डिगऴ में मर्यादा रौ मांडण

राजस्थानी रा साहित में मर्यादा रो आछो मंडण, विशेषकर चारण साहित में घणों सखरो अर सोहणो हुयो है। जीवण री गहराई ने समझ परख अर ऊंचाई पर थापित करणे री मर्यादावाँ कायम करी गई है। इण मर्यादा रे पाण ही माणस समाज संगठित अर सुव्यवस्थित रैय र आपरी खिमता अर शक्ति में उतरोतर बढाव करियो है। चारण कवेसरां कदैई नीति रो मारग नी छोडियो है, अर नीतिबिहूणा जीवण ने पाट तोड़ बिगाड़ करण हाऴी नदी रै कूंतै मानियो है, इण भाव रो दोहो निजरां पैश है।

।।दोहा।।
तोड़ नदी मत नीर तूं, जे जऴ खारौ थाय।
पांणी बहसी च्यार दिन, अवगुण जुगां न जाय।[…]

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डिंगल काव्यधारा में प्रगतिशील चेतना

शौर्य, औदार्य, भक्ति, नीति, लोकव्यवहार एवं अनुरक्ति आदि विविध विषयों में रचित राजस्थानी साहित्य की डिंगल काव्यधारा का अपना अनुपम एवं गौरवमयी इतिहास है। धारातीर्थ धाम के रूप में स्वनामधन्य इस राजस्थान की धोरा धरती की शौर्यप्रधान संस्कृति के निर्माण और परित्राण में डिंगल काव्यधारा का विशेष योगदान रहा है। इस धारा के कवियों में हलांकि अनेक जाति वर्ग के लोगों का नाम आता है लेकिन इनमें अधिकांश कवि चारण रहे हेैं और आज भी हैं। अतः यह चारणी काव्य नाम से भी जाना जाता है। “आधुनिक हिंदी जगत में डिंगल काव्यधारा यानी चारण काव्य के लिए प्रायः भ्रामक धारणाएं व्याप्त है, जो लेशमात्र भी आप्त नहीं है। वस्तुतः चारण सामाजिक चेतना का संचारण एवं क्रांति का कारण है। वह स्वातंत्र्य का समर्थक, पौरुष का प्रशंसक और प्रगति का पोषक होने के साथ ही युगचेता, निर्भीक नेता और प्रख्यात प्रणेता रहा है। उत्कृष्ट का अभिनंदन एवं निकृष्ट का निंदन इसकी सहज वृत्ति रही है। सिद्धांत एवं स्वाभिमान हेतु संघर्ष करने वाले बागी वीरों का वह सदैव अनुरागी रहा है। “[…]

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