घनघोर घटा, चंहु ओर चढी – कवि मोहन सिंह रतनू

।।छंद – त्रोटक।।
घनघोर घटा, चंहु ओर चढी, चितचोर बहार समीर चले।
महि मोर महीन झिंगोर करे, हरठोर वृक्षान की डार हले।
जद जोर पपिहे की लोर लगी, मन होय विभोर हियो प्रघले।
बन ओर किता खग ढोर नचै, सुनि शोर के मोहन जी बहलै।[…]

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खूबड़जी री स्तुति – गंगारामजी बोगसा

डिंगल कवियों की यह उदारता भी रही है कि अपने मित्रों, हितेषियों व संबंधियों के आग्रह पर ये उन्हीं के नाम से भी रचनाएं लिख देते थे। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण मिलते हैं। बाद में मूल कवि के स्थान पर उस कवि का नाम चल पड़ता है जिसके नाम से मूल कवि ने रचना बनाई।

ऐसा ही एक उदाहरण आज गंगारामजी बोगसा सरवड़ी की कुछ पांडुलिपियां पढ़ते हुए मिला। गंगारामजी ने किन्हीं ठाकुर सरदारसिंहजी के नित्य पाठ हेतु मा खूबड़ी की स्तुति लिखकर दी थी।[…]

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असन्तां री आरसी – जनकवि ऊमरदान लाळस

।।दोहा।।
आवै मोड अपार रा, खावै बटिया खीर।
बाई कहै जिण बैन रा, वणैं जँवाई वीर।।1।।
गुरु गूंगा गैला गुरु, गुरु गिंडकां रा मेल।
रूंम रूंम में यूं रमें, ज्यूं जरबां में तेल।।2।।

।।छन्द – त्रोटक।।
सत बात कहै जग में सुकवी, कथ कूर कधैं ठग सो कुकवी।
सत कूर सनातन दोय सही, सत पन्थ बहे सो महन्त सही।।1।।[…]

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दारू दुरगण

आदरणीय मोहनसिंहजी रतनू री सेवा में लिख्यो एक छंद आज आपरी निजरां
।।छंद त्रोटक।।
सत मोहन भ्रात कहूं सुणियै।
धुर बांचत सीस मती धुणियै।
कल़ु कीचड़ जात फसी कतनू।
रण कोम रु काज करै रतनू।।1

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श्री करनी विजय स्तुति – श्री जोगीदान जी कविया सेवापुरा

।।छन्द त्रोटक।।

करणी तव पुत्र प्रणाम करै
धरि मस्तक पावन ध्यान धरै
कलिकाल महाविकराल समै
बिन आश्रय हा तव बाल भ्रमै।१।

हम छोड़ चुके अब इष्ट हहा,
रिपु घोर अरष्टि अनिष्ट रहा।
पथ भ्रष्ट हुये जग माँहि फिरैं
घन आपत्ति के नभ भाग्य घिरैं।२। […]

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जूझार मूल सुजस

बीकानेर जिले री कोलायत तहसील रै गांव खेतोलाई रै सालमसिंह भाटी रो बेटो मूल़जी एक वीर क्षत्रिय हो। सं १८६६ री भादवा सुदि १२ रै दिन ओ वीर चोखल़ै री गायां री रक्षार्थ जूझतो थको राठ मुसलमानां रै हाथां वीरगति नै प्राप्त होयो। किवंदती है कै सिर कटियां पछै ओ वीर कबंध जुद्ध लड़ियो। आथूणै राजस्थान रे बीकानेर, जैसलमेर नागौर अर जोधपुर मे इण वीर री पूजा एक लोक देव रे रूप मे होवै।मूल़जी जूझार रे नाम सूं ओ अजरेल आपरी जबरैल वीरता रे पाण अमरता नै वरण करग्यो।जैड़ो कै ओ दूहो चावो है :- मात पिता सुत मेहल़ी बांधव वीसारेह सूरां […]

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