नोवां,
नमो द्रंग गेढा कलां खुर्द दोवां।
प्रणम्मो समों च्यार छै नो पहोमी,
नमो मास आषाढ री शुक्ल नौमी।

नमो शुक्र संध्या घणो श्रैष्ठ सम्मो,
नखित्रां तणो पातिसा स्वाति नम्मो।
महालक्ष्मी मात धापां नमामी।
नमो मात रो तात सामुद्र नामी।।
~~हिंगऴाजदानजी कविया

 

वेद ऋतु ग्रह भव विमल, संवत इण सुरराय।
साढ शुकल नवमी शुकर, अवतरिया जग आय।।
~~हिंगऴाजदान जी जागावत

इस श्रृंखला मे तात्कालिन समय के डिंगऴ के डकरैल सुकवियों के सृजित सुंदर सरंचनाऐं शक्ति-सुयश आदि पुस्तकों मे सहेजकर संग्रहित हैं।।

सामान्यजन को शक्तियों के अवतरण का आभास विलम्ब से होता है।।

देवी भागवत के प्रसंग में………
ब्रह्माजी देवी भगवती से जिज्ञासा पूर्वक पूछते है कि……

जिस ब्रह्म को वेदों में “एकम” तथा “अद्वितीय” कहा है, क्या वह ब्रह्म आप ही है, यदि आप ही हैं तो आप पुरूष रूप में है अथवा स्त्री स्वरूप में। भगवती सम्यक सही उत्तर दिया कि।

सदैकत्वं न भेदोऽस्ति सर्वदेव ममास्य च।
योऽसौसाहमहं योऽसौ भेदोऽस्ति मतिविभ्रमात।
अर्थात….. मेरा और ब्रह्म का सदा ऐकत्व है, किंचित मात्र भेद नही है जो वह हैं वही मैं हूं और जो मैं हूं वही वह हैं, केवल बुध्दिभ्रम से भेद प्रतीत होता है।।

भव भय भंजनी भगवती भवानी की लीला विहारणी लीलायें बाल वय में ही स्वांतः सुखाय, पर हिताय सुदर्शन दृष्टिगोचर होने लग गई थी, नन्ही चार वर्ष की वय मे पिताश्री द्वारा लाई गई बालिका पोषाक को पहनने से मना कर, पुरूष परिधान धारण की पहली बालहठीय आज्ञा को समझने मे परिजन पेशोपेश में पड़ने से पिताश्री के पेट में उदरशूल की पीड़ा व्यापित कर, उसका समन भी श्रीहाथों से ही कर सबके सन्मुख प्रथम प्रवाड़ा परिचय करवाकर बाईसा ने आदेश देकर आगे सदैव पुरूष परिधान पहनना ही शुरु किया जो दिव्य देह धारण तक चलता रहा।

पांच वर्ष की बाल वय में श्रीमढ खुर्द धाम के मंदिर के सिंह द्वार के सामने (उस समय यह विशाल भव्य मंदिर नही बना था) खेजड़ी के पेड़ के पास छोटासा ऐक चबुतरा बनाकर भगवती श्रीकरणी जी की उपासना पूजा पाठ त्रिसंन्ध्या समै ज्योति प्रज्वलन चालू करदिया, ऐक दिवस ज्योति जागृत करने से पहिले नारियल नही होने से सभी उपस्थित जनो को स्वाभाविक चिंता होने पर, बाल सगत बाईसा ने स्वंय ने सभी आस्वस्थ कर कुछ पल ध्यानस्थ होने से शमीवृक्ष (खेजड़ी) पर श्वैत चिल्ह आकर बैठना व नारियल गिराना, यह दूसरा प्रवाड़ा था।

जिसकी कीर्ति पताका की प्रसिध्दि उच्च पायदान पर पहुंच गई, श्रध्दालु जन स्वतः भगवती के दर्शन करने आने लगे, सरल भक्तों की मन वांछना परिपूर्ण होने लगी।

अब पड़ौस में ही स्थित गेढा-कलां गांव के नितान्त अभिमानी शठ जागीरदार गुमानसिंह को अपनी मिथ्या अंहकारी भावना को श्रीशक्ति के सुयश से अपनी सत्ता के समक्ष संकट सा आभास अनुभव होने लगा तो उस अज्ञानी ने सुसभ्य सागरदान जी को बुलाकर असभ्य आचरण कर कहा कि तेरी पुत्री के पाखंड और तेरे प्रचार के परचम को परवान चढने से पहले ही, तुझे परेशान कर गेढा-खुर्द गांव से निकाल दूंगा।

गेढावाऴो गढपति, भरियो गरभ गुमान।
श्रीआवड़ सगतरो, घणो कियो अपमान।।
उलटो परसन पूछियो, मौत बता दे मोय।
नीतर फिरै बिरोटणी, झूंठी जांणूं तोय।।

संध्या समय पिताश्री के मन मानस की स्थिति से परिचित बाईसा ने बात की पहल कर पितु को आसन्न संकट से आश्वस्त कर धैर्य धारण करा कर, अहंकारी अज्ञानी शासक को समझाने की सार्थक पहल की, जिसे विवेकशुन्य ठाकुर ने उपहास मे उड़ा कर अपनी मृत्यु के आलिंगन की इच्छा औछै वचनों से शक्ति के सामने प्रकट की, भगवती ने माँ श्रीकरणीजी के कान्हा के वध की भांति नवरात्री की नवमी के दिन, अज्ञानी की इहलीला की इतिश्री का आदेश देकर पुनः अपने स्थान को पधार गयी, नवमें दिवस की संध्या समय भगवती वचनो के समय सीमा समाप्ति पर मदहोश मतिहीन महल की छत्त पर चढ, मातेश्वरी के वचनो की कुटिल अट्टहास मे खिल्ली उड़ाते समय गिर कर, उस आतातायी का अन्त हो गया एवं महल की छत के उपर सहस्त्रों संवऴी उड़ते हुये गेढा कलां गांव के ग्रामिणों ने साक्षात देखा जो कि आज से बीस वर्ष पहले तक इन पंक्तियों के लेखक को उनमें से एक वयोवृध्द सज्जन ने यह सारी बातैं सविस्तार बताई थी।

