स्तुति श्री करणी माँ की – कवि जयसिंह सिढ़ायच (मण्डा-राजसमन्द)

।। छन्द – नाराच।।
नमो अनन्द कन्द अम्ब, मात मैह नन्दिनी।
निकन्द फन्द दास द्वन्द, विश्व सर्व वन्दिनी।।
कृपा निधाण किन्नियांण, बीस पाण धारणी।
नमौ धिराण दैशणोक, तीन लौक तारणी।।
माँ, सर्व काज सारणी।।१।।[…]

» Read more

जुड़ै जवान जोरवान

।।छंद – नाराच।।
मरट्ट धार खाय खार, आर पार उच्चरै।
बडी विचार ले उडार, व्योम वाट विच्चरै।
चँडी उचार बार बार, मार शत्रु मान रा।
जुड़ै जवान जोरवान, हेर हिंदथांन रा।।1।।[…]

» Read more

विरछ – वंदना

।।छंद – नाराच।।
लगाय नेह लोयणां, उगाय रूंख ऐम तूं।
हमेस पोख हेर-हेर, पाल़ नित्त प्रेम तूं।
सनेह नीर सीचतां, मनां हरीत मोहणा।
बणै विरच्छ बोहरंग, सो सुरंग सोहणा।।१[…]

» Read more

आह्वान – कवि रिड़मलदान चारण

(छंद-नाराच/पंचचामर)
प्रचंड भुज्जदंड से,धरा अखंड तोल दे।
कराल रूप काल सा, त्रिकाल देख डोल दे।
भुला अतीत-रीत ना, निशंक जीत बोल दे।
पुकार आन-बान की, कृपाण म्यान खोल दे।[…]

» Read more

खोडियार माताजी री स्तुति – हेमुजी चारण

।।छंद – नाराच।।
प्रवाळ नंग धाम पें, बणे सु गोख छब्बियं।
जळे सु जोत है ऊधोत, कोटीरुप से कियं।
अरक्कजा सुधा अगे, चडे सिंदुर चाचरी।
नमो सगत्त नित, नृत्त खोडली रमे खरी।।1।।[…]

» Read more

गूदड़ी वाले बाबा गणेशदास जी !!

आज से लगभग अस्सी नब्बे वर्ष पहले एक महान संत जयपुर के आसपास विद्यमान थे, जो गूदड़ीवाले बाबा के नाम से जाने जाते थे। उनका नाम गणेशदासजी था। वह दादूपंथी महात्मा थे। उस समय में जयपुर के प्रसिध्द गणमान्य लोगौं में बाबा की बड़ी मान्यता व स्वीकार्यता थी, तथा बाबा भी बड़े त्यागी-तपस्वी मनीषी थे। उस समय के संस्कृत के उद्भट विद्वान पं.वीरेश्वरजी शास्त्री ने बाबा का स्तवन इस प्रकार किया था:

निर्द्वंन्द्वो निःस्पृहः शान्तो गणेशः साधुतल्लजः
सानन्दः सर्वदा कन्थाकौपीनामात्रसंग्रहः
अर्थातः बाबा गणेशदास कैसे है निर्द्वन्द्व अर्थात ब्रह्मैक्यभाव-प्राप्त, सुख दुःखादि रहित व किसी प्रकार की इच्छामुक्त, शान्त वृति के साधुजनो में परमश्रेष्ठ व ब्रह्मानन्द में मगन रहते हैं व मात्र[…]

» Read more

राजल माताजी चराडवा वाळी री स्तुति – कवि जीवणदानजी डोसाभाइ झीबा (धांगध्रा)

॥छंद नाराच॥
मंदोर मस्त जोरका भरेल दैत मारणी।
प्रचंड दुष्ट झुंड पै त्रिशूल की प्रहारणी।
जिन्नात भूत प्रेत को हराणहार जोपियं
अखंड जोत रुप आई राजबाई ओपियं॥1॥

पहेलवान म्लेच्छ मार वार रूधिरं पिये।
करोर ब्रहम राखसां विलोकतां डरे हिये।
दहीत दास के तमाम नाश सब्ब है कियं।
अखंड जोत रुप आई राजबाई ओपियं॥2॥[…]

» Read more

🌺हिंगल़ाज वंदना🌺

🍀नाराच छंद🍀
शिवा! अनूपमेय! शक्ति! सांभवी! मनोहरी! ।
त्रिशूलिनी! भुजंग-कंकणा! , त्रिलोकसुंदरी।
सुभव्यभाल, केश-व्याल, माल -लाल, कंजनी।
भजामि मात हिंगल़ाज भक्त भीड भंजणी।।१।।
ध्वनि मृदंग ध्रंग ध्रंग चारू चंग बज्जही।
झमाल झांझ, औ पखाज, वेणु वाजती मही।
डमाल डाक डं डमाक राग तान रंजणी
भजामि मात हिंगल़ाज भक्त भीड भंजणी।।२[…]

» Read more

भद्रकालिका नाराचवृत्त स्तवनम्

शवारूढे स्मशानवासिनी शिवे, दयानिधे।
अघोरघोर गर्जनी, रता मदे दिगंबरी।
विशाल-व्याल केशिनी, प्रपूजिता मुनिश्वरम्।
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।१

निरावलंबलंबिनी, करालकष्टनष्टनी।
मंदांधमूढदैत्यदुष्टदर्पभंजनी भवा।
मनोविकारदाहिवह्निरूप ज्वालमालिके।
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।२

रणे वने जले स्थले गढे पुरे च पर्वते।
क्षणे क्षणे पलेलवे अपत्य रक्ष अंबिके।
सदामनोनुकूलभक्त मात! भैरवी सुखे।
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।३[…]

» Read more

माँ श्री आवड़जी रा छन्द – कवि मेहाजी

।।छन्द-नाराच।।
अम्बा ईच्छा अलख की झलक दुख झाळणे।
मांमट देव के ऊभट प्रेह प्रगटी पाळणे।
सप्त बैन सुख चैन भैरू लेन भावड़ा।
भज्यां निशुंभ शुंभ भूप आप रूप आवड़ा !!१!!

तुंही भगत तारणी ऊबारणीलसुरां असी।
जणीह मात चारणी जगत में तेरे जसी।
सकत को संसार करत नाकड़ा नमावड़ा।
भज्यां निशुंभ शुंभ भूप आप रूप आवड़ा !!२!![…]

» Read more
1 2 3