स्वाभिमान और गौरव का बिंदु है जौहर

राजस्थान का नाम धारा-तीर्थ के रूप में विश्रूत रहा है। शौर्य और धैर्य का मणिकांचन संयोग कहीं देखने को मिलता था तो वो केवल यही धरती थी। ऐसे में कुछ सवाल उठते हैं कि फिर राजस्थान के रणबांकुरों को युद्ध में परास्त और यहां की वीरांगनाओं को जौहर की ज्वालाओं में क्यों झूलना(नहाना) पड़ा? क्या कारण था कि जिनकी असि-धाराओं के तेज मात्र से अरिदलों के हृदय कंपित हो उठते थे, उनको साका आयोजन करना पड़ता था?

जब हम निर्विकार रूप से इन बातों पर विचार करते हैं तो निश्चित रूप से जो तथ्य हमारे सामने आते हैं उन्हें एक-दो राजस्थानी कहावतों में समाहित किया जा सकता है। जैसा कि यहां के कुछ लोगों ने तो अपना यह ध्येय ही बना लिया था कि-‘भाई मरिये रो धोखो नीं, पण भोजाई रो नखरो भागणो चाहीजै।’ और ये ही लोग ‘आंख फोड़’र अपसुगन’ करते थे।

लुद्रवा, जालोर, जैसलमेर, सिवाना, आदि के इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो यह तथ्य हमारे सामने आते हैं कि यहां के वीर शासकों को अपने ही प्रिय लोगों के घात-प्रतिघात का शिकार होना पड़ा था। उनके सामने ये यक्ष प्रश्न था कि या तो आक्रांताओं की अधीनता स्वीकार कर उनकी शर्तों पर जीवन यापन किया जाए या स्वाभिमान व जातीय गौरव को अक्षुण्ण रखने हेतु साका आयोजन किया जाए। जब अपने ही लोग स्वाभिमान का चीरहरण करने को लालायित हों तो ऐसे में स्वाभिमानपूर्वक जीवन जीने वाले मरण का वरण करना ही श्रेयस्कर समझते थे–

तोड़ां घड़ तुरकाण री, मोड़ां खांन मजेज।
अनमी दाखै भोजदे, जादम करै न जेज।।
गेबी नाम धरावियो, आसावत अणजाण।
भाटी दीनो भीमदे, तव गढ भेद प्रमाण।।

राजस्थान का इतिहास पढ़ते हैं तो चित्तौड़गढ़, रणथंभौर, जैसलमेर, गांगरोन, रूण, सिवाना, जालोर आदि विश्व विश्रूत स्थानों के साथ अनेक ऐसे स्थान हैं जहां वीरांगनाओं ने इस दोहे को सार्थकता प्रदान की कि-

सुलटा तजै न शीलता,
कुलटा भूषण देख।

जनकवियों ने ऐसी ही वीर-बालाओं के लिए ही तो कहा था कि-

साध सराहे सो सती,
जती जोखता जाण।

जहां-जहां साका आयोजन हुआ, वहां-वहां का कण-कण वंदनीय-अभिनंदनीय हुआ। लोगों ने उस माटी की पावनता स्वीकारी तथा उस धरती को तीर्थ सदृश माना। उन्होंने इस बात को तुच्छ से तुच्छ माना कि जौहर की ज्वालाओं में अपना शरीर समर्पित करने वाली महिलाएं किस जाति अथवा समुदाय से थी? लोगों ने उन वीर ललनाओं को बिनां किसी पूर्वाग्रहों के राजस्थान के गौरव की अभिवृद्धि करने वाली मानकर बांठे(झाड़ी)-बांठे के पास उनकी पाषाण पूतलियां स्थापित कर अपना जमीर जिंदा व संवेदनायुक्त होने का प्रमाण दिया था।

साका और जौहर राजस्थान के स्वाभिमान के प्रतीक रहे हैं। ‘साकौ’ का राजस्थानी में अर्थ होता है- महायुद्ध, अमर कीर्ति की घटना, शौर्य की धाक। शूरवीरों के साका तथा वीरांगनाओं का जौहर मरण पर्व के प्रतीक हैं।

