सियावर रामचंद्र

म्हारी अनूदित पोथी आस्था री मंदाकिनी सूं एक निबंध आप सब विद्वानां रै पठनार्थ

– डॉ गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

बरसां सूं अजोध्या नगरी मांय उदासी छायोड़ी है। सगळा लोग-बाग आप-आपरै धरम-करम मांय रच्या-पच्या, आयै दिन रा काम-काज नीत-सास्तरां रै बतायै मुजब कर रिया है। घर-गिरस्थी वाळा लोग अतिथियां री सेवा, माता-पिता रो माण अर गुरुवां रो सनमान पूरै मनोयोग सूं करता आपरो जीवण जीवै। किणीं नैं किणीं सूं कोई अड़ी-ईसको नीं, कोई खींचताण नीं, कोई सिकवा-सिकायत नीं, कोई कोरट-कचेड़ी रो काम ई नीं। सगळा सांयती सूं समै बितावै। पण अेक बात अखरै कै वांरै जीवण मांय उमंग, उल्लास अर उत्साह रो भाव सोयोड़ो सो लागै।

नगर मांय जठै ई दो-च्यार आदमी अेक जिस्ये मन, मत अर चिंतन वाळा मिल ज्यावै, बठै दबी जबान में बात आ ई चालै कै अजोध्या तो है पण आ है जीवण-विहीण। अर सावसाची बात है कै जिण नगरी रो राजा उदास हुवै, उमंग अर उत्साह सूं हीण हुवै, उणमणो अर अवसाद रो घेर्योड़ो सो रैवै उण री प्रजा किण भांत कोई उत्सव मनावै। कियां नाचै, कियां गावै अर कियां राग-रंग रो कोई ढंग करै।

बरसां सूं राजा कोई सिकार कोनी चढ्यो। आस-पड़ोस रै राज्यां पर चढाई करण रो तो उण बगत चाळो हो ई कोनी, जणा चढता ई कियां ? राजघराणै में न कोई ब्याव, ना सगाई ; ना रियाण, ना बधाई। पैली तो राजा लोग बरस दो बरस में और नीं तो खुद रो ई ब्याव रचा लिया करता। कदै कोई सामंत री बेटी तो कदै श्रीमंत री बेटी, कदै किणी रियासतधणी री जाई सूं ब्याव-सगाई । मतलब ओ कै जीवता जितरै वांरै ब्यावां रो रंग बटीजतो ई रैतो। इणसूं भलां ई थोड़ा दिनां सारू ई हुवै पण कीं आमोद-प्रमोद अर हंसी-खुसी रो माहौल बण्या करतो। पण समै रो इयांकलो फेर आयो कै रामराज्य मांय अै सगळी बातां जाणै पुरातत्व री पुराणी धरोहर बण’र रैयगी। बियां प्रजा मांय सूं कीं विवेकवान लोगां रो अेक दळ इण बात नैं चोखी तरियां जाणै आ मानै कै आपणै राजा राम साथै अन्याय उणरी प्रजा ई कियो है। वांनै पछतावो है कै प्रजा उण राजा साथै अन्याय कियो है, जकै आपरी प्रजा री माण-मरजाद, काण-कायदा, कट्टर आचार अर ओछै विचारां पर भी आपरी सुख-सुविधा, राग-रंग अर हास-परिहास सौक्यूं निछरावळ कर दिया। आं लोगां रै अंतस सूं हूक उठै कै ‘महाराणी सीता निकळंक ही, जद ई तो राजा राम उणनैं अठै लाया हा। दूजी बात आ कै न्याय-अन्याय रै विचार अर निर्णय रो काम तो राजा रो है, उणनैं प्रजा आपरै हाथ में लियो ई क्यूं ?’’ आ सोच-सोच अजोध्या नगरी रा गुणीजनां, सुधीजनां अर संभ्रांतजनां रै मन पर मणांबंद बोझ बढतो जा रैयो हो। आ बात वांरै मन पर काळी छाया ज्यूं मंडरावण लागी।

बरसां ताणी राज्य रै न्यारा-न्यारा वरगां मांय, न्यारी-न्यारी मंत्रणावां होती रैयी। समस्या रो उळझाड़ खासा गंभीर हो। सुळझण रो सराजाम कोई नैं सूझ नीं रैयो हो। घूम-फिर’र मरदानगी वाळो दंभी-मद सगळी बातां पर भारी पड़ रैयो हो। छेवट पिंडतां नैं अेक मारग सूझ्यो कै राजा अश्वमेध-जिग करै। राजा सूं ब्राह्मण री हत्या हुई है। रावण जियांकलो ई हो पण हो तो ब्राह्मण। इण वास्तै ब्रह्म-हत्या री काळी छांवली अजोध्या नैं घेर’र अंधेर में उळझायदी। इणरो उपाय अेक ई है कै राजा अश्वमेध-जिग करै। सगळै पिंडतां री अेकमत बात नैं राजा अंगेजली अर अश्वमेध री तैयारियां सरू करवा दी।

