श्री डूंगरराय स्तवन – कवि चाळकदान जी रतनू (मोड़ी)

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।।दोहा।।
नमो सगत सतगळ न्रिमळ, सकळ जगत सेवीह।
तोर कृपा फिर ताहरी, दाखूं स्तुति देवीह।।
हरख प्रफूल्लिय सुर हिये, सगत झुल्लरा स्वच्छ।
थापे गिरवर माढ़ थिर, आप सथान सुअच्छ।।

।।छन्द – नाराच।।
अच्छे रचे जु आवड़ा, अस्थान वे अखण्डळा।
नचे जचे सुनाचता, मचे सुरा समण्डळा।
जगत्त मात जां जुरीय, जोगणी सुजोगरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।
जी डूंगरेच डोकरी।।टेर

नभस्सु माय न्रम्मला, सुभस्सु जाम सत्तमी।
रमत्त रास ईसरी, जमत्त मात जक्तमी।
घमंक पाय घूघरा, धराधर धूजै धरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

सजे श्रृंगार सोरसार, हार हीर हिंडळा।
अपार तार तन्न अेम, क्रन हेम कुंडळा।
डमंक हाथ डेरवो, रमंत भैरवो रुरी।।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

विसाल नैण सुद्ध वैण, माण मैन मोघणी।
अनूप रूप अम्बरा, सरूप तो सतोगुणी।
नमे नचान न्रम्मळा, थये सथान तो थिरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

झणंक पाय झंझरा, खणंक नेवरी खरी।
दमंक चूड़ दो करे, चमंक भाळ चंदरी।
उराळ में विसाल माळ, फूल री मनोहरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

गणंक आण सक्तियां सणंक याण सज्जते।
बजे घमंक बज्जिया, गगन मंक गज्जते।
मगन घन्नि तन्न में, मना प्रसन्न मोकरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

उमग्ग लग्ग यास में, अकास मग्ग उत्तरी।
अभा समान ओपती, प्रभा समान पुत्तरी।
अखार थान आनये, जये विमान जोकरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

सुरान थान थान सू, चढ़ी विमान में चले।
सभा सथान संकरी, महान सक्तियां मिले।
निरत्त तान होत गान, मान पाय मोकरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

प्रवेश ऐस अम्ब पे असे सदेव इन्दरं।
दहंत मोहि दाणवा कहंत जोरिया करं।
मदांध दैत्य मारये सरन्नया सुखीकरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

चितीय वक्र लीध चक्र सक्र काज संकरी।
भ्रकुट्टि के त्रकुट्टि भ्रू विकट्ट थट्ट बंकरी।
निशुम्भ शुम्भ दैत् नाह जंग में जये जुरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

अखण्ड खण्ड युद्ध भो ब्रह्मण्ड हाक मंडवां।
चपेट मार मार चण्ड मुण्ड रुण्ड मुंडवां।
खलं प्रचण्ड खण्डियां दयत्त झुण्ड कोदरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

दुरै दयत्र दूर पूर पत्र ज्यूं प्रचंडिये।
अपार जत्र तत्र अत्र खेत्र शत्रु खण्डिये।
प्रचण्ड पत्र हाथ पे रकत्र ले अरोगरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

मुरं महीष खीज मारी, सोणवी जसंधरा।
मधु सकीट सेस मीट धीट पीट धींगरा।
सहाय माणवां सुरादि दाणवां दह्योकरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

सुदोय सुंद आसुरिंद देव वृन्द दाबये।
सरूप कीय सुन्दरीय विंदरी बणावये।
सुदोय सुंद सोमरे लरे मुखे विलोमरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

उबेर देव बेर पे कुबेर ना कछू करी।
दनु भ्रमाय देवराय साय कीन संकरी।
अभंग भंग दैत्य अंग जंग में जये करी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

रखे भगत्त रिच्छियां पखे सगत्त पारती।
दखे स्तुति देवता अखे उतार आरती।
सगत देव सेवकारी छाकरी त्रिलोकरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

जगत्त मात जोगणी भगत्त भीर भंजनी।
सहाय थाय सेवका गरिष्ट दुष्ट गंजनी।
अरिष्ट मेटि के अनिष्ट शुभ दृष्टि सो करी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

नमो मैया निरंजनी विशाल विश्व वंदनी।
क्रमाल झालये करं निशिचरं निकंदनी।
मुनीजनां जितम्मनां जसत्विनां जपोकरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

अनादि आदि अम्बिका अजादि तें अखण्डळा।
किये सरूप तैं किता हुये तुहीं जु हिंगळा।
अपार रूप आपरा न पार ले निघेकरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

चकार वंश चण्डिका सुधार काज सारणी।
डकार झुण्ड दानवां त्रकार संत तारणी।
सवार हो बलिष्ट सिंह कष्ट काटबो करी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

धरंत चारू कव्वि ध्यान पाण जोरिया परी।
ब्रह्माणि रूद्र राणि वेश जाणिय जुगादरी।
भरम्म दुक्ख भांज राख लाज भक्त लोकरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।।

।।कवित्त।।
डूंगरेच डोकरी, सोक दुख मेटण सत्वर।
रोकि फोज सिंध री, सोखि हाकड़ो समंदर।।
महिष रत्तड़ो मार, बार महरख्ख उबारे।
अरक थंभि आकाश, सुधा ले काज सुधारे।।
तेमड़ो दाबि गिरि तेमड़ै, बड़े विवर विसवेस्वरी।
सिलाड़ी देय बैठी समुख, सुख जग करण सुरेस्वरी।।

सात समाणी सगति, रास रमियत गिरराणी।
ब्रहमाणी वाणीय, कम्मला जुत कतियाणी।।
रुद्राणी रिद्ध सिद्ध, साथ सच्चिय सुरराणी।
चोसठ अठ चालीस, छपन नव रूप छजाणी।।
त्रय तीस कला देवी सगति, अति अच्छरा आयवा।
खेचरी भूचरी बाढ सुख, रमे माढ़ गिररायवा।।

।।दोहा।।
आवड़ रमति रास इम, हास सहित हरसाय।
जगती जोती जोगणी, सगती मिली सुहाय।।

ध्वज त्रिशूल भुज धारणी, आद चारणी अम्ब।
मावड़ कर मो पर मया, आवड़ तो अवलम्ब।।

धरे ध्यान मन सुद्ध सूं, अरज ऊचरे आय।
आय परो तो शरण अब, साय करो सुरराय।।

~~कवि चाळकदान जी रतनू (मोड़ी)

प्रेषित: कवि गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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