सुबोध बावनी – कवि देवीदान देथा (बाबीया – कच्छ)

।।दोहा-मंगलाचरण।।
बंदहु श्री गजवदन को, प्रथम जोरि जुग पान।
जाको कविवर संतजन, बहु विधि करत बखान।।१।।
श्री गुरु दीन दयाल को, बार बार सिर नाय।
बरनों बोधक बावनी, मनहर कवित बनाय।।२।।

।।कवित्त।।
उमा के कुमार गले मंजुल मनि को हार,
मोदक अहार जाकी मुषक सवारी है।
जाको नाम गावत, अबुध होत बुधवंत,
एकदंत दयावंत, संत सुखकारी है।
मंगल करन, शोक संकट हरनहार,
मति के उदार वाको, तात त्रिपुरारि है।
बडे कविराय आदि ग्रंथ में मनाय “देवा”,
ऐसे गनपति जू पे वंदना हमारी है।।१।।

नमो मात बाकबानी, विद्या हू की दानी जानी,
पाणि में बिराजे बीन, वाहन मराल है।
वेद ही पुरान हू को, भेद ही जनाय देत,
सीस पें अनूप बेनी, जाके चंद्र भाल है।
भूषण अमूल आभा, लेत है सु अंग अंग,
मोती मनि लालही प्रवाल गल माल है।
“देवीदास” मूढ को, विशाल बुद्धि देनहारी,
ब्रह्म की कुमारी कवि संत पे कृपाल है।।२।।

मति जो बिकानी दाम काम से जुडानी प्रीत,
राखत गुमानी मोह, जूठी जिंदगानी को।
दियो दान पानि ते न कियो संग ग्यानी हू को,
बूरी बात तानी ! नेह कीनो जाई बानी को।
बुध में बुराई ठानी, भली सीख मानी नाही,
आन्यो न विचार कछु लाभ अरु हानी को।
“देवा” दधि दानी को न गायो मृदु बानी ही तें,
जात है जवानी जैसे पूर जात पानी को।।३।।

सीस पे सु बाल वेरी बांधत है पाग टेरी,
श्रोवन किनेरी वाकी, कोर कसमेरी है।
अंबर अमूल पेरी, चावत है पान बीरी,
बात ही घनेरी यामें तात पर केरी है।
संतजन केत टेरी, सोई न सुनेरी कान,
काया में मगन माया, जाने यह मेरी है।
पर त्रिया हेरी काम दिल में जगेरी “देवा”
आगे यम द्वार सेरी विकट घनेरी है।।४।।

धन ही के काज धाई, देस ही बिदेस जाई,
अनंत उपाय कीनी, नौकरी पराई है।
काहू सो बुराई अरु काहू सो जूठाई ऐसी,
कर के लुचाई माया, बोत ही कमाई हे।
लछ की बडाई पाई, अति ही फुलाई अंग,
देत नहीं पाई कछु, आप ही न खाई है।
जवे जम आई सीस, मारेंगे गदाई भाई,
तबे मन मांहि “देवा” घनो पछताई है।।५।।

अति ही अनूप देह पायो है मनुष हू को,
कीजिए विचार यार, हीरो हाथ आयो है।
तात मात दारा सुत, भ्रात में भुलाई रह्यो,
काम धाम दाम ही में, कहा तू फुलायो है।
करले भलाई कछु कीजे न बुराई काज,
चौरासी में केती बेर आगे भटकायो है।
हरि को संभार ताते, होहिगो संसार पार,
ऐसे ग्रंथकार आगे, ग्रंथ ही में गायो है।।६।।

आज काल करत ही, आयुष उडी है जात,
जैसे उड़ी जात तरु, आक हू के तूरही।
माया को विलास नट-बाजी ज्यूं फैलाई रह्यो,
दोय घड़ी देखिबे की पीछे सब धूर ही।
जैसे सरिता को पूर, जात है समुद्र बीच,
तैसे जग काल मुख जायगो जरूर ही।
जान को गुमान तज, भज भगवान लीजै,
“देवीदास” साची बात, या में नहीं कूर ही।।७।।

