ભગવતી આઈ શ્રી જીવામાં – લખીયાવીરા (भगवती आई श्री जीवा मां-लाखीयावीरा)

માતૃપૂજાની શરૂઆત તો સૃષ્ટિના આરંભ સાથે જ થઈ હશે. ભારતમાં તો આદિકાળથી જ માતૃપૂજા થતી આવી છે.

ઋગ્વદમાં પણ જગદંબાને સર્વદેવોના અધિષ્ઠાત્રી આધાર સ્વરૂપ, સર્વને ધારણ કરનારા સચ્ચિદાનંદમયી શક્તિ સ્વરૂપે વર્ણવ્યા છે.

ચારણ આઈઓની ઉજળી ગૌરવશાળી અને ભવ્ય પરંપરા રહી છે. ચારણ તો મુળથી જ જગદંબાનો ઉપાસક રહ્યો છે. તેથી જ ચારણ દેવીપુત્રલેખાય છે. દેવી ઉપાસનાને કારણે જ ચારણોમાં નારીને ભાગ્યા નહીં પુજનીય ગણવામાં આવે છે. સ્ત્રી સન્માનને કારણે જ ચારણ પુત્રીઓ તપ – સાધના – આરાધના કરી આઈનું જગદંબાનું પદ પામી પુરાવા લાગી. ચારણોનું આ નારીતત્ત્વ સંયમ, શીલ, સદાચાર, માનવપ્રેમ, વિઘાર્થન, નિયમ અને તપને કારણે પ્રાપ્ત થયેલી આત્મશક્તિને આભારી છે અને એટલે જ કદાચ આવી ચારણપુત્રીઓ પરમ શક્તિની વાહક બની છે. તેમની આત્મશક્તિ એવી હતી કે તેઓ જે વચન બોલી જાય તેને સાચા પાડવા પ્રકૃતિને પણ તેનો નિયમબદલવો પડે. એટલે જ મેઘાણીજી નોંધે છે કે “આવું નારીતત્ત્વ જગતના ઈતિહાસના અન્ય કોઈ વિર સ્તુતીકાર સંસ્થા સાથે જોડાયેલું જડતું નથી.”[…]

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शरणागत पंखी रै सारू मरणिया !!

महात्मा ईसरदासजी आपरी काल़जयी कृति ‘हाला-झाला रा कुंडलिया’ में लिखै कै “सिंह रा केश, नाग री मणि, वीरां रो शरणाई, सतवंती रा थण अर कृपण रो धन फखत उणां रै मरियां ईज दूजां रै हाथां पड़ै, जीवतां नीं। जे ऐ जीवता है ! अर कोई इणां री इण चीजा़ं रै हाथ घालै, तो घालणिये नै मरणो ईज पड़ै। उणां आ बात किणी अटकल़ पींजू डोढसौ री गत नीं लिखी बल्कि कानां सुणी अर आंख्यां देखी रै मेल़ सूं मांडी-

केहर केस भमंग मण, शरणाई सूहड़ांह।
सती पयोहर कृपण धन, पड़सी हाथ मूवांह।।[…]

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गैली दादी!

आथूणै राजस्थान री धरा वास्तव में सिद्धां, सूरां, सतियां, जतियां री धरा है। बांठै-बांठै कन्नै लोक-निर्मित उण महामनां री कीरत रा कमठाण, इण बात री साख भरै कै-

कीरत महल अमर कमठाणा।

लोकहितार्थ जीवण जीवणियां अर अरपण करणियां रो जस सदैव जनकंठां में ई गूंजतो सुणीजै, क्यूंकै लोक कदै ई गुणचोर नीं हुवै अर साथै ई लोक जात रो पूजक नीं, बल्कि गुणां ग्राहक हुवै-

गुण नै झुरूं गंवार, जात न झींकूं जेठवा।[…]

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स्वाभिमान और गौरव का बिंदु है जौहर

राजस्थान का नाम धारा-तीर्थ के रूप में विश्रूत रहा है। शौर्य और धैर्य का मणिकांचन संयोग कहीं देखने को मिलता था तो वो केवल यही धरती थी। ऐसे में कुछ सवाल उठते हैं कि फिर राजस्थान के रणबांकुरों को युद्ध में परास्त और यहां की वीरांगनाओं को जौहर की ज्वालाओं में क्यों झूलना(नहाना) पड़ा? क्या कारण था कि जिनकी असि-धाराओं के तेज मात्र से अरिदलों के हृदय कंपित हो उठते थे, उनको साका आयोजन करना पड़ता था?[…]

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रँग शीलां रखवाल़िया,जोर झिणकली झाड़!!

