स्वामी ब्रह्मानंद जी (लाडूदान जी आसिया)

सिरोही का राज दरबार खचाखच भरा हुआ था। महाराजा के कहने पर, युवा कवि लाडूदान आसिया ने अपनी स्वरचित कविताएं सुनाना शुरू कर दिया। बच्चे के शक्तिशाली और धाराप्रवाह काव्य वाचन ने दर्शकों को मन्त्र मुग्ध कर दिया, काव्यपठन समापन होते ही करतल ध्वनि और वाहवाही से पूरा राज दरबार गूँज उठा।

भीड़ अभी भी विस्मय से युवा कवि के बारे में चर्चा कर रही थी, सिरोही के महाराजा के मन में विचार आया “कितना अच्छा हो यदि हमारे राज्य के इस अमूल्य रत्न की प्रतिभा की महक हर जगह फैले। ” इस सदाशय से सिरोही के महाराजा ने भुज के “महाराव श्री लखपतजी ब्रजभासा काव्य पाठशाला” में युवाकवि को पढाने के लिए भेजने की बात कही।

कुछ समय पश्चात कवि के माता पिता लालुबा और शम्भुदान जी को भगवान ने स्वप्न में इसी उपरोक्त विचार को दर्शाया व प्रेरित किया। अतः महाराजा ने जैसे ही अपनी और से लाडूदानजी को आगे पढ़ाने का उनसे आग्रह किया तो वे आसानी से सहमत हो गए। इस प्रकार सभी का आशीर्वाद लेकर लाडूदानजी अपने एक साथी ब्राह्मण के साथ भुज में पिंगळ शास्त्र के ज्ञान के लिए निकल पड़े।

राजस्थान में जिला सिरोही के खाण गाँव में बसंत पंचमी वि.स. १८२८ (8 फ़रवरी 1772) को विलक्षण काव्य प्रतिभा के साथ जन्मे लाडूदानजी ने भुज में पाठशाला में रहकर बहुत तेजी से अपना विकास किया। यहाँ, उन्होंने कच्छ के राव राजा के मेहमान के रूप में रुक कर गुरू अभयदान जी के मार्गदर्शन में अध्ययन किया।  दस साल तक कठोर अध्ययन के उपरान्त लाडूदानजी पिंगळ और अन्य काव्य शास्त्रों में पारंगत हो गए, गुरु अभयदान जी उनकी प्रतिभा से अभिभूत थे।

हालांकि, रावराजा अभी भी लाडूदानजी के ज्ञान का परीक्षण करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने लाडूदानजी को राज दरबार में अपनी काव्य क्षमता प्रदर्शित करने को कहा। युवा कवि की प्रतिभा से राव राजा तथा उनके सभी दरबारी अत्यंत प्रसन्न हुए। राव राजा ने लाडूदानजी को अनेकों पुरस्कार दिए और उन्हें राजकविरत्न, पिंगळ-विद्याचार्य, महामहोपाध्याय, महाकविश्वर, शतवधनी आदि खिताबों से नवाजा। राजा ने अपने दरबार में उन्हें राजकवि के रूप में स्थायी रूप से रुकने के लिए अनुरोध किया। लाडूदानजी को अपने गृहनगर की अत्यंत याद सता रही थी अतः महाराज से उन्होंने वापसी का वादा करके महाराज के उपकार को एक कर्ज मानकर उनका धन्यवाद करके उनसे विदा मांगी।

अपने गाँव खाण वापस लौटने के रास्ते में, संस्कृत तथा संगीत की शिक्षा लेने के लिए लाडूदानजी कच्छ में धमडका गांव में प्रसिद्ध पंडित भट्टाचार्य के पास रुके। यहीं लाडूदानजी ने रामानंद स्वामी से मुलाकात की और पहली बार उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।

पंडित भट्टाचार्य के पास से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद लाडूदानजी जब निकले तो ध्रांगधरा, जामनगर, द्वारका और जूनागढ़ के राज्यों में उनका बेहद सम्मान के साथ स्वागत किया गया। सभी उनकी असाधारण प्रतिभा के कायल हो गए तथा सभी ने उनको बहुमूल्य उपहारों व खिताबों से नवाज़ा।

भावनगर के महाराज विजयसिंह तो अपने दरबार में उनके काव्य प्रदर्शन पर इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने शाही सुनार को बुलाकर उन्हें स्वर्ण आभूषणों से लाद दिया।

महाराज विजयसिंह ने उनको अपनी एक दुविधा का हल करने के लिए उपयुक्त पात्र मानकर कहा कि “मेरे राज्य में गढ़डा नामक एक गांव है। इस गाँव में स्वामीनारायण नाम से कोई व्यक्ति आया हुआ है। काठी बिरादरी के लोग उसे भगवान मानते हैं। मुझे लगता है कि यह धोखा है लेकिन में चाहता हूँ कि आप क्रपया वहां जाकर सच्चाई का पता लगायें। ”

युवा और अपने कौशल और प्रसिद्धि के गर्व से भरे लाडूदानजी, अपने मामा के साथ स्वामीनारायण को बेनकाब करने गढ़डा के लिए चल दिए। रास्ते में लाडूदानजी खुद पर शक करने लगे तथा सोचने लगे कि कहीं सच में स्वामीनारायण भगवान के ही रूप ही तो नहीं हैं। फिर उन्होंने विचार किया कि “यदि यह सत्य है तो उन्हें मेरी इच्छाओं को पूरा करना चाहिए” उन्होंने निम्नलिखित चार इच्छाओं के साथ स्वामीनारायण को परखने का निश्चय किया:

  1. “वो मुझे देखते ही मेरे नाम से मुझे पुकारेंगे और अपने गले से गुलाब की माला उतार कर मुझे पहनाएंगे। “
  2. “वो मुझे अपने पैरों पर सोलह दिव्य निशान दिखायेंगे। “
  3. “वे मेरा सम्पूर्ण जीवन परिचय बता देंगे। “
  4. “एक काले कपडे में लिपटी हुई भागवत को वे पढ़ लेंगे। “

brahmanandswamiइस तरह के विचारों को अपने मन में दृढ करके लाडूदानजी ने गढ़डा में प्रवेश किया। वहां पंहुचते ही उनको पूर्ण शांति का अनुभव हुआ। उस समय महाराज स्वामीनारायण, दादा खाचर के दरबार में नीम के पेड़ के नीचे साधुओं और श्रद्धालुओं की एक सभा में बैठे हुए थे। गुलाब के फूलों की माला उसकी गर्दन में सजी थी। उनके सामने एक काले कपड़े में लिपटी भागवत भी रखी थी।

लाडूदानजी ने दरबार में प्रवेश किया, महाराज स्वामीनारायण ने उनको उनके नाम से बुलाया और अपने गले से गुलाब की माला उतार कर उनको पहनाकर उनका स्वागत किया। इसके बाद उन्होंने कवि के जीवन की कहानी से उनका परिचय दिया और फिर अपने पैरों पर उन्हें सोलह दिव्य लक्षण दिखाए।

महाराज स्वामीनारायण ने लाडूदानजी की सारी इच्छाओं को पूरा किया था। कवि की खुशी की कोई सीमा नहीं रही, ख़ुशी से झूमते हुए उन्होंने वहीँ एक कीर्तन बनाया और गाने लगे:

“धन्य अाजनी घडी रे, धन्य आज नी घडी,
में निरख्या सहजानंद, धन्य अाजनी घडी,
धन्य …….
ज्ञानकूंची गुरु गमसे, गया ताळा उघड़ी,
लाडू सहजानंद निरखता मारी ठरी अंखाडी रे,
धन्य ……. [पूरे भजन के लिए क्लिक करें]
“धन्य है इस पल को जब मैंने सहजानंद को अनुभव किया, धन्य है इस पल को
ज्ञान की जो कुंजी मुझे गुरु ने दी उसने मुक्ति का द्वार खोल दिया और सहजानंद की अनुभूति से लाडू की आँखे ख़ुशी से भर उठी है। “

कवि के दिल के दरवाजे खुल गए थे, और जैसे ही उनकी आँखें महाराज जी से चार हुई लाडूदानजी समाधि में चले गए। अपने भांजे के शरीर को हलचल रहित देखकर उनके भयभीत मामा महाराज से कुछ कहते इससे पहले वो भी समाधि में चले गए उपस्थित भक्त जन यह घटना देखकर अचंभित रह गए।

एक ऐसा दिव्य प्रकाश चारों ओर फैला था जो कवि ने इससे पहले कभी नहीं देखा था और उसके केंद्र में थी महाराज स्वामीनारायण की दिव्य मूर्ति जिसके चारों ओर उनके पहले के सभी अवतार हाथ जोड़े स्तुति गा रहे थे। इस दिव्य दृष्टि को समागम करते हुए कवि की आँखों से खुशी के आँसू प्रवाहित होने लगते हैं और उनके दिल में भावनाओं का सागर उमड़ आया। समाधि से जागृति पर महाराज के चरणों में गिर कर उन्होंने भक्ति के साथ पूर्ण समर्पण किया।
साथ में उसी समय आप नें स्वामी नारायण की दशावतारमय वंदना रोमकंद छंद में स्वयं स्वामीनारायण भगवान को सुनाई।

“अति आनंद कंद मुनिंद अराधत सो सहजानंद रूप सही”

जैसे एक नमक की गुडिया समुद्र की गहराई नापने का उपक्रम करने पर स्वयं ही पिघल जाती है उसी प्रकार लाडूदानजी जो महाराज स्वामीनारायण को झूठा साबित करने के उद्देश्य से आये थे स्वयं अपने दिल में महाराज श्री की मूर्ति स्थापित कर बैठे। कवि लाडूदानजी जो एक राज कवि बनने चले थे अब वे महाराज जी के अनन्य भक्त व शिष्य बन चुके थे।

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कुछ दिनों के बाद, महाराज स्वामीनारायण ने लाडूदानजी से दादा खाचर की बहनों से बात करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि दादा की दोनों बहने, लाडूबा और जीवुबा की शादी हो रखी है, फिर भी वे साधु धर्म अपनाते हुए ब्रह्मचारी नियमों का पालन कर रही हैं जो ठीक नहीं है। उन्होंने लाडूदानजी को कहा कि वे जाकर उन बहनों को विवाहित गृहिणियों के रूप में रहने के लिए मनाएं।

लाडूबा और जीवुबा ने महाराज श्री के अलावा अन्य किसी पुरुष को नहीं देखने का व्रत ले रखा था, अतः लाडूदानजी उनसे मिलने के लिए गए तो उन्होंने अपने और उन बहनों के बीच में एक पर्दा रख कर उनसे बात की और उनको समझाने की कोशिश की कि एक सामाजिक महिला होने के नाते ये उनकी जिम्मेदारी है की वे विवाह को स्वीकार करें।

बहनों ने शांति से कवि की बात सुनी। उसे सुनने के बाद उन्होंने जवाब दिया, “शरीर का जो भी आकर्षण है वो उसके भीतर स्थित आत्मा से कारण ही होता है। यह आत्मा ही है जो इस शरीर को हिलाती, डुलाती और चलाती है। आत्मा के बिना शरीर का कोई मूल्य नहीं है। ” बहनों ने आगे कहा “आपने स्वयं को इतने सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों से सजा रखा है, यदि इन्हेंBrahmanand_Swami2 देखकर कोई आपकी और आकर्षित हो गया तो इस पाप के लिए जिम्मेदार भी आप ही होंगे। इसलिए अपनी चमक दमक वाली आकर्षण भरी जीवन शेली को छोड़कर एक धार्मिक और भक्ति भरा जीवन जीओ। ”
उन बहनों के दिव्य शब्दों का लाडूदानजी पर गहरा असर हुआ। वे तुरंत महाराज के पास गए और उन्होंने अपने अमीर कपड़े और गहने त्याग दिए। इसके बाद उन्होंने महाराज से उन्हें साधु बनाने के लिए आग्रह किया। इस पर महाराज स्वामीनारायण ने स्वयं ने उनको साधु धर्म में दीक्षित किया और उनका नाम श्री रंगदास रखा। बाद में इस नाम को बदल कर ब्रह्मानंद रखा गया जिसका अर्थ होता है दिव्य आनंद क्योंकि अपने हंसमुख स्वभाव और काव्य कौशल के कारण वे महाराज स्वामीनारायण के चेहरे पर एक मुस्कान लाने में कभी विफल नहीं होते थे।

