विनायक-वंदना

।।गीत – जांगड़ो।।
व्हालो ओ पूत बीसहथ वाल़ो,
दूंधाल़ो जग दाखै।
फरसो करां धरै फरहरतो,
रीस विघन पर राखै।।१

उगती जुगती हाथ अमामी,
नामी नाथ निराल़ो।
भगतां काज सुधारण भामी,
जामी जगत जोराल़ो।।२[…]

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गीत जांगड़ो

सिमर रै सांमल़ियो साहेब,
वेद पुराण बतावै।
सुधरै अंत मिटै धुर सांसो,
संत सार समझावै।।1

पुणियां नाम कटै भव पातक,
सुणियां मल़-गल़ सारा।
चुणिया नाम कोट गढ चौड़ै,
पेख हुवा पौबारा।।2[…]

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सांस्कृतिक संबंधां रो साकार सरूप ठाकुर नाहरसिंहजी जसोल

राजस्थानी रा सिरै कवि रायसिंहजी सांदू मिरगैसर आपरी रचना “मोतिया रा सोरठा” में ओ सोरठो जिण महामनां नै दीठगत राखर लिखियो उणां में नाहरसिंहजी हर दीठ सूं खरा उतरै-

राखै द्वेष न राग, भाखै नह जीबां बुरो।
दरसण करतां दाग, मिटै जनम रा मोतिया।।

किणी मध्यकालीन कवि ठाकुर सुरतसिंह री उदार मानसिकता नै सरावतां कितो सटीक लिखियो हो-

सुरतै जिसै सपूत, दिस दिस मे हिक हिक हुवै।
चारण नै रजपूत, जूना हुवै न च्यारजुग।।

आज जद आपां नाहरसिंहजी जसोल नै देखां तो बिनां किणी लाग लपट उण मध्यकालीैन क्षत्रिय मनीषियां री बातां अर अंजसजोग काव्य ओल़ियां याद आ जावै जिकी इणां चारण कवियां री स्वामी भक्ति, सदाचरण, साहित्य रै प्रति समर्पण, सांस्कृतिक चेतना, सत्य रो समर्थन साच कैवण रो साहस अर सही सलाह रै उदात्त गुणां नै देखर कैयी।[…]

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मंडी रास दासोड़ी मढ में

।।गीत जांगड़ो।।
चवदस आसाढ चांदणी चंडी,
खळ खंडी धर खागां।
मंडी रास दासुड़ी मढ में,
रीझ अखंडी रागां।।1
कीधो उछब आज करनादे,
तद चौरासी तैड़ी।
सरसज मनां साबळी सगळी,
नाहर चढियां नैड़ी।।2 […]

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सैणां इम काम सबां सूं सोरो

।।गीत जांगड़ो।।
सैणां इम काम सबां सूं सोरो, झांसां भासण झाड़ो।
भोल़ां नुं भटकाय भावां में, कमतर सहल कबाड़ो।।1
दो उपदेस दूजां नैं दाटक, सरसज बात सुहाणी।
मनमाफक बेवो खुद मारग, केवो काग कहाणी।।2 […]

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गीत – जांगड़ो चंदू माऊ नै अरज

गीत – जांगड़ो
मो मन रो सोच मेटजै माता, दादी आगल दाखूं।
हूं तो एक एकेलो हरदम, लारै जुलमी लाखूं।।१
आखूं कथ म्हारी किण आगै, तन लेवै सह टाल़ी।
साच धणी ऊदाई साभल़, पख पूगै झट पाल़ी।।२
सिरकै सिला तूझ सूं सांप्रत, मिटसी गिला मिहारी
दूजां विश्वास करूं न दिल में, थिर आसा इक थारी।।३ […]

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सरस्वती वंदना – कवि जगमाल सिंह “ज्वाला” सुरतांणिया कृत

गीत जांगड़ो

शुभ्र वस्त्र वीण साज शुशोभित,बाई हंस बिराजे।
झनहण वीण ज तार झणंकत,राजीव उपर राजे।1।

वेद विरंचि खरेखर विमला,पुष्प शब्द प्रकाशे।
जाय बिराजे रसना जां के,उर जन होय उजासे।2।

धवल गात अरु सो पट धवला’धवल दंत मुख धारे।
धवल हंस शोभे धणियाणी,सेवक सोय सुधारे।3। […]

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