इश नें अनुग्र कीन्हौ, ऐसो नर देह दीन्हौ,
ताही को न नाम लीन्हौ, ऐसो भयो बाँवरो।
परदारा हू को रंग, लागि रह्यौ अंग अंग,
करबे में ताको संग, सदा वाँको मावरो।
पुन्य की न जाने बात, करत पराई ताँत,
निंदा में अघात नहीं, बातन को चावरो।
“देवीदास” कहै नेक, सीख नहीं माने मूढ,
चौरासी में जायबे को भयो है उतावरो।।८।।

इन्द्र को गुमान गार्यौ, बाहु पे गिरीश धार्यो,
ब्रज को उगार्यौ जिन मेघ के प्रहार तें।
कंस को पछार जरासंघ जैसे जोध मारै,
केते दुष्ट काट डारै, चक्रहू की धार तें।
कुंदनपुरी में जाई, कीनी सरसाई अति,
रुकमनि हरी ल्याई, भूपति अपार तें।
ऐसे प्रभु है उदार, वाही को संभार यार,
कारज सरैगो “देवा” नंद के कुमार तें।।९।।

उदे भयो भाग ताते ऐसो है आवास तेरो,
उंचै म्हैल मेड़ी ता में, रोशनी तमाम ही।
मंजुल बिछौना ठाठ कुरसी कपाट हू के,
खुब मृदु खान पान, रूपवंती बामही।
पूत ही सपूत स्याना, झूलत झूलना बीच,
दीरघ खजाना बोत, भर्यो वा में दामही।
पून्य के प्रभाव “देवा”, उत्तम जनम आयो,
एतो सुख पायो पे न गायो राम नामही।।१०।।

ऊज्जवल अटारी म्हैल, छटा गोख बारी हू की,
चित्र ही बिचित्र रंग, कंचन की गारी है।
मनि हीरा लाल आभा, लसत दिवाल बीच,
झुम्मर बिलोरी हू की रोशनी अपारी है।
रंजन किँवार कोंच, मंजुल कनक हू के,
सीत ही सुगंध मंद, लागत बयारी है।
ऐसो ही विलास पायो, पुन्य की प्रबलता सों,
“देवा” तीन लोक में धरम सुखकारी है।।११।।

एक ब्रह्म हुते जीव भये है अनेक ता के,
रूप गुन न्यारे न्यारे, नाम ही अनंत है।
जैसे रवि मेघ वस्त्र, मृत्तिका को रूप एक,
बिंब बिंदु तंतु पात्र कोउ ना गनंत है।
सोई जगदीश भरपूर है ब्रह्मांड बीच,
चार खान ब्रह्मा आदि कीट परयंत है।
सुख अरु दु:ख पाप, पुन्य हू ते न्यारो “देवा”,
दाता हू को दाता एक, सोई भगवंत है।।१२।।

ऐरावत, नंदी अरु गरूड मरालपति,
सोई आठों जाम जाको ध्यान ही धरत है।
शेष अरु शारदा गनेश मुनि नारद ही,
गावत ही गान वाके, पायन परत है।
रच्यौ है बेराट जिन रवि शशि तारा गन,
ईशन को ईश तातें काल ही डरत है।
पल में उपावै एक, पल में खपावै “देवा”,
सोई प्रभु जग प्रतिपाल ही करत है।।१३।।

ओपमा अपार मति काहू की लहै न पार,
बानि हू ते ब्हार वाको कैसे गुन गाइये।
अगम अगाध गति, बरनी न जात कृति,
रचना रचाई अति, देखिकै सराइये।
तारा धन शशि मान, चार खान आदि आन,
रचि है जहान भगवान ध्यान लाइये।
याको नहीं रूप रंग, भूपन को सोई भूप,
“देवीदास” कहै ताको पार हू न पाइये।।१४।।

औधि करी आयौ नर, देह पायौ मन भायो,
जब ही ते जायो, तब ही ते सुख पायौ है।
तात झूलरायौ मात झुलना झुलायौ खुब,
बालापन बीत्यौ पछे, जोबन जनायौ है।
मानुनी के संग मन, लीन वारी मीन जैसे,
गोरे गोरे अंग ही के रंग ही फुलायौ है।
काम अरु क्रोध लोभ, मोह में फसाई रह्यौ,
“देवीदास” नाम रघुवीर को न गायौ है।।१५।।