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गढ़डा में लाडूदानजी को छोड़कर, कवि के मामा जल्द ही उनके गाँव खाण पहुंचे तथा जो भी घटित हुआ उसकी जानकारी पूरे परिवार व सम्बन्धियों को दी। लाडूदानजी ने जो किया उसे सुनने के बाद परिवार के सदस्यों ने उन्हें वापस लौटने को मनाने के लिए गढ़ाडा जाने का फैसला किया।

वे गढ़ाडा में पहुंचे तो ब्रह्मानंद स्वामी ने महाराज स्वामीनारायण की अद्वितीय महानता के बारे में उन्हें विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि उनका भगवान से मिलन हो गया है और इसलिए उन्होंने इस जीवन में अपने उद्देश्य को पूरा करने के क्रम में दुनिया त्याग करने का अंतिम निर्णय ले लिया है।  उनके माता पिता को समझाते हुए ब्रह्मानंद स्वामी ने किर्तन बनाकर सुनाया। कीर्तन के शब्द थे:

रे सगपना हरिवर नुं साचुं,
बीजु सर्व क्षणभंगुर काचु।
जिसका अर्थ है “सच्चा रिश्ता वही है जो सिर्फ भगवान के साथ है; बाकी सभी क्षणिक और नाजुक है। “
“मेरा संबंध भगवान् के साथ हो गया जो अनन्त और वास्तविक है और दुसरे सारे रिश्ते झुठे और अस्थायी है। “

ब्रह्मानंद स्वामी के परिवार के सदस्यों ने उनके मन को बदलने के लिए अत्यंत प्रयास किये किन्तु वे नहीं माने। उनका निर्णय अटल था।

इस सबके बावजूद ब्रह्मानंद स्वामी के संकल्प का परीक्षण करने के लिए महाराज स्वामीनारायण ने उनको घर वापस जाने के लिए निर्देश दिया। ब्रह्मानंद स्वामी ने यह आश्चर्यजनक निर्देश सुना तो जैसे उन पर वज्रपात हो गया, वे वहीँ बेहोश हो गए।

ब्रह्मानंद स्वामी की यह दशा देखकर और महाराज के प्रति उनकी निष्ठा व समर्पण देखकर सबके दिल पिघल गए। लेकिन, उनकी मां को अभी भी एक चिंता थी: कौन अब लाडूदानजी को वो प्यार देगा जो एक केवल एक माँ अपने पुत्र को दे सकती है? उसके विचारों को पढ़, स्वयं स्वामीनारायण ने उनसे वादा किया कि वे खुद ब्रह्मानंद स्वामी को एक माँ के रूप में प्यार और स्नेह देंगे। इसके बाद उन्होंने लाडूदानजी की माँ को एक पवित्र पोशाक देकर और पूरे परिवार को आशीर्वाद देकर आश्वस्त किया।

अंततः ब्रह्मानंद स्वामी के फैसले को मान कर और महाराज के प्रति उनके समर्पण एवं दृढ़ विश्वास की प्रशंसा कर परिवारगण वापस राजस्थान के लिए यात्रा की तैयारी करने लगे।

लाडुदान जी की सगाई जिनसे पेशुआ ग्राम मैं हुई थी उनको जब लाडुदानजी के साधु बनने का समाचार मिला तो उन्होने भी आजीवन शादी न करने का निर्णय लिया। और वह जीवन भर अविवाहित रही और भक्तिमय जीवन व्यतीत किया। साथ ही लाडुदान जी की सगाई जिन के साथ हुई थी उनकी छोटी बहन भी आजीवन अविवाहित रही। क्योंकि वे दोनों बहनें मन से ही उनका वरण कर चुकी थी।

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अपने समय के बड़े बड़े विद्वान ब्रह्मानंद स्वामी के व्यक्तित्व, ज्ञान भंडार और प्रभावपूर्ण वाकचातुर्य कौशल से प्रभावित थे। कई विद्वानों ने उनके प्रभाव के कारण महाराज स्वामीनारायण (महाराज श्री) की शरणागति स्वीकारी थी।

ब्रह्मानंद स्वामी अक्सर गांव-दर-गांव की यात्राओं में महाराज श्री के साथ रहते थे। महाराज श्री के अनुरोध पर आगे की पढ़ाई करने के लिए वे सूरत गए जहां उन्होंने संस्कृत तथा वेदांत दर्शन के प्रकांड विद्वान् मुनिबावा से शिक्षा ग्रहण की।
अपनी विद्वता के कारण मुनिबावा पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। उनका सहज स्वभाव बड़ा अक्खड़ था फिर भी ब्रह्मानंद स्वामी ने सरस विनम्रता और प्रतिभाशाली बुद्धि से उनका दिल जीत लिया। मुनिबावा के साथ रहकर ब्रह्मानंद स्वामी न केवल स्वयं संस्कृत में एक विशेषज्ञ बन गए अपितु उन्होंने मुनिबावा को भी आत्मा और परमात्मा और महाराज श्री की महानता का महत्व समझाया।

ब्रह्मानंद स्वामी की बातों ने मुनिबावा को भी बदल दिया, उनके कहे शब्दों में मुनिबावा को परमेश्वर का प्रकाश दिखाई दिया। ब्रह्मानंद स्वामी के साथ अपने अनुभव के बाद, मुनिबावा ने भी महाराजश्री के दर्शनो की इच्छा जाहिर की। कालांतर में उन्होंने भी महाराज श्री से दीक्षा प्राप्त की।

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श्रीजी महाराज एक बार अपने साधुओं और श्रद्धालुओं के साथ-साथ कच्छ गए। वहाँ मांडवी शहर में उन्होंने ब्रह्मानंद स्वामी को एक घोड़े पर बैठा कर उनके लिए एक भव्य जुलूस की व्यवस्था की।  मांडवी में खइयो खत्री के नाम से वेदांत के एक महान विद्वान रहते थे। खइयो को जब शहर में महाराज के आगमन का पता चला तो उन्होंने महाराज श्री को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी।  खइयो खत्री के इरादों को भांप कर, महाराज श्री ने एक योजना तैयार की।

उन्होंने ब्रह्मानंद स्वामी को कहा की जब खइयो खत्री शास्त्रार्थ के लिए आए तब आप मेरे आसन पर बैठ जायें और में आपके पास जमीन पर नीचे बैठूंगा। वो जब आपसे सवाल पूछे तो आप कहना कि इसका उत्तर तो मेरा यह शिष्य ही दे देगा।
ब्रह्मानंद स्वामी ऐसा करने से थोड़ा झिझके क्योंकि महाराज श्री ने उनको स्वयं भगवान की भूमिका निभाने का निर्देश दिया था। परन्तु वे महाराज के आदेश का पालन करने के लिए बाध्य थे।

खइयो खत्री और उसके चेले जल्द ही सभा में पहुंचे। खइयो ने महाराज श्री के आसन पर बैठे ब्रह्मानंद स्वामी को देखा। स्वामी जी का उन्नत ललाट तथा शारीरिक आभा बहुत ही प्रभावपूर्ण थी। उनको भगवान स्वामीनारायण मानकर खइयो उनसे सवाल पूछने लगे।

“मेरा यह शिष्य जवाब देगा,” ब्रह्मानंद स्वामी ने महाराज श्री की ओर इशारा करते हुए कहा।

महाराज श्री ने खइयो के सवालों में से प्रत्येक का स्पष्ट और तार्किक जवाब दे दिया। उनके अकाट्य जवाब को सुनकर खइयो अवाक रह गया तथा सोच में पड़ गया कि इनमे से वास्तविक स्वामीनारायण कौन है।

खइयो को भ्रम की स्थिति में देखकर महाराज श्री की हँसी फूट पड़ी। ब्रह्मानंद स्वामी ने उसी समय उठ कर महाराज श्री को अपना आसन दिया तथा स्वयं जमीन पर बैठ गए।  महाराज के बारे में खइयो की गलतफहमी अब दूर हो गयी। एक प्रखर आलोचक खइयो खत्री स्वयं अब एक भक्त बन गए थे।

❀❀❀SwaminarayanTemple_1866

महाराज श्री ने अब एक भव्य मंदिर का निर्माण शुरू कर दिया था। अहमदाबाद में पहले मंदिर के निर्माण की निगरानी करने के लिए महाराज ने ब्रह्मानंद स्वामी को इस कार्य के लिए दक्ष तथा उपयुक्त पात्र मानकर भेज दिया। अहमदाबाद में ब्रह्मानंद स्वामी ने ब्रिटिश सरकार के एक अधिकारी “जनरल गॉर्डन” से मुलाकात की और उसके पास से मंदिर निर्माण के लिए असीमित पट्टा प्राप्त कर लिया।

SwaminarayanAhmedabadमंदिर निर्माण जल्द ही शुरू कर दिया गया। ब्रह्मानंद स्वामी पूरी परियोजना के इंचार्ज थे फिर भी उन्होंने श्रमिकों के साथ मिल कर कार्य किया। उन्होंने पत्थर काटने, चूना मोर्टार तैयार करने और नींव गड्ढों की खुदाई करने तक के कार्य अपने हाथों से किये। इस तरह के कठोर काम के बीच भी उन्होंने कविताओं की रचना करने का काम जारी रखा। उनको जब भी समय मिलता वे कविता की कुछ लाइनें लिखने बैठ जाते थे।  मंदिर जल्द ही पूरा हो गया था। एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया और नर-नारायण देव की मूर्तियां नए मंदिर में स्थापित की गयी।

अहमदाबाद मंदिर बनने के कुछ ही समय पश्चात महाराज श्री ने वडताल में एक मंदिर का निर्माण करने के लिए ब्रह्मानंद स्वामी को निर्देश दिए। महाराज ने वडताल में एक गुम्बद वाले मंदिर के निर्माण का प्रस्ताव किया था। परन्तु ब्रह्मानंद स्वामी ने तीन गुम्बदों वाले मंदिर का निर्माण शुरू किया।

vadtaldham-1गुजरात की मिट्टी नरम थी अतः गहरी नींव की खुदाई करना जरूरी था। संसाधनों की एक बड़ी राशि इस प्रकार मंदिर की नींव में चली गयी। तब महाराज श्री ने उनको उपलब्ध संसाधनों के भीतर ही रहने की सलाह देते हुए एक पत्र लिखा। जिसमें स्वामीनारायण भगवान नें एक दोहा लिखकर छोटा मंदिर बनाने का परामर्श दिया। दोहा कुछ यूं था।

अपनी पहुच बिचारि कै, करिए हरदम दौड।
एते पाँव पसारिए, जेती लंबी सोड।।
ब्रह्मानंद स्वामी ने एक दोहे के साथ महाराज श्री के लिखे पत्र का निम्न उत्तर दिया:
साहिब सरिखा शेठिया, बसे नगर के माहि।
ताके धन की का कमी जाकि हुंडी (चले) नवखंड माहि।।

ब्रह्मानंद स्वामी के जवाब से प्रसन्न तथा संतुष्ट होकर महाराज श्री ने उनको अपनी योजना अनुसार कार्य जारी रखने की अनुमति दे दी।

महाराज अक्सर मंदिर निर्माण देखने वडताल आते रहते थे। उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से मंदिर जल्द ही पूरा हो गया। पूर्ण उत्सव के साथ, महाराज श्री ने मुख्य मंदिर में लक्ष्मी-नारायण देव की मूर्तियां स्थापित की तथा एक अन्य मंदिर में, ‘हरिकृष्ण’ नाम से स्वयं की मूर्ति स्थापित की।

