सींथल़-सुजस इकतीसी

।।दूहा।।
सुकवी संतां सूरमां, साहूकार सुथान।
सांसण सींथळ है सिरै, थळ धर राजस्थान।।1

वंश वडो धर वीठवां, गोहड़ भो गुणियाण।
जिण घर धरमो जलमियो, महि धिन खाटण माण।।2

धरमै रो बधियो धरम, भोम पसरियो भाग।
जांगल़पत गोपाल़ जो, उठनै करतो आघ।।3

धरमावत मेहे धरा, कीरत ली कवराव।
सांगट देव हमीर सा, आसै जिसा सुजाव।।4[…]

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रंग मा पेमां रंग!!

बीकानेर रो दासोड़ी गांम जीवाणंदजी/ जीवराजजी/ जीयोजी रतनू नै बीकानेर राव कल्याणमलजी दियो। बात चालै कै जद आधै बीकानेर माथै जोधपुर रा राव मालदेवजी आपरी क्रूरता रै पाण कब्जो कर लियो। गढ में उणां आपरा खास मर्जीदान कूंपा मेहराजोत नै बैठा दिया जद कल्याणमलजी अठीनै-उठीनै इणां नै काढण खातर फिरै हा। जोग सूं आपरै कीं खास आदम्यां साथै बाप रै पासैकर निकल़ै हा जद बधाऊड़ा गांम में इणांनै जीवराजजी आसकरणोत गोठ करी। जीवराजजी रो व्यक्तित्व, वाकपटुता, मेहमाननवाजी आद सूं प्रभावित हुय’र कल्याणमलजी कह्यो कै- “बाजीसा आप तो बीकानेर म्हारै गुढै ई बसो! म्हैं आपनै उठै ई गांम देऊंला। आप आवजो।”[…]

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चारणों के गाँव – जिले वार सम्पूर्ण लिस्ट

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चारणों के गाँव – थेरासणा

ई.स.1755 में मेवाड की राजधानी उदयपुर की गद्दी पर महाराणा जगतसिंह जी विराजमान थे। उस समय उदयपुर के राजकवि ठा.सा. श्री गोपालसिंह जी सिंहढायच थे। उनका परिवार कुम्भलगढ के पास मण्डा नामक गाँव में रहता था (यह गाँव जोधपुर के राजा नाहरराव ने ठा.सा.श्री नरसिंह जी सिंहढायच को जागीर में दिया था) उस समय ईडर के राजा राव रणमल थे और ईडर के राजकवि श्री सांयोजी झुला थे। वो ईडर से उत्तर दिशा मे श्री भवनाथ जी के मंदिर के पास कुवावा नामक गाँव है में रहते थे। सांयोजी बहुत बडे संत और कृष्ण भक्त थे। इनके बृज की यात्रा के लिए निकलने की बात ईडर के राव रणमल जी को पता लगी तो वे भी उनको मिलने हेतु उनके पीछे यात्रा पे निकल पड़े। […]

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चारणों के गाँव – नोख / बासणी (कवियान)

नोख (कवियान) चारणो की जागीरो में से एक ऐसी जागीर है जो एक बहुत बड़े राजपूती सँघर्ष के फलस्वरुप अस्तित्व मे आयी। नोख एक राजपूत और एक चारण कवि की घनिष्ठ मित्रता का परिणाम है। आज राजस्थान राज्य के पाली जिले मे राजपूतों की उदावत खाँप का प्रभुत्व है। ये महान वीर यशस्वी राव उदाजी के वँशज है। राव उदाजी जोधपुर के सँस्थापक महावीर जोधाजी के पौत्र थे। राव उदाजी और खेतसी जी कविया की बहुत अच्छी मित्रता थी, ये मित्रता चँदरवरदाई और सम्राट पृथ्वीराज चौहान की तरह थी। राव उदाजी और खेतसीजी दोनो उस वक्त जवान थे। वे हर वक्त […]

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चारणों के गाँव – हरणा, मोलकी तथा हाड़ोती के अन्य मीसण गाँवों का इतिहास

बूंदी राज्य में बारहट पद सामोर शाखा के चारणों के पास था परन्तु भावी के कर्मफल से उनकी कोई संतान नहीं हुई तथा कालांतर में उनका वंश समाप्त हो गया।
इस समय मेवाड़ में दरबारी कवि ईसरदास मीसण थे जिनके पूर्वज सुकवि भानु मीसण से उनके सत्यवक्ता बने रहकर मिथ्या भाषण करने के अनुरोध को नहीं मानने की जिद से कुपित होकर चित्तौड़ के तत्कालीन राणा विक्रमादित्य ने सांसण की जागीर के मुख्य गाँव ऊंटोलाव समेत साथ के सभी उत्तम गावों की जागीर छीन कर केवल रीठ गाँव उनके लिए छोड़ दिया था। […]

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गडरा

बाड़मेर जिले का सीमांत गांव गडरा, जो कि न केवल हमारे देश की सीमा पर स्थित सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं बल्कि इसका इतिहास भी मातृत्व, वीरता युक्त शान्ति और सह-अस्तित्व की भावना के कारण आज भी सुप्रसिद्ध हैं। वर्तमान में गडरा रोड़ भारत में हैं, जबकि गडरा सीटी पाकिस्तान में स्थित हैं जो कि आजादी से पहले एक ही हुआ करता था। इसका उल्लेख कुछ इस तरह मिलता हैं कि किसी समय में यहाँ घना जंगल था जिसमें भयंकर जंगली और विषेले जानवर रहते थे। जंगल के आस पास ढाणियों में रहने वाले लोग भेड़-बकरियाँ रखते थे। बताते हैं […]

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सांडा

जैसलमेर जिले की फतेहगढ़ तहसील के अंतर्गत डांगरी ग्राम पंचायत का यह गाँव सांडा जिला मुख्यालय से 75 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। चारों तरफ पसरी रेतीली धरती पर साण्डा गाँव कई ऎतिहासिक व सामाजिक मिथकों से जुड़ा हुआ है। साण्डा नामक पालीवाल द्वारा बसाये जाने की वजह से इस गांव को साण्डा कहा जाता है। यहां उस जमाने में पालीवालों की समृद्ध बस्तियां थीं लेकिन एक ही दिन में पलायन करने की वजह से यह पूरा क्षेत्र वीरान हो गया। पालीवाल सभ्यता का दिग्दर्शन कई शताब्दियों पुराना यह गाँव पालीवाल सभ्यता का भी प्रतीक है, जहाँ आज भी पालीवाल […]

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दासोड़ी

राजस्थान सरकार गांव-गांव रो इतिहास लिखावण री सोच रैयी है। आ बात वास्तव में सरावणजोग है। इण दिशा में म्है, कीं छप्पय आपरी निजर कर रैयो हूं। इण छप्पयां रै मांय म्है म्हांरै बडेरां नैं मिलियै गांवां री विगत बतावण री खेचल करी है। परमवीर देवराज भाटी रै प्राणां री रक्षा करणियै द्विजवर वसुदेवायत पुरोहित रै बेडै रतन री संतति चारणां में रतनू बाजै। इणी रतनू वंश परंपरा में म्हांरा बडेरा आसरावजी रतनू (सिरुवो) होया जिकां स्वामीभक्ति री मिसाल कायम करतां थकां राव जगमाल मालावत सूं जैसलमेर री रक्षा करी अर दूदा जसहड़ोत नै जैसलमेर रावल़ बणावण में महताऊ भूमिका […]

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