जिग री तैयारियां चालतां महीनां बीतग्या। समै तो लागतो ई अश्वमेध-जिग है, कोई साधारण जिग थोड़ो ई है। कितरी लांबी-चैड़ी जिग-भोम, वास्तुसास्तर रै हिसाब सूं बणी वेदियां, जगकरता जजमानां रै जोड़ां री ठौड़ां, होता, उध्वर्यु, ऋत्विक, ब्रह्मा अर सैंकड़ां-हजारां री संख्या में बैठणियां पिंडतां रै थान-मुकाम रा सावजोग सराजाम करणा पड़ै इण जिग सारू।

पण अचाणचकै ई अेक अटकाव आयग्यो। सगळा सोच’र सोच में पड़ग्या। अरे! आ बात तो सगळां सूं पैली मगज में आवणी चाईजती पण कोनी आई। अर आ ई पण हो सकै कै पिंडत तो स्याणां ठैर्या। जे वांरै ध्यान में आयगी तो ई वां उणनैं परगासी कोनी। सोच्यो हुवैला कै जिग री तैयारियां सरू करावां। आधी’क तैयारियां हुयां पछै राजा नैं इण अटकाव सूं अवगत करास्या, जिणसूं राजा इणरै उपाय सारू मजबूर हुज्यासी। बियां ई करी। आधी तैयारियां पूरी हुई। पिंडतां राजा नैं जाय बतायो कै जिग में आप अेकला नीं बैठ सको, जिग में तो धणी-धिराणी रो जोड़ो ई बैठ सकै, नींतर जिग संपूरण नीं हो सकै। पिंडतां राजा श्रीराम नैं कैयो कै जिग में बैठावण सारू महाराणी चाईजै, इण खातर आप तो दूजो ब्याव रचाओ अर महाराणी ल्याओ। पिंडतां रो प्रस्ताव सुणतां ई प्रजा तो उछळण लाग गी। ओह! राजा रो ब्याव होसी, राग-रंग, नाच-गान, खाणो-पीणो। अेकै छेडै राजा रै ब्याव रो आणंद तो दूजै कड़खै जिग रो फळ । प्रजा राजी। अजोध्या मांय कीं हलचल आई। नयी हवा रा झौंका लोगां रै मनां में कीं तमन्ना जगावण लाग्या। वांरी रगां मांय खून बैवण ई नीं नाचण लागग्यो। च्यारां कानी राजा री जै-जैकार होवण लागी। अजोध्या रो आसमान जैकारां सूं गूंजण लाग्यो। अठै आ पण बात सोचण वाळी है कै उण समै मोट्यारां सारू अर खास कर मोटा मिनखां सारू दूजो-तीजो का बीसवूं-तीसवूं ब्याव रचावणो कोई अजोगती बात कोनी ही। लुगायां नैं घर सूं काढणी का दुहाग-दंड देवणो कोई अचेरी बात कोनी मानीजती। राजघराणै में कीं राग-रंग हुवै तो आमप्रजा रै ई दो-च्यार दिन आणंद रा बीतै, बस इतरो ई मामलो हो। ओ ई कारण है कै प्रजा नैं सीता री कोई चिंता कोनी अर दूजै ब्याव रा कोड करण लागगी। खैर!
पण पिंडतां रै मूंढै ओ विधान सुण’र राजा श्रीराम तुरंत बोल उठ्या कै ‘म्हैं इण जलम मांय दूसरो ब्याव हरगिज ई नीं करूं।’ पिंडत गया तो हा कोडाया-कोडाया पण राम री बात सूं रात सी रळगी। जाणै सगळां पर गाज गिरगी व्है। मंत्री-परिषद वाळा ई ठौड़ रा ठौड़ ई ठमग्या। जण-जण रो जमावड़ो जाणै चितराम में मंडग्यो हुवै, बियां सगळा चेताचूक हुग्या।
बाद में महीनां ताणी राज्य मांय मंत्री-परिषद री, पिंडतां री, ब्राह्मणां री अर सेठ-श्रीमंतां सूं लेय हरेक तबकै रै लोगां री सभावां जुड़ती रैयी। हरेक सभा मांय राजा रै दूजै ब्याव री बात नैं ठीक ठैरावतां राजा सूं इण बाबत अरदास करीजती रैयी। सभावां रा प्रस्ताव अर अरदास राजा रै सामी भेजीजता रैया। पण अै सगळी अरदासां ‘रामो द्विनार्भिभाषते’ (राम दो बार कोनी बोलै) टणकै वाक्य सूं टकरा’र पाछी बावड़ती रैयी।

