श्री आवड़ आराधना – कवि चाळकदान जी रतनू मोड़ी

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।।दोहा।।
आद मनाऊँ आवड़ा, सुगम बनाऊँ संथ।
पवित तास प्रताप ते, पाये कविता पंथ।।
अखै प्रवाड़ा अम्ब का, जगत विषै को जाण।
सोखे समदर हकर सो, एकहि अंजुलि गाण।।

।।छंद – हरिगीत।।
अंजुलिय इक्कर नलगि नख्खर सिन्धु हक्कर सोखिये।
तेमड़े तिहि कर दनू दह कर महिष भक्कर मोखिये।
मद रूपमत्ती सिंह सझत्ती वज्रहत्थी बदावड़ा।
जय मातु जगत्ती बीसहत्थी, आद सगती आवड़ा।
जिय आद रूपा आवड़ा।।१।।

बाहू विशालि वडाळि वाणी, साल सुर के सोखणी।
प्रात्पाळि तूं अनपूरणा, त्रहु काळ जन पर तोखणी।
दुख दाळि दीन दयाळि देवी, काळि रूप कहावड़ा।
जय मातु जगत्ती बीसहत्थी, आद सगती आवड़ा।
जिय आद रूपा आवड़ा।।२।।

दल दण्ड पिण्ड प्रचण्ड दानव, चण्ड मुण्ड ही चूरिये।
वलवण्ड हणि रदवीज सा, भुवमंड भोर वभूरिये।
अणखण्ड खेचर खण्डिया, ब्रहमण्ड रूप बणावड़ा।
जय मातु जगत्ती बीसहत्थी, आद सगती आवड़ा।
जिय आद रूपा आवड़ा।।३।।

निशचर निशंभा सोखि संभा, पूज कुंभा पापरा।
जिय जीति जंभा मधुकिटम्भा यहि अचम्भा आपरा।
करि बाह बहु जगदम्बिका, दनु महिष दरब दहावड़ा।
जय मातु जगत्ती बीसहत्थी, आद सगती आवड़ा।
जिय आद रूपा आवड़ा।।४।।

अणसरण के तुम सरण सगति, करण जनहित कारणी।
ब्रह्मंड धरण रु भरण विस्वनु धरण अम्बर धारणी।
कुरियंद दरण रु हरण कळिमळ, सरण जिहि रक्षावड़ा।
जय मातु जगत्ती बीसहत्थी, आद सगती आवड़ा।
जिय आद रूपा आवड़ा।।५।।

तुम धरम रूप अधर्म हारत, परम आनंद पूजणी।
दुख करम क्रूरे करण दूरे भरम भूरे भंजणी।
मन मरम आसा पूर मैया, सरम राख सदावड़ा।
जय मातु जगत्ती बीसहत्थी, आद सगती आवड़ा।
जिय आद रूपा आवड़ा।।६।।

बहु लवण चाव सुभाव सुवलि, आव आवड़ अम्बिका।
आनंद रूप उदयोत होविय, जोत मय जगदम्बिका।
दिल होत भोत आनंद देविय जोत दृश्य जमावड़ा।
जय मातु जगत्ती बीसहत्थी, आद सगती आवड़ा।
जिय आद रूपा आवड़ा।।७।।

गिर गहर तेमड़ रहर सगति, लहर आनंद ले रही।
अठ पहर चाळक कहे इहगनु, दुक्ख हर सुख दे रही।
अरु अहरनिसि मम ऊपरा अति महर रख महमावड़ा।
जय मातु जगत्ती बीसहत्थी, आद सगती आवड़ा।
जिय आद रूपा आवड़ा।।८।।

।।कवित्त।।
आद सगति आवड़ा, जगति मावड़ा जुगादू।
वपु तुम धरे वहोत, आप जग जोत अनादू।
काळि विम्मळा कम्मळा, भगवति कळा भवानी।
आतम रूप उरस्य, द्रस्य अनद्रस्य दिपानी।
चेतना सगति रूपि चण्डी, वडांवडी जग व्यापणी।
आवड़ा आदि काया उदय, माया मोह अमापणी।।

।।दोहा।।
माया मय जग मोहणी सोहणि तू सुरराय।
तन मन आतप तोखणी, मोखणि जन महमाय।।
कृपा कृपाळी कीजिये, प्रतपाळी नितप्रत्त्त।
दाता चाळक दीन रे, माता रहो मदत्त।।
तेरो विरद विचार तूं, भगवति बीस भुजाळि।
म्हारी करणी माफ़ कर, कर किरपा किरपाळि।।

।।सोरठा।।
देवी दय्यालीह, जन प्रतपाळी जोगणी।
खळवत खयकाळीह, अचळ कलाळी आवड़ा।।
है तूं दुख हरणीह, दरणी दानव दैत्यवा।
कारण सुख करणीह, अधम उधारण आवड़ा।।
सरजी जग सुरराय, गरजी मारण गिररया।
मरजी कर महमाय, अरजी सुणज्यो आवड़ा।।

~~कवि चाळकदान जी रतनू मोड़ी

प्रेषित: गिरधरदानदान रतनू “दासोड़ी”

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