महाराज श्री ने अगले ही दिन ब्रह्मानंद स्वामी तथा गुणातीतानन्द स्वामी को अगले मंदिर के निर्माण के लिए जूनागढ़ भेज दिया। शहर के नगर ब्राह्मणों ने इसका काफी विरोध किया। ब्रह्मानंद स्वामी ने इस विरोध को देखकर महाराज श्री की महानता के बारे में शहर के नवाब तथा मुख्य प्रशासक को समझाकर मना लिया। ब्रह्मानंद स्वामी ने इस प्रकार मंदिर के निर्माण का काम सहजता तथा सरकारी समर्थन के साथ प्रारंभ किया। नगर का विरोध भी यह देख कर कम हो गया।

कुछ ही समय के भीतर मंदिर पूरा हो गया और महाराज श्री इसके उद्घाटन के लिए पहुंचे। महाराज श्री को जूनागढ़ के रास्तों Junagadh Swaminarayan Mandir 1से एक भव्य जुलूस के रूप में स्वागत करने की व्यवस्था की गई थी। नगरवासी अभी भी पूर्णतया संतुष्ट नहीं थे। बदला लेने की नियत से उन्होंने ब्रह्मानंद स्वामी को बैठने के लिए एक जंगली घोड़ा(कामी) भेज दिया। स्वामी जी के स्पर्श मात्र से घोड़ा तुरंत शांत (निष्कामी) हो गया। महाराज श्री ने यह देख कर कहा कि स्वामी ब्रह्मानंद एक सच्चे यति हैं।

नए मंदिर में राधा-रमन देव की मूर्तियां स्थापित की गयी। महाराज श्री की उपस्थिति से खुश नवाब ने समारोह पूर्वक उनको साधुओं सहित अपने महल में आमंत्रित किया तथा उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। नवाब के अनुरोध पर, नए मंदिर के महंत के रूप में गुणातीतानन्द स्वामी को नियुक्त किया।

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महाराज श्री कई अलग अलग तरीकों से अपने साधुओं की परीक्षा लिया करते थे। इसी तहत उन्होंने एक नियम बनाया कि प्रत्येक साधु जूट का कंतान (जिससे बोरा बनता है) से बना हुआ साढ़े चार फीट का कपडा इस्तेमाल करेंगे।

एक के बाद एक सभी साधु जूट के अपने टुकड़े को लेने के लिए आये। ब्रह्मानंद स्वामी भी वहाँ पहुंचे। उनके बड़े आकार के बावजूद महाराज श्री ने उनको वही साढ़े चार फीट का जूट का टुकडा दे दिया।

“महाराज,” ब्रह्मानंद स्वामी ने कहा। “मेरा शरीर आकार में थोडा बड़ा है। इतना सा जूट मेरे लिए पर्याप्त नहीं होगा। मुझे थोड़ा और दे दीजिए। ”

“नियम तो नियम हैं,” महाराज ने उत्तर दिया। “कुछ वजन कम कर लीजिये। ”

“लेकिन मैं अचानक एक ही दिन में अपना वजन कैसे कम कर सकता हूँ?” ब्रह्मानंद स्वामी चिंता के साथ पूछा।
अचानक एक विचार उनके मस्तिष्क में कोंधा। वे अचानक से ऊपर, नीचे, दायें, बाएँ कुछ ढूंढते हुए देखने लगे।

“आप क्या देख रहे हैं?” महाराज श्री ने पूछा।

ब्रह्मानंद स्वामी ने उत्तर दिया, “इस दुनिया में चारों ओर एक इंच भूमि भी नहीं है जहां आपके अतिरिक्त अन्य कोई भगवान उपस्थित है इसलिए मेरे पास आपके साथ यहीं पर रहने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं है। ”

ब्रह्मानंद स्वामी का दृढ़ विश्वास देखकर, महाराज श्री अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उनको तत्काल ही जूट का एक बड़ा टुकड़ा दे दिया।

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महाराज ने अपने साधुओं के लिए एक और नियम बनाया था – कोई भी सत्संग के समय नींद की झपकी नहीं लेगा। महाराज श्री सत्संग के दौरान यदि किसी को ऊंघते हुए देख लेते तो उस पर अपने बेर्खो (सुपारीओं का समुह) से फ़ेंक कर मारते थे।

एक बार एक रात्री सत्संग में, महाराज श्री ने ब्रह्मानंद स्वामी को उंघते हुए देखा। उन्होंने अपना बेर्खो उनकी तरफ फेंका तो ब्रह्मानंद स्वामी चोंक कर जागे। इसके बाद उन्होंने उठकर महाराज श्री को बेर्खो लौटाते हुए पूछा “महाराज, आपने मेरे ऊपर बेर्खो क्यों फेंका?”

“आप ऊँघ रहे थे”, महाराज ने उत्तर दिया।

“महाराज मैं ऊँघ नहीं रहा था बल्कि एक कीर्तन की रचना कर रहा था। “Brahmanand

ब्रह्मानंद स्वामी के तर्कशील जवाब को सुनकर महाराज ने मुस्कराते हुए उनसे कीर्तन सुनाने को कहा।

ब्रह्मानंद स्वामी ने इस प्रकार गाना शुरू किया:
तारो चटक रंगीलो छेड़लो, अलबेला रे,
कांई नवल कसुम्बी पाघ,
रंगना रेला रे….

ब्रह्मानंद स्वामी एक लाइन गाते और जब स्रोता कोरस में उसे दोहराते तब तक वे अगली लाइन की रचना कर लेते। इस तरीके से उन्होंने वहीँ आठ गरबी की रचना गाते हुए ही कर डाली। महाराज श्री और समस्त साधू ब्रह्मानंद स्वामी के असाधारण काव्य कौशल पर मुग्ध हो उठे यह जानते हुए कि वे वाकई में ऊंघ रहे थे।

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एक बार, महाराज श्री गढ़ाडा प्रवास के दौरान बीमार हो गए। बीमारी के दौरान वो हर दिन ब्रह्मानंद स्वामी को अपने पास बुलाते, उनकी प्रशंसा करते तथा अपनी थाली से प्रसाद उनको देते।  ब्रह्मानंद स्वामी को थोडा संदेह हुआ कि महाराज श्री उनपर अचानक इतने अधिक कृपालु क्यों हो गए। जरूर इसके पीछे कोई कारण है।

महाराज श्री की हालत धीरे-धीरे अधिक खराब होती चली गयी। ब्रह्मानंद स्वामी ने संजीवनी दवा बनायीं किन्तु महाराज श्री ने उसे लेने से इनकार कर दिया। अन्य साधुओं ने भी दवा लेने के लिए महाराज श्री से अनुरोध किया, लेकिन वे नहीं माने।

ब्रह्मानंद स्वामी समझ गए कि महाराज अब अधिक समय पृथ्वी पर नहीं रहेंगे।

इसी दौरान महाराज श्री ने ब्रह्मानंद स्वामी को जूनागढ़ जाने का निर्देश दिया। ऐसे समय में महाराज श्री को अकेला छोड़ना उन्हें प्रीतिकर नहीं लगा।  ब्रह्मानंद स्वामी की दुविधा देखकर महाराज श्री ने उनको सांत्वना दी और कहा, “जाओ, और जैसे ही तुम वहाँ पहुँचो, गुणातीतानन्द स्वामी को यहाँ भेज देना”।

भारी मन के साथ, ब्रह्मानंद स्वामी ने जूनागढ़ के लिए प्रस्थान किया। पहुँच कर उन्होंने गुणातीतानन्द स्वामी को महाराज श्री का आदेश सुनाया।  गुणातीतानन्द स्वामी ने ब्रह्मानंद स्वामी से सन्देश पाते ही गढ़ाडा के लिए प्रस्थान किया। वहां पहुँच कर उन्होंने महाराज श्री से मुलाकात की। इसके तुरंत बाद महाराज श्री ने अपने भौतिक शरीर को छोड़ दिया और अपने दिव्य धाम अक्षरधाम में लौट आए।

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SwaminarayanMuliमहाराज श्री के अक्षरधाम महाप्रयाण के बाद ब्रह्मानंद स्वामी बहुत उदास हो गए उनका अब किसी कार्य में मन नहीं लगता था। लेकिन महाराज श्री ने मुली में एक मंदिर का निर्माण करने का उनको निर्देश दिया था इसलिए वे तुरंत ही मंदिर पर काम शुरू करने के लिए चले आये।

वहां पानी की कमी थी तथा मंदिर के निर्माण के लिए पत्थर भी नहीं था। लेकिन महाराज श्री ने ब्रह्मानंद स्वामी को दर्शन दिए और उन्हें एक पत्थर की खदान का पता बताया। मुली मंदिर ब्रह्मानंद स्वामी का अंतिम निर्माण कार्य था Painting done by a painter when swamiji was alive and Mahant at Muli Mandirइसलिए इसमें पारंपरिक डिजाइनों से भरा कला का एक अद्भुत काम किया गया है। मंदिर समय से पूर्व पूरा किया गया और अहमदाबाद के आचार्य द्वारा उत्सव के बीच मूर्ति-प्रतिष्ठा की गयी।

इसके बाद, ब्रह्मानंद स्वामी मुली में रहने लगे। वह अक्सर मंदिर में बैठते और मूर्ति के सामने सुंदर कीर्तन गाते थे। उन्होंने महाराज श्री की समस्त इच्छाओं का पालन किया था तथा अब वे महाराज श्री के साथ एकाकार होने के बारे में ही अपना ध्यान केंद्रित करने लगे।

जल्द ही, ब्रह्मानंद स्वामी बीमार पड़ गए। देवानंद स्वामी जो स्वयं भी एक चारण गोत्र में उत्पन्न स्वामीनारायण संप्रदाय के साधु थे और अन्य साधु उनकी सेवा में लगातार थे। ब्रह्मानंद स्वामी ने आखिरी दर्शन देने के लिए निश्कुलानंद स्वामी, गुणातितानंद स्वामी, आचार्य महाराज और अन्य लोगों को बुलाया। उनके पहुचने पर ब्रह्मानंद स्वामी ने सब से कहा, “मेरा तो अब अंतिम समय आ गया परन्तु आप सब सतसंग का प्रचार प्रसार करना तथा महाराज श्री के सच की महिमा का प्रसार तब तक करते रहना जब तक कि उनकी महानता हर जगह ना फेल जाये”

इसके तुरंत बाद ब्रह्मानंद स्वामी ने हमेशा के लिए श्रीजी महाराज की सेवा में बने रहने के लिए जेठ सूद दशमी, संवत् 1888 (8 जून 1832 सीई) पर अक्षरधाम को महा प्रयाण किया।

महाराज स्वामीनारायण के अनन्य भक्तों के मध्य एक दैदीप्यवान नक्षत्र ब्रह्मानंद स्वामी ने इस सम्प्रदाय की कई मायनों में अत्यधिक सेवा की। उनके योगदान में अहमदाबाद, वडताल, जूनागढ़ और मूली में भव्य मंदिर निर्माण शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने अपने असाधारण काव्य कौशल से संप्रदाय के साहित्य के साथ ही साथ गुजराती साहित्य को भी अत्यधिक समृद्ध किया। उन्होंने गुजराती और अन्य भाषाओं में 8,000 से अधिक कीर्तनो की रचना की। छंद एवं चौपाई रचना उनकी विशिष्टता थी। अपने भजनों के माध्यम से उन्होंने अध्यात्म संबंधित, आत्मा और परमात्मा की महानता, भक्ति का मार्ग, महाराज श्री की मूर्ति महिमा और कई अन्य विषयों पर अपनी विद्वता की छाप छोड़ी।