अंक जो मराल पति लिखे है ललाट बीच,
कोटि ही उपाय कीजै, टारे हू न टरे हे।
साठ ही हजार भूप सग्र के कुमार सोइ,
कपिल मुनि के धाम, श्राप हू ते जरे हे।
पंडू हरिचंद राय, बन ही गवन कीन्हौ,
रामचंद्र तजि राज रावन सो लरे है।
होनहार होय सो तो, होइ है जरूर “देवा”
तातें संत सोच काहू बात को न करे है।।१६।।

अरे मन बार बार कीजिए विचार यार,
हरि को संभार यातें, पार भव पायगो।
रुपवती नार प्राण, प्यारे दिलदार तेरे,
पूत परिवार सो तो, काम ही न आयगो।
मेरो मेरो मानी रह्यौ, तेरो तिल भार नाहीं,
छोड़ि के आगार समशान में सिधायगो।
जायगो तू यमद्वार, खायगो अपार मार,
“देवीदास” जबे दिल मांहि पछतायगो।।१७।।

कली दु:खकारी भारी, आयो जग बारी हू में,
नीति की उखारी बेल, अनीति सुधारी है।
बड़े ही अचार मद्य मांस के अहारी भये,
केते संत दाम धाम, राखत हजारी है।
करै है बिपारी क्रूर, लांच लेवे न्यायकारी,
केते नर नारी या में, भये व्यभिचारी है।
कठिन जमानो भारी, न्यारी मन जात हारी,
“देवीदास” ता में पत राखे गिरधारी है।।१८।।

खरी हू न मानै बात, जूठी में अघात नांहि,
कहत पराई ताँत, मूढ दिन रात ही।
न्यात अरु जात ही में अपनी बडाई गात,
हेरी हेरी निज गात, बहुत फुलात है।
ईश की सुनंत गाथ, हिय में सुहात नांहि,
संत तें लजात सतसंग में न आत है।
मात तात सुत दारा, भ्रात में लोभाई रह्यौ,
“देवीदास” हरिनाम कबहू न गात है।।१९।।

गये राव राना, बडे़ बादशा वज़ीर दाना,
केते बुधवाना अरु केते विदवाना है।
केते हिंदवाना वाँ में केते ही मुसल्लमानां,
केते ही प्रबीन स्यानां, केते ही दीवाना है।
केते कलावंत ताना, जानते बजाना गाना,
छोड़ि मृदु साज़ प्याना बसे समसाना है।
साँझ को बिहाना चल्यौ जात है जहाना “देवा”
कीजै न गुमाना यम राना हाथ जाना है।।२०।।

घरी घरी पल तेरी आयु जो घटती जाती,
जावत जुवानी जरा, जोर ही से आती है।
देह मदमाती तेरी, वज्र से कठोर छाती,
चाहत पराई घाती, दया हू न आती है।
तू तो दिन रात काती राखत कलेजे बिच,
तेरे शिर काल हू की गाज न गजाती है।
होय गो बराती समसान लगी मित्र नाती,
“देवीदास” पाछै तेरो कोई न संगाथी है।।२१।।

नये नये रंगवाला, ओढत दुशाला अंग,
कंचन प्रवाला गले मोतिन की माला है।
देह मतवाला देख, होत है खुशाला खूब,
खावत नवाला मद्य पीवत पियाला है।
दीरघ दिवाला बिच, सदन विशाला जामें,
रूपवंत बाला संग, खेलत खयाला है।
“देवा” दीपमाला का ऊजाला चहुँऔर राजै,
ऐसो सुख पायौ पें न गायौ नंदलाला है।।२२।।

चल्यौ ही जहाना जात, रात अरु दिन प्रात,
तू तो ललचात तात, मात भ्रात बेटा में।
गात प्रफुलात खात, भोजन मधुर भात,
ओढत बनात मोह रह्यौ रंग रेटा में।
बौत ही बढात बैर, ता में नांही अकुलात,
अरि को हटात खुशी रैत ख्याल खेटा में।
“देवी दास” कहे कछू दिल में दरात नाँहि,
एक दिन आयगो तू काल के झपेटा में।।२३।।

