लेबा भचक रूठियो लालो

राजस्थान रो मध्यकाल़ीन इतियास पढां तो ठाह लागै कै अठै रै शासकां अर उमरावां चारण कवियां रो आदर रै साथै कुरब-कायदो बधाय’र जिणभांत सम्मान कियो वो अंजसजोग अर अतोल हो।

जैसल़मेर महारावल़ हरराजजी तो आपरै सपूत भीम नै अठै तक कह्यो कै ‘गजब ढहै कवराज गयां सूं, पल़टै मत बण छत्रपती।‘ तो महारावल़ अमरसिंहजी, कवेसरां रो जिणभांत आघ कियो उणसूं अभिभूत हुय’र कविराजा बांकीदासजी कह्यो- ‘माड़ेचा तैं मेलिया, आभ धूंवा अमरेस।‘[…]

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कवि सम्मान री अनूठी मिसाल

कवि मनमौजी अर कंवल़ै काल़जै रो हुवै। जिण मन जीत लियो कवि उणरो कायल। इण मामलै में वो छोटो कै मोटो नीं देखै। ओ ई कारण है कै वो निरंकुश कहीजै। बुधजी आसिया भांडियावास, कविराजा बांकीदासजी रा भाई पण उणां री ओल़खाण आपरी निकेवल़ी मतलब मनमौजी कवि रै रूप में चावा। एक’र बीमार पड़िया तो दरजी मयाराम उणां रा घणा हीड़ा किया। उणरी सेवा सूं रीझ’र बुधजी ‘दरजी मयाराम री बात‘ लिखी। आ बात राजस्थानी बात साहित्य री उटीपी रचनावां मांय सूं एक।[…]

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इण घर आई रीत!!

रजवट रै रुखाल़ै गोपाल़दासजी चांपावत रै वंशजां रो ठिकाणो हरसोल़ाव। इण ठिकाणै में महावीर बलूजी री वंश परंपरा। इण परंपरा नै पाल़णिया कई आंकधारी अर अखाड़ाजीत नर रत्न हुया, जिणां आपरै पुरखां री कीरत आपरी वीरत रै पाण कदीमी कायम राखी।
इणी ठिकाणै रै छुट भाइयां में महाराजा मानस़िहजी री बखत करणसिंहजी चांपावत(सालावास) आपरी आदू रीत अर तरवार सूं प्रीत पाल़णिया राजपूत हुया। […]

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तूं झल्लै तरवार!

राजस्थान रै इतिहास में जोधपुर राव चंद्रसेनजी रो ऊंचो अर निकल़ंक नाम है। अकबर री आंधी सूं अविचल़ हुयां बिनां रजवट रो वट रुखाल़ण में वाल़ां में सिरै नाम है चंद्रसेनजी रो। राष्ट्रकवि दुरसाजी आढा आपरै एक गीत में लिखै कै उण बखत दो आदमी ई ऐड़ा हा जिणां रो मन अकबर रो चाकर बणण सारू नीं डिगियो। एक तो महाराणा प्रताप अर दूजा राव चंद्रसेनजी जोधपुर-

अणदगिया तुरी ऊजल़ा असमर,
चाकर रहण न डिगियो चीत।
सारां हिंदूकार तणै सिर,
पातल नै चंद्रसेण पवीत।।[…]

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रतनू सलिया रंग!!

महाकवि सूर्यमल्लजी मीसण रो ओ दूहो–

हूं बलिहारी राणियां, जाया वंश छतीस।
सेर सलूणो चूण ले, सीस करै बगसीस।।

मध्यकालीन राजस्थान में घणै सूरां साच करर बतायो। उणां री आ आखड़ी ही कै किणी रो लूण हराम नीं करणो अथवा अवसर आया लूण ऊजाल़णो।

यूं तो ई पेटे घणा किस्सा चावा हुसी पण चाडी रै रूपावत खेतसिंहजी री लूण रै सटै नींबाज ठाकुर सुरताणसिंहजी रै साथै प्राण देवण री बात घणी चावी है—

चाडी धणी पखां जल़ चाढै,
रूपावत रण रसियो।
वर आ अपछर नै बैठ विमाणां,
विसनपुरी जा वसियो।।[…]

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राण मिल़ै किम राजसी?