🌹श्री ब्रह्मानंद स्वामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व-लेखक डो भूपतिराय बदरीप्रसादोत साकरिया वल्लभ विधानगर गुजरात🌹
🌸व्यक्तित्व 🌸
गुजरात व राजस्थान में भाषा साहित्य एवं संस्कृति की जो अद्भुत अभेदता है, वैसी देश के किन्ही दो प्रदेशों के बीच द्रष्टिगोचर नहीं होती। दोनों का प्रारंभिक साहित्य एक दूसरे की सम्मिलित धरोहर है। मध्य काल की भी लगभग यही स्थिति है। कान्हड दे प्रबंध, ढोला मारू रा दूहा, मीरा के पद, इसरदास कृत हरिरस आदि इसके ज्वलंत उदाहरण है। विदेशी आक्रमणों, भौगोलिक कठिनाईयों, जीजीविषा और जीविकोपार्जन जैसी अनेक बातों को लेकर राजस्थान से गुजरात में जातियों का प्रवाह निरंतर प्रवाहमान रहा है।

🌸परिमात🌸
राजस्थान और गुजरात की लगभग सभी जातियाँ एक अभेद की स्थिति ली हुई है। क्षत्रियों में डाभी, गोहिल, राठौड और चौहान, ब्राह्मणों में श्रीमाली, गौड, गुर्जर गौड, पुष्करणा और तपोनिष्ठ तथा वैश्यों में ओसवाल जैन, ओसवाल वैष्णव, माहेश्वरी, आदि सभी स्थाई रूप से सदियों से बसे हुए है। राज्याश्रित होनें के कारण मारू चारणों का प्रवाह तुलना में अधिक रहा। प्रख्यात चारणों में भक्त प्रवर ईसरदास, राष्ट्र कवि दुरसा आढा तथा कच्छ की ब्रज भाषा पाठशाला के प्रथम प्राचार्य राजस्थान के जैन मुनि कनक कुशलजी और उनके चयनकर्ता श्री हमीरदान रतनू जैसे महापंडित सभी की जन्म भूमि राजस्थान थी और सभी नें कई दसकों तक इसे अपनी कर्मभूमि बनाया। ओर तो और सात पीढियों से जो अहमदाबाद के नगरशेठ बनने का अपूर्व गौरव प्राप्त किये हुए है, ऐसे श्रेणिकभाई व कस्तुरभाई लालभाई के पूर्वज भी राजस्थान के सिसोदिया राजपूत थे। आधुनिक काल में भी यह प्रवाह अवरूध्ध नहीं हुआ है। मूर्धन्य लेखक स्व श्री पन्नालाल पटेल तथा प्रखर हिंदी प्रचारक स्व जेठालाल जोशी और अनेकों उधोगपति इसी शृंखला की अजोड कडियां है। इस विशाल आदान प्रदान के क्रम में श्री लाडुदानजी उर्फ ब्रह्मानंदजी भी है, जो राजस्थान के सिरोही जिले के खांण गाँव के थे।

खांण गाँव वास्तव में उत्तम खान है, जिसने भक्ति साहित्य के क्षेत्र में नर-पुंगव ब्रह्मानंद जैसी कौस्तुभ -मणि उत्पन्न कर अपनी कोंख को उज्जवल किया था। कौस्तुभ को भगवान विष्णु अपने वक्ष स्थल पर सदैव धारण किये रहते है, ठीक इसी भाँति ब्रह्मानंद स्वामी, भगवान विष्णु के अवतार स्वरूप प स्वामी सहजानंद महाराज के गले का हार थे। महाराज तो उन्है हर प्रवास में अपने साथ ही रखा करते थे।

ब्रह्मानंदजी नें अपने जन्म से राजस्थानी धरा को तो गौरवान्वित किया ही है, परंतु अपने कार्यक्षेत्र गुर्जर धरा को उससे भी अधिक महिमामय बना दिया है। सत्य ही है कि महापुरूष जहाँ भी विचरण करते है, अपनी सुवास प्रसारित करते रहते है। और वैसे भी साधुओं का कोई प्रदेश भी तो नहीं होता, वे तो रमते राम होते है।

एक अति साधारण घर में जन्म लेकर, अपनी प्रतिभा के बल पर अपने अध्ययन, स्वाध्याय, और प्रचुर भक्ति साहित्य के निर्माण रूपी संबल से संप्रदाय में गौरवशाली पद प्राप्त कर ईस भव और पर भव दोनों में अपने को अमिट कर दिया।

ब्रह्म अर्थात वह सर्वोच्च नित्य चेतन सत्ता, जो जगत का मूल कारण है। इसे ही सच्चिदानंद स्वरूप माना गया है। यथार्थ का ज्ञान या पारिभाषिक सत्ता का ज्ञान होना ही ब्रह्म ज्ञान अथवा ब्रह्मतत्व है। इसी ब्रह्म तत्व से जो आनंद प्राप्त होता है वही ब्रह्मानंद है, जिसे हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों ने जीवन का चरम लक्ष्य माना है। इस के अतिरिक्त हमारे उध्धव मुखी चिंतकों नें साहित्य को भी “ब्रह्मानंद सहोदर” की संज्ञा दी है।

अपनें भजनों और अन्य भक्ति सभर काव्यों से ब्रह्मानंद की प्राप्ति करने वाले स्वामी ब्रह्मानंद नें संवत १८२८ वसंत पंचमी के शुभ दिन श्री शंभुदान आसिया के घर श्रीमती लालुदेवी की कोख से अक्षरधाम के इस महामुक्त नें नर देह धारण की थी। स्वयं ब्रह्मानंद नें अपनी कृति “ब्रह्मविलास” में इस अवतरण का उल्लेख किया है।

“ज्ञाति चारण ओडक आशियुं की आबू छांय भयो खाण गाम में जी।
ताके नाम शंभुदान तातहु को, मात लालुबाई धर्यो ठाम में जी। “

“होनहार बिरवान के होते चिकने पात”-गौर वर्ण बालक लाडूदान रूपमय होने के साथ साथ धीर गंभीर प्रकृति के थे। जब अन्य बालक खिलौनों के साथ खेलते थे तब बालक लाडू बैठे हुए कुछ विचार करते हुए पाये जाते थे। साथ साथ ही वे हाजिर जवाबी और हँसमुख भी थे। ऐसे विरोधी गुण बहुत ही स्वल्प व्यक्तियों में देखने को मिलते है।

सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की यह सृष्टि ऐसे नव नव आश्चर्यों से भरी पडी है, जिन्है देखकर हम मात्र दांतों तले अंगुली दबाकर रह जाते है। ये आश्चर्य किसी एक स्थल पर तथा किसी एक रूप न होकर शताधिक रूपों में प्रगट होते है। तथा मनुष्य को विस्मित करते रहते है। लाडू (लड्डू) जैसे स्वभाव के मीठे और तन से गोलमटोल ये लाडू भी विधाता की ऐसी ही रचना थे। आठ दस वर्ष की अवस्था में तुकबंधी करने लगे और बारह चौदह वर्ष की आयु में तो दोहों और साखियों की रचना करने लगे। धरती में जैसे बीज वपन के पूर्व उसका संस्कार किया जाता है ठीक उसी प्रकार लाडू का भी अध्ययन द्वारा संस्कार आवश्यक था। योग एसा बैठा कि एकबार किसी कार्यवश वे (पिता- पुत्र) उदयपुर गये हुए थे। उदयपुर के महाराजा बालक की काव्यप्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्हौनें अपने खर्चे से कच्छ की ब्रजभाषा काव्य पाठशाला में भेजने का आदेश दिया, लेकिन वे गए थे सिरोही राज्य के खरचे से ही।

मेधावी बालक नें राजकवि तथा पाठशाला के अध्यापक कविवर अभयदानजी के दिशा निर्देश में डिंगल और पिंगल के अनेक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। अष्टावधानी से सहस्त्रावधानी तक पहूँचे। विधाभ्यास के पश्चात भुज के महाराज नें उनको अनेक उपाधियों से मंडित किया। महाराज नें उन्है रत्नमंडित तलवार और आभुषण प्रदान कर विद्वता के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया।

शिक्षा की समाप्ति पर जब गाँव लौट रहे थे तो धमडका ठाकुर के वहाँ विजयकुशल जी जैसे महिमामंडित विद्वान और संगीताचार्य से भेट हुई जिनसे लाडूदानजी ने संस्कृत के अभ्यास के पश्चात सामुद्रिकशाश्त्र अश्वविध्या, गजविध्या और वाध्ययंत्रों को बजाने मैं निपुणता प्राप्त की। भविष्य में लाडूदानजी ब्रह्मानंद बने तो यह संगीत विध्या उनके लिए अत्यंत उपयोगी सिध्ध हुई। धमडका से स्वदेश लौटते समय धांगध्रा और भावनगर के राजा तथा जूनागढ के नवाब को भी प्रभावित करते और पुरस्कार प्राप्त करते हुए घर आए। परंतु घर उनकी काया और मन को बांध न सका।

संवत १८६० में वे पुन: भुज आए, जहां उन्हौंने सुना कि समीप के गाँव में स्वामी सहजानंद बिराज रहे है। कुछ भेंट लेकर वे दर्शनार्थ जा पहूँचे। साष्टांग दंडवत कर दर्शनों से धन्य हुये और निम्न उद्गार ह्रदय से निकल पडे।

“आज नी घडी रे धन्य आज नी घडी।
मैं निरख्या सहजानंद धन्य आजनी घडी। “

प्रेमरस में तन्मय अश्रुपूुरित द्रग देखकर सहजानंद उठे और अपने भक्त को गले लगा लिया। गढडा सौराष्ट्र में पुन: दर्शन किये। अंतर्यामी स्वामी ने समझ लिया कि भक्त के मन में अभी भी ममत्व है। उसका तिरोधान आवश्यक है। जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने उध्धव जी का ज्ञान-घमंड गोपियों द्वारा विगलित करवाया था, श्री सहजानंदजी ने भी लाडूदान की सांसारिक ममता दो राजकुमारी बहिनों द्वारा तिलांजलि दिलवाई। अंत में गेरिता गाँव में स १८६१ में सहजानंद स्वामी ने उन्है भागवती दिक्षा दी और श्रीरंगदास नाम से अभिहित किया। उसके पश्चात श्रीरंगदास के स्थान पर ब्रह्मानंद नाम देकर लाडूदान को सदैव के लिए ब्रह्मानंदमय बना दिया। इसका वर्णन स्वयं कवि नें इस भांति किया है।

“लाडु मेट के श्रीरंग नाम धर्यो दोउ लीन ब्रह्मानंद नाम में जी”

वैराग्य लेने से माता पिता तथा अन्य परिजन आकुल व्याकुल हो गये। उनका प्रलाप और समझाना बुझाना व्यर्थ रहा। वे लाडु को संसार में पुन: ला न सके। उनका सच्चा संबंध तो श्रीहरि के साथ हो गया था। अब लोकलाज का भय कैसा?

