देशभक्ति

कांईआप बता सको ?
कै
देशभक्ति रो दीप
किण विचारधारा रै वायरै सूं प्रजल़ै
अर
अरूड़ चानणो देवै?
अर
किण विचारधारा रै वायरै रै
दोटां सूं बुझै परो।
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हे दिव्यात्मा!

हे दिव्यात्मा!
म्हांरै कनै फखत
तनै झुकावण नै माथो है
कै है
थारी मीठोड़ी ओल़ूं में
आंख्यां सूं झारण आंसू
कै
काल़जो काठो कर’र
तनै कोई मोटो
बदल़ो मान’र
मोह चोरणो ई रह्यो है सारू म्हांरै तो![…]

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उण काल़ नैं दुरकार काढ्यो

आंधियां अटारी
खैंखाट करती
आवती
वैर साजण
मुरधरा सूं
गैंतूल़ लेयर धूड़ रा।
अर धूड़ जिण तो
आंखियां
हर एक री
भर दिया रावड़
दीवी कावड़[…]

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राज बदळियां के होसी

कांई फरक पड़ै कै राज किण रो है ?
राजा कुण है अर ताज किण रो है ?
फरक चाह्वो तो राज नीं काज बदळो !
अर भळै काज रो आगाज नै अंदाज बदळो !
फकत आगाज’र अंदाज ई नीं
उणरो परवाज बदळो !
आप – आप रा साज बदळो
न्यारा – न्यारा नखरा अर नाज बदळो !
इत्तो बदळ्यां पछै चाह्वो
तो राजा बदळो
चाह्वै राज बदळो‘र
चाह्वै समाज बदळो ।[…]

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बाप अर बोल!!

कांई तेजो जाट इणी धरा रो सपूत हो?
सुणण में तो आ ई आवै
पण मनण में नीं आवै।
आवै ई कीकर
वो मिनख हो
कै बजराग!
जिको मोत सूं मिलण
चार पाऊंडा
साम्हो गयो।[…]

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कांई आपां जमीर बेच चूका?

कांई आपां जमीर बेच चूका?
ओ खाली म्हारो अबल़ेखो ई है
कै आपनै ई लागै
म्हारी बात में
कठै ई तंत !!
कांई आपनै
नीं लागै
कै
आपां में अबै
नीं रह्यो जमीर जीवतो[…]

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कितरा धृतराष्ट्र ?

कितरा धृतराष्ट्र ?
लागै है डर
साच नै साच कैवण सूं
जोखिम रो काम है
साच रै सैमूंडै ऊभणो
साच नै आंच नीं!
आ बात साव कूड़ी लागै है
क्यूंकै
जद जद ई हुयो है
किणी रो साच सूं सैंमूंडो
तो ऊतरी है
मूंडै री आब […]

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अजै ई कर रह्यी है कल़ाप कविता!!

आद कवि रै 
करुण क्रंदन रै संजोग सूं
उपजी कविता !
अजै ई कर रह्यी कल़ाप!
कणै ई बुद्ध नै
थापण कै
कणै ई
उथापण रा!!
कर रह्यी है तरल़ा
कणै ई वामपंथ नै खंडण
कै
कणै ई
दक्षिणपंथ नै मंडण
रा!!
अधरबंब में अल़ूझी

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मैं विप्लव का कवि हूँ !

मैं विप्लव का कवि हूँ ! मेरे गीत चिरंतन।

मेरी छंदबद्ध वाणी में नहीं किसी कृष्णाभिसारिका के आकुल अंतर की धड़कन;
अरे, किसी जनपद कल्याणी के नूपुर के रुनझुन स्वर पर मुग्ध नहीं है मेरा गायन !

मैं विप्लव का कवि हूँ ! मेरे गीत चिरंतन।[…]

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भव का नव निर्माण करो हे !

भव का नव निर्माण करो हे !
यद्यपि बदल चुकी हैं कुछ भौगोलिक सीमा रेखाएँ;
पर घिरे हुए हो तुम अब भी इस घिसी व्यवस्था की बोदी लक्ष्मण लकीर से !
रुद्ध हो गया जीवन का अविकल प्रवाह तो;
और भर गया कीचड़ के लघु कृमि कीटों से गलित पुरातन संस्कृति का यह गन्दा पोखर ![…]

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