शरणाई राजपूत रै कारण अगन रो वरण

चारणां में बीठूजी री वंश परंपरा में गांम साठीका(बीकानेर) में बोहड़जी मोटा कवेसर हुया। इणां री ज वंश परंपरा में धींधोजी हुया। धींधोजी री वंश परंपरा में रासोजी धींधा हुया जिणांनै खाबड़ियां झिणकली(बाड़मेर) गांम दियो। कोई कैवै उदयसिंह खाबड़िया ओ गांम दियो तो कोई कैवै रिड़मल खाबड़िया ओ गांम दियो।

आं रासाजी री परंपरा में मेहाजी दूसलोत मोटा कवि हुया जिणांनै जोधपुर राव मालदेवजी खेड़ी गांम देय सम्मानित किया। इणी झिणकली गांम में आगै जायर महादानजी, भानोजी आद बीठू हुया। जोपियोड़ो कड़ूंबो अर भला मिनख। कनै घणी जमी घणो वित्त।[…]

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रंग मा पेमां रंग!!

बीकानेर रो दासोड़ी गांम जीवाणंदजी/ जीवराजजी/ जीयोजी रतनू नै बीकानेर राव कल्याणमलजी दियो। बात चालै कै जद आधै बीकानेर माथै जोधपुर रा राव मालदेवजी आपरी क्रूरता रै पाण कब्जो कर लियो। गढ में उणां आपरा खास मर्जीदान कूंपा मेहराजोत नै बैठा दिया जद कल्याणमलजी अठीनै-उठीनै इणां नै काढण खातर फिरै हा। जोग सूं आपरै कीं खास आदम्यां साथै बाप रै पासैकर निकल़ै हा जद बधाऊड़ा गांम में इणांनै जीवराजजी आसकरणोत गोठ करी। जीवराजजी रो व्यक्तित्व, वाकपटुता, मेहमाननवाजी आद सूं प्रभावित हुय’र कल्याणमलजी कह्यो कै- “बाजीसा आप तो बीकानेर म्हारै गुढै ई बसो! म्हैं आपनै उठै ई गांम देऊंला। आप आवजो।”[…]

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शूरवीर चारण कानाजी आढा द्वारा मित्र का वैर लेना – डॉ. नरेन्द्रसिंह आढा (झांकर)

।।शूरवीर चारण कानाजी आढा द्वारा आमेर के शासक सांगा को मारकर अपने मित्रवत् स्वामी करमचंद नरूका का वैर लेना।।

(सन्दर्भ: ख्यात देश दर्पण पृ स 28-29 कृत दयालदास सिंढायच व श्यामलदास जी दधवाडिया कृत वीर विनोद के भाग 3 के पृ स 1275)

बीकानेर की धरती के कानोजी आढा चारण जाति के बडे शूरवीर योद्धा थे कानोजी आढा दुरसाजी आढा की तरह कलम व कृपाण दोनो में सिद्धहस्त चारण थे। कानोजी अमल खूब खाते थे इनके अमल ज्यादा खाने से इनके भाईयों ने इन्हें घर से निकाल दिया। ये अमल की जुगाड में इधर उधर ठिकाणों में जाने लगे। घूमते हुए आमेर की सीमा में आ गये।[…]

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प्रथम राष्ट्र कवि व जनकवि दुरसाजी आढ़ा – डॉ. नरेन्द्र सिंह आढ़ा (झांकर)

दुरसाजी आढ़ा का जन्म चारण जाति में वि.स.1592 में माघ सुदी चवदस को मारवाड़ राज्य के सोजत परगने के पास धुन्धला गाँव में हुआ था। इनके पिताजी का मेहाजी आढ़ा हिंगलाज माता के अनन्य भक्त थे जिन्होंने पाकिस्तान के शक्ति पीठ हिंगलाज माता की तीन बार यात्रा की। मां हिंगलाज के आशीर्वाद से उनके घर दुरसाजी आढ़ा जैसे इतिहास प्रसिद्ध कवि का जन्म हुआ। गौतम जी व अढ्ढजी के कुल में जन्म लेने वाले दुरसाजी आढ़ा की माता धनी बाई बोगसा गोत्र की थी जो वीर एवं साहसी गोविन्द बोगसा की बहिन थी। भक्त पिता मेहाजी आढ़ा जब दुरसाजी आढ़ा की आयु छ वर्ष की थी, तब फिर से हिंगलाज यात्रा पर चले गये। इस बार इन्होनें संन्यास धारण कर लिया। […]

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सूजै जिसो नह कोई शेखो !

राजस्थान धरती रै जायां री आ तासीर है कै वो धर, धरम अर स्त्री रै माण सारू आपरो सीस शिव री माल़ में पिरोय गरबीजतो रह्यो है।

अगूण सूं आथूण अर उतराध सूं दिखणाद रै कूणै तांई इण धर रा जाया मरण सूं नीं संकिया। मरण ई ऐड़ो! जिणरै पाण आवण वाल़ी पीढी उवां री वीरता रा दाखला देवै अर पाखाण पूतलिया थाप आपरो सीस झुकाय कृतज्ञता ज्ञापित करै। सही ई है जिणां नै सुजस प्यारो हुवै उवै प्राण नै प्यारो नीं गिणै-

सुजस पियारा नह गिणै, सुजस पियारो ज्यांह।
सिर ऊपर रूठा फिरै, दई डरप्पै त्यांह।।

यूं तो ऐड़ै नामां री नामावली इतरी लंबी है, जिणां इण अवन नै आपरी मनसा, वाचा अर कर्मणा पावन करी अर जे कोई दूठ अपावन करण आयो तो उणरै आडो आय आपरो खांडो ताण सुजस खाटियो।[…]

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कांई आपरै आ मनगी कै म्है आपनै मार दूं ला?