“रे सगपण हरिवर नुं साचुं,
बीजुं सरवे क्षणभंगुर काचुं
रे डरूं न हूं लोक तणी लाजे”

भक्तिमती मीरा ने भी भाव विह्वल होकर गाया है।

“उण बिन सब जग खारो लागत और बात सब कांची।
संतन ढिग बैठ बैठ लोक लाज खोई”

ब्रह्मानंद स्वामीने अपनी वास्तु और शिल्प कला के ज्ञान का सम्यक उपयोग सौराष्ट्र में मूली, जूनागढ, और गुजरात के चरोतर प्रदेश के वडताल गाँव मे किया। जब मंद मंद पवन इनके कलामय स्तंभों, गवाक्षों और गर्भगृहों से प्रसरित होता है तब मर्मर घ्वनि करती संगीत की लहरें उत्पन्न होती है। मानों वे अपने निर्माण कर्ता के साफल्य का यशोगान करती हो।

कहा जाता है कि जूनागढ के मंदिर के निर्माण के समय तत्कालीन नवाबने ब्रह्मानंद स्वामी उर्फ ब्रह्ममुनि को यह कहकर ललचाया कि यदी स्वामी उनकी प्रशंसा में एक छंद कह दें तो मंदिर निर्माण का सारा खर्च राज्य से दिया जाएगा। ब्रह्ममुनि ने इन पंक्तियों से स्पष्ट मना कर दिया।

“शाह भयो कहा बात बडी पतशाह बढ्यो कहां आन फिराई।
देव भयो तो कहा भयो अहमेव बढ्यो तृष्णा अधिकाई। “

उन्होनें स्पष्ट कहा “यह जीभ इश्वर गुणगान के लिए है, राजा महाराजाओं की स्तुति के लिए नहीं है। संत तुलसीदास जी की रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ इस संबंध में कितनी सटीक है।
“कीन्है प्राकृत जन गुन गाना,
सिर धुनि गिरा लगत पछिताना”

वास्तव में स्वामी की कवित्व शक्ति गजब की और भक्तिरस से भरपूर थी। उनकी कवित्वशक्ति लोगों के प्रसन्नार्थ नहीं थी, परंतु श्रीहरि को प्रसन्न करने के लिए थी।

अनेक परचे सारे गुजरात में बहु चर्चित थे। श्रीहरि से प्रार्थना कर उन्होंने संतो को कंतान पहिनने की आज्ञा से मुक्त कराया, पत्थर को फूल जैसा बनाया, मल्हार राग गाकर वर्षा करवाई, समूचे वढवाण गाँव को कोलेरा रोग से मुक्त करवाया और प्रभुजी महेता के समस्त कुल को मोक्ष दिलवाना आदि अनेक करिश्मे कर प्रजाजनों को आश्चर्य चकित कर दिया।

🌸मोक्षधाम🌸
सौराष्ट्र के मूली नगर के हरिमंदिर में सरोद पर किर्तन कर, प्रसादी का दुग्धपान किया। पुजारी नें प्रसादी का हार पहनाया और वहीं पद्मासन लगाकर जय स्वामीनारायण कहते हुए भगवान के दिव्यधाम में संवत १८८८ को अंतरध्यान कर गए। भोगावो नदी के किनारे उनकी छतरी हमें दिव्य धाम का स्मरण करवाती है।

🌸कृतित्व🌸
श्री ब्रह्मानंद स्वामी रचित निम्न भक्ति साहित्य उपलब्ध है।
१ ब्रह्मानंद काव्य भाग-१
२ ब्रह्मानंद काव्य भाग-२
३ ब्रह्मानंद छंद रत्नावली -तीन पुस्तकों का संपूट(अ)उपदेश रत्न दीपक(आ)उपदेश चिंतामणी(इ)विवेक चिंतामणी
४ धर्मवंश प्रकाश
५ नीति प्रकाश
६ सुमति प्रकाश
७ ब्रह्मविलास
८ शिक्षापत्री गुजराती और हिंदी पद्य में
९ संप्रदाय प्रदीप। तीन पुस्तकों का संपुट(अ)धर्मकुल ध्यान(आ)दशावतार चरित(इ)ज्ञान प्रकाश चिंतामणी
१० सती गीता
उपयुक्त प्रत्येक कृति का संक्षिप्त साहित्यक परिचय समीचीन है जिससे हमें कवि की उद्भट विद्वता व विविध विषयों पर प्रकट किये गये उनके विचारों का सामान्य खयाल आ जाए।

🌸ब्रह्मविलास🌸
यधपि स्वामी ब्रह्मानंद तो सगुण भक्त कवि थे, उन्होंने मध्यकालीन निर्गुण भक्त कवियों की परंपरा का निर्वाह करते हुए इस ग्रंथ में विषयों के विभाजन को “अंग” संज्ञा से अभिहित किया है। इस में कुल बीस अंग है। ब्रजभाषा में रचित यह ग्रंथ संवत १८८३ में दुर्गपुर अर्थात गढपुर में दादा खाचर के दरबार में पूर्ण किया था। यह ग्रंथ छप्पय, कुंडलिया और सवैया से विरचित है तथा इस में कुल ३८० छंद है।
“गुरूदेव को अंग” में गुरु की महिमा का वर्णन है। शास्त्रों में ऐसा उल्लेख है कि दस उपाध्याय से पिता बडा है। दस पिता से एक माता महान है तथा दस माताओं से गुरू श्रेष्ठ होता है। माता पिता तो काया देते है पर गुरू तो ज्ञान दान से शिष्य को देह बंधन से मुक्त करता है। यही कारण है कि त्रिदेवों से भी गुरू को श्रेष्ठ माना गया है-

गुरूर्ब्रह्मागुरूर्विष्णुगुरूर्देवोमहेश्वर:।
गुरूर्साक्षातपरब्रह्मातस्मै श्रीगुरुवैनम:।।

कबीर नें भी इसी लिए कहा है-
गुरु गोविंद दोनूं खडे, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरुदेव की,(जिन) गोविंद दियो बताय।।

परंतु ब्रह्मानंद स्वामी के गुरु साक्षात भगवान सहजानंद है। उनके उपदेश मात्र से काम, क्रोध, कुबुध्धि आदि सर्व दुष्ट तत्वों का विनाश होता है और शील, संतोष समता तथा सुंदरतादि गुण प्रकट होते है-

अंतर ब्रह्म विचार अखंडित, काम कुबुद्धि अहं मद टारे।
सुंदरता उर में समता ममता, मद मत्सर मान निवारे।
शील संतोष निरंतर शोभित, अंतर ते जग मूल उखारे।
इष्ट सदा ब्रह्मानंद कहे, सहजानंद है गुरूदेव हमारे।।

“पतिव्रता को अंग” में ब्रह्मानंद स्वामी पतिव्रता नारी धर्म की बात करते हुए वास्तव में सहजानंद भगवान के प्रति अपनी प्रेम लक्षणा भक्ति की बात करते है। पतिव्रता अपने पति को प्रभु मानती है। ब्रह्मानंद स्वामी प्रभु को अपना पति मानकर गुणगान गाते है। पति के संबंध में वह कहते है-

साधन नेम पति सुख संपत ज्ञान रू ध्यान पति से मति है।
जोग रू जाग पति तप तीरथ, दान रु पुण्य पति सों रति है।
अष्ठ हि सिध्दि पति नव ही निध, लोक प्रलोक पति सों यति है।
ब्रह्ममुनि कहे काय गिरा मन, सोइ पतिव्रत एक पति है।।

🌸ब्रह्मानंद छंद रत्नावली🌸
यह ग्रंथ पंद्रह भागों में विभाजित है जिसमें “ब्रह्मविलास” भाँति छ: अंगो का भी वर्णन है। यथा सार असार को अंग, फकीर को अंग, साधु को अंग आदि। सत्संग शीर्षक के अंतर्गत कमल रूपी सत्संग सूर्य रूपी सत्संग चंद्र रूपी सत्संग, समुद्र रूपी सत्संग और कल्पवृक्ष रूपी सत्संग का वर्णन है। प्रत्येक सत्संग के लिए एक सवैया छंद का प्रयोग किया गया है। सूर्य रूपी सत्संग द्रष्टव्य है-

उद्धव उर सो पूरब की दिश नूर हुऔ तम दूर निकासा।
दुष्ट रही सकुचाय कुमोदिनी सज्जन संत सरोज विकासा।
दिक्रित लीन भई रजनी डरी, सुक्रित प्रात विख्यात उजासा।
ब्रह्ममुनि कहे या जग में सतसंग सहोदित सूर प्रकाशा।

(उद्धव के अंत:करण में पूर्वदिशा के सूर्य की भांति ज्ञानोदय होने से अज्ञान रूपी अंधकार दूर हो जाता है। इससे दुष्ट बुध्धि रूपी कुमुदिनी का संकोच होता है। दुष्कर्म युक्त रात्रि भयभीत हो अद्रश्य हो जाती हे़ै और सुकृत रूपी प्रभात के आगमन से चहूऔर उजाला फैल जाता है। ब्रह्मानंद स्वामी कहते है कि सूर्योदय की भाँति श्रीजी महाराज के आगमन के साथ ही सूर्यरूपी सत्संग का प्रकाश सर्वत्र विकीर्ण हो जाता है। )

श्रीहरि चरित्र में श्रीहरि के जन्म का उदेश्य, तत्कालीन धर्म और समाज की स्थिति, काम पर विजय, बाल लीला आदि प्रसंगों को लेकर विभिन्न छंदों में (दोहे, छप्पय, मोतीदाम, अर्धनाराच, भुजंगी, अर्ध भुजंगी, और संजूता) रचना की गई है।

🌸काव्याष्टक🌸
आठ काव्याष्टक को अर्थात ६४ छंदों से रचित इस की भाषा शैली हमें बरबस ही डिंगल का स्मरण कराती है। अनुप्रासों की अनुपम छटा तथा वर्णसगाई अलंकार के दर्शन होते है-

कमल मुखक्क कर कमल, कमल नाभि अतरक्क।
करजग बुध जन शांति कर, कुल शुभ धर्म तिलक्क।।

श्री कृष्ण लीला के अंतर्गत ३७ सवैया छंदों में तन विहार, श्री राधिका जी, प्रभु भक्ति और नटखट कान्ह आदि का वर्णन है। श्री राधिका जी काव्य में स्वामी सहजानंद के प्रति प्रेमलक्षणा भक्ति प्रदर्शित करते समय ब्रह्मानंद स्वयं राधा स्वरूप हो जाते है। इस समग्र काव्य की भाषा ब्रज है और वह भी चमत्कार पूर्ण है। इसके प्रथम चरण का प्रथम शब्द और अंतिम शब्द, तीसरे चरण का प्रथम शब्द बनता है और यह क्रम ऐसे ही चौथे चरण में भी चलता है। यथा-

पियरा नहीं जानत पीर सखी,
मोय धीर धरात नहीं हियरा।
हियरा बिन मेट भये सबतो,
विधि कुं न कटे दुख के दियरा।
दियरा दिल धोत नहीं तब लो,
जब लों नहीं पाप मिटे जियरा।
जियरा ब्रहमानंद चाह जगी,
रट एक लगी पियरा पियरा।।

इनके समकालीन राजस्थान में जन्मे भक्त कवि पं मगनीराम साकरिया ने इसी प्रकार का परंतु इससे थोडा भिन्न प्रयोग अपने काव्य में किया है।

शरद निस गोविंद जू, बिन लगत है मोहि निरस।
सरनि बिनु मैं वेग व्याकुल, वेग प्रितम परस।
सरप ज्यूं तन डसत बिरहा, बहुत बीते बरस।
सरवगुण भरपूर मोहन, देवहू कब दरस।।

उपयुक्त काव्य में शब्द के वर्ण वही है लेकिन उनका विलोम कर दिया गया है।
(१)स्तुति काव्य के अंतर्गत दशावतार, राधारमणदेव, व सिद्धेश्वर महादेव की स्तुति गाई है। महादेव की स्तुति शुद्ध डिंगल की रचना है।

सागरा रागरा लेत नागरा सृंगार सरा,
आगरा व्यागरा चिह्न भागरा अथाह।
ज्यागरा अधीश रूद्र सदा ध्यान प्रजागरा,
वाघरा अंबरा वेण बाग रा सुबाह।।

🌸गूढार्थ पद🌸
ब्रह्मानंद मुनि नें १५ गूढार्थ पदों की रचना की है। गूढार्थ काव्यों को कूट काव्य भी कहा जाता है। इनके चार भेद होते है। कवि ने संबंध वाचक गूढार्थ पदों की रचना की है। ऐसे पदों में काव्य में प्रयुक्त कूट शब्दों के अर्थ का संबंध बतलाकर सर्वथा नए अर्थ को प्रकट करना होता है-

