मूऴजी करमसोत रो मरसियो – लाऴस उमरदानजी रो कह्यौ

गाँव धणारी के राठौड़ मूऴजी करमसोत, जोधपुर महाराजा जसवन्तसिंह द्वितीय के समय नागौर के हाकिम थे, वे बहुत उदारमना एंव काव्य-प्रेमी तथा चारणों का अति-विशिष्ठ सम्मान करने वाले व्यक्ति थे। उन्हे नागौर किले में गड़ा हुआ धन मिला था, अतः उन्होने अपनी दाढी छंटाने के उत्सव पर 151 ऊँट तत्कालीन प्रसिध्द चारण कवियों को भेंट-स्वरूप उनके घर पर भेजे थे। “वीरविनोद” (कर्णपर्व) के रचयिता महाकवि स्वामी गणेशपुरीजी महाराज ने भी इस दानवीर की प्रशंसा में यह दोहा कहा था-

।।दोहा।।
सांगै री कांबऴ सही, हाड दाधिच कहाय।
करहा मूऴ कमंध रा, जातां जुगां न जाय।।[…]

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कहाँ वे लोग कहाँ वे बातें (गाँव सींथल का एक वृतांत) – सुरेश सोनी (सींथल)

आज आपके सींथल का एक वृतान्त पेश करता हूं –
सींथल गांव किसी भी कालखंड में परिचय का मोहताज नहीं रहा है, क्योंकि हर युग ने इस गांव की उर्वरा भूमि पर प्रतिभावानों, बुद्धिमानों, व्यापारियों, समर्थों व श्रेष्ठों की उत्पत्ति मन लगाकर की है।
यहां के हजारों किस्से बीकानेर, शेखावाटी, मारवाड़ व मेवाड़ तक के गांवों की हथाइयों में आज भी कहे जाते हैं और उन किस्सों के नायक आज भले ही इतिहास के अंग बन गए हैं, मगर लोगों की जुबानों पर आज भी भली-भांति जिन्दा हैं।
बात उस जमाने की है, जब मेरा तो जन्म भी नहीं हुआ था। गांव के किसरावतों के बास में रहने वाले कालूदानजी ‘बडोजी’ गांव के मौजीज आदमी हुआ करते थे।[…]

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कविता रो प्रभाव

दूहो दसमो वेद,
समझै तैनै साल्है।

काव्य मर्मज्ञां दूहै नै दसमे वेद री संज्ञा दी अर कह्यो कै ओ फखत उणरै काल़जै नै ईज छूवै जिको इणरो मर्म जाणतो हुवै !नीतर आंधै कुत्तै खोल़ण ही खीर वाल़ी बात है। जिणांरै सातै सुआवड़ी हुवै उणांरै दूहे रो मर्म नैड़ैकर ई नीं निकल़ै पण जिकै रै नैड़ैकर निकल़ै, उणनै ओ चित नै चकित करै तो साथै ई चैन ई देवै। आ ई नीं ओ उणरै दिल में दरद उपावै तो साथै ई दवा पण करै-

दूहो चित चक्रित करै, दूहो चित रो चैन।
दूहो दरद उपावही, दूहो दारू ऐन।।[…]

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कूड़ लारै, धूड़!!

जोधपुर रै थल़वट इलाकै रो जुढियो गांम आपरी साहित्यिक अर सांस्कृतिक विरासत रै पाण चावो रह्यो है। इणी जुढिये में सोनथल़ी (एक धोरै रो नाम) माथै थल़वट री आराध्या देवी सैणीजी रो मढ(मंदिर) है–

धिन-धिन रै धोराह, वेदासधू विराजिया।
सकवी रह सोराह, सरण तिहारी सैणला।।

सैणीजी रै कारण ई रियासत काल़ में जुढियो प्रसिद्ध अर गजबंध गांम मानीजतो-

प्रथम शेरगढ परगनै, गजबंध जुढियो गांम।[…]

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गैली दादी!

