पुस्तक-प्रेम, पुस्तकालय-संस्कृति एवं पठनीयता के समक्ष चुनौतियां

विगत दिनों किसी मित्र ने बताया कि उसका पुत्र अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय एवं महाविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करके अभी अमेरिका में “व्यक्तित्व-विकास” की कक्षाएं लगाता है, जिनमें हजारों विद्यार्थी आते हैं। वहां बौद्धिक के साथ-साथ शारीरिक विकास हेतु सूक्ष्म-योगा भी करवाया जाता है। कक्षा प्रारंभ होने के समय एक युवती, जो कोई पुस्तक पढ़ रही थी, योग हेतु लगाई गई चटाई पर आने से पहले उसने अपने जूते उतारे तथा उस पुस्तक को अपने जूतों पर ही उलटा रख दिया ताकी वापस आने पर वहीं से पुनः पढ़ना प्रारंभ कर दे। कक्षा में सभी विद्यार्थी अमेरिकी थे, बस योग-शिक्षक भारतीय था। जैसे ही उस भारतीय की दृष्टि जूतों पर रखी पुस्तक पर पड़ी तो वो दौड़ कर गया और पुस्तक को उठाया। उसे सीस झुका कर प्रणाम किया तथा ससम्मान मेज पर रखा। जैसे ही विद्यार्थियों से मुखातिब हुआ तो उस लड़की ने आश्चर्य से पूछा “सर! यह क्या कर रहे हैं आप?[…]

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काव्य-कलरव सांंस्कृतिक संगम एवं स्नेह मिलन समारोह (१३-१४ जुलाई २०१९ खुड़द)

  • दो दिवसीय सांस्कृतिक संगम एवं स्नेहमिलन समारोह संपन्न
  • श्रीमढ खुड़द धाम की आस्था के उजास पर पढ़े गए छंद एवं गीत
  • सोशल मीडिया की उपादेयता एवं प्रासंगिकता” विषयक संगोष्ठी में की विद्वानों ने शिरकत
  • विशिष्ट साहित्यिक सांस्कृतिक प्रतिभाओं का किया गया अभिनन्दन
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जद छूटै जालोर!

दूहा लोहा सरिस दुहुं, वडौ भेद इक एह।
दूहो वेधै चित्त नै, लोहा भेदे देह।।

यानी दोहा अर लोहा री मार एक सरीखी। एक चित्त नै वेधै तो दूजो देह नै। पण लोह तो हरएक रै घाव कर सकै पण दूहो फखत समझै उणनै ईज सालै। इतिहास में ऐड़ा अनेकूं दाखला मिलै कै दूहे इतिहास बदल़ दियो। लोगां री दिनचर्या बदल़दी।[…]

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કચ્છી ભાષાના આદિ કવિ સામુર ચારણ

સામુર ચારણ કચ્છી ભાષાના આદિ કવિ મનાય છે. સામુર ચારણથી પહેલા કોઈ કચ્છી કવિનું નામ ઈતિહાસમાં નોધાયેલ હોય તેવું મારી જાણમાં નથી. ચારણ કુળની તુંબેલ ગોત્રની વંશાવળીમાં ગુગળ ચારણ પહેલાં સામુર કવિનું નામ આવે છે. સામુર તુંબેલ જામ નરપતનાં સમકાલીન હતા. બારોટોના ચોપડા અનુસાર જામ નરપતની ગાદી સંવત ૬૮૩ થી સંવત ૭૦૧ સુધી છે. સામુર તુમેર ચારણોનો તુંબેલ પછીનો આદિ પુરુષ છે. કચ્છી લોક સાહિત્યનાં જૂના દોહામાં સામુરનું નામ આવે છે અને એ બધા દુહાના રચયિતા સામુર ચારણ છે. જો કે તેમની અનેક કાવ્ય રચનાઓ કાળના પ્રવાહમાં લુપ્ત થઈ ગઈ હશે. ચારણોના રાવળદેવોની વહી અનુસાર સામુરની વંશાવાળી આ મુજબ છે. શબ્દસહ આપવામાં આવી છે.

આદ લગ ઈસવર: નઃ ચારણીયોઃ
કવ ચારણ પેદા કિયો, અંગરો મેલ ઉતાર,
પતા જાસ શંકર પણા, માત જશી મહામાએ..[…]

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कविता रो प्रभाव

दूहो दसमो वेद,
समझै तैनै साल्है।

काव्य मर्मज्ञां दूहै नै दसमे वेद री संज्ञा दी अर कह्यो कै ओ फखत उणरै काल़जै नै ईज छूवै जिको इणरो मर्म जाणतो हुवै !नीतर आंधै कुत्तै खोल़ण ही खीर वाल़ी बात है। जिणांरै सातै सुआवड़ी हुवै उणांरै दूहे रो मर्म नैड़ैकर ई नीं निकल़ै पण जिकै रै नैड़ैकर निकल़ै, उणनै ओ चित नै चकित करै तो साथै ई चैन ई देवै। आ ई नीं ओ उणरै दिल में दरद उपावै तो साथै ई दवा पण करै-

दूहो चित चक्रित करै, दूहो चित रो चैन।
दूहो दरद उपावही, दूहो दारू ऐन।।[…]

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न्यात न्यात में होवत नाथो!

