साख अर प्रीत

यूं तो साख(रिश्ता, रक्त-संबंध) सोनो अर प्रीत पीतल़ मानीजै। देवकरणजी बारठ ईंदोकली आपरी रचना ‘साख-प्रीत समादा’ में कह्यो है–

साख कहै सुण प्रीत सयाणी,
लड़तां थनै न आवै लाज।
सोनो साख प्रीत पीतल सुण,
इल़ पर चलै कहावत आज।।

साख रो ओ ओल़भो सुण’र प्रीत पड़ुत्तर देवै-[…]

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जेठवा री बात में कतिपय भ्रामक धारणाएं – श्री कैल़ाश दान उज्ज्वल आईएएस (रिटायर्ड)

‘चारण साहित्य का इतिहास’ नामक शोध ग्रन्थ लिख कर चारण साहित्य पर कालजयी व प्रणम्य कार्य करने वाले डॉ. मोहनलाल जिज्ञासु‘सौराष्ट्र नी रसधार’ के लेखक श्री झवेरचंद मेघाणी जैसे मनीषियों को सादर वंदन।
अस्तु इसी साहित्य इतिहास में एक बहुत बड़ी भूल हुई है – “ऊजळी-जेठवा री बात” इसमें ऊजळी को कवयित्री मानकर उसका परिचय तथा काव्य बांनगी भी दी गई है। यह भूल जिज्ञासुजी ने मेघाणीजी को आधार मानकर की थी। मेघाणीजी ने भी यह भूल जानबूझकर नहीं की अपितु विभिन्न कहानियों का संकलन करते समय अपवादस्वरूप हो गई।
इसी भूल पर राजस्थानी साहित्य के दिग्गज विद्वान श्रद्धेय कैलासदानजी उज्ज्वल ने शोध पत्रिका ‘विश्वंभरा’ अप्रैल-जून 1994 में एक शोध लेख लिखा था। जिसमें शोध के प्रतिमानों के आधार पर तथ्यात्मक दृष्टि से व्यापक प्रकाश डाला गया है।[…]

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पारख पहचाणीह !

मध्यकाल़ीन राजस्थान रो इतियास पढां तो कदै कदै ई आपांनै लागै कै केई वीरां अर त्यागी मिनखां साथै न्याय नीं हुयो। इण कड़ी में आपां मारवाड़ रो इतियास पढां तो महाराजा जसवंतसिंहजी प्रथम रो जद देवलोक हुयो अर उणांरै कुंवर अजीतसिंहजी नै क्रूर ओरंगजेब सूं बचावण अर दिल्ली सूं बारै सुरक्षित काढण री नौबत आई। उण बखत उठै कनफाड़ै जोगी रो रूप धार आपरी छाबड़ी में छिपाय अजीतसिंहजी नै छानै-मानै काढणियै जिण मिनखां रा नाम आपांरै साम्हीं आवै उणांमें एक नाम है मनोहरदास खीची अर दूजो नाम है मनोहरदास नांधू।[…]

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लेबा भचक रूठियो लालो

राजस्थान रो मध्यकाल़ीन इतियास पढां तो ठाह लागै कै अठै रै शासकां अर उमरावां चारण कवियां रो आदर रै साथै कुरब-कायदो बधाय’र जिणभांत सम्मान कियो वो अंजसजोग अर अतोल हो।

जैसल़मेर महारावल़ हरराजजी तो आपरै सपूत भीम नै अठै तक कह्यो कै ‘गजब ढहै कवराज गयां सूं, पल़टै मत बण छत्रपती।‘ तो महारावल़ अमरसिंहजी, कवेसरां रो जिणभांत आघ कियो उणसूं अभिभूत हुय’र कविराजा बांकीदासजी कह्यो- ‘माड़ेचा तैं मेलिया, आभ धूंवा अमरेस।‘[…]

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कवि सम्मान री अनूठी मिसाल

कवि मनमौजी अर कंवल़ै काल़जै रो हुवै। जिण मन जीत लियो कवि उणरो कायल। इण मामलै में वो छोटो कै मोटो नीं देखै। ओ ई कारण है कै वो निरंकुश कहीजै। बुधजी आसिया भांडियावास, कविराजा बांकीदासजी रा भाई पण उणां री ओल़खाण आपरी निकेवल़ी मतलब मनमौजी कवि रै रूप में चावा। एक’र बीमार पड़िया तो दरजी मयाराम उणां रा घणा हीड़ा किया। उणरी सेवा सूं रीझ’र बुधजी ‘दरजी मयाराम री बात‘ लिखी। आ बात राजस्थानी बात साहित्य री उटीपी रचनावां मांय सूं एक।[…]

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इण घर आई रीत!!