पण अेक दिन सुभघड़ी मांय अश्वमेध-जिग रो श्रीगणेश हुयो। मंत्र पढीजै, आहूतियां पड़ै। च्यारां कानी जग रो पवित्र वातावरण। हां ! आ बात जरूर ही कै ‘राम दो बार नीं बोलै’ आ ओळी रह-रह’र पिंडतां अर ब्राह्मणां नैं बोला रैवण सारू मजबूर करै ही पण पिंडत तो पिंडत। सोच ली जकी कर्यां मानै। वांनैं तो जिग करावणो हो। अर जको काम पिंडत करवावणो चावै, उणरै बिचाळै आवण वाळी हर अेक बाधा अर अटकाव रो उपाय सास्तरां मांय पिंडत ढूंढ ई लेवै। पिंडतां सास्तरां सूं देख’र विधान दियो कै अश्वमेध-जिग संपन्न करावण सारू राजा श्रीराम रै साथै वांरी भारज्या महाराणी सीताजी री सोनै सूं बणी मूरत नैं विराजमान करो। राजान-काजान काम। कैवतां टेम लागै पण बणतां के टेम लागे ? तुरताफुरत सोनै री सीता कमल रै आसण माथै राम रै सारै विराजमान होय जजमान रो जोड़ो बणग्यो। सीताजी री आ सोनैली मूरत कितरी सोवणी, मनमोवणी अर फूटरी है कै बात छोड़द्यो। सबदां री कांई खिमता कै वै उण अलौकिक सुदरता रो बखाण कर सके ? मूर्तिकारां रै मन री पवित्त भावना अर भगती उण मूरत में अेक निकेवळोपण भर दियो। मूरत में महाराणी रो दिपदिपतो मुखमंडळ लोगां रो मन मोवै।
अठीनै राम आपरै मन री बात करतां कैयो कै जिग संपूरण होवण री वेळा तक वै रातबासै जिगसाळ में रैवैला। प्रजा जै-जैकार कियो- धरमात्मा राम, संयमी राम, पवित्र-आतमा राम। लोगां राम नै ‘तपसी राम’ री उपाधि दी- सब पर राम तपस्वी राजा।
जिग रो पैलो दिन पूरो हुयो। रात हुई। राम जिगसाळ में अेकाअेक। राम रै बगल में सीताजी री सोवणी मूरत विराजमान है। कित्तो लांबो समै हुग्यो। सीताजी तो राम री यादां मांय ई हा। इत्ते टेम बाद यादां वाळी सीता आकार धारण कर मूरत रूप में राम रै सा’रै बैठी है। बावजूद उणरै राम री हिम्मत नीं हो री है कै उण मूरत वाळी सीता रो चेहरो आपरी सीधी आंख्यां देखै। अेक अणजाण्यो अर अचेरो सो अपराध भाव राम रै मन में संचरण लागै। थोड़ी ताळ बाद राम हिम्मत कर’र मूरत रै मंूढै कानी झांकै। देखै तो लागै कै सीता री मूरत रै मूंढै तो अेक सौम्यता अर सरलता रो भाव विराजै। उण मूंढै पर कोई रीस, झाळ, दुख का ओळमै रो भाव नेडैनेड़ास ई नीं। राम रै माथै सूं जाणै मणांमण भार उतरग्यो हुवै। राम मूरत नैं अेकटक जोवा लागै।
अेकाअेक राम री आंख लागण लागै। बैठां-बैठां झेरां आवण लागै। अठीनै सीताजी री मूरत खिलती सी लागै, जाणै इणमें प्राण संचरण होवण लाग्यो हुवै। इत्तै तो इयांकलो चमत्कार हुवै कै राम बरसां री अवधि उलांघता राजा जनकजी री फुलबाड़ी में पूग ज्यावै। आपरी मनमेळू सीता सूं हुयोड़ी पैलड़ी मुलाकात नैं पाछी जीवण लागे। वांरै हिवड़ै मांय कणकती, पाजेब अर बिछिया वाळै घूघरियां री घंटियां गूंजण लागै। वै आपरै अनुज लिछमण नैं कैवण लागै-‘मानो मदन दुंदुभी दीनी/मनसा विश्व विजय करि लीनी।’ इतरो कैवतां-कैवतां राम री आंख्यां वाळो चकोर सीताजी रै मुखचंद नैं अेकटक जोवण लागै।

सीताजी री सोभा सूं राम नै कितरो सुख मिल्यो, उणरो बरणाव सबदां में संभव नीं- ‘‘देखि सीय शोभा सुख पावा/हृदय सराहत वचन न आवा।’’ राम तो जाणै इण दरसाव नैं देखता-देखता आपरै जीवण मांय घटी घटनावां री दुबारा जातरा करण लागै। बै देखै कै राजतिलक होवण रै बदळै जद राम नैं चवदा बरसां रो बनवास मिलै तो अजोध्या रा वासी हा जठै ई ठैरग्या, सगळां नैं राजा दशरथ री इण घोषणा सूं चोट पूगी। इयां लाग्यो जाणै कोई पा’ड़ उपर पड़ग्यो हुवै। इणी टेम राम री यादां मांय मां कौशल्या आवै, जिणनैं राम कदै ई भूल ई नीं सक्या हा। राम खुदोखुद सूं बंतळ करता सा बोलण लाग्या कै म्हारी मां कौशल्या री कांई बात करणी। वा उण टेम कितरो धीरज धारण राख्यो अर आपरै काळजै री पीड़ नै पचा’र राखी, उणरो अंदाजो लगावणो ओखो है। राम नै खुद अचरज है कै जकी मां राजा दशरथ सूं रोजीना धरम अर राज रै सास्तरां री बातां करतां तर्क-वितर्क किया करती, वा उण दिन मून धारण कियां कर सकी ? वै विचारै कै म्हारै चरित्र नैं बणावण बर मजबूत देवण में मां रो मोटो हाथ रैयो, वा मां म्हारी आचरण गुरु ही।