वैसे तो जौहर का शाब्दिक अर्थ तेज विशेषता, खूबी, गुण आदि होता है लेकिन राजपूतों में जौहर करना युद्धकालीन एक प्रथा भी रही है। जब राजपूतों को यह विश्वास हो जाता था कि येनकेन प्रकरेण शत्रु गढ में प्रवेश कर ही जाएगा तब वे तो केशरिया बाना पहनकर मरने के लिए शत्रु से भिड़ जाते थे और उनकी स्त्रियां गढ़ में ही चिता बनाकर जिंदा ही अग्नि में जल जाती थी ताकि शत्रु उन्हें अपवित्र न कर सके। उनकी पावनता, कुल गौरव, रक्त शुद्धता व आन-बान अक्षुण्ण रह सके। इसी प्रकार राजस्थान में किसी आतताई शासक के अन्याय के प्रतिकार स्वरूप किसी के भी जल मरने की क्रिया भी जमर(जौहर) ही कहलाती है। ऐसे जौहर भी राजस्थान के अनेक स्थानों पर हुए हैं। गढ़ों में आयोजित जौहर को समस्त राजस्थान वासियों ने अपने सम्मान की श्रीवृद्धि करने वाला माना है। डॉ.शक्तिदान कविया लिखते हैं कि “धवल धरती पर क्षात्रधर्म की पावन पताका सहस्राब्दियों तक फहराती रही है। जिसका अर्थ था ‘क्षतात त्रायते इति क्षत्रियः

इस धरा की धवलता इसी लिए कायम रही कि जान से श्रेयष्कर आन को तो प्राण से श्रेष्ठतर प्रण को मानने वाली इस धरती के लोगों का आदर्श वाक्य था कि ‘रैवै साख, जावै लाख।’ तभी तो यहां यह दोहा प्रसिद्ध है कि-

सांई तोसूं वीणती, ऐ दुई भेल़ा रक्ख।
जीव रखै तो लाज रख, लज बिन जीव न रक्ख।।

लाज विहीन लोगों को इस धरती ने कोई महत्व नहीं दिया। यहां की नारियां गौरव के साथ लाज का आभूषण धारण करती थी, क्योंकि लाज ही भारतीय नारी का सर्वोपरि भूषण माना गया है और राजस्थान इसका प्रतिनिधि। इस संबंध में राजरूपक के प्रणेता वीरभाणजी रतनू लिखते हैं जो स्त्रियां लज्जाशील, शीलवान होती हैं वे पातिव्रत्य खंडित नहीं करती। उन्हें धन, यौवन, रूप ताकत आदि से विचलित नहीं किया जा सकता। लज्जाहीन होकर जीने के बनिस्पत वे मरना स्वीकार करती हैं-

लाज सील़ सन्नेह,
लाज पतिवरत न मूकै।
लाज मांण रक्खणी,
लाज अवसाण न चूकै।
लाज सोभ संग्रहै,
लाज धन लोभ न लागै।
प्रीत माण द्रढ पांमि,
लाज इक काज उमग्गै।।

लोचनों में लज्जा के कस वाले नर-नाहरों ने ही तो यहां साका व उनकी स्त्रियां ने जौहर किया था। आसाजी बारहठ के शब्दों में-

जेण लाज हमीर,
झूंझ मुवो रणथंभर।
जेण लाज चुंडराज,
मुवो नागाण तणै सिर,
जेण लाज मुल़राज,
मुवो दूदो जैसल़गिर।
जेण लाज पातल्ल,
मुवो पाबागढ अंतर।

यही बात कविराजा बांकीदासजी लिखते हैं-

पीथल कान्हड़दे पतो, गोग हमीर हठाल़.
साको कर पोहता सरग, अचल़ो ऐ उजवाल़।।

कविराजा बांकीदासजी ने अपनी ख्यात में उन गढ़ों के गौरव को गुंफित करते हुए उनका नामोल्लेख किया हैं जहां नर-नाहरों ने साका तथा वीरांगनाओं ने जौहर की ज्वालाओं में अपने आपको इस तरह समर्पित किया कि जैसे वे अग्नि से नहीं अपितु निर्मल व शीतल नीर से नहा रही हों–