आथूणै राजस्थान री धरा वास्तव में सिद्धां, सूरां, सतियां, जतियां री धरा है। बांठै-बांठै कन्नै लोक-निर्मित उण महामनां री कीरत रा कमठाण, इण बात री साख भरै कै-

कीरत महल अमर कमठाणा।

लोकहितार्थ जीवण जीवणियां अर अरपण करणियां रो जस सदैव जनकंठां में ई गूंजतो सुणीजै, क्यूंकै लोक कदै ई गुणचोर नीं हुवै अर साथै ई लोक जात रो पूजक नीं, बल्कि गुणां ग्राहक हुवै-

गुण नै झुरूं गंवार, जात न झींकूं जेठवा।[…]

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धुर पैंड़ न हालै माथौ धूंणे (गीत घोड़ा रैं ओळभा रौ) – ओपा जी आढ़ा

देवगढ़ के कुंवर राघवदेव चूंडावत ने ओपा आढ़ा को एक घोड़ा उपहार में दिया। जब वह इसको लेकर रवाना हुआ तो घोड़े ने अपने सही रंग बता दिये। प्रस्तुत गीत में घोड़े के सभी अवगुण बताते हुए राघवदेव को कड़ा उपालम्भ दिया हैं।

धुर पैंड़ न हालै माथौ धूंणे,
हाकूं कैण दिसा हे राव।
दीधौ सौ दीठो राघवदा,
पाछो लै तो लाखपसाव।।१[…]

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असही सही न जाय!

एक जमानो हो जद लोग चीकणी रोटी जीमता पण चीकणी बात करण सूं परहेज राखता। हर भजण अर हक बोलण में विश्वास राखता। अजोगती बात करणियो कोई धंतरसिंह क्यूं नीं हुवै, उणनै ई साच कैवता नीं संकीजता। आज जद आपां हर नाजोगी बात देख’र अथवा सुण’र बेहिचक कैय देवां कै – “बल़णदे नीं आपांरो कांई लेवै या आपां क्यूं किणी सूं बिनां लाभ खरगसो बांधां।”[…]

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भगू पारस भेट

यूं तो साख (रिश्ता, रक्त-संबंध) सोनो अर प्रीत पीतल़ मानीजै। इण विषय में ओ कैताणो चावो है- ‘साख सोनो अर प्रीत पीतल़।’ आ ई बात देवकरणजी बारठ ईंदोकली आपरी रचना ‘साख-प्रीत समादा’ में कैयी है–

साख कहै सुण प्रीत सयाणी,
लड़तां थनै न आवै लाज।
सोनो साख प्रीत पीतल सुण,
इल़ पर चलै कहावत आज।।

साख रो ओ ओल़भो सुण’र प्रीत जिको पड़ुत्तर दियो उवै उल्लेखणजोग है-[…]

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जेठवा री बात में कतिपय भ्रामक धारणाएं – श्री कैल़ाश दान उज्ज्वल आईएएस (रिटायर्ड)

‘चारण साहित्य का इतिहास’ नामक शोध ग्रन्थ लिख कर चारण साहित्य पर कालजयी व प्रणम्य कार्य करने वाले डॉ. मोहनलाल जिज्ञासु‘सौराष्ट्र नी रसधार’ के लेखक श्री झवेरचंद मेघाणी जैसे मनीषियों को सादर वंदन।
अस्तु इसी साहित्य इतिहास में एक बहुत बड़ी भूल हुई है – “ऊजळी-जेठवा री बात” इसमें ऊजळी को कवयित्री मानकर उसका परिचय तथा काव्य बांनगी भी दी गई है। यह भूल जिज्ञासुजी ने मेघाणीजी को आधार मानकर की थी। मेघाणीजी ने भी यह भूल जानबूझकर नहीं की अपितु विभिन्न कहानियों का संकलन करते समय अपवादस्वरूप हो गई।
इसी भूल पर राजस्थानी साहित्य के दिग्गज विद्वान श्रद्धेय कैलासदानजी उज्ज्वल ने शोध पत्रिका ‘विश्वंभरा’ अप्रैल-जून 1994 में एक शोध लेख लिखा था। जिसमें शोध के प्रतिमानों के आधार पर तथ्यात्मक दृष्टि से व्यापक प्रकाश डाला गया है।[…]

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पारख पहचाणीह !

मध्यकाल़ीन राजस्थान रो इतियास पढां तो कदै कदै ई आपांनै लागै कै केई वीरां अर त्यागी मिनखां साथै न्याय नीं हुयो। इण कड़ी में आपां मारवाड़ रो इतियास पढां तो महाराजा जसवंतसिंहजी प्रथम रो जद देवलोक हुयो अर उणांरै कुंवर अजीतसिंहजी नै क्रूर ओरंगजेब सूं बचावण अर दिल्ली सूं बारै सुरक्षित काढण री नौबत आई। उण बखत उठै कनफाड़ै जोगी रो रूप धार आपरी छाबड़ी में छिपाय अजीतसिंहजी नै छानै-मानै काढणियै जिण मिनखां रा नाम आपांरै साम्हीं आवै उणांमें एक नाम है मनोहरदास खीची अर दूजो नाम है मनोहरदास नांधू।[…]

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