बोलतां-बोलतां राम जियां आपरै मांयनैं ई खोयग्या। अेकदम मून धार लियो। थोड़ी ताळ सूं जियां कोई नींद सूं जाग्या अर सीताजी री मूरत नैं मन री बात कैवण लाग्या- पण हे प्रिया ! तू तो उण दिन अेकदम चट्टान हुवै ज्यूं अड़गी ही। बियां विनम्रता, धीरप अर ठीमरपणो तो थारै सभाव में है ई पण अटलता री तो तूं जियां पड़मूरत है। म्हैं थनै जंगळ मांय नीं चालण सारू कितरी समझाई पण म्हारी अेक नीं मानी। म्हैं तो अठै तांई कैय दियो हो कै जे इण प्रेम में हठ करसी तो बेजां दुख पावैली- ‘‘जे हठ करउ प्रेम बस वामा/तो तुम दुख पायेए परिनामा।’’ उण बगत म्हनैं थारी बातां पर रीस आई पण जद थूं थारो अटल इरादो सुणायो कै ‘कि तन-प्राण, कि केवल प्राण’ मतलब प्राणवान सरीर ले चालो नीं तो प्राण तो साथै चालैलाईज।

थारै इयांकलै इरादै आगै म्हारा हथियार झुकग्या। म्हारा समझावण-बुझावण रा सगळा सराजाम अेकै छैड़ै अर थारो अेकलो अटल इरादो दूजै छैड़ै। थारो पलड़ो भारी निकळ्यो। म्हैं थनैं साथै चालण री हामी भर दी। राम होळै सी कैवै कै हे सीता ! थनैं अेक गुपत बात बताऊं। म्हैं उण दिन बारै सूं तो थारै उपर रोळा करै हो, रीस करै हो पण मांय ई मांय मन रै अेक खूणै में थारै माथै गर्व रो भाव ई हो। म्हैं अर्धांगिनी सबद रो साचो अरथ उण दिन ई मैसूस कियो।

हे प्रिया! थारो साथै चालणूं मांयनैं सूं तो म्हनें ई घणो चोखो लागै हो पण मन में फिकर ई अणूंतो ई हुयो, उणरो तो थनैं अंदाजो ई नी है। जंगळ में रात-दिन घटण वाळी घटनावां, आंधी-तूफान, भतूळिया, बिखमी वेळां मांय थरो ओ कंवळो अर निरमळो कोमळ सो सरीर किण भांत भारज्या भाव नैं निभा सकसी ? म्हारी तो सोचण सगती ई खूटगी ही। इतरै राम री आंख्यां सामी वनवास रै मारग में सीताजी री हालत रो चितराम घूमण लागै-

पुर तें निकसी रघुवीर वधू, धरि धीर दिए मग में डग द्वै।
झलकी भरि भाल कनी जन की पुट सूखि गए मधुराधर वै।
फिर बूझती है चलनो अब केतिक पर्णकुटी करिहौं कित ह्वै।
तिय की लखि आतुरता पिय की अंखियां अति चारु चली जलच्वै।

सोचतां-सोचतां रात री उण अेकदम नीरव वेळा मांय राम री आंख्यां अेकर फेरूं डबडबायगी। राम उण बीत्योड़ै टेम नैं अेकर फेरूं जीभर’र जीवणो चावै। चवदा बरसां री लांबी वनवास री अवधि मांय राम नैं खुद सारू कोई चिंता-फिकर कदै ई कोनी हो। वां री चिंता रो कुंडाळियो तो आपरी प्राणप्रिया सीता र च्यारूंमेर चकारा लगावतो रैयो कै इण अणमोल थाती नैं पाछी संभाळ’र कियां लेजाईजैला ?

राम नैं वनवास मारग में बितायोड़ी पैलड़ी रात याद आयगी। अरे बापरे कितरो घेरघुमेर वाळो अर सघन हो वो इंदुगी रो रूंख। उण रात म्हारी प्राणप्यारी! थूं तो पैंडै रै थाकेलै सूं हार’र चूर-चूर हुयोड़ी निढाळ सी नींदराणी री गोदी में सौयगी पण म्हैं तो उण रात अेक खिण ई सौ नीं सक्यो। रै-रै अर विचार आवै हो कै इतरी कोमळ अर सुकुमार, राजा जनक री रंगकंवरी, लाड-प्यार में पळ्योड़ी …… दुरजोग सूं 14 बरसां रो वनवास भोगसी। म्हैं आ ई सोचतो रैयो कै आगला चवदा सालां मांय आज वाळी सी सेज ई दे पाऊंला कै नीं, इण बात नैं सोचतां-सोचतां थारो मूंढो निहारतो रैयो अर रात कद बीतगी ठा ई नीं पड़्यो।

पण थूं तो अेकदम निधड़क अर हर दीठ सूं तिरपत होयोड़ी सी आखी रात गैरी नींद में सूती रैयी। इणरो कारण म्हारै ओ ई समझ में आयो कै थूं तो थारै जीवणसाथी रै मोटै संकट अर मन-मानस री उळझण रै दौर में उणरो साथ निभावण सारू हर पल साथै रैवण सारू निकळ पड़ी ही। थनैं पतियारो हो कै थूं सुख-दुख में राम री जीवणसंगिनी बण’र रैसी।
जिग कांई सरू हुयो, राम नै तो नयो जीवण मिलग्यो। दिनभर जिग रै काम में लाग्या रैवै अर रात रा आपरी प्यारी सीता सूं बंतळावता उणरै साथ रो आणंद लेवै।