जलज सुता पति वाहन, भ्रखपति ताको पान जगत अति भावे।
रवि नंदिनी पति भगिनी पति पितु, ब्रह्मानंद तेहि पान बहावे।।

अर्थ: कमल सुता अर्थात् लक्ष्मी, उसके पति विष्णु, विष्णु का वाहन गरूड, गरूड का भक्ष्य साँप, सर्प के पति शिव, शिव का पान जहर जो उन्है बहुत भाता है। सूर्य की पुत्री यमुना, यमुना के पति श्रीकृष्ण, कृष्ण की बहन सुभद्रा, सुभद्रा के पति अर्जुन, उसके पिता इन्द्र, ब्रह्मानंद स्वामी कहते है कि उसका पान अमृत कहलाता है। (वाच्यार्थ यह होगा कि जगत में वासना रूपी विषपान सबको अच्छा लगता है, परंतु भक्ति रूपी अमृत किसी को अच्छा नहीं लगता)।

इनके अतिरिक्त ब्रह्मानंद स्वामी ने इस ग्रंथ में संशय निवारण, उपदेशामृत, दंभ दर्शन, उपदेश रत्नदीपक, उपदेश चिंतामणि, गोलोक दर्शन, और ज्ञान उपदेश आदि भिन्न छंदों में सारे तत्व को विस्तार से समझाया गया है। इन सबसे ब्रह्मानंद स्वामी के विविध विषयो पर के अधिकार का पता चलता है।

🌸संप्रदाय प्रदीप🌸
इस ग्रंथ में मूल विषयों के साथ साथ धर्मकुल ध्यान, अवतार चिंतामणी (दशावतार चरित्र) और ज्ञान प्रकाश चिंतामणि का भी समावेश है। सहजानंद भगवान की आज्ञा से उन्होंनें इस ग्रंथ की रचना की है-

“सदगुरु सहजानंद मोहि, राख्यौ चरन समीप।
करहु ग्रंथ श्रीमुख कह्यो, संप्रदाय प्रदीप।।”

🌸गीता की भक्ति🌸
इस ग्रंथ में अष्ट रस अध्याय है। उध्धव जैसे उत्तम शिष्य की प्राप्ति के प्रसंग उध्धव समागम, नारायण अवतार, हरिदर्शन, श्री नारायण, सदाचार युक्त भक्ति गृहस्थी धर्म और भागवत स्तुति आदि पर बहुत उत्तम रीति से अपने विचार प्रकट किये है। धर्मकुल ध्यान में सहजानंद स्वामी के पूर्वजों के नाम इनके अवतरण का प्रदेश, उनके बाल रूप का वर्णन आदि का वर्णन करते हुए कवि अंत में कहता है कि-

“धरम वंश की महिमा भारी, जँह प्रगटे घनश्याम मुरारी।
धरम भगत को परिवारा, ता में दोहि रहै आप उदारा।
धरम भगति हित हेत विचारी, अचल रहे निज कुल हितकारी।
ब्रह्मानंद कही सब रीती, प्रगट हरि पद चाहत प्रीति।।”

अवतार चरित्र में मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, कृष्ण, बुध्ध, कल्कि आदि का तीन तीन पदों में वर्णन है। परंतु कवि को तो कृष्णावतार परम प्रिय है। अतएव वह कहते है-

“सब अवतारन के अवतारी,
श्रीहरि कृष्ण परम सुखकारी। “

ज्ञान प्रकाश चिंतामणि में ५१ दोहा छंद है। सभी दोहो की चौथे चरण की काव्य पंक्ति एक ही है “चेत चेत नर चेत”। वास्तव में यह सब उद्बोधन के दोहे है जो मनुष्य को असार संसार की मोह निद्रा का त्याग करने के लिए है-

“जात परचा जग जाल में, ताते काल ग्रसेत।
छूटन का उपाय कर, चेत चेत नर चेत।।

🌸शिक्षापत्री (हींदी गुजराती पध में)🌸
सहजानंद स्वामी ने शिक्षापत्री को स्वयं का ही स्वरूप और स्वयं की ही वाणी कहा है। अतएव स्वामीनारायण संप्रदाय का यह प्रमुख सांप्रदायिक ग्रंथ है। शिक्षापत्री को गागर में सागर कहा गया है, क्योंकि सहजानंद स्वामी ने इस में सारे शास्त्रों का निष्कर्ष भर दिया है। मूलत:यह ग्रंथ संवत १८८२ में संस्कृत में लिखा गया था, जिसके पठन, पाठन-मनन, श्रवण, आदि से इस भौतिक युग में अलौकिक आनंद की प्राप्ति हो सकती है। संस्कृत लोकोपभोग्य न होने से सहजानंद स्वामी की आज्ञा से ब्रह्मानंद मुनी ने इसका हिंदी और गुजराती में अनुवाद किया है इस अनुवाद के माध्यम से सद्धर्म का व्यापक प्रचार हुआ है-

“पत्री गूढ अरथ गिरवाणी पोते कीधी रे।
तेने प्राकृत करवा काज आज्ञा मुने दीधी रे।
सौने संस्कृत केरी रीत नथी समझाती रे।
माटे पद बांध्या करी प्रीत भाषा गुजराती रे।।”

हिन्दी पधानुवाद लोक प्रिय दोहा व चौपाई छंद में है जबकि गुजराती पधानुवाद गरबी व धोळ राग रागिनियों में है जिनसे उनको लोकाभिमुख बनाने में सहजता हुई है दोनों ही गेय है। नारायण और महेश अभेद है इसका निरूपण तो इसमें है ही परंतु छोटी से छोटी बात भी सहजानंद स्वामी से छुटी नही है। दातुन, स्नान, वस्त्र, उर्ध्वपुड्र तिलक, मलमूत्र निवारण बिना जलपान नही करना, आदि कब किसे किया जाय? उसका वर्णन शिक्षापत्री में है, तो जहाँ चोरों का निवास है, जो मदिरा व मांस का सेवन करते हो कामी हो ऐसे स्थान व स्त्री पुरूष त्याज्य है। एकादशी व्रत रखना, कृष्ण जन्माष्टमी और शिवरात्रि को उत्सव के साथ मनाना, बिना विचारे शब्दों का उच्चारण न करना, गुरू, विद्वान साधु विप्र का सम्मान करना आदि पर विधायक निर्देश दिये गए है। अंत में कवि लिखते है कि-

“आश्रित की पीडा हरन, धर्म भक्ति प्रतिपाल।
कृष्ण जनन वांछित सुखद, मंगल करहू विशाल।।
सहजानंद गुरु एहि विधि, पत्री रची नवीन।
ब्रह्मानंद गिरवान पर, सुलभ सुभाषा कीन।।”

इधर अहमदाबाद की श्रीमती विराजकुमारी पांडेय ने मूल के साथ ब्रजभाषा में शिक्षापत्री को अनुवादित किया है, जो हिंदी साहित्य परिषद अहमदाबाद से प्रकाशित है।

🌸श्री सुमति प्रकाश🌸
इस ग्रंथ में कुल बीस विश्राम (अध्याय) है। दोहा, त्रोटक, छप्पय, त्रिभंगी, पद्धरि, तोमर, उधोर, मोतीदाम, भुजंगी, संजूता, निष्पाल, मनहंस, प्रमाणिका, मालिनी, तुंगा, हरिगीत। उधोर, संजूता, निष्पाल, मनहंस, प्रमाणिका, तुंगा आदि ऐसे छंद नाम है जो अनेक विद्वानों को प्रथम बार सुनने में आए हो। यधपि यह ग्रंथ हिंदी भाषा में लिखा हुआ है, फिर भी डिंगल का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

प्रथम विश्राम में श्री बदरीकाश्रम व नगराज हिमालय की शोभा का वर्णन है। द्वितीय और तृतीय विश्राम दुर्वासा ॠषि श्राप और श्रीहरि के अवतार लेने के प्रयोजन से संबंधित है। चतुर्थ और पंचम अध्याय में सहजानंद स्वामी के गृहत्याग, वन विचरण आदि का उल्लेख है। सप्तम से चतुर्दश विश्रामों में निर्लोभ, निष्काम व्रत, प्रायश्चित, निस्पृहिव्रत, स्त्रीधर्म, और गृहस्थ धर्म का आलेखन है।

पंद्रह वे विश्राम में अक्षरधाम का वर्णन है तो सोलहवे सत्रहवें में नर्क यातना कितनी भयंकर होती है उसका विशद वर्णन है। अठारहवें और उन्नीसवें में श्रीहरि के अवतार का प्रधान कारण तथा उनकी महिमा का वर्णन है। अंतिम विश्राम अर्थात बीसवें में बदरीकाश्रम, केदारनाथ, वराहीशिला, नृसिंहशिला का महत्व दर्शाया गया है।

नरक कुंड निरूपण में ब्रह्मानंद स्वामी अष्टाविंश नरकों के नाम गिनाये है जबकि गुजरात से ही सडसठ वर्ष पूर्व प्रकाशित पौराणिक कथा कोष में यह संख्या उनतीस है। एक दो नामों मैं भी फर्क है। पौराणिक कथा कोष में पर्यावर्तन अधिक बतलाया गया है। इन नरकों के कराल वर्णन को पढ सुनकर लोग पातकों से बचे रहें यही कदाचित इसके निर्माण का उदेश्य रहा होगा।

🌸धर्मवंश प्रकाश🌸
इस ग्रंथ में कुल आठ अध्याय है। गोलोक धाम वर्णन में प्रारंभिक दोहे में ही स्वामी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सहजानंद स्वामी की आज्ञा से ही इस ग्रंथ की रचना हुई है-

करी आज्ञा ताते करूं, धर्म सुवंश प्रकाश।
इसी गोलोक को अक्षरधाम कहते है-
जाकू कवि कोविद कहै, अक्षरधाम अनूप।

ऐसा यह गोलोक धाम(अक्षरधाम) अत्यंत रमणीय एवं मुनिमन मोहक है। द्वितीय अध्याय धर्म भक्ति श्राप कथन का है। प्रारंभ में सुंदर प्राकृतिक वर्णन है, जिससे कवि के वनस्पति के ज्ञान का पता लगता है। ऐसे विमल बद्रीवन में नर नारायण देव का अाश्रम अति शोभा पाता है, जिनके दर्शनार्थ एक बार प्रफुल्लित मुनि वृंद आते है। जब नर नारायण और मुनियों के बीच भागवत चर्चा चल रही थी तब उसी समय कैलाश से दुर्वासा ऋषि पधारे। सभी इतने विचार मग्न थे कि किसी का इस और ध्यान ही नहीं गया। दुर्वासा नें इसे अपमान समझ क्रोधित हो हाथ उठाकर कराल शब्दों में श्राप दे दिया कि अब आप को मनुष्य शरीर धारण करना पडेगा। नर नारायण व मुनियों की प्रार्थना पर उन्होंने उससे छुटकारे का वरदान भी दे दिया।

धर्म प्रवास कथन के अंतर्गत स्वामी सहजानंद के जन्म, उपनयन संस्कार, और कृष्णमय बनकर कृष्ण जैसी क्रीडा करना और अंत में अनेकों लीलाओं के पश्चात भगवान के अंतर्ध्यान होने का वर्णन है।
“धर्मकुल आचार्य पद स्थापन” अध्याय में स्वामिनारायण संप्रदाय के आचार्य पद की स्थापना का वर्णन है। इस संपूर्ण ग्रंथ की रचना १८८६ में हुई। अंतिम दोहै में अपनी विनम्रता प्रकट करते हुए वह कहते है कि-

“ह्रस्व दीर्घ अरू गन अगन,
मोय न पूरन ज्ञान।
ब्रह्मानंद एहि विध लख्यौ,
ज्यूं प्रेर्यो भगवान।।”