भरमसूरजी रतनू आपरै समय रा मोटा कवि अर पूगता पुरुष हा। इणां नै मेड़ता रा राव जयमलजी मेड़तिया मौड़ी अर बासणी नामक दो गांम देय कुरब बधायो। भरमसूरजी रा डिंगल़ गीत उपलब्ध हैं। इणी रतनू भरमसूरजी री ई वंश परंपरा में ईसरदासजी रतनू हुया। जद अकबर चित्तौड़गढ माथै आक्रमण कियो उण बखत जयमलजी मेड़तिया री सेना में रतनू भरमसूरजी अर ईसरदासजी मौजूद हा। कह्यो जावै कै भरमसूरजी इण लड़ाई में वीरगति वरी–

चारण छत्री भाइयां, साच बोल संसार।
चढियो सूरो चीतगढ, अंग इधक अधिकार।।

जयमलजी मेड़तिया जैड़ै जबरेल वीर री वदान्य वीरता नै अखी राखण सारू ईसरदास जी ‘जयमल मेड़तिया रा कवत्त’ लिखिया। आ रचना डिंगल़ री महताऊ ऐतिहासिक रचना मानी जावै। रचना री एक बांनगी कवि री मेधा नै दरशावण सारू-[…]

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म्हांरा माथा ई रावल़ां सटै

मध्यकाल़ रा मिनख वाच-काछ निकलंक हुवता। आपरै गांम कै पडौसी माथै आफत आयां पाछ पगलिया नीं सिरकता बल्कि आगमना हुय आपरो माथो देवण में गुमेज मानता। जद ऐड़ै मिनखां री ऐड़ी बातां पढां कै सुणां तो इयां लागै कै वै मिनख जावता वै बातां अर बखत आपरै साथै लेयग्या।

ऐड़ी ई गीरबैजोग एक बात है मोरझर रै सुरताणिया पताजी वैरावत अर अकरी रै रतनू भोजराज खेंगारोत री।[…]

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सो सुधारण ! सो सुधारण!!

रातिघाटी के युद्ध में परास्त होकर बाबर का पुत्र कामरान राव जैतसी से भयातुर होकर भागा जा रहा था। किंवदंती है कि जब वो छोटड़िया गांव से निकल रहा था कि उसके मुकुट में लगी किरण(किलंगी) गिर गई। वो बीकानेरियों के शौर्य से इतना भीरू हो गया था कि उसने उस किरण को रुककर उठाना मुनासिब नहीं समझाऔर वो बिना उसकी परवाह किए अपनी राह चलता बना। यह गांव बीकानेर के संस्थापक राव वीका ने जीवराज सूंघा को इनायत किया था। कहतें हैं कि यहां छोटा मोयल रहा करता था। जब यह गांव सूंघों को मिला तो उसने इच्छा व्यक्त […]

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ऐतिहासिक तेमड़ाराय मंदिर देशनोक का करंड, रतनू आसराव नै दिया था अपनी बेटी को दहेज

जैसलमेर के महापराक्रमी वीर दुरजनशाल उर्फ दूदाजी जसौड़ को गद्दीनशीन करने में सिरुवा के रतनू आसरावजी का अविस्मरणीय योगदान रहा। दूदाजी भी कृतज्ञ नरेश थे, उन्होंने आसरावजी व उनकी संतति को हृदय से सम्मान दिया। कहतें कि एक बार दूदाजी अपनी ससुराल खींवसर गए हुए थे। खींवसर उन दिनों मांगलियों के क्षेत्राधिकार में था। वहां उनकी सालियों व सलहजों ने उनके साहस की परीक्षा लेने हेतु अपनी किसी सहेली के चोटी में गूंथने की आटी का सर्प बनाकर उनके शयनकक्ष के मार्ग में रख दिया। जब वे सोने जाने लगें तो उनके मार्ग में सर्पाकार वस्तु निगाह आई। उन्होंने बड़ी […]

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संवेदना रो प्रवाह!!

आज आपां अपणै आप नै आधुनिक कै विचारवान कैवण में अंकै ई नीं संकीजां पण जद कोई आपांनै पूछै कै आप में संवेदना जीवती है!!तो आपां छ दांत र मूंडो पोलो री गत में ज्यावां। ज्यूं-ज्यूं आपां आधुनिकता रो आवरण ओढण लागा बिंया-बिंया आपां में असंवेदनशीलता पग पसारण लागी। जद ई तो आपां रै पाड़ौस में एक कानी लास माथै कूका रोल़ो मचियोड़ो है तो दूजै कानी उणी लास माथै लोग आपरी रोट्यां सैकण में लागोड़ा है अर आपां बीच में कदै ई इनै मूंडो बताय भला बजां तो कदै ई बिनै मूंडो बताय चातरक बजां!!पण पैला लोगां री कैणी अर रैणी एक सरीखी होती। दूजै रै दुख में दुखी होवणो अर दूजै रै सुख मे सुखी होवणो उणां री आदत रो एक भाग हो, जिणनै छोडणो वे आपरो अभाग मानता। ऐड़ो ई एक किस्सो है चोवटियां जोश्यां रै होल़ी नीं मनावण रो।[…]

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