सूरातन सूरा चढै, सत सतियां सम दोय।
आडीधारां ऊतरै, गणै अनल़ सम तोय।।

“चहुवांणां सातल-सोम घर जनम हुयो गढ सिवाणै रो।
जाल़ोर सोनगरा कान्हड़दे घर जनम हुवो।
चित्तौड राणा अड़सी रै घर जनम हुवो।
सिहोर गोहिलां रै घर जनम हुवो।
जैसल़मेर दूदा-तिलोकसी रै घर जनम हुवो।
गांगुरण खीची अचल़दास घर जनम हुवो।
अकबर चितोड़ लियो जद राणा रै घर जनम हुवो।
सिवाणो कला रायमलोत रै घर जनम हुवो।”

सातल-सोम, अड़सी, कान्हड़दे, दूदा-तिलोकसी, अचलदास, हमीर, कला रायमलोत, आदि ऐसे नाम हैं जिन्होंने क्षत्रियत्व की धर्म-ध्वजा को निष्कलुषित रखा था। इन वीरों के साथ मरण का वरण करने वाले अन्य वीरों को भी राजस्थानी कवियों ने रंग का अर्घ्य चढ़ाया है-

मांझी मूवा माढधर, रसा खाट नै रंग।
अडर अणखलै आहूड़्या, रजपूतां ज्यां रंग।
रणथंभर रहिया जिकै, रजपूतां नै रंग।
विढिया साथै भोज रै, रांघड़ छत्र्यां रंग।
….आदि आदि।

उक्त वीर शरणागतवत्सलता, स्त्री-सम्मान, धर्म दृढता आदि के कारण मर गए लेकिन ‘जबलग सास शरीर में, तबलग ऊंची ताण’ की बात पर डटे रहे। जब दूदा-तिलोकसी के समय जैसलमेर में साका व जौहर हुआ। उस समय उस साके के नायक दूदा जसहड़ोत जिस अदम्य साहस के साथ लड़े उसके किस्से जनमानस में विख्यात है- हड़ हड़ दूदो हंसियो। प्रत्यक्षदर्शी कवि आसराव रतनू लिखते हैं कि निकलने को तो दूदा भी धर्म-द्वार(गढ़ का पिछला दरवाजा) से निकलकर सुरक्षित जा सकता था लेकिन उस महावीर ने सत्कर्मों का पुण्य संचित रखने हेतु रणांगण में मरना ही श्रेष्ठ माना-

क्रम राखण दीन्हा नवकोटां,
दूदे धरम-द्वार नह कीन।

नैणसी अपनी ख्यात में लिखते हैं-

“माणस 100 सूं रावल़ दूदो काम आयो नै रावल़ दूदै री वैरां बीजी तो सगल़ी ही गढ आय जमर कर बल़ी।”

यही भाव कला रायमलोत के सिवाना में आयोजित साके व जौहर के संबंध में समकालीन कवि माला सांदू ने व्यक्त किए हैं कि अन्य कायर शासकों की तरह कला रायमलोत ने धर्म-द्वार की तरफ रुख न करके मरण पर्व मनाना ही श्रेयष्कर माना-

तैं अनिकारां जहिं ऊतरै,
दल़ कल़पियो न धरम दुवार।।

किसी अन्य कवि ने लिखा है कि उस समय सिवाना का मरणमहोत्सव देखने लायक था। एक तरफ रायमल मालावत की कुलवधुएं जमहर (जौहर) की तैयारियां कर रही थी तो दूसरी तरफ उनके कुलदीपक समहर(युद्ध) को प्रस्थान कर रहे थे। उस अद्भुत जमहर व समहर का साख सिवाना भर रहा था-

राममल कुल़ वधू समोभ्रम रायमल,
भलौ पायो परब रीझियो भांण।
साख जमहर तणै भरै सिवियांण सुज,
साख समहर तणी भरै सिवियांण।।

वि.सं.1480 में अचलदास खीची ने गढ गांगरोण में जो वरेण्य साका व जौहर किया उसका अद्भुत वर्णन ‘अचलदास खीची री वचनिका’ में पठनीय है। जौहर की ज्वालाओं में चौहान कुल की वधुओं ने स्नान किया उसकी चंद्रिका आज भी चतुर्दिक चमकती हुई दृष्टिगोचर होती है।

इससे पूर्व इसी आतताई अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी लड़की फिरोजा उर्फ सितारा को जबरन जालोर के युवराज वीरमदेव से ब्याहना चाहा तो वहां साका व जौहर हुआ। वीरमदेव के मनोभावों को बांकीदासजी आसिया ने इस प्रकार व्यक्त किया है–