काल रात री बात ल्यो- जद सूं सीताजी नै वनवास दियो है, उण दिन सूं राम राजसी ढोलियां माथै नीं पोढै। वां आप सारू तिणकलां अर अंकाळै सूं बण्योड़ो माचो ढळवा राख्यो है। वां नैं इयांकलो आभस हुयो जाणै सीताजी वांसूं कैय रिया है कै हे नाथ ! अबै तो हूं आयगी। आपनैं इण तिणकलां रै मांचै पर पोढतां देख’र म्हनैं घणो दुख हुवै। उठो अर राजसी पिंलग माथै सौरा पोढो। राम अेकदम चिमकता सा आंख्यां खोलै- ना, कठै ई कीं है तो कोनी। बै चुपचाप आंख्यां पाछी मींच’र सोवण री आफळ करै। इतरै तो वांनै फेरूं लागै जाणै जानकी वांसूं कैय री है कै आप मूंज रै इण अबखै मांचै पर सोवो तो पछै म्हारै कमळ रो आसण क्यूं ? हे प्रीतम ! ओ कमळासण म्हनैं सूळां सूं ज्यादा चुभ रैयो है। अबकाळै राम आंख्यां मसळ’र सावळ देखै। सागण ई बात कीं कोनी दीखै। मूरत बियां री बियां सागण ठौड़। हाली न डोली। कोई प्राण संचार नीं हुयो। राम सोचण लाग्या कै म्हैं इणरै साथै बैठ’र जिग कर रियो हूं। जे जिग रै हवन री अगन अर मंत्र इणमें प्राण नीं घाल सकै तो पछै कुणसो अंतरीख इणमें प्राण फूंकैला।

इण भांत चोळणा-पंचोळणा करता, चिंतण री धार में डूबता-तिरता वै चित्रकूट पूग ज्यावै। उण दिन कितरी लगन अर प्रेम सूं वां आपरै हाथां सूं फूलां रां गजरो बणायो अर सोवणी सीला पर बैठी सीता नैं पैरायो। भावां री खळकती धार में जाणै आज बो गजरो अर सगळा आभूखण पाछा राम रै हाथ में आयग्या। खुदोखुदी राम रा हाथ आपरी प्रिया नैं सजावण-संवारण सारू आगै बढ्या। पण मोटो अचरज। राम रै बढतै हाथां नै अेकदम सूं मूरती सागण ठौड़ ई रोक दिया। राम खंभो हुवै ज्यूं, हा जठै ई रुकग्या। राम रो अपमानित सो मून पूछ उठ्यो- हे प्रिया! आ अणहूंती बात म्हारै साथै कियां ? थूं म्हारी इच्छा में विघन बणरी है। आज ताणी थूं इयांकलो काम कदै ई कोनी कर्यो। मूरती मांय सूं अेक पतळी अर धीमी सी आवाज आवै। राम अेकर सी जड़ हुवै ज्यूं हुग्या। आवाज ही- हे नाथ! चित्रकूट में तो अेक ई कागलो हो, जिण पर आप जीत पा ली पण इण अजोध्या मांय तो कागलां रो पार ई कोनी। मूरत रो मून मुखर होवण लाग्यो अर बोली कै उण कागलै माथै छोड्योड़ो आपरो बाण म्हारै जीवण री अणमोल धरोहर है। थे थांरी लुगाई पर अभरोसो करण री ठौड़ उण पापी काळै कागलै नै डंड दियो। इणीं कारण म्हैं अशोकवाटिका सूं जको संदेसो आपनै भिजवायो उणमें आपनैं उण बाण री याद दिराई। म्हैं हनुमान नै कैय’र भेज्यो ‘‘ तात शक्रसुत कथा सुनायेहु/बाण प्रताप प्रभुहि समुझायेहु।’’