जोधपुर माथै महाराजा सूरसिंहजी रो राज। सूरसिंहजी रै खास मर्जीदानां मांय सूं एक पुष्करणा ब्राह्मण नाथोजी व्यास ई हा। नेकदिल अर उदारमना मिनख। उणांरै एकाएक बाई ही। दिन लागां बाई परणावण सावै हुई।

बेटी मोटी हुवै जणै बाप सूं पैला मा नै चिंता हुवै। इणी चिंता रै वशीभूत एक दिन गुराणी रै मन में जची कै हमै बाई रा हाथ पील़ा कर दैणा चाहीजै। इण सारू एक दिन उवां व्यासजी नै कह्यो कै –
“जगत में खांचिया फिरो। डूंगर बल़ता निगै आवै पण पगै नीचै सिल़गती निगै नीं आवै। बाई मोट्यार माल हुई है अर थे आंधा हुयोड़ा हो। कांई आ बोल’र कैसी कै म्हनै हमे परणावो।”[…]

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માવલ સાબાણી અને આઇ રવેચીનો કુંભ (मावल साबाणी अने आई रवेची नो कुंभ)

કેરાકોટની રાજમહેલની અટારીયે આથમતાં સુર્યની ચર્ચા જોતી ચારણ આઇ જશી, રાણી સોનલ અને તેની દાસી ડાઈ એ ત્રણેય બેઠી હતી. એ દરમ્યાન સુર્યના કિરણમાંથી એક ફુલ મેડીની અટારીમાં પડયું. ફુલની સુવાસ ચોતરફ મધમધ ઊઠી. આઇ જેસી રાણી સોનલ અને દાસી ડાઈએ ક્રમશઃ ફુલ સુંઘે છે. ફુલની સુગંધ અલૌકિક ત્રણેય સખીઓ એ ફુલ સુંધી ઘોડારમાં નાંખે છે ત્યાં ઘોડારમાં નેત્રમ નામની ધોડી આ ફુલ સુંધે છે. આ ફુલમાં એવી દૈવીશક્તિ હતી કે જે સુંઘે તેને ઓધાન રહે. આથી ત્રણેય સખી અને ઘોડીને ઓધાન રહે છે. નવમે મહિને સોનલરાણીને પુત્ર લાખાનો જન્મ, ચારણઆઇ જેસીને પુત્ર માવલસીનો જન્મ, ડાઈબેનડીને કમલ દિકરીનો જન્મ અને ઘોડીને માણેરા વછેરાનો જન્મ થાય છે.આ ધટનાની ક્વિદંતી લોકોમાં ખુબજ પ્રચલીત છે.[…]

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शरणागत पंखी रै सारू मरणिया !!

महात्मा ईसरदासजी आपरी काल़जयी कृति ‘हाला-झाला रा कुंडलिया’ में लिखै कै “सिंह रा केश, नाग री मणि, वीरां रो शरणाई, सतवंती रा थण अर कृपण रो धन फखत उणां रै मरियां ईज दूजां रै हाथां पड़ै, जीवतां नीं। जे ऐ जीवता है ! अर कोई इणां री इण चीजा़ं रै हाथ घालै, तो घालणिये नै मरणो ईज पड़ै। उणां आ बात किणी अटकल़ पींजू डोढसौ री गत नीं लिखी बल्कि कानां सुणी अर आंख्यां देखी रै मेल़ सूं मांडी-

केहर केस भमंग मण, शरणाई सूहड़ांह।
सती पयोहर कृपण धन, पड़सी हाथ मूवांह।।[…]

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कूड़ लारै, धूड़!!

जोधपुर रै थल़वट इलाकै रो जुढियो गांम आपरी साहित्यिक अर सांस्कृतिक विरासत रै पाण चावो रह्यो है। इणी जुढिये में सोनथल़ी (एक धोरै रो नाम) माथै थल़वट री आराध्या देवी सैणीजी रो मढ(मंदिर) है–

धिन-धिन रै धोराह, वेदासधू विराजिया।
सकवी रह सोराह, सरण तिहारी सैणला।।

सैणीजी रै कारण ई रियासत काल़ में जुढियो प्रसिद्ध अर गजबंध गांम मानीजतो-

प्रथम शेरगढ परगनै, गजबंध जुढियो गांम।[…]

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स्वाभिमान और गौरव का बिंदु है जौहर

राजस्थान का नाम धारा-तीर्थ के रूप में विश्रूत रहा है। शौर्य और धैर्य का मणिकांचन संयोग कहीं देखने को मिलता था तो वो केवल यही धरती थी। ऐसे में कुछ सवाल उठते हैं कि फिर राजस्थान के रणबांकुरों को युद्ध में परास्त और यहां की वीरांगनाओं को जौहर की ज्वालाओं में क्यों झूलना(नहाना) पड़ा? क्या कारण था कि जिनकी असि-धाराओं के तेज मात्र से अरिदलों के हृदय कंपित हो उठते थे, उनको साका आयोजन करना पड़ता था?[…]

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