बणसूर, जुगतावत गोत री सुभराज

घर जुगता गरजी घणा,अरजी करे अपार।
मरजी राजा मान री,सरजी सरजण हार।।
ऊगै रिव ऐतीह,पूगै ताय सेती पवन।
जुगता धर जैतीह,तेती कीरत ताह री।।
मरजी राजा मान री,जुगता ऊपर जोर।
कर रीझां अनरिण कियो, रयो न कबडी रोर।।
पाडलाऊ तांबांपत्रा,मौने बगसी मांन।
दै हाथी सांसण दिया,दीना लाखां दान।।
गज गहणा सांसण गरथ, हीर चीर हैराव।
जुगतै पत जोधांण सू,पाया लाख पसाव।।
जोधोणै राजा जिकां,पूज्या आगै इ पात।
तै भैरा पाया तठै,सात कुरब इक साथ।।
सामंद इंद भैरो सकव, पख बे मेर प्रमाण।
करगां क्रन वीकम कली,जुगतावत घण जाण।।
नित नित बधतै नूर,तु भैरा कुल रा तिलक।
वाह वाह वणसूर,इल मे जस बधियो इधक।।
भैरा तु मत भूल,नित सुमरण कर नाथ रो।
कीधी जका कबूल,करसी जिका कबूल हे
गुण रूपक मालम गढा,महाराजा की मेर।
सारी धर जाणे सको, भारी विरदां भैर।।
अक्खा लक्खा ईसरा, पात हुआ गुण पूर।
भैरा हव थारै भुजा,वरन लाज वणसूर।।

~~संकलन – मोहन सिंह रतनू, चौपासणी

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