वर्षा ऋतू वर्णन – कवि श्री दुला भाया “काग”

।।छंद – सारसी।।
आषाढ घमघम धरा धमधम, वरळ चमचम वीजळी,
जीय वरळ चमचम वीजळी।।

गडहडिय सज दळ, आभा वळकळ, मंद प्रबळा मलकती,
दीपती खड खड, हसी नवढा, श्याम घुंघट छुपती;
अबळा अकेली, करत केली, व्योम वेली लळवळी,
आषाढ घमघम धरा धमधम, वरळ चमचम वीजळी,.
जीय वरळ चमचम वीजळी।।१[…]

» Read more

ए ज सोनल अवतरी

।।छंद – सारसी।।
नव लाख पोषण अकळ नर ही, ए ज सोनल अवतरी।।
मा ! ए ज सोनल अवतरी ।।टेर।।

अंधकारनी फोजुं हटी, भेंकार रजनी भागती।
पोफाट हामा सधू प्रगटी, ज्योत झगमग जागती।।
व्रण तिमिर मेटण सूर समवड, किरण घटघट परवरी।
नव लाख पोषण अकळ नर ही, ए ज सोनल अवतरी।।
मा ! ए ज सोनल अवतरी…….।।१।।[…]

» Read more

आधशगति उमिया माताजी री स्तुति – कवि मुळदानजी तेजमालजी रोहडिया (जामथडा कच्छ)

।।छंद – सारसी।।
तुंही रुद्राणी, व्रहमाणी, विश्व जाणी, वज्जरा।
चाळळकनेची, तुं रवेची, डुँगरेची, छप्परा।
विशां भुजाळी, वक्र वाळी, त्रिशूळाळी त्रम्मया।
वेदां वदंती, सारसत्ती, आध शगति उमिया।।1[…]

» Read more

आवड माता री स्तुति – अनोपजी वीठू

।।छंद हरिगीत (सारसी)।।
गणेश गणपत दीजिये गत उकत सुरसत उजळी।
वरणंत मैं अत कीरति व्रत शगत सूरत संव्वळी।
वा वीश हथसूं दिये बरकत टाळे हरकत तावडा।
भगवान सुरज करे भगति आद शगति आवडा।।1।।

मामड चारण दुःख मारण सुख कारण संमरी।
दिव्य देह धारण कीध डारण तरण तारण अवतरी।
समर्यां पधारण काज सारण धन वधारण धावडा।
भगवान सुरज करे भगति आद शगति आवडा।।2।।[…]

» Read more

चंदू मा रा छंद – धूड़जी मोतीसर जुढिया

।।छंद – सारसी।।
मनधार मत्ती सज सगत्ती, आप रत्थी आविया।
पोक्रण पत्ती बड कुमत्ती, सोह सत्ती सूर सत्ती,
रूक हत्थी राड़वै।
बढ चरण वंदूं सील सिंधू, मात चंदू माड़वै।।1

साह मान संका बाज डंका, होय हंका हेदनी।
इल़ मेर अंका लाग लंका, मार मंका मेदनी।
आलम असंका रीझ रंका, धाड़ धंका धाड़वै।।
बढ चरण वंदूं सील सिंधू, मात चंदू माड़वै।।2[…]

» Read more

सरस्वती वंदना

शुभ स्वेत वसना, ललित रसना, दडिम -दसना, उज्जवला।
कलहंस करती, फरर फरती, तिमिर हरती, निर्मला।
सिर मुकुट सुंदर, हार गल वर, माल मनहर कर अति।
प्रिय पुस्तपाणि, वाक-वाणी, वीण पाणी, सरसती।। १

» Read more

बीरवड़ी वंदना

छंद सारसी
अन्नपूर आई चक्खड़ाई, तूं सदाई सेवियां।
बातां बधाई बह बडाई, दख सवाई देवियां।
नरपत नमाई इम अथाई, पहुम बाई परवड़ी।
निज सुजस जाहर चढै नाहर, बणै वाहर बिरवड़ी।। 1 […]

» Read more

राधा रमण देव स्तुति

।।छंद सारसी/हरिगीतिका।।
जेहि नाम आधा, गयँद साधा, जल अगाधा, अंतरे।
जब जूड खाधा, करी हाधा, शरण लाधा, अनुसरे।
मिट गई उपाधा, चैन बाधा, बंध दाधा, धा करी।
जय रमणराधा, मित्र माधा, हरण बाधा, श्रीहरी।।1

वसुदेव द्वारे, देह धारे, भार टारे, भोमके।
सुरकाज सारे, संत तारे, द्वैषी मारै, होम के।
सुरपति हँकारे, मेघ बारै, ब्रज उगारै, गिरधरी।
जय रमणराधा, मित्र माधा, हरण बाधा श्रीहरी।।2[…]

» Read more

काली रूप आवड वंदना

छंद सारसी
क्रां भद्रकाळी, क्रीं कृपाळी, क्रूं कराली, कालिका।
मां मुण्डमाळी, डं डमाली, वपु विशाळी, ज्वालिका।
जय जगतपाली, वृद्ध बाली वेश भाळी मावडा।
काली कराली, वदन वाली, अस्थिमाली, आवडा॥1
समसान वासी, अट्टहासी, वपुअमासी, कज्जला।
प्रति पल पिपासी, पुंज राशी, भव्य भासी, चप्पला॥
मेटो उदासी, हिये वासी, फँस्यौ फासी, डावडा।
काली कराली, वदन वाळी, अस्थि माळी, आवडा॥2 […]

» Read more

बिरवडी जी रा छंद – कवि कानदासजी

॥छंद सारसी (हरिगीत)॥
दांतां बतीसां सौत जाई, लिया दांत सु लोहरा।
अचरज्ज दरशण हुऔ अंबा, मिट्या वादळ मोहरा।
पख दोय पूरी शगत सूरी,पिता हुकम पर वडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 1 ॥

नव लाख घोडे चढै नवघण, सूमरां घर सल्लडै।
सर सात खळभळ, शेष सळवळ, चार चकधर चल्लडै।
इण रुप चढियो सिंध धरपर इळा रज अंबर अडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 2 ॥ […]

» Read more
1 2