आपरी घरनार अर प्राणप्यारी री आ बात सुण’र राम अेकदम टूट ज्यावै। मांय रा मांय घनघोर अंधकार वांनै घेर लेवै। मांयनै गैरै अंधेरै खाडै सूं आवाज सी आवै कै हां! थूं ठीक कैय री है प्यारी। म्हैं अजोध्या वाळां नैं वांरै अणूंतै करमां सरू कोई डंड नीं दे सक्यो। हां! म्हैं वांनै देहित डंड दे भी नीं सकूं। क्यूंकै इयां कर्या पछै रामत्व कठै रैवतो ? राम सीता सूं बंतळावै कै आज थनै म्हारी अेक और गुपत बात बताऊं कै म्हैं अजोध्या वाळां रै इयांकलै ओछै विचारां नैं पैली सूं जाणै हो। ओ ई कारण हो कै रावण रो वध करण रै बाद म्हैं थनैं घणा करड़ा अर अकरा वचन कैया। थारै राम रै मूंढै आपरै पूरै जीवणकाळ मांय इतरा अचेरा अर ओछा बोल कोनी निकळ्या। थूं कांई संसार रो कोई पण प्राणी आ सोच सकै है के कै जकै आदमी कदैई इयांकला अणओपता बोल नीं बोल्या उणनैं आज खुद कितरी कुंठा अर अगौरव रो भाव झेलणो पड़्यो है। पण भविस में थनैं अर म्हनैं आज वाळी सी दुखदाई अर माणभंग वाळी डगर पर नीं जावणो पड़ै, इण खातर म्हैं थनैं बै बोल सुणाया। अर कांई थूं इण बात रो अंदाज लगा सकै कै जकै राजा री महाराणी नैं कळंकणी करार देय घर सूं बारै काढ दी हुवै बो राजा आपरी प्रजा सूं बात करतां का प्रजा रै सामी जावतां कितरी लाज अर अपमान रा कड़वा घूंट पीवण सारू मजबूर हुवै। साची बात तो आ है कै थनैं वनवास दियां पछै राम कदैई प्रजा रै सामी गयो ई कोनी। जदकदै जरूरी हुयो तो राम रो सरीर ही प्रजा रै सामी गयो है। आज सोचूं कै आपां पाछा अजोध्या क्यूं आया ? कितरो आछो रैवतो कै आपां जंगळ मांय वां रींछ-बानरां रै भेळै ई रैवता। साची कैवूं तो बै रींछ-बानर, आं मगजमार्या हेंकड़ीबाज अजोध्या वाळां सूं लाख सावळ हा। म्हैं म्हारै मन में उठी गर्व री अेक बात और बताऊं। रावण माथै जीत्यां पछै म्हारी सेना रो अेक ई सैनिक रींछ-बानरो दुसमणां रै नगर कानीं झांक्यो तक कोनी। कोई लूटमार कोनी करी। कोई लुगायां री इज्जत, टाबरां री ज्यान अर बूढां री स्यान कोनी ली। कोई अनाचार, अत्याचार कोनी कर्यो। संसार में जीत्योड़ी सेना रै इयांकलै संयमी अर अनुशासित आचरण रो ओ पैलो अर छेहलो, अेकलो अर अनोखो उदाहरण है। हे प्रियतमा! म्हैं इण घटना नैं म्हारै आचरण री सिद्धि मानूं।

बोलतां-बोलतां राम अेक’र फेरूं आपरै अतीत नैं जीवण लागै। वांरी आंख्यां सामी दरसाव आयो जाणै वै अबार-अबार ई जंगळ में आया है। घणै उछाव अर प्रेम सूं आपरी प्रिया वैदेही नैं जंगळ रा मनोरम चितराम दिखावै। राम बोलै- हे सुखदाई अर सौरममयी केसां वाळी ! हे मयूराभा मृगी! इण अणूंतै लांबै-चैड़ै जंगळ मांय च्यारां कानीं अमलतास रा सोनलिया पानां अर फूलां रा ढेर लाग रिया है। ममोळियां रा टोळ उछर रिया है। बै मोती-माणक पोयोड़ै सोनै रै हार जियां लागै। अठीनैं मोरिया आपरी पांख्यां छितरायोड़ा मगन नाच रिया है। भंवरां रो गुंजार लोकनिरत री धुन बजावतो सो लागै, गरजता बादळा जाणै ताल-मिरदंग बजा रिया है। बा नाचता मोरियां अर पांख्यां बिचाळै दीखती वांरी असंख्य आंख्या देख’र इयां लागै जाणै बै गैणै-गांठै सूं सजीधजी थारी फूटरी-फर्री देही री सोभा नैं देखण सारू मचल रिया है।

हे कोयलकंठी! आं रूंखां रै झुंडां नैं देखो। आं रूंखड़ां मारग में जाग्यां-जाग्यां फूल बिखेर राख्या है। अै जाणै कै थारी आं कंवळी अर कोमळ पगथळियां नैं कांटा अर कांकरां री चुभण सैण करण री आदत कोनी। अर आं सौरम बिखरावती डाळ्यां नैं देख, जकी थारै दांई आपरी डमरू जियांकली कमर कियां लचकावै। अठीनैं आधै चांद जियांकलै दांता वाळो ओ हाथी। इणरी हथणी पेट सूं है। ओ डाळ्यां पर बैठ्या भंवरां नैं आपरी सूंड सूं उडाय’र पेड री कोटर रै मांय बण्योड़ै छातै सूं बैवण वाळै सुवाद अर सौरमी सहद नैं आपरी सूंड में भर लेवै। पछै आपरी हथणी रै सामी खड़्यो होय आपरी सूंड उणरै मूंढै में देवै अर उणनैं सहद पावै। उण हाथी रै इण प्यारै, व्हालै अर निराळै काम नैं देखो।

राम नैं आ याद कोनी कै अै सगळा दरसाव बां आपरी प्राणप्यारी नें कितरै दिनां में दिखाया पण आज तो वांरो मन जियां फलांगां मारतो वां सगळा दरसावां नैं बार-बार देखणो चावै। हजारां दरसाव दिखाया हुवैला वां आपरी प्राणप्यारी नैं। वां मांय सूं ब्होत कम अर आंगळ्यां पर गिणीजै इतरा सा ई तो चितराम यादां वाळै संदूक मांय सावळसर सहेज राख्या है। इण सारू ई अै वांरै जीवण री अणमोल थाती है। बै सगळां रै सामी आं नै कद कर सकै। अेकदम अेकांत में, जठै कोई नैं भणक ई नीं पड़ै, जद राम आपरी इण यादां री मंजूष नैं खोलै।