परणूं धी पतसाह री, रजवट लागै रोग।
वर अपछर वीरम कहै, जाणो सुरपुर जोग।।

‘कान्हड़देप्रबंध’ के अनुसार उक्त साका व जौहर वि.सं.1368 वैशाख शुक्ला गुरुवार को हुआ था। जिसमें राजपूत रमणियों के साथ अन्य जाति की महिलाओं ने भी अपनी मर्यादा को अक्षुण्ण रखने हेतु अग्नि का वरण किया था।

इसी खिलजी के भगौड़े माहिमशाह की रक्षार्थ हठी हमीर ने साका किया था तो इनकी कुल स्त्रियों ने जलजौहर भी किया था। बांकीदासजी ने लिखा है-

आया साह अलाऊदी, विढ कटकां सूं वीर।
मांझी रिणथंभर मुवौ, हठ निरवाह हमीर।।

जब महाराणा उदयसिंह के समय बादशाह अकबर की सेना ने आक्रमण किया। उस समय गढ की रक्षा का भार जयमल मेड़तिया पर था। जब उसे अकबर के संदेशवाहकों ने गढ उन्हें सुपूर्द करने को कहा तो उस समय उस महावीर ने अपने पूर्ववर्ती महानायकों के चरित्र का अनुसरण करते हुए जो प्रत्युत्तर प्रेषित किया। उसको ईसर रतनू ने ‘जयमल मेड़तिया रा कवत्त’ में गर्वोक्ति के साथ इस प्रकार लिखा है-

ज्यों कान्हड़ जाल़ोर, दीध जद साको दक्खै।
दूदै जैसल़मेर, को हीण न दक्खै।
ज्यों हमीर रणथंभ, जूड़ै जीतो जगि जांणै।
सोम मंडोरि जेम, कियो सातल समियांणै।
तिम करिस सरिस पतसाह तो, खाग सार खेरों खरों।
नँह नमै सील नदियौं दुरंग, वदे माल वीरम रो।।

उस समय चैत्र कृष्णा 11 सं. 1624 में चितौड़ किले में जौहर की ज्वालाएं धधक उठी। बांकीदासजी की ख्यातानुसार 350 महिलाओं ने अग्नि स्नान किया- “चितौड़ भिल़ियो जद साढै तीन सौ लुगायां रो जंवर हुवो।”

ये सभी वीर सुरक्षित समर्पण कर सकते थे, भाग सकते थे, धर्म परिवर्तन कर सुविधाओं का उपभोग कर सकते थे या उनके साका करने के बाद उनकी कुलवधुएं आतताइयों के हरम की शौभा बढ़ाकर आभूषणों से सज्जित हो सकती थी, विलासिता की तरफ डिगकर जारों को अपने इशारों पर नचा सकती थी लेकिन उन हुतात्माओं ने ऐसे किसी कलंकित कार्य करने के उलट हुताशन को हृदय लगाना ही श्रेष्ठ कर्म माना।

जौहर राजस्थान वासियों के लिए गौरव बिंदु रहा है। इसे किसी अनर्गल अर्थ में परिभाषित करना, न केवल हमारी विकृत मानसिकता को दर्शाता है अपितु हमारे कुंठा ग्रसित होने का भी परिचायक हैं। जौहर में जलने वाली स्त्रियां यहां सम्पूज्य हुई। होनी ही थी। क्योंकि उन्होंने अपने सत्यव्रत को नहीं त्यागा। जो सत्यव्रती रही वे ही सतियां कहलाई। भारतीय जनमानस में ‘सात सतियां’ प्रसिद्ध हैं। वे जली नहीं थी अपितु अपने थापित सिंद्धांतों पर दृढ़ता से कायम रही थी।

मध्यकाल में सती होने की परंपरा राजस्थान में थी। हम उस परंपरा का समर्थन नहीं करते हैं, लेकिन हम उस परंपरा को बंगाल आदि प्रदेशों के परिपेक्ष्य में परिभाषित करने वालों की हां में हां भी नहीं मिला सकते। क्योंकि राजस्थान में जिस-जिस जाति अथवा समुदाय में सतियां हुई हैं, उनके प्रति लोगों की आज भी श्रद्धा है तथा वे लोकदेवियों के रूप में पूज्य हैं।

