सुरराज आरजी सुणै साहिब!

च्यारां कानी वरसाल़ो लूंबियो। सांवण रा लोर लटूंबिया। घणघोर कांठलां बणाव कियो। आभै में बीजल़ी रा पल़ाका अर धरा माथै मोरां रो कल़ाव बखाणणजोग है पण गारबदेसर ठा.किसनसिंहजी एक बात सोल़ै आना सटीक कैयग्या-

सौ कौसां बीजल़ खिंवै, ता सूं किसो सनेह।
किसना तिसना जद मिटै, आंगण वरसै मेह।।

अजै ई थल़ देश इंदर री उडीक में है। कवियां किताई इण री दातारगी रा गीत गाया पण चौपड़ै घड़ै छांट नीं पड़ी। सौ एक वीणती भल़ै —

।।दूहा।।
कव कितरां तो कीरती, साच कही सुरराज।
अरज रखी तैं आंतरै, खिणी न कानां खाज।।1

सुरधर वाल़ा सांम सुण, रीझ भूलांणो रीत।
बिन बूठा धर-वालमा, गिटग्यो डींगल़ गीत।। 2

मालम करकठियो मुदै, मनमठियो तूं मीत।
है हठियो सठियो हिंयै, (जणै)गिटग्यो सारा गीत।।3

सुरधर वाल़ा सांम सुण, खरी म खरजै खीझ।
शचीपती तैं सांपरत, रेटी रीतां रीझ।।4

सावण नह लूंबै सरस, नह ले वरसण नांम।
सुज छौल़ां सुरयंद सुण, की फिर आसी कांम।।5

रोर विहंडण लोर रम, गहर घटा घणघोर।
पशु पंखी हर प्रांणियां, चाव हुवै चहुओर।।6

अरज सुणै आ अमरपत, दरज करै ओ दाव।
गरज संपूरण गाढधर, वसू मेह वरसाव।।7

।।छंद-गयामालती।।
काढियो मुरधर काल़ कूटै,
एक थारी आस में।
इण झांख साम्हीं आंख काढी,
बात रै विसवास में।
ओ बीतियो ऊनाल़ इणविध,
छांट हेकन छेकड़ी।
सुरपाल़ अरजी सुणै साहिब,
पूर गरजी आ पड़ी।।1

आसाढ बीतो बिनां ऊमां,
मास रीत मेघड़ां।
इम अहरनिस सज रही उडती,
धूड़ गैंतुल़ सज इण धड़ां।
विदरंग ओरण धरा विरँगी,
खड़ी अणमण खेजड़ी।
सुरपाल़ अरजी सुणै साहिब,
पूर गरजी आ पड़ी।।2

आसाढ ना गैघूंबियो इल़,
कांठल़ां तैं ना करी।
मुरधरा दिस तैं वडा मालक,
करां सजियो ना करी।
सूखिया सरवर कूप सारा,
करै कुसमो किड़किड़ी।
सुरपाल़ अरजी सुणै साहिब,
पूर गरजी आ पड़ी।।3

झल झूंसरै खड़ नहीं जोवो,
रोही डांगर रड़बड़ै।
भखभखी ऊठै भगै भोगन,
तिरस मरता तड़बड़ै।
तन ढकण छांया पात बिन तर,
हींयै माची हड़बड़ी।
सुरपाल़ अरजी सुणै साहिब,
पूर गरजी आ पड़ी।।4

सुज आवियो इम माह सांमण,
किरस्सा मन में कल़पिया।
धोरिया अजतक पड़्या धोल़ा,
मनां मोल़ा मोरिया।
दिल डेडरां नह साद दीनो,
जोय माची नह झड़ी।
सुरपाल़ अरजी सुणै साहिब,
पूर गरजी आ पड़ी।।5

कुदरत्त थारी कोरणी बल़,
वल़ोवल़ तूं वरसवै।
थल़देश किरपा बिनां थारी,
तन्न मन सह यूं तरसवै।
घट हांम पूरण चढै गजपत,
उरड़ भांजण सह अड़ी।
सुरपाल़ अरजी सुणै साहिब,
पूर गरजी आ पड़ी।।6

मघवांन अब मत करै मोड़ो,
मरू फोड़ो मेटजै।
उतराध कांठल़ सजै ऊमड़,
भाव भलपण भेटजै।
बीजल़ी पल़का हुवै वल़वल़,
छति काल़ रै सिर दे छड़ी।
सुरपाल़ अरजी सुणै साहिब,
पूर गरजी आ पड़ी।।7

सांमण बीकानेर सुरंगो,
कोड कोड घर कांमणी।
खिती रोर मेटण नीर खल़का,
दियै पल़का दांमणी।
प्रिथी पशु पंखी मिनख परगल़,
गहर सुख री दे घड़ी।
सुरपाल़ अरजी सुणै साहिब,
पूर गरजी आ पड़ी।।8

किरसांण सजधज करै खेती,
उरस हेती ऊपजै।
बदनं पसीनो बहै विमलं,
निज मही मोती नीपजै।
गुणियांण भामी देख गिरधर,
हिव हिंयै हल़धर हड़हड़ी।
सुरपाल़ अरजी सुणै साहिब,
पूर गरजी आ पड़ी।।9

।।छप्पय।।
महर आज मघवान, कान अरजी तूं करजै।
धरजै थल़ दिस ध्यांन, हेत रख विपती हरजै।
उमड़ै अब उतराध, मेघ घट्टा मतवाल़ी।
दांमण पल़का देय, कांठल़ां वरसा काल़ी।
हलधरां हरस समपै हिंयै, दुरस हमै थल़ देश नै।
रोर नै भांज घणघोर रम, अंतस मन आदेश नै।।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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