अर ल्यो ! राम आपरी यादांळी मंजूष सूं अेक ओर दरसाव बारै काढ्यो। अबै बै आपरी जीवजड़ी सीता रै साथै चित्रकूट परबत री तळाई मांयकर बैवण वाळी मंदाकनी नदी रै कांठै जा खड़्या हुया। राम सीता नैं बतावै कै ‘हे वैदेही! इण रळियावणै विचित्र तटांवाळी, रमणीय अर हंस-सारसां जियांकलै पंखेरुआं सूं सोभती इण मंदाकनी नैं देख। इणरै दोनूं कांठां माथै फळ-फल वाळा न्यारी-न्यारी जात रा रूंखड़ा जाणै रामत घाल रिया है। इणरी सोभा तो कुबेर री सौगन्धिका नाम्नी नदी सूं सवाई लखावै।
देखो! हवा रै झोंकां सूं हालता-डोलता आं रूंखां रै कारण ओ परबत नरतन करतो सो दीखै। हवा रै झटकै सूं नीचै पड़ता कंवळा-कंवळा फूल इयां लागै जाणै चित्रकूट-परबत मंदाकनी पर रीझ’र फूलां री बिरखा कर रियो है। हे कल्याणी! फूलां री ढिगल्यां माथै चढ्योड़ा चकवा देख कियां कामातुर होय रति करण सारू आपरी चकव्यां नैं मीठा अर मोवणा हेला पाड़ै।
हे शोभने! इण चित्रकूट परबत अर मंदाकनी नदी नैं देखण सूं अर दूजो थारै साथै रैवण सूं म्हनैं अजोध्या सूं ई पण घणो आणंद आयो। हे सीते! इण मंदाकनी नदी मांय शम, दम अर तप सूं संजुत्त, पाप सूं पसवाड़ै रैवणियां सिधपुरख रोजीनां सिनान-ध्यान करै। चाल, आपां दोनूं ई इणमें सिनान करण रो सोभाग लेवां। हे प्राणेश्वरी! जियां थूं थारी सखी-साथणियां रै साथै बिनां संका-सरम रै न्हाया करती, पाणी मांय उछळ‘कूद करती खेल्या करती, बियां ई म्हारै साथै ई इण मंदाकनी मांय आं लाल अर धोळा कमल रा फूलां नैं डुबोवती-उछाळती जळक्रीड़ा करो।

राम इण बगत आपरै अतीत मांय मगन होय आपरी प्रिया सूं बातां करै- हे प्रिया ! थूं उण जंगळ रै जीवण नैं कितरो सहजता सूं अंगेज’र अपणाय लियो। साच्याणी थारै आवण सूं बो आश्रम पवित्रता अर रमणीयता री संगमथळी बणग्यो हो। पौधां नैं सींचती बेळा थूं जकी मीठी, मधरी अर मोवणी रागळी करती, वां कोयल जैड़ी सुरीली वाणी आज ई म्हारै कानां गूंजै-

सम्राट स्वयं प्राणेश, सचिव देवर हैं
देते आकर आसीस हमें मुनिवर हैं
धन तुच्छ यहां यद्यपि अनेक आकर हैं
पानी पीते मृग सिंह एक तट पर हैं
सीता रानी को यहां लाभ ही लाया
मेरी कुटिया में राज भवन मन भाया
गुरुजन, परिजन सब धन्य घ्येय हैं मेरे
औषधियांे के गुण-निगुण ज्ञेय हें मेरे
वन देव, देवियां आतिथेय हैं मेरे 
प्रिय संग यहां सब प्रेय श्रेय हैं मेरे
मेरे पीछे ध्रुव धर्म स्वयं ही आया
मेरी कुटिया में राजभवन मन भाया।

इयां सोचतां-सोचतां जियां फिलमां मांय पड़दै पर चितराम बदळता रैवै, बियां ई राम रै मन-मानस वाळै पड़दै पर न्यारा-न्यारा चितराम उभरणा सरू हुया। लाग्यो जाणै अबार-अबार बै सोनलियै मिरगलै नैं मार’र पाछा आश्रम री कुटिया मांय आया। उण दरसाव नैं याद करतां ई राम अेकदम उदास अर उणमणा सा हुग्या, चेहरै रो रंग उडग्यो। उदासी लियां बोल्या हे प्रिये! स्वर्णमृग बण्योडत्रै उण रागस नैं मार’र जद म्हैं आश्रम आयो अर बठै थूं नीं लाधी, जद म्हारी हालत बेजां पतळी अर माड़ी हुई। म्हैं तो अेकदम बावळो सो हुग्यो। म्हारै मांयनैं तो साधारण सो विवेक ई कोनी बच्यो। म्हैं पसु, पंखेरुआं, जीव-जिनावरां, भंवरां अर बांठ-बोझां अठै ताणी कै पेडां, डाळ्यां अर पानां-फूलां सूं थारो ठिकाणो पूछतो थारी नासेट निकळग्यो। म्हैं अधबावळो सो हुयोड़ो च्यारां-कानीं गोता खावतो फिरण लाग्यो। म्हैं अेक पल भी इण बात रो विचार कोनी कियो कै म्हनैं इण भांत बेलीताप करतां देख’र म्हारा मोटा अर टणका भगत म्हनैं महाविरही अर मोटो कामी बतासी।