🌸सतीगीता🌸
वास्तव में यह कवि की स्वतंत्र रचना न होकर डेढ सौ साल पूर्व स्वामी सहजानंद कृत संस्कृत रचना का ब्रजभाषा में अनुवाद है। ब्रह्मानंद स्वामी का मूल उदेश्य यह था कि इसे लोक भोग्य बनाया जाए जिससे अधिक से अधिक स्त्रियां इसका लाभ उठा सके।
इसमें स्त्रियों की तीन अवस्थाए (कुमारी, परिणीत और विधवा)में पालन करने योग्य नियमों का विस्तृत वर्णन है। स्वधर्म का रक्षण करते हुए कुसंग से बचना ही इस छोटे से ग्रंथ का उदेश्य है। इसमें कुलटा स्त्रियों के भेदों व लक्षणों का भी निरूपण है।  छ: अध्यायों में विभाजित इस ग्रंथ के पहले अध्याय में सधवा व विधवा भेद निरूपित है। द्वितीय और तृतीय अध्याय में पतिव्रता स्त्रियों का वर्णन और अंतिम तीन अध्यायों में विधवा के कर्तव्यों का वर्णन है।
दोहा, चौपाई और हरिगीत छंदों में लिखित इस ग्रंथ में कुल संख्या ५११ है। वैसे यह अनुवाद अवश्य है लेकिन मौलिक रचना की भाँति सुंदर बन पडी है। प्रशस्ति में कवि नें लिखा है-

“यह जो ग्रंथ सतीन की गीता,
सुने पढे सोई सती पुनीता,

ऐ दोनूं वांछित फल पावै,
ताप पाप सबही मिट जावै,
संवत अठारह त्रयासियो,
फागन वद छठ मान।
कीन्हौ ब्रह्मानंद कवी,
ग्रंथ संपुरन जान।।”

🌸नीति प्रकाश🌸
इस ग्रंथ का निर्माण उनड राजा के महल में गढडा सौराष्ट्र में स्वामी सहजानंद महाराज के चरणों में बैठकर संवत १८८४ में स्वामी ब्रह्मानंद जी ने किया था।

संवत अढार चौरासियौ, श्रावण मास उदार।
श्रीगुरू सहजानंद के, करी के निकट निवास।
गढपुर उनड भूप गृह, कीन्हो नीति प्रकाश।।”

दोहा और चौपाई छंदों में रचित यह विदूर नीति का हीन्दी पधानुवाद है। इस में प्रकाशित गुजराती गधानुवाद स्वामी श्री नारायण प्रिय दास जी का है।
प्रारंभ में धर्मदेव व भक्तिमाता का स्मरण कर कविवर नें महात्मा विदूर और महाराज धृतराष्ट्र के संवादो के माध्यम से राजा, पंडित, मित्र, ग्यानी, मूर्ख, सज्जन और, दुर्जन के लक्षणों को भी इस ग्रंथ में दर्शाया है।
द्वादस वर्षिय कठोर वनवास का दुख भोग कर जब धर्मराज युधिष्ठिर नें संजय के माध्यम से अपने अधिकार का आधा राज्य मांगा तो धृतराष्ट्र की नींद हराम हो गई। वे मन की शांति के लिए विदुर को बुलाते है। विदुर उन्है खरी खरी सुना देते है। वे कहते है कि हे राजन ! न तो आप के आँख है और न ही राजा होने के लक्षण। कहीं आप के ह्रदय में पराया धन हडपने की इच्छा तो नहीं है ? वैसे निम्न चारों कों नींद नहीं आती है-

“बिना सहायक अरू बल हीना।
दारूण बैर सबल से कीन्हा।
धन ह्रत कामी चोर कहावै।
विधा तप इन्द्रिय बस लावै।
जब लूं लोग त्याग नहीं करही।
तो कूं शांति नजर न परही।।”

वास्तव में यह ग्रंथ अत्यंत जीवनोपयोगी है और जैसा कि स्वयं रचयिता नें दावा किया है-

“जो यां कुं सीखे सुनें, मूढ हु होत प्रबीन”

सो वैसे सत्य है। एक स्थल पर मुनि ने कितने गंभीर तथ्य को अलंकारों के माध्यम से हमारे समक्ष उतनी ही सरलता से प्रकट कर दिया है। द्रष्टव्य है-

जाके मन भ्रम होत है, सुझत उलटो ज्ञान।
पूरव कूं पश्चिम कहै, पश्चिम पूरब जान।।
धरम लगत है गरल सम, लगत है पाप पीयूख।
में तेरी विपरीत गति, दुख कुं मानत सुख्ख।।
ब्रह्मानंद कहै जाहिको, मन अती रहत मलीन।
काजल ज्यूं निज सामता, तज तन ही मति हीन।।”

मुर्ख भी एक प्रकार के नहीं सत्रह प्रकार के होते है। स्वयंभु मनु नें इनका वर्णन किया है। उधर ज्ञानी पुरूषों के लक्षणों को भी गुरू दतात्रेय के मुख से कहलाया है। अन्यत्र यह भी बतलाया गया है कि शास्त्र में मनुष्य की आयु सौ वर्ष की कही गई है तो क्या कारण है कि उसकी आयु कम हो जाती है। अपनें पधानुवाद में मुनि नें कहा है। –

“मान अति अरू वाद अति, अति अपराध बखान।
शिष्य उदर रत क्रोध रत, मित्र द्रोह खट जान।।
सबही मुनिवर कहत है, एह तीक्षण तलवार।
मति बिन जग में मनुष्य के, आयुष काटनहार।।”

🌸ब्रह्मानंद काव्यम🌸
माना यह जाता है कि ब्रह्मानंद स्वामी नें आठ सहस्त्र पदों की रचना की, परंतु अभी तक सुसंपादित ब्रह्मानंद काव्यम भाग १और २ में मात्र २५२५ पद ही प्रकाशित हुए है। यह भी कोई कम संख्या नहीं है। इतने पद और उनके उपयुक्त चर्चित ग्रंथ उन्है महाकवि के उच्चासन पर बिठाने के लिए यथेष्ठ है। प्रथम भाग में ११७७पद है तो शेष द्वितीय दोनों भागों का विषयगत विभाजन इस भाँति है। प्रभाती(५०), आरती और भोग(१००), ग्यान विलास(२००), उत्सव(४००), भक्तिविलास, शृंगार तथा विरह के(८००), और लीला के (१०००) पद है। राग रागिनीयों और छंदों की विविधता भी कोई कम नहीं है। २७ प्रकार के छंद और ७२ राग रागिनियों में ये सभी पद समाविष्ट है। भाषागत विशेषता है कि स्वयं मुनि शाश्त्रों और संस्कृत के अच्छै ग्याता होते हुए भी उन्होंनें पदों की रचना गुजराती(२२१०), पिंगल(३००), और शेष मारवाडी और कच्छी में की है। यह सभी क्या कम उपलब्धि है?

पौ फट गई है परंतु आराध्य देव श्री कृष्ण अभी भी पौढे हुए है। गोप गोपी दर्शनार्थ एकत्रित हुए है। भगवान शिव भी भेष धारणकर दरवाजे पर बैठे है आदि का वर्णन भैरव राग की एक प्रभाती में देखिये।

“प्रात थयुं मन मोहन प्यारा, प्रीतम रह्या शुं पोढीने।
वारम वार करूं छुं विनती, जग जीवन कर जोडी नें।
घर घर थी गोवाळ आव्या, दरसन कारण दोडी नें।
आंगणिये उभी व्रज अबळा, मही वलोवां छोडीने।।”

श्री वल्लभाचार्य के संस्कृत में रचित मधुराष्टक की भाँति ब्रह्मानंद मुनि नें श्रीकृष्ण की प्रत्येक वस्तु की सुंदरता का द्रष्टांत द्रष्टव्य है-

“सुंदर रसीले नैन, सुंदर ही मुख बैन,
सुंदर बनी है छबि, सुंदर सुजान की।
सुंदर बसन सार, सुंदर ही मोती माला, “

एक पद में कवि ने अपनी निराली कल्पना से श्रीकृष्ण को न केवल गोपी का वेश धारण करवाया है बल्कि नाच भी नचवाया है तथा इस बालिका बनी बालक को माता यशोदा के पास ले जाकर गोपियाँ कहती है कि क्या तुम अपने पुत्र कन्हैया का विवाह इस कुंवरी से करोगी? और मजा तो यह है कि श्रीकृष्ण भी भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर चुपचाप सब सहन कर जाते है।

“हरि कुं राधे नाच नचावै।
हरि कुं राधे नाच नचावै।
पायन में नेपुर कर दीन्है कर चूडी पहरावै।
मिल के जूथ सबै ब्रजनारी लाल कुं प्यारी बनावै।
कछनि कंबरिया दूर बहायके, ले लँहगौ पहरावै।
पाघ उतार ओढाई चुनरिया, काजर नैन लगावै।
मांग समार भाल दे बींदी, कर ग्रही लाल सिखावै।
राधै राधै कान्ह कान्ह कही, नचवत तान मिलावै।
रूप बखान लगाय के घुंघट, जसुमति के ढिग ले जावै।
ब्रह्मानंद कहै तेरे सुत को, यह कुंवरि परणावै।।”

“बारहमासी “काव्य विधा का हमारे यहां काफी प्रचलन है। इस विधा का उपयोग भक्ति और शृंगार दोनों रसों में भरपूर किया गया है। ब्रह्मानंद स्वामी ने इसका उपयोग भक्ति मिश्रित शृंगार में किया है।

“सखी आव्यौ मास अषाढ, चमकी वीजलडी रे।
सखी केम करी राखुं गाढ खाली सेजलडी रे।
सखी नीर भराय छै नेण, घणुं हुं वारूं रे।
सखी ब्रह्मानंद नों सेण मळे तो सारू रे।।”

और रेणकी छंद में रास के इन स्वरो पर मुग्ध हुए बिना नहीं रहा जा सकता। कितना प्रभुत्व है भाषा पर:

सर सर पर सधर अमर नर अनुसर, कर कर वर घर मेल करे।
हरि हर सुर अवर अछर अति मनहर, भर भर अति उर हरख भरे।।”

ऐसे विद्वतवर्य और कविवर्य तथा भक्तवर्य और गुरूवर्य के लिए स्वामी नारायण संप्रदाय में विशिष्ट स्थान होना स्वाभाविक ही है। साक्षात सहजानंद भगवान जिस पर अमीद्रष्टि रखते हो उस पर कुद्रष्टि डालने का साहस ही किसी को कैसे हो सकता है? संप्रदाय में उनकी वरियता निसंदिग्ध है।

अतएव अष्ट नंद छाप के कविवर स्वामी अविनाशानंद यह कहें तो सर्वथा उचित ही है।

“ब्रह्ममुनि कवि भानु सम, मुक्त प्रेम दो चंद।
और कवि उडुगण सम, कहै अविनाशानंद। “
(ब्रह्म मुनि सूर्य सदस प्रखर तेजस्वी कवि है। कविता ही के क्षेत्र में प्रेमानंद और मुक्तानंद चंद्रमा की भाँति है। अन्य तारों के सदस प्रकाशित है। ऐसा अविनाशानंद कहता है)

यहाँ हिंदी के उस दोहै का बरबस स्मरण हो जाता है जिस में कहा गया है कि सूरदास सूर्य के समान है और तुलसीदास चंद्रमां की भाँति। केशवदास तारे के सदस तो अन्य कवि जूगनु की भाँति है जो इधर उधर क्षणिक प्रकाश फैलाते रहते है।

“सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केसवदास।
अब के कवि खधोत सम, जँह तँह करत प्रकाश।।

श्रीवलभाचार्य द्वारा प्रस्थापित पुष्टिमार्ग के अष्टछाप के कवि प्रसिध्ध है। ठीक इसी भाँति श्रीसहजानंद स्वामी द्वारा प्रस्थापित स्वामीनारायण संप्रदाय के अष्ट नंद कवि प्रसिद्ध है। और अष्ट नंद में स्वामी ब्रह्मानंद अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से सर्वोपरि है।

शास्त्र, साहित्य, शिल्प, स्थापत्य, संगीत, सामुद्रिक शास्त्र सभी के पूर्ण ज्ञाता थे। श्रीहरि के अत्यंत निकट थे और एकनिष्ठ भक्त थे। स्व के मोह से उपर थे और इसी लिए सब के प्रिय थे। सांसारिक वैभव उनके लिए धूलवत थे, और इसी लिए वह महात्मा थे। शरीर में रक्त की भाँति कविता उनके तन मन का अंग थी। इन्ही सर्व गुणों के कारण सबके प्रिय थे। और एक अनोखे व्यक्तित्व के धनी थे।

(गुजराती भाषा साहित्य भवन, सौराष्ट्र युनिवरसीटी राजकोट एवं स्वामीनारायण विधार्थी भुवन सुरेन्द्रनगर द्वारा आयोजित ब्रह्मानंद स्वामी द्विशताब्धि महोत्सव के उपलक्ष मे दिए व्याख्यान के लिखित अंश)

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🌹ब्रह्मानंद स्वामी -विद्वानों और साहित्यकारों की नजर में🌹“About eight thousand miscellaneous padas besides other works nine in numbers, is said to have been his literary output. His forte was preacting and for driving his preaciting homes; he has used a number of illustrations and instance which shows his marvelous grasp and knowledge of social problems manners and customs. His power over words, the content of his vocabulary is such that the very reading of his verses produces in the reader an indefinable emotions of pleasure and satisfaction.
(Milestone in Gujarati Literature Page No 267, Diwan Bahadur krishnalal Mohanlal Zaveri,MA LLB)


His verses have an easy flow and fine clear imagery.