छटादार एन हू में, मौज पायो मैं न हू में,
मृगनैनी सेन हू में, मोह्यौ मंदमति को।
मीठे मृदु खान हू में, आछे मधुपान हू में,
माया के गुमान हू में, छक्यौ वाम गति को।
कथा हू सुनें न कान, धरै न हरि को ध्यान,
देता न पसारि पान, दान एक रति को।
ऊँचे कुल माँहि जायौ, ब्हौत ही विलास पायौ,
कब हौ न गायौ “देवा” नाम रमापति को।।२४।।

जबै जूड़ ही ते दु:ख, पायौ है गयंद अति,
तबै हरि धाय के बचायौ गजराज को।
पांडवों की त्रिय को अनंत चीर पूरै आय,
सभा बीच राख लीन्ही द्रौपदी की लाज को।
ता तें संत काम क्रोध लोभ अरु मोह तजि,
आठौ याम गावत है गरीब-निवाज को।
ताते भज वार वार, घड़ी न बिसार यार,
“देवीदास” दीन के दयाल ब्रजराज को।।२५।।

झरै नीर शीश गंग, आछी ही भभूत अंग,
उमा अरधंग संग, भूत प्रेत भारी है।
व्याल हू के गले हार, आक ही धतूर आ”र,
विष ही को कंठ धार, नंदी की सवारी है।
राजत है तीन नैन, अंग भंग कीयौ मैन,
दास भक्त ही को देंन, आनंद अपारी है।
जाको है महेश नाम, “देवा” गाय आठों जाम,
सोई दु:खहारी सुखकारी त्रिपुरारि है।।२६।।

नये कंज नैनवाला, जटा का दुशाला शीष,
ओढे जो गयंद छाला, भाल शशी बाला है।
संग ही कराला भूत, प्रेत है विशाला बीर,
गले बीच नाग काला, रूंडन की माला है।
हाथ में त्रिशूल झाला, डाक ताल गात ख्याला,
देह मतवाला कलिकुंद ते उजाला है।
पीवत पियाला भंग, होत ही खुशाला देवा,
दीन पें दयाला ऐसे, ईश जू कृपाला है।।२७।।

टरै ताप पाप शंभु नाम के प्रताप ही ते,
जपे जाप सोई सुख संपति को पावै है।
रावन जलंध्र बाण आदि केते भक्त ही को,
कीन्है जू निहाल ताको संत गुन गावे है।
और ही असुर सुर, केते मुनि वृंद योगी,
साधु कही सिद्ध वा को, ध्यान ही धरावे है।
काशी कईलाश वासी, ऐसे सुखराशि ईश,
“देवीदास” कोई वाको पार हू न पावे है।।२८।।

ठयो है महेस वास, गिरि जो कैलास हू पें,
आवत सुवास चहु पास तें सुहावनी।
मंजुल आराम धाम, रजत तमाम यहाँ,
भूत प्रेत बीर हू की, राजत है छावनी।
गांध्रव सो गान तान, गावत बजात साज,
आभा इन बाग हू की अति मन भावनी।
यहाँ तहाँ राग रंग, बाजही मृदंग चंग,
“देवी दास” ईश पुरी, आनंद उपावनी।।२९।।

डरे ना दिवाना जोर देखि जमराना हू को,
अति ही फुलाना रहै जोबन गुमाना में।
देखी बलवाना ज्वाना करे जू धिंगाना धाई,
तोरत है ताना भये, मस्त मदपाना में।
खाता मन माना खाना, गाता जू रसिक गाना,
धरे न प्रभुका ध्याना, झुलता झुलाना में।
“देवीदास” कहै स्याना, तजि दे गुमाना अंध,
छोडि के जहान यारों, जाना समसाना में।।३०।।

ढरे रनधीर बीर केते रन भूमि हू में,
रावन ही कुंभ मेघनाद बाद भये है।
द्रौन ही गंगेव कर्न, सुजोधन जयद्रथ,
अभिमन्यु आदि केते, भारथ में कहे है।
काल ही यवन जरासंघ जैसे बडे जोध,
प्रथिराज शूर अरू सामत न रहे है।
“देवीदास” कहे कछु कीजै न गुमान अंध,
ऐसे बलवंत सो अनंत आगे गये है।।३१।।