राण मिल़ै किम राजसी?‘ आ एक ऐतिहासिक छप्पय री छूटती झड़ है। इण छप्पय रै रचणहार कवि रै रूप में भूलवश किणी कम्माजी आसिया तो किणी कम्मजी दधवाड़िया तो किणी भल़ै कीं लिखियो है पण दरअसल इण छप्पय रा रचणहार कवि कम्माजी नाई हा।

कम्माजी ‘जिल्या चारणवास’ रा रैवणवाल़ा हा। ‘जिल्या चारणवास’ कुचामण रै पाखती आयो थको रतनू चारणां री जागीर रो गांम हो।

ठावकै मिनखां री बस्ती हो जिल्या चारणवास। अठै रतनुवां रो सम्मान पाखती रा राजपूत सिरदार घणो राखता। […]

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हूं कांई? होको तो खुद डोकरो खांचै!

मेवाड़ धरा रा राणा जितरा सूरमापणै में अजरेल उतरा ई उदारता में टणकेल। महाराणा प्रताप जिता वीरता रा पूजारी,उतरा ई कविता रा पारखी। आजादी री अलख रै उण आगीवाण महासूरमै माथै समकालीन मोकल़ै कवियां काव्य रचियो।

एक दिन राणा रो दरबार लागोड़ो हो। कूंट-कूंट रा कवेसर आप आपरी गिरा गरिमा री ओल़खाण दे रह्या हा। उणी बखत कानैजी सांदू ई आपरो एक गीत पढियो। गीत सुण’र महाराणा घणा राजी हुया अर इणांनै गोढवाड़ रो गांम मिरगेसर इनायत कियो-

गोढाण धरा वाल्ही गढे,
आछा अरहर गांम अत।
परताप राण तांबा-पतर,
दियो मिरगेसर गांम दत।।[…]

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शरणाई राजपूत रै कारण अगन रो वरण

चारणां में बीठूजी री वंश परंपरा में गांम साठीका(बीकानेर) में बोहड़जी मोटा कवेसर हुया। इणां री ज वंश परंपरा में धींधोजी हुया। धींधोजी री वंश परंपरा में रासोजी धींधा हुया जिणांनै खाबड़ियां झिणकली(बाड़मेर) गांम दियो। कोई कैवै उदयसिंह खाबड़िया ओ गांम दियो तो कोई कैवै रिड़मल खाबड़िया ओ गांम दियो।

आं रासाजी री परंपरा में मेहाजी दूसलोत मोटा कवि हुया जिणांनै जोधपुर राव मालदेवजी खेड़ी गांम देय सम्मानित किया। इणी झिणकली गांम में आगै जायर महादानजी, भानोजी आद बीठू हुया। जोपियोड़ो कड़ूंबो अर भला मिनख। कनै घणी जमी घणो वित्त।[…]

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रंग मा पेमां रंग!!

बीकानेर रो दासोड़ी गांम जीवाणंदजी/ जीवराजजी/ जीयोजी रतनू नै बीकानेर राव कल्याणमलजी दियो। बात चालै कै जद आधै बीकानेर माथै जोधपुर रा राव मालदेवजी आपरी क्रूरता रै पाण कब्जो कर लियो। गढ में उणां आपरा खास मर्जीदान कूंपा मेहराजोत नै बैठा दिया जद कल्याणमलजी अठीनै-उठीनै इणां नै काढण खातर फिरै हा। जोग सूं आपरै कीं खास आदम्यां साथै बाप रै पासैकर निकल़ै हा जद बधाऊड़ा गांम में इणांनै जीवराजजी आसकरणोत गोठ करी। जीवराजजी रो व्यक्तित्व, वाकपटुता, मेहमाननवाजी आद सूं प्रभावित हुय’र कल्याणमलजी कह्यो कै- “बाजीसा आप तो बीकानेर म्हारै गुढै ई बसो! म्हैं आपनै उठै ई गांम देऊंला। आप आवजो।”[…]

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शूरवीर चारण कानाजी आढा द्वारा मित्र का वैर लेना – डॉ. नरेन्द्रसिंह आढा (झांकर)

।।शूरवीर चारण कानाजी आढा द्वारा आमेर के शासक सांगा को मारकर अपने मित्रवत् स्वामी करमचंद नरूका का वैर लेना।।

(सन्दर्भ: ख्यात देश दर्पण पृ स 28-29 कृत दयालदास सिंढायच व श्यामलदास जी दधवाडिया कृत वीर विनोद के भाग 3 के पृ स 1275)

बीकानेर की धरती के कानोजी आढा चारण जाति के बडे शूरवीर योद्धा थे कानोजी आढा दुरसाजी आढा की तरह कलम व कृपाण दोनो में सिद्धहस्त चारण थे। कानोजी अमल खूब खाते थे इनके अमल ज्यादा खाने से इनके भाईयों ने इन्हें घर से निकाल दिया। ये अमल की जुगाड में इधर उधर ठिकाणों में जाने लगे। घूमते हुए आमेर की सीमा में आ गये।[…]

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