(Selection from classical Gujarati Literature Vol -III ; Page No:374)

Author :Mr J S Tarapoorwala( B A ,PH.D,Bar at law)


In his beauty of language, Brahmanand surpasses all his contemporaries except Dayaram

(Gujarat &Its literature-Page No 268, K M Munshi)


उन्होनें गुजराती पद और गरबीयों की रचनाए की है। हिन्दुस्तानी भाषा में भी गेय पदों की रचना की है। कुल मिलाकर ८००० पद है, तथा धर्मवंश प्रकाश, सुमति प्रकाश, धीरज आख्यायन, ब्रह्मविलास आदि बडे बडे ग्रंथ हिंदुस्तानी भाषा में लिखे है। उन में मोतीदाम, भुजंगी, नाराच, उधोर, सवैया, कवित्त, कुंडलिया, छप्पय आदि तरह तरह के छंदों का रचना की है। उन सब के अलावा फुटकर झुलणा, चर्चरी, अमृतध्वनि रेणंकी आदि छंद नाद सौंदर्य वाले (झड झमक वाले) रचे है और जिनकी कविता से स्वामी नारायण खुब रंजित होते थे। वह सरोद (वीणा) सितार बहुत अच्छी तरह से बजाना जानते थे और विनोद सहज स्वभाव वाले थे, शरीर से मोटे थे उनके वाकचाचुर्य के किस्से आज भी लोगों की जिह्वा पर रमते है। कोई चाहे कितना ही उदास क्यों न हो पर उसको खुश मिजाज करने की शक्ति उनमें थी। शीध्रकाव्य रचना करने की दक्षता भी उनमें थी
(बुध्धि प्रकाश नामक गुजराती साहित्यक पत्रिका का विशेशांक फरवरी १८६३ अंक नं-२, पृष्ठ नंबर ३२, संपादक/ लेखक -कविश्वर दलपतराम डाह्यालाल)


उनकी रचनाऔं में उपदेश प्रधानतया झलकता है, जिसमें मुक्तानंद स्वामी ग्यानी कवि, निष्कुळानंद स्वामी वैराग्यवान कवि और प्रेमानंद प्रेम सखी प्रेम निष्ठ कवि वैसे ही ब्रह्मानंद स्वामी उपदेश निष्ठ कवि थे। उनकी कविता में उनके ह्रदय का जोम / उत्साह, उद्गार और भाषा गौरव और श्रोताऔ के मन पर अमीट छाप छोडने वाली झडझमक वाली(नाद सौंदर्यवाली) पद पद में रणकार करती हुई रचना विन्यास वाली कविताऐं मन को लुभाती है। “अखा ने जिस तरह नीर्भिक रहके वेंदांत के विषय को लेकर उस युग के सांप्रदायिक शिक्षण पर जो व्यंगय कसे है उसी प्रकार स्वामी नें व्यवहारिक चतुराई बताने के लिए संसार को अष्टसिध्घि नव निधि मानने वाले जडवादीयों की पोल पाखंड के उपासकों को उनकी धधकती और अश्व की भांति उछलती हुई वाणी से लताडा है। आज भी उनके चंद्रायणा, झूलणा छंद, छप्पय और पंक्तियाँ अनेको बैरागी साधु और उपदेशक स्वामी के नाम से या कई बार नाम बिना खुद का नाम प्रयोग करके उपदेशों मैं प्रयोग करते हुए द्रष्टिगोचर होते है। शूरवीर के अंग का उपदेश तो स्वामी जी का ही कह सकते है जो हरदम रोम रोम को ओज से उत्तेजित करने वाला, ह्रदय को मजबूत बनाके ओज का नवसंचार कर के मन को डोलनेवाले उनके काव्य प्रवाह में हम अब स्नान करेंगे “हरिजन साचा रे जे उर मां हिम्मत राखे” (और फिर सारे पद क. मा मुंशी ने क्वोट किए है। )
गुजराती भाषा पर उनका प्रभुत्व सहज ही द्रष्टव्य है, हिन्द के दुर्दिन के अंधेर युग में आर्य प्रजा ब्राह्मणों में ब्राह्मणत्व टिकाए रखना, क्षत्रियों के क्षात्रत्व के तेज को निरंतर शूरवीरी के अग्नि को प्रज्वलित रखनेवाला, वैश्यों को खुद के वचन पर मस्त रहने के मार्मिक टकोर करने वाले “वैध का वचन और बनिये के बोल” उस नई कहावत को जन्म दे ऐसे व्यवहार में लेकर सत्यवचनपनें का सद्गुण व्यापारीयों में द्रढ कराने वाले अगर संक्षेप में कहें तो तीनों वर्गों का उस काल में रक्षण करके उस को उत्साह से संजोकर जीवित रखकर सर्जे हुए का मान जो किसी को किसी को देना हो तो उस काल के चारण, बारहठ, भट्ट और स्त्रीवर्ग के लिए ही संभव है। इस तरह देश के उध्धार में भाग लेने वाली चारण जाति में जनमे आप खुद के गुरू पर अतूट श्रध्धा और अडिग निश्चय से जिसका अंतःकरण प्रकाशित है ऐसे व. जो सत्य उनको स्वयं को प्राप्त हुआ है वह दुसरे लोगों को दिखाना खुद का फर्ज या धर्म है ऐसा मानने वाले, जिनकी ह्रदयवीणा के तार तार झनकार करके आलाप कर रहे है ऐसै स्वामी के शूरवीरपनें के अंग के साक्ष्य और गुजराती भाषा पर उनके प्रभुत्व प्रत्यक्ष है सो ज्यादा उदाहरण प्रस्तुत करना उचित नहीं समझता। उनके पदों में दोहा,सोरठा,चौपाईयाँ,और अलग अलग छंदों में पिंगल के नियम का बखुबी पालन किया गया है। प्रेमानंद स्वामी के पद जिस तरह गाने वाले के लिए अत्युत्तम है और स्वामी के पद काव्य शाश्त्र के नियमों के अनुसरण के लिए श्रेष्ठ है।

(गुजराती साहित्य मध्य काल नो प्रवाह पृष्ठ नं २३९ से २४८ /कनैयालाल माणिकलाल मुंशी)


अशांति और निर्वेद का वातावरण हलका होने लगा होगा इसलिए प्रेम सखी और ब्रह्मानंद सरीखे के भावोन्मनी ह्रदय में से प्रगटा हुआ वैराग्य शुष्क नहीं अपितु रसमय हो गया। पुरे मध्यकालीन साहित्य में इस घटना का कोई उदाहरण नहीं है ऐसा स्वीकार किये बिना नहीं चलेगा।

(साहित्य दर्शन १०६ श्री विजयराज वैध)


श्री स्वामी नारायण नें सचमुच समुचे गुजरात पर बडा उपकार किया है और उस संप्रदाय के लेखकों नें भी भक्ति को सही मायने में रखने हेतु और वैराग्य की सही समझ देने के प्रशंशनीय प्रयास किये है।

“आ तन रंग पतंग सरीखो जातां वार न लागे जी” ऐसा लिखने वाले ब्रह्मानंद ने बोध और शृंगार के असंख्य पद लिखें है और वह असरदार द्रष्टांत खोजने में और लोगों को खुद के बोध के अनुसार यथायोग्य समझानें में महद अंश से सफल हुए है। उनके अधिकांश पद एकत्रित करके ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किए गए है जो बताता है कि उनके भक्त भी खुब है और उनकी जनसाधारण में लोकप्रियता भी खुब है।

(साहित्य प्रवेशिका पृष्ठ नं ६१,
हिम्मतलाल गणेश जी अंजारिया एम ए एल एल बी)


गंभीर और शांत ग्यान विग्यान के तत्वमयी बातें एक मां कि भांति समझाकर उपदेश देने वाली मुक्तमुनि की वाणी रोम रोम में उपदेश प्रेरक और और उत्साह और शौर्य का नवसंचार करनेवाली, ब्रह्ममुनि की उक्ति ह्रदय को झकझोर के रूलानेवाली तथा हँसानेवाली शुध्ध निस्वार्थ प्रेम भक्ति को पोषण करने वाले प्रेम सखी के गूंजन और ललकार, जगत से मन हटा कर तीव्र द्रढ और शुद्ध सात्विक वैराग्य को ह्रदय में स्थायी करने वाले वैराग्य मूर्ति निष्कुळानंद तथा देवानंद और मंजुकेशानंद के पद,चाबखे और साखियाँ आज भी श्रोता वक्ता और वाचक के मन पर ऐसी असर छोडते है कि उस की वजह से भाषा के साहित्य में अलग ही स्थान प्राप्त है और वहीं टिके रहते है।

(मध्यकाल नो साहित्य प्रवाह साहित्य संसद-पृष्ठ २२४
इ.इ.मशरूवाला)


ग्यानाश्रयी अखा,धीरा,और ब्रह्मानंद आदि में अनुभूत ब्रह्म कि लहरें किंवा ब्रह्मझकोर ही साहित्य की चिरंतन संस्कार बोधक सिद्धियां है।

(गुजराती साहित्य नी रूपरेखा पृष्ठ-३०, श्री विजयराज वैध)

4 comments

  • Vyas swami

    Jay swaminarayan me kutch bhuj se hu aapne Likha he ki brahmanand swami ne amdavad ka mandir banvaya he lekin sayad vo galat he brahmanand swami ne vadtal or junagadh me swaminarayan ka mandir banvaya he kisiko puchakar tapas
    Kar lena ye mera number he 9328932824 vyas swami

  • Arvind Gadhavi

    Jay Mataji Badha Bhai Ne

  • ओमपाल सिंह आसिया

    लाडू दान जी आसिया उच्च कोटि के कवि एवं असाधारण भक्त थे । स्वामनारायण सम्प्रदाय के आधार स्तंभ है । न केवल भारत में वरन ईग्लैण्ड (UK ) में भी इस सम्प्रदाय के आज मंदिर हैं ।
    ।। कोटि कोटि वंदन ।।

  • Narpat Asia

    Bahut Hi Adbhut aur rochak information. Swamiji Ke Jivan Ke anchue pahlu aur sahity ke bare main rochak aur gyan vardhak Jankari. Baut Sunder Manoj Sa. Jay Shree.

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