रणुकार बार बार, बाजै घरियार हू में,
आयू जो घटत वाकी सूचना जनावे है।
पल ही मिनिट घरी, जात हे कलाक जाम,
रात धौस मास ऐसे, वर्ष बह जावे है।
केते ही बरस ऐसे, खेलिबे में बीत जात,
तू तो नहीं जानें जो पें संत समझावै है।
अरे अभिमानी ! नैन खोलि के निहार “देवा”,
सुता सुख सेज तो कूं नींद कैसे आवे है।।३२।।

तरु की लतान पंछी, करै चहचान आई,
होत ही विहान न्यारै, न्यारै उडि जावै है।
बादल की घटा छटा, छाई है गगन बीच,
पौन का झपेटा पाई सब बिखरावै है।
सरिता को पूर वर्षा-काल में बिसाल चढी,
एक छिन मांही जाहि सागर समावै है।
तैसे जग ठाठ कुंद-कली जैसो “देवी दास”,
पल में फुलावै फेर, पल में कुमावै है।।३३।।

थक्यौ राम नाम ही की, कथामृत पांन ही में,
काम क्रोध लोभ मद, मोह में तू थक्यौ ना?
बक्यौ देन लेन हू की, आठों जाम कूरी बात,
हरि गुन एक घरी, मुख हू ते बक्यौ ना?
छक्यौ दाम जोबन, गुमान मद्यपांन ही ते,
प्रभु की विचित्र लीला, देखि कछु छक्यौ ना?
सक्यौ है उठाई पाप, हू की मोट “देवीदास”,
कबहू न भवजल पार होई सक्यो ना?।।३४।।

दधि के अगाध वारि, न्यारी मन जात हारी,
जा में मच्छ भारी भारी, बडे दु:ख कारी है।
ता में असुरारि धँसे, कूरम को रूप धारी,
सिंधु ते निकारी लिन्है रत्न दस चारी है।
शंखासुर मारी वेद वारी मुख चारी हुकि,
दिये पन्नगारी पति ऐसे उपकारी है।
जाको उर धारी संत, तरे है अपारी आगै,
“देवीदास” ऐसे सुखकारी श्री मुरारी है।।३५।।

धर्यो रहै धन माल, मोती मनि हीरा लाल,
मानिक प्रवाल कौड़ी रूपिया रियाल ही।
ऊँची ही दिवाल वाँ में, बंगला विशाल ब्हौत,
आछी अश्वशाल गऊशाल मेड़ी माल ही।
कोट सुरवाल आछै दुपटा दुशाल अरु,
केते पटु लाल शाल रेशमी रूमाल ही।
सोई छोड़ि जाएगो तू, काल विकराल हाथ,
“देवी दास” संग न चलेगो एक बाल ही।।३६।।

नरतन पाई शील, राखिए सदाई भाई,
कामिनी पराई माई, बाई सम ध्यायिये।
दया दीनताई दिल माई जु द्रढाई यार,
तजिए जूठाई को सचाई उर लाइये।
छोड़ छलताई अरू मन की कुटिलताई,
निज मुख निज प्रभुताई न जनाइये।
“देवी दास” कीजिए भलाई जु बुराई तजि,
गुरु को रिझाई रघुराई गुन गाइये।।३७।।

पति के बियोग सती देह को जलाई देत,
चंद को निहारी प्रेम राखत चकोर ज्यों।
स्वाति की सदाई बुंद चाहत बपैया जैसे,
नाचत है मोर सुनी गाजन की घोर ज्यों।
दीप में खद्योत जरै, प्रेम के प्रसंग ही तें,
नट हू को ध्यान एक लागि रह्यौ दोर ज्यों
“देवीदास” ऐसे ध्यान हरि में द्रढाई लीजै,
जैसे गोपिका को प्रेम नंद के किशोर ज्यों।।३८।।

फँस्यौ फूल बासन में अलि एक गोबर को,
ऊड्यौ नहीं तों लों जों लो, कंज कुम्हलायौ है।
आयौ द्विजराज सोई भृंग को प्रसून तोर्यो,
उत्तम अनोप नीर गंग में नवायौ है।
बिप्र वेद बानी सेवा ठानी जू महेश जू की,
यही पुष्प ईश हू के शीष पे चढायौ है।
“देवीदास” ता ते जाई कीजिए सुसंग भाई,
ऊँच संग पाई अलि, ऊँच पद पायौ है।।३९।।