पातिव्रत्य का पूर्ण पालन करने वाली स्त्री सती, साध्वी कहलाती हैं। यानी जो सत्य का अनुसरण करती हो, सही मायने में वो ही सती हैं। इसके साथ ही अपने मृत पति के साथ अग्नि का वरण करने वाली भी सती व अपने मृत पुत्र के साथ अग्नि का वरण करने वाली स्त्री महासती कहलाती थी।

यहां की नारियां अपने पतियों के साथ सतियां हुई थी। उन्हें किसी ने जबरन आग के हवाला नहीं किया अपितु वे रागात्मक संबंधों के कारण अपने आपको रोक नहीं सकती थी-

फिर चंवरी फेराह, घर डेरा सोरा घणा।
लेवे कुण लेराह, सत फेरा थां ज्यूं सुगन।।

इसी कारण तो कवि जमाल ने लिखा है-

मा ऊभी महल़ी जल़ै,
कारण कौन जमाल?

इस संबंध में कवियों ने लिखा है कि आजकल की प्रीत को तो हम नर लोक में भी सही तरीके से नहीं निभा सकते, जबकि उन नारियों ने अपने प्रियतम का साथ सुरलोक तक निभाया-

नरपुर तक निभवै नहीं, आज काल की प्रीत।
सुरपुर तक पाल़ै सती, प्रेम तणी परतीत।।

चित्तौड़ में जो जौहर हुआ। उसकी पावन अग्नि का जो प्रकाश विस्तीर्ण हुआ उससे ही क्षात्रधर्म की जाज्वल्यमान ज्योति का आलोक प्रसारित हुआ है। उसकी आभा आज भी अखंडित है। कवियों ने लिखा हैं-

जौहर कर सतियां जल़ी, ऊगत सूर उजास।
चमकै अजै चित्तौड़ में, पदमण रो परकास।।

जौहर, जूंझना और उनकी प्रशस्ति में ग्रंथों का प्रणयन करना व करवाना इस मरणहार संसार में अपना सुयश पीछे छोड़ना का एक उपक्रम ही था। कविराजा बांकीदासजी लिखते हैं–

सती बल़ै जूझै सुभट, करै ग्रंथ कविराज।
दाता माया ऊधमे, नाम उबारण काज।।

यही बात रामस्नेही संत हरिरामदासजी अपने ग्रंथ अनुभववाणी में लिखते हैं-

सूर सती जब जाणिये, आपा ऊपर खेल।
हरिया सूरा लड़ मरै, सति आगि तन झेल।।

जौहर की घटनाएं कोई साधारण या अतिरिक्त उद्वेग में संपादित घटनाएं नहीं थी। जिन्होंने जौहर किया उन्होंने अत्यधिक धैर्य व संयम का परिचय दिया था। हजारों की संख्या में भारतीय संस्कारों के प्रतिमान स्थापित कर उन महान महिलाओं ने जौहर कर आने वाली पीढ़ियों का मनो-मष्तिष्क उन्नत रखा। चितौड़गढ़ में महारानी पद्मिनी के साथ हजारों की संख्या में महिलाओं ने जौहर की ज्वालाओं का आलिंगन किया था। उसमें कमोबेश सभी जातियों की महिलाएं थी। वे हमारी ही माताएं-बहिनें थी। उनके आत्म बलिदान को कमतर आंकना या किसी संकीर्ण दायरे में परिभाषित करना केवल हमारी कृतघ्नता को ही दर्शाता है।

आज भी इस बात की आवश्यकता है कि हमारे लिए किए गए त्याग व बलिदान के मूल्यांकन से हम हमारे भावी कर्णधारों को परिचित करवाएं ताकि अपने गौरव बिंदु व कीर्ति के प्रतिमान कायम रह सके। इसे किसी विचारधारा या दलगत राजनीति के दायरे में संकुचित कर इसकी महत्ता का हनन करने वालों की तरफ मौन रहना व उदासीनता दिखलाना न केवल हमारी हीन-भावनाओं को फलने-फूलने का मार्ग प्रशस्त करेगी अपितु जिन्होंने हमारी हजारों मातृशक्ति को आग के हवाले होने को विवश किया, उन्हें सही ठहराने की कुत्सित मानसिकता को भी बल मिलेगा।

अतः बिना किसी जातीय जाल व पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर जौहर को अनर्गल अर्थों में परिभाषित करने वालों लोगों का विरोध करना चाहिए।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़़ी”

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