માવલ સાબાણી અને આઇ રવેચીનો કુંભ (मावल साबाणी अने आई रवेची नो कुंभ)

કેરાકોટની રાજમહેલની અટારીયે આથમતાં સુર્યની ચર્ચા જોતી ચારણ આઇ જશી, રાણી સોનલ અને તેની દાસી ડાઈ એ ત્રણેય બેઠી હતી. એ દરમ્યાન સુર્યના કિરણમાંથી એક ફુલ મેડીની અટારીમાં પડયું. ફુલની સુવાસ ચોતરફ મધમધ ઊઠી. આઇ જેસી રાણી સોનલ અને દાસી ડાઈએ ક્રમશઃ ફુલ સુંઘે છે. ફુલની સુગંધ અલૌકિક ત્રણેય સખીઓ એ ફુલ સુંધી ઘોડારમાં નાંખે છે ત્યાં ઘોડારમાં નેત્રમ નામની ધોડી આ ફુલ સુંધે છે. આ ફુલમાં એવી દૈવીશક્તિ હતી કે જે સુંઘે તેને ઓધાન રહે. આથી ત્રણેય સખી અને ઘોડીને ઓધાન રહે છે. નવમે મહિને સોનલરાણીને પુત્ર લાખાનો જન્મ, ચારણઆઇ જેસીને પુત્ર માવલસીનો જન્મ, ડાઈબેનડીને કમલ દિકરીનો જન્મ અને ઘોડીને માણેરા વછેરાનો જન્મ થાય છે.આ ધટનાની ક્વિદંતી લોકોમાં ખુબજ પ્રચલીત છે.[…]

» Read more

शरणागत पंखी रै सारू मरणिया !!

महात्मा ईसरदासजी आपरी काल़जयी कृति ‘हाला-झाला रा कुंडलिया’ में लिखै कै “सिंह रा केश, नाग री मणि, वीरां रो शरणाई, सतवंती रा थण अर कृपण रो धन फखत उणां रै मरियां ईज दूजां रै हाथां पड़ै, जीवतां नीं। जे ऐ जीवता है ! अर कोई इणां री इण चीजा़ं रै हाथ घालै, तो घालणिये नै मरणो ईज पड़ै। उणां आ बात किणी अटकल़ पींजू डोढसौ री गत नीं लिखी बल्कि कानां सुणी अर आंख्यां देखी रै मेल़ सूं मांडी-

केहर केस भमंग मण, शरणाई सूहड़ांह।
सती पयोहर कृपण धन, पड़सी हाथ मूवांह।।[…]

» Read more

कूड़ लारै, धूड़!!

जोधपुर रै थल़वट इलाकै रो जुढियो गांम आपरी साहित्यिक अर सांस्कृतिक विरासत रै पाण चावो रह्यो है। इणी जुढिये में सोनथल़ी (एक धोरै रो नाम) माथै थल़वट री आराध्या देवी सैणीजी रो मढ(मंदिर) है–

धिन-धिन रै धोराह, वेदासधू विराजिया।
सकवी रह सोराह, सरण तिहारी सैणला।।

सैणीजी रै कारण ई रियासत काल़ में जुढियो प्रसिद्ध अर गजबंध गांम मानीजतो-

प्रथम शेरगढ परगनै, गजबंध जुढियो गांम।[…]

» Read more

स्वाभिमान और गौरव का बिंदु है जौहर

राजस्थान का नाम धारा-तीर्थ के रूप में विश्रूत रहा है। शौर्य और धैर्य का मणिकांचन संयोग कहीं देखने को मिलता था तो वो केवल यही धरती थी। ऐसे में कुछ सवाल उठते हैं कि फिर राजस्थान के रणबांकुरों को युद्ध में परास्त और यहां की वीरांगनाओं को जौहर की ज्वालाओं में क्यों झूलना(नहाना) पड़ा? क्या कारण था कि जिनकी असि-धाराओं के तेज मात्र से अरिदलों के हृदय कंपित हो उठते थे, उनको साका आयोजन करना पड़ता था?[…]

» Read more

असही सही न जाय!