बलि के जू यग्य बीच, हरि ने प्रपंच कीन्हौ,
विप्र को स्वरूप वपू, वामन को पाय के।
बेद हू की धुनि सुनी, भुपति बुलाई लीन्हौ,
मांग मांग विप्र ऐसो कह्यो भूप आय के।
विप्र कहे तीन पाँव, दीजिए छिति को दान,
भूपति तुरंत दीन्हौ, पानि जो पसाय के।
एते में विराट देह, कीन्हौ विश्वनाथ “देवा”,
हरि हाथ डंड सो ब्रहंड लगो जाय के।।४०।।

भयो न भलाई काज, नर देह पायौ साज,
संत को समाज देखी, शीश तें नमायो ना।
मोह्यौ हेरी गोरी चाम, तन में बढायौ काम,
माया धन धाम बाम, ता में तू अघायो ना।
पुन्य की न जाने रीति, पाप सें अधिक प्रीति,
करै जू अनीति चित्त, यम तें डरायो ना।
रह्यौ मेरो मेरो मानी, जूठी जूठी बात तानी,
“देवीदास” अभिमानी, हरिगुन गायो ना।।४१।।

मन ही गयंद भारी, ताको अंग लीजै न्यारी,
काम क्रोध लोभ मद, चरन कहावै री।
शीश वा के मोह मान, कलपना दोई कान,
दंभ ही दसन सूंढ तृषना हलावे री।
दुविधा के नैन सो निहारि चैन पावत है,
प्रकृति को पूछ सोतो पीछे ही फिरावे री।
“देवी दास” मन हाथी, तबै बस होवै जब,
ग्यान को अंकुश गुरु, म्हावत लगावे री।।४२।।

यग्य रखवारे अवधेश के दुलारे प्रभु,
मुनि को उगारे केते दुष्ट ही को मारे है।
सूर्पनखा नासा कान, वान ही सो काट डारै,
शिला पे चरन धारे, अहल्या उधारे है।
भूपति जनक द्वारै बड़ै छितिपाल हारै,
ईश को धनुष भारे राम तोड़ डारे है।
सिय काज सारे पर्शुराम को गुमान गारे,
“देवीदास” प्रान प्यारै कोटि संत तारे है।।४३।।

रह्यो जो कपाल ईश, नवलख ताराधीश,
इंद्र सुराधिप जू पे बड़ि मित्रताई है।
हरे अंधकार ऐसो, तेज हे अपार पुनि,
वंश परिवार ही ते, छिति रही छाई है।
प्यारे जू रतन भ्रात, भगिनी रमा विख्यात,
पयोनिधि जैसो तात, विष्णु से सगाई है।
विधि ने ललाट अंक, लिख्यौ है मयंक “देवा”
टर्यो ना कलंक याकों इतने सहाई है।।४४।।

लग्यौ हरि नाम लेन, प्रेम सो प्रलाद जबै,
तबै वाके तात आई केती बेर वार्यौ है।
नेक ही न मान्यौ पूत, अरि सम मान्यौ भूप,
अति क्रोध आन्यौ मतो मारिबे को धार्यो है।
खड्ग सो प्रहार नीर नाव में डूबायो पीछे,
वहनि में जार्यो गिरि शृंग ही ते डार्यो है।
एते कष्ट हू ते “देवा” भक्त को उगार्यो प्रभु,
नरहरि रूप धार्यौ हिर्नाकंस मार्यो है।।४५।।

बह्यो जात जाह्नवी के, वारि में विशाल व्याल,
खेलन शिकार तहाँ आए पन्नगारी है।
नाग को निहारी चैन पायो जू खगेश भारी,
पंख की झपेट डारी वाको चंच मारी है।
छूट गये प्रान जान भई जू मुरारी जू की,
शंख चक्र धार कीन्ही गरुड़ पे स्वारी है।
सदा पाप हारी शत्रु ताप में निवारी लेत,
“देवीदास” मात गंगे! ऐसी सुखकारी है।।४६।।

शठ काम क्रोध लोभ मोह में मगन भयो,
शील की संतोष दया, ग्यान ह्रदै आयो ना।
जूठे लेन देन हू के, फेन में कमाई रह्यौ,
मैन हू में मौज पायौ नेक हू अघायौ ना।
लंपट लबारी ज्वारी, विभिचारी हूँते यारी,
संत की समाज न्यारी चैन चिंत पायौ ना।
अरे ! अभिमानी बात ग्यानी की मानी न “देवा”
गई जिंदगानी तों लों प्रभु गुन गायो ना।।४७।।