बोलतां-बोलतां राम अठै आय अेकदम चुप हुग्या। खासा ताळ बाद में मून तोड़ता बोल्या- पण थारै उणी राम खुद आज्ञ देय थनैं खुद सूं अळगी भेज दी अर आज साव चुप बैठो है। होठ ई कोनी हिलावै, जाणै टांको लाग्योड़ो हुवै। जाबक भाटो बण्योड़ो बैठो है। आज थारै सूं बिछड़्यां पूरो अेक जुग बीतग्यो पण थारै उण प्रेमी राम आपरै मूंढै सूं बिछोह रै दुख-बेलीताप रो अेक सबद ई बारै नीं काढ्यो है। ओ राम तो इस्यो हिंवाळो भाखर बणग्यो, जिणरै मांयनैं सौक्यूं ई बरफ दाईं जम्योड़ो अर जड़ हुवै ज्यूं रैवै।

अश्वमेध जिग रो समापन पाखती आयग्यो। इतरा दिन राम अेकदम मांयनैं सूं राजी हा। आतमा में तोस रो भाव हो। वांनै इतरै समैं बाद आपरी प्रिया वैदेही नैं सफाई देवण रो मौको मिल्यो कै थनैं जकी सजा दी वा थारै पति राम कोनी दी, वा तो अजोध्या रै राजा राम दी है। थारै पति रै रूप में म्हें आज ई उण डंड नैं बेजां गळत मानूं। साथै ई आ बात ई साची है कै इण डंड री सांसती अर संताप नैं भोगण सारू थारो ओ पति राम सदा थारै साथै-साथै तिल-तिल बळ्यो, बूझयो है। अेक-अेक सांस में थारै दरद नैं मैसूस करतो खुद बिछोह री बेदरद घड़ियां बिताई है। राम आपरी प्रिया सूं बंतळावै कै अै लारला थोड़ा सा दिन ई है, जका कै आपणै जीवण मांय अेकांत में रैय सुख-दुख अर मन-तन री बात करण रो मौको मिल्यो। बिना किणी संकोच भाव रै राम आपरो दिल री पोटळी सीता रै सामी काठी उघाड़ दी पण परकत नैं ओ ई मंजूर कद। राम जाणै कै दो-चयार दिनां में जियां ई जिग संपूरण होसी अर बियां ई वांरै इण दांपत्य जीवण रो ई पड़दो उठ ज्याणो है।

अेक दिन अजोध्या रै राजा राम री घोसणा हुवै कै जिगसामग्री रै साथै महाराणी सीता री स्वर्णमूरत सरयू नदी में तिरवाई जावै। घोसणा सुणतां ई लोग आकळ-बाकळ हुया, सगळां रै मूंढै अेक ई सवाल हो ‘इतरी सुदर, सोवणी मूरत नैं पाणी में क्यूं फैंका’? इयांकली कलाकृति नैं इयां पाणी में परवारणी उचित है के? लोगड़ा न्यारी-न्यारी मंडळ्यां अर झुंड बणायोड़ा आप-आपरी राय देवै। सगळा भेळा होय सभावां करै अर इण मूरत नैं पाणी में नीं तिरावण सारू राजा राम सूं अरदास करे। पण राजा राम कोई री ई कीं नीं सुणै। स्यात बै अजोध्यावासियां नैं इण बात रो अैसास करावणो चावता कै थे करमखोड़ला इण पवित्र आतमा वाळी नार जात री रतन जियांकली सीता री मूरत राखण जोगा हो ई कोनी। सीता जियांकली सती लुगाई सूं किणी रूप में जुड़ण रो थांरो डोळ ई कोनी। राम नैं आपरी भारज्या रो अपमाण किणीं सूरत में सहण नीं हुवै। राम आपरी घोसणा पर अटल रैवै।
अर अेक दिन जिग री पूर्णाहूति रै बाद हवनसामग्री रै साथै ई सीताजी री सोवणी मूरत सरयू नदी मांय बैवाय दी। उण टेम सगळा तिलमिलावण लाग्या, मांय ई मांय घूटण लाग्या पण कोई कीं नीं बोल्यो, जाणै जीभ नैं कील दी हुवै। उण दिन पाछो राम रो दांपत्य जीवण बिखरग्यो। इण घटणा रै थोड़ा दिनां पछै राम खुद ई आपरो सरीर सरयू नैं सौंपतां डुबकी लगाई अर जा मिल्या आपरी वाल्ही धण सूं सदा-सदा सारू साथ निभावण री हूंस साथै। स्यात सरयू मांय सीताजी री मूरत तिरावण री घोसणा राम रै दांपत्य जीवण नैं भविस में अखंडित अर अमर बणावण री सोची-समझी योजना ही।…………………………

~~डॉ गजादान चारण “शक्तिसुत”

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