मिहिर ऊग मा’राण

मिहिर ऊग मा’राण, तिमिर दल़ अकबर तोड़्यो।
करां झाल किरपांण, माण मानै रो मोड़यो।
वन जमियो वनराव, भाव आजादी भूखो।
नह डिगियो नखहेक, लियो पण भोजन लूखो।
साहस रो रूप भूपां सिरै, मुगट मेवाड़ी मोहणो।
कीरती कल़श चढियो कल़ू, स्वाभिमान भड़ सोहणो।।1[…]

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नह लीधो हर नाम

नह लीधो हर नाम, कपट अर कूड़ कमायो।
नह लीधो हर नाम, गरथ संचियो गमायो।
नह लीधो हर नाम, चपट सँग कीनी चोरी।
नह लीधो हर नाम, गात तकियो नित गोरी।
भूलियो नाथ भोदूपणै, बातां करी विवाद री।
मोचणी पाप गीधा मुदै, एको गल्ल ना आदरी।।1[…]

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करणीजी रा  छप्पय

जियै अराधी जोर, दयासिंधु सांसण दीधो।
वळ राघव उण वाट, लोहड़ी सरणो लीधो।
अयो बलू तुझ ओट, हेर जिणरो दुख हरियो।
तिणरी घरणी तूठ, कुवै जळ अणथग करियो।
सुरराय मात करनी सदा, छात छत्र री छांवड़ी।
दासोड़ी गीध सुकवि दखै, मया रखै तूं मावड़ी।।[…]

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भैरूंनाथ रा छप्पय – जवाहरदान जी रतनूं

।।भैरवानाथ।।

।।छप्पय।।

डमर डाक डम डमक, घमर घूघर घरणाटै।
पग पैजनि ठम ठमक, स्वान झमझम सरणाटै।
द्युति आनन दम दमक, रमक गंध तेल रऴक्कै।
गयण धरा गम गमक, खमक मेखऴी खऴक्कै।
सम समक संप चम चम चमक, धमक बहै रँग धौरला।
मोरला काम कज चढ हद मदद, (रे) गुरज लियाँ कर गौरला।।1।।[…]

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चारण भगत कवियां रै चरणां में

आसो ईसर अखां, अखां इम कवियो अलू।
दाखां केसोदास, भणां सँग मांडण भलू।
कवियण करमाणद, गोदड़ हुवो गुणगामी।
हुवो ऐम हरदास, जीभ जपण जगजामी।
चूंडो रु जेम माधव चवां, सिमरण कीधो साम नै।
कर जोड़ गीध दँडवत करै नरहर नामी नामनै।।[…]

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भगवा

कुण नै चिंता करम री, करै सो आप भरेह।
पण इण भगवा भेख नैं, काळो मती करेह।।
काळा, धोळा, कापड़ा, या हो नंग धड़ंग।
भारत में है भेख रो, सूचक भगवों रंग।।
भगवैं नै भारत दियो, सदा सदा सम्मान।
भगवैं भी राखी भली, इण भारत री शान।।[…]

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देशनोक-दर्शन – भलदान जी चारण

।।छप्पय।।
पोखर मथुरापुरी, सेत बंधण रामेसर।
कर बदरी केदार, अधिक आबू अचलेसर।
पापां गमण प्रयाग, गया गंगा गोमती।
मुकतिदेण सुरमात, सकल महिमा सुरसत्ती।
कुरूक्षेत्र नाथ कासी सकल,
जात घणा जुग जीविया।
करनला आप दरसण कियां,
कवि केता तीरथ किया।।[…]

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बोलत नाह ऊचारत फूं फूं – कविराजा बांकीदास आसिया

यह काव्य महलों में एक महारानी जी सें सम्बन्धित है। एक राणी जी अपनै पति कै दर्शन करके ही दंत मंजन करती थीं। उन्होंने हमेशा की तरह अपने पति के जागने का इतजार करतै हुए अपनी नज़रों को पति के मुख पर केन्द्रित करते हुए दासी सें दंत मंजन का कटोरा मांगा। उस दिन दासी नयी थी सो उसनै भूल सै चूनै से भरा कटोरा आगे कर दिया। राणी जी नै चूना लेकर मुह में बिना देखै डाल दिया जिससे मुह में अत्यधिक जलन होनै लगी जिस कारण वो बार-बार मुह में पानी डाल कर गरारै करने लगी। जब यह यह द्रश्य राजा साहब नै दैखा तब उन्होंने एक काव्य की पंक्ति बोली। “बोलत नाह ऊचारत फूं फूं। “ इस काव्य को कवि बांकीदास नै बनाया था। ओर राजा मान सिंह ने इसका उच्चारण किया था।[…]

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नमण धरा नागौर

नमण धरा नागौर, और कुण तो सूं आगै।
संत भगत सिरमौर, तोर जस जोती जागै।
तूँ मोटी महमाय, उदर मीरां उपजावै।
गुण गोविंद रा गाय, दाय नह दूजो आवै।
जहं सूरवीर पिरथी सिरै, (अरु) देव-देवियां अवतरै।
गजराज आज घण गरब सूं, (थनै) क्रोड बार वन्दन करै।। 01।।[…]

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मेहाई-महिमा – हिगऴाजदान जी कविया

।।आर्य्या छन्द।।
पुरूष प्रराण प्रकती, पार न पावंत शेष गणपती।
श्रीकरनी जयति सकत्ती, गिरा गो अतीत तो गत्ती।।1।।

।।छप्पय छन्द।।
ओऊंकार अपार, पार जिणरो कुण पावै।
आदि मध्य अवसाण, थकां पिंडा नंह थावै।
निरालम्ब निरलेप, जगतगुरू अन्तरजामी।
रूप रेख बिण राम, नाम जिणरो घणनामी।
सच्चिदानन्द व्यापक सरब,
इच्छा तिण में ऊपजै।
जगदम्ब सकति त्रिसकति जिका,
ब्रह्म प्रकृति माया बजै।।2।।[…]

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