षड ही अढार चार पढि के प्रबीन भयो,
पिंगल के छंद सीख्यौ रस अलंकार को।
सप्त स्वर गीत राग, रागिनी के न्यारै रूप,
वारि में तरनौ सिख्यौ फेरबो तोखार को।
कोक न्याय नीति हीरा मानिक प्रवाल लाल,
मोती की परीक्षा सिख्यौ वैदक के सार को।
“देवीदास” एतो वृथा, सिखबो तमाम तों लों,
जों लों गुन गायो नहीं नंद के कुमार को।।४८।।

समता को टोप सीस, बख्तर विचार हू को,
शील को लगाम ग्यान अश्व ही को डारिए।
जीन जगदीश नाम, कटिबंध केशव को,
धीरज की ढाल सदा, पीठ हू पे धारिये।
करुना कटारी बंध, बरछी बिहारी जू की,
छमा के खडग ही तें, शत्रु ही संहारिये।
एतो ही समाज साज, जक्त रन भोमि बीच,
“देवा” काम क्रोध लोभ, मोह रिपु मारिए।।४९।।

हरि को संभार घरी एक न बिसार यार,
वार वार ऐसो दाव फेर ही न आएगो।
करि ले सुकृत पुनि, सेवा गुरू संत हू की,
ऐसी जो मनुष्य देह फेर कहाँ पायगो।
नात जात मित्र मात, तात सुत भ्रात छोड़ि,
रीते हाथ आयौ तैसे यम हाथ जाएगो।
लीयो न प्रभु को नाम, कियौ न भलाई काम,
“देवीदास” एसे दिल मांहि पछताएगो।।५०।।

लग्यो जू किरात हाथ, खेंचन कबान बांन,
आय के सिंचान राह रोक्यो असमान को।
के’त ही कपोत प्यारी, गाय ले बिहारीलाल,
करेगो बचाव वो ही तेरे मेरे प्रान को।
इत में भूयंग डस्यौ, पारधि के पायन में,
छूट गयौ तीर जाई, लग्यौ है सिंचान को।
शत्रु को संघारी प्रभु, भक्त को उगारि लेत,
राख ले भरोसो “देवा” नंद के कुमार को।।५१।।

क्षमा अपराध कीजै, दीन के दयाल प्रभु,
मैं तो हूं पतित यार, लंपट लबारी को।
संत सुखकारी हू को, लीनो नसरन जाई,
नेह कीन्हौ धाई धाई, दुष्ट दुराचारी को।
पाव सेर अन्नदान दियौ न पसारि पान,
कीयौ नाही स्नान भागीरथी पापहारी को।
कुंज के बिहारी भव वारि तें उगारी लीजै,
“देवीदास” कहे डर भारी यमद्वारी को।।५२।।

ग्यात को बिचारि लेहू, अग्यात निवार देहू,
एहु मोक्ष द्वार यार, वार वार पावे ना।
तग्य हो तपास श्वास विश्व है विनाशवान,
अरे मोहबस कीस कीर ज्यों बंधावे ना।
लग्नता से दीनद्याल, नंदलाल को सँभाल,
होवेगो निहाल इष्ट “देवा” बिसराये ना।
चिंतामनि पाई भाई, कर ले कमाई चाही,
गुमाई बहुत बेर अबही गुमावे ना।।५३।।

वेद सार खंड ससि, वाम अंक गति मिति,
नौमि गुरू शुक्ल मधु मास के समास ही।
देथा मारू चारन जो भव्य है कहाति जाति,
देस कच्छ स्वच्छ ग्राम बाबिया निवास ही।
देवीदान दीनो “देवी दास” ही प्रकास कीन्हौ,
नवीनो नगीनो ग्रंथ बावनी विलास ही।
सुबुधि उपावनी सो, ताप को नसावनी है,
भावनी सुजान को, बढावनी हुलास की।।५४।।

।।इति श्री सुबोध बावनी संपुर्ण शुभं भवतु।।

~~कवि देवीदान देथा (बाबीया-कच्छ)
प्रेषित: नरपत आसिया “वैतालिक”

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