इन्दर मुख इण विध कह्यो, दिन जीवै लो नोय।
नौलख जोगण भख लेयसी, होणी हो सो होय।।
सकति तणैं सराप सें, करणी रो फऴ पाय।
गढस्यूं नीचै गुड़कियो, गयो गडींदा खाय।।

अनूपकुँवरी चौहान को पांव प्रदान करना:-

आतातायी ठाकुर का अन्त होने से सर्वत्र सुख शान्ति व हर्षित उल्लसित जन जन के ह्रदय के उद्गार जन कंठो से झूमते पूर्व से पश्चिम व उतर से दक्षिण सर्वत्र सुवासित है गये व इसकी सौरव अलवर रियासत के ऐक प्रसिध्द व सिरायत ठिकाणे नीमराणा के उमरावसिंह चौहान के पास पहुंची तो उन्हे अपनी पुत्री के पंगु पैर जो कि जन्मजात विकलांगता लिये हुये ही पैदा हुई थी उसके भाग्य को बदलने की आशा का संचार दिखने लग गया व श्रीमढ खुरद की सपरिवार भृत्य जनों सहित यात्रा की तैयारी को सुव्यवस्थित तरीके से करने की योजना के आदेश ठिकाणे के कामदार को देकर रवाना हो गये।

इससे पहले आर्थिक रूप से संम्पन्न इस ठिकाणेदार ने अपनी पुत्री के इलाज पर देश व विदेश ने अत्यन्त कोशिश कर धन लगा कर भी हताश निराश हो कर इस आश के साथ मे बाईसा महाराज के श्रीचरणो का ही आश्रय ले लिया था, निराधारों की आधार माँ भगवती भी इस बात को अपनी लीला मे प्रकट कर भक्त पर शक्तिपात करने को आतुर थी, ऐक दिवस शमी वृक्ष की छाया में तख्त पर आसीन होकर सामने बैठी सावाणियों सवासणियों के चिरजा गायन की मधुर स्वर लहरीयों के आरोह अवरोह को सुनने में तन्मयता से आँखे मुद मधुर स्मित मुस्कान के साथ अपनी कृपादृष्टि से निहार रही थी, बीच बीच मे अनेक मातृशक्ति में से नृत्य गायन की छवि साताद्वीप की मनोहारी आभा का आभास आलोकित करा रही थी, इस नयनाभिराम नजारो को अभागी अनूपकुँवरी टुकुर टुकुर निरामिष भाव से निहारते यह सोच रही थी कि काश……… मैरे भी पांव होते तो आज मैं भी अन्दाता को नृत्य कर रिझाती, उसके मनोभावों को माँ पहचान रही थी, अनायास आदेश मे भगवती ने कहा कि, …… “अनोप तूं भी उठ और घूमर रम।” इस आदेश से अनोप अचकचा गई, भगवती ने पुनः जोर से आवाज लगा कर कहा कि……. “अनोप उठ, बैठी कांई देखे है सुण्यो कोनी के मैं कांई कैयो।”

इस प्रकार भगवती की कड़क आवाज सुनकर अनोप कुंवरी रोने लग गई व कहा कि माँ पगां मे शक्ति नही है।

अब अबोध अनोपकुंवरी को कहां यह बोध था कि जहां साक्षात शक्ति स्वंयं शक्तिपात कर रही है तो अशक्ति का अंदेशा ही क्यों हो, माँ भगवती ने स्वंयं अपनी भक्तों के बीच मे से उठ कर अनूपकंवरी का हाथ अपने हाथ मे पकड़ कर खड़ा कर दिया व कृपा के सागर को उसपर उंडेल दिया, हर्ष की सरिता बह निकली, चिरजा गायन व नृत्य का ऐसा शमा बंधा कि सभी अपलक निहारते रहे, अनोपकुंवरी को नव जीवन मिल गया, माता पिता की खुशी की सीमा नही रही, चौहान परिवार श्रीमढ खुड़द मे सवा महिने शक्ती दर्शन लाभ लेकर नीमराणा प्रस्तान कर गया व दूसरे ही साल अनोपकुंवरी व ठाकुर उमरावसिंहजी चौहान श्रीमढ खुड़द के निज मंढ चौक मे स्थापित मनोहारी काष्ठ का सुन्दर मंदिर बनाकर लाये व माँ भगवती के श्रीचरणों मे समर्पित किया, जिसका नाम करण श्री इन्द्र भवन किया गया व पराम्बा इसमे ही बैठकर आवड़ करनी माँ की जप-तप साधना, श्री करनी जी के मंदिर स्थापना संवत १९८८ तक करते रहे थे।।

कविया हिंगऴाजदान जी ने एक गीत के दुहाऴै में इस एतिहासिक घटना का उल्लेख किया है कि……….।

मौत रो लेख बिसना तणो मेटियो,
पोत रो सैन रो चशम पाई।
सुपह चंहुवाण री कुंवरी आई शरण,
बगस दीधा चरण इन्द्र बाई।।

क्रमशः

~~राजेन्द्रसिंह कविया (संतोषपुरा सीकर)

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