रजवट रै रुखाल़ै गोपाल़दासजी चांपावत रै वंशजां रो ठिकाणो हरसोल़ाव। इण ठिकाणै में महावीर बलूजी री वंश परंपरा। इण परंपरा नै पाल़णिया कई आंकधारी अर अखाड़ाजीत नर रत्न हुया, जिणां आपरै पुरखां री कीरत आपरी वीरत रै पाण कदीमी कायम राखी।
इणी ठिकाणै रै छुट भाइयां में महाराजा मानस़िहजी री बखत करणसिंहजी चांपावत(सालावास) आपरी आदू रीत अर तरवार सूं प्रीत पाल़णिया राजपूत हुया। […]

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रतनू सलिया रंग!!

महाकवि सूर्यमल्लजी मीसण रो ओ दूहो–

हूं बलिहारी राणियां, जाया वंश छतीस।
सेर सलूणो चूण ले, सीस करै बगसीस।।

मध्यकालीन राजस्थान में घणै सूरां साच करर बतायो। उणां री आ आखड़ी ही कै किणी रो लूण हराम नीं करणो अथवा अवसर आया लूण ऊजाल़णो।

यूं तो ई पेटे घणा किस्सा चावा हुसी पण चाडी रै रूपावत खेतसिंहजी री लूण रै सटै नींबाज ठाकुर सुरताणसिंहजी रै साथै प्राण देवण री बात घणी चावी है—

चाडी धणी पखां जल़ चाढै,
रूपावत रण रसियो।
वर आ अपछर नै बैठ विमाणां,
विसनपुरी जा वसियो।।[…]

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राण मिल़ै किम राजसी?

राण मिल़ै किम राजसी?‘ आ एक ऐतिहासिक छप्पय री छूटती झड़ है। इण छप्पय रै रचणहार कवि रै रूप में भूलवश किणी कम्माजी आसिया तो किणी कम्मजी दधवाड़िया तो किणी भल़ै कीं लिखियो है पण दरअसल इण छप्पय रा रचणहार कवि कम्माजी नाई हा।

कम्माजी ‘जिल्या चारणवास’ रा रैवणवाल़ा हा। ‘जिल्या चारणवास’ कुचामण रै पाखती आयो थको रतनू चारणां री जागीर रो गांम हो।

ठावकै मिनखां री बस्ती हो जिल्या चारणवास। अठै रतनुवां रो सम्मान पाखती रा राजपूत सिरदार घणो राखता। […]

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हूं कांई? होको तो खुद डोकरो खांचै!

मेवाड़ धरा रा राणा जितरा सूरमापणै में अजरेल उतरा ई उदारता में टणकेल। महाराणा प्रताप जिता वीरता रा पूजारी,उतरा ई कविता रा पारखी। आजादी री अलख रै उण आगीवाण महासूरमै माथै समकालीन मोकल़ै कवियां काव्य रचियो।

एक दिन राणा रो दरबार लागोड़ो हो। कूंट-कूंट रा कवेसर आप आपरी गिरा गरिमा री ओल़खाण दे रह्या हा। उणी बखत कानैजी सांदू ई आपरो एक गीत पढियो। गीत सुण’र महाराणा घणा राजी हुया अर इणांनै गोढवाड़ रो गांम मिरगेसर इनायत कियो-

गोढाण धरा वाल्ही गढे,
आछा अरहर गांम अत।
परताप राण तांबा-पतर,
दियो मिरगेसर गांम दत।।[…]

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कहां वे लोग, कहां वे बातें ?

।।16।।
हिम्मत और भ्रातृत्व!

राजस्थानी में एक कहावत है कि ‘नर नानाणै अर धी दादाणै।’ वास्तव में हम प्राचीन काल से लेकर अद्यावधि तक ऐसे लोगों पर दृष्टिपात करें तो यह कहावत सत्य प्रतीत होती है। हमारे गांव में मुरल़जी अगरजी के हुए थे। उनका ससुराल सींथल पीथों के बास में सत्तीदानजी के घर था। विदित रहे कि सत्तीदानजी आदि पांच भाई थे और पांडव कहलाते थे। सत्तीदानजी शक्तिशाली पुरूष थे जिनके अनेक किस्से प्रसिद्ध हैं। इन्हीं सत्तीदानजी की पुत्री मोहनबाई हमारे गांव के मुरल़जी(मुरलीदानजी) को ब्याही थी।[…]

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