एक जमानो हो जद लोग चीकणी रोटी जीमता पण चीकणी बात करण सूं परहेज राखता। हर भजण अर हक बोलण में विश्वास राखता। अजोगती बात करणियो कोई धंतरसिंह क्यूं नीं हुवै, उणनै ई साच कैवता नीं संकीजता। आज जद आपां हर नाजोगी बात देख’र अथवा सुण’र बेहिचक कैय देवां कै – “बल़णदे नीं आपांरो कांई लेवै या आपां क्यूं किणी सूं बिनां लाभ खरगसो बांधां।”[…]

» Read more

डूंगरां ऊपरै छांह डाकी

कविवर नाथूसिंहजी महियारिया सही ई लिख्यो है कै भगती अर वीरता वंशानुगत नीं हुय’र फखत करै जिणरी हुवै-

जो करसी जिणरी हुसी, आसी बिन नूंतीह।
आ नह किणरै बापरी, भगती रजपूतीह।।

क्यूंकै फखत शस्त्र धारण सूं सूर अर गैणो पैरण सूं कोई हूर नीं हुवै-

भेख लियां सूं भगत नीं, होय न गैणै हूर।
पोथी सूं पंडित नहीं, नहीं शस्त्र सूं सूर।।[…]

» Read more

चुनौतियों के चक्रव्यूह में फंसे आज के विद्यार्थी एवं अभिभावक

यह चिरंतन सत्य है कि समय निरंतर गतिमान है और समय की गति के साथ सृष्टि के प्राणियों का गहन रिश्ता रहता है। सांसारिक प्राणियों में मानव सबसे विवेकशील होने के कारण समय के साथ वह अपनी कदम ताल मिलाते हुए विकास के नवीनतम आयाम छूने के लिए प्रयासरत्त रहता है। समय के बदलाव के साथ व्यक्ति की सोच, उसकी आवश्यकताएं, अपेक्षाएं, मान्यताएं तथा वर्जनाएं बदलती हैं। इसी बदलाव में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक तथा अन्यान्य जीवनमूल्यों में परिवर्तन होता है।[…]

» Read more

सूरां मरण सांम ध्रम साटै!!

राजस्थान रै मध्यकाल़ीन इतियास नै निष्पक्ष भाव सूं देखण अर पुर्नलेखन री दरकार है। क्यूंकै आज जिणगत युवापीढी में जीवणमूल्यां रै पेटे उदासीनता वापर रैयी है वा कोई शुभ संकेत री प्रतीक नीं है।
उण बखत लोग अभाव में हा पण एकदूजै सूं भाव अर लगाव अणमापै रो राखता। ओ वो बखत हो जद स्वामीभक्ति अर देशभक्ति एक दूजै रा पूरक गिणीजता हा। जिणांरै रगत में स्वामीभक्ति रैयी उणांरै ईज रगत में देशभक्ति रैयी। भलांई आपां आज इण बात नै थोड़ी संकीर्ण मानतां थकां व्यक्तिवाद नै पोखण वाल़ी कैय सकां पण आ बात तो मानणी ईज पड़सी कै उण मिनखां में त्याग, समर्पण, अर मरण नै सुधारण री अद्भुत ललक ही। इणी ललक रै पाण उवै आज ई खलक में आदरीजै।[…]

» Read more

सियावर रामचंद्र

बरसां सूं अजोध्या नगरी मांय उदासी छायोड़ी है। सगळा लोग-बाग आप-आपरै धरम-करम मांय रच्या-पच्या, आयै दिन रा काम-काज नीत-सास्तरां रै बतायै मुजब कर रिया है। घर-गिरस्थी वाळा लोग अतिथियां री सेवा, माता-पिता रो माण अर गुरुवां रो सनमान पूरै मनोयोग सूं करता आपरो जीवण जीवै। किणीं नैं किणीं सूं कोई अड़ी-ईसको नीं, कोई खींचताण नीं, कोई सिकवा-सिकायत नीं, कोई कोरट-कचेड़ी रो काम ई नीं।[…]

» Read more

કંઠ કહેણીના મશાલચી : મેરૂભા ગઢવી (લીલા)

મેઘાવી કંઠના ગાયક શ્રી મેરૂભા ગઢવીનો જન્મ સૌરાષ્ટ્રમાં લોકવાર્તાઓ દ્વારા લોકસાહિત્યના સંસ્કાર ચેતાવનારા છત્રાવા ગામના લોકસાહિત્યના આરાધક પિતા મેઘાણંદ ગઢવી લીલા શાખાના ચારણને ખોરડે માતા શેણીબાઈની કૂખે સંવત ૧૯૬૨ના ફાગણ સુદ ૧૪ ના રોજ થયો. ગામડા ગામની અભણ માતાએ ગળથુથીમાં જ ખાનદાની, સમાજસેવા અને ભક્તિના સંસ્કારો બાળકમાં રેડ્યા. ચાર ગુજરાતીનું અક્ષરજ્ઞાન પ્રાપ્ત કરી બાળક મેરૂભાએ શાળાને સલામ કરી અને પછી આછી-પાતળી ખેતીમાં જોડાયા. પિતાની વાર્તા કથની મુગ્ધભાવે અને અતૃપ્ત હૈયે માણતા મેરૂભા લોકસાહિત્યના સંસ્કારોના રંગે રંગાઈ ગયા.[…]

» Read more
1 2 3 18