एक जमानो हो जद अठै रा नर-नारी मरट सूं जीवण जीवता अर सत रै साथै पत रै मारग बैवता। हालांकै धरती बीज गमावै नीं आज ई ऐड़ा लोग है जद ई तो ओ आकाश बिनां थांभै ऊभो है अर ऐड़ै नर-नाहरां री बातां हालै। पण उण दिनां री बातां बीजी ही। बीसवैं सईकै री बात है भाडली(जैसल़मेर) रा भाटी रुघजी मानसिंहजी रा (रुघराजजी /रुघनाथजी) धाट रै गांम छौल़ रै सोढा संग्रामसिंह अमरसिंह रां रै परण्योड़ा हुता। सोढीजी रो नाम गीतांकंवर हो। उणां री जोड़ायत सोढीजी, एक’र आपरै पीहर छौल़ गयोड़ा हा। रुघजी रै रावल़ै बात चाली कै सोढीजी नै आणो(लेने के लिए) मेलियो जावै। बात तय हुई कै जोगराजजी बीठू नै मेलिया जावै। वै जावै अर सोढीजी नै ले आवै। जोगराजजी नै बुलाय’र मा सा कह्यो कै- “बाजीसा आप ऊँठ लेय’र पधारो अर छौल़ जाय’र बीनणीसा नै ले आवो। आप तो उणरै माईत हो सो नीं उणरै संकोच री बात नीं आपरै।”[…]

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शरणागत सारू अगन रो वरण

आपांरै अठै कैताणो है कै ‘आप मरतां बाप किणीनै ई याद नीं आवै’। बात सही ई है पण अठै ऐड़ा लोग ई हुया है जिकै बाप अर बोल नै एक ई मानता अर आं माथै आंच आयां मर पूरा देता। बात झलगी तो झलगी!! पछै तो ‘तबलग सांस शरीर में, जबलग ऊंची ताण।’ जिकै ऊंची ताणै, उणांनै ईज जग जाणै। जिकै ऊंची नीं ताणै उवै आयां ज्यां ई उठ’र बुवा जावै। लारै ‘खुड़को हुवो न खोज’ री बात चालै। पण जिकै भाइयां नै सुख, सैणां नै अंजस अर आयै अवसर नै सिग चाढ’र पिता री मंशा नै पूरै, उवै ईज जगत में धनकार लेय’र जावै-

सुख भायां सैणां अंजस, आयां सिग अवसाण।
पितु मनसा पूरावियां, ज्यां जायां धन जाण।।

आपरै जनमणै नै जिकै धिन-धिन कर’र गया उणांमें एक चावो नाम है मा देमां रो।[…]

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थपिया कीरत थंब

सांचोर माथै राव बरजांगजी राज करै। बडो दातार। बडो सतवादियो। कवियां रो कद्र करणियो अर खाग रो धणी। केई चारण कवेसरां नै गांम इनायत किया। इणी कवियां में एक नाम सोडैजी मईया रो ई चावो।

इण सोडैजी मईया नै राव बरजांगजी, गोमेई गांम दियो। नैणसी री ख्यात रै परिशिष्ट में दाखलो मिलै कै उन्नीसवें सईकै में गोमेई में दो पांतीदार हा-

“कोस 9आथूण। इकसाखियो। कोसोटो हुवै। चारण करता जमांवत, चारण अभा मांनावत रै आदो-आद सो गांव बरजांगजी दीया चारण सोडै मई नै। “

जैड़ोक दाखलो आयो कै अभा मानावत रै आधोआध है। इणसूं ठाह लागै कै अभजी मईया गांम रा आधिया हा। उवै आपरी बखत रा नामजादीक कवि पण हा-

अभमल तोसूं ऊजल़ी, सो मईयां री साख।[…]

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हूं नीं, जमर जोमां करसी!!

धाट धरा (अमरकोट अर आसै-पासै रो इलाको) सोढां अर देथां री दातारगी रै पाण चावी रैयी है। सोढै खींवरै री दातारगी नै जनमानस इतरो सनमान दियो कै पिछमांण में किणी पण जात में ब्याव होवो, पण चंवरी री बखत ‘खींवरो’ गीत अवस ही गाईजैला-

कीरत विल़िया काहला, दत विल़ियां दोढाह।
परणीजै सारी प्रिथी, गाईजै सोढाह।।

तो देथां रै विषय में चावो है-

दूथियां हजारी बाज देथा।।

इणी देथां रो एक गांम मीठड़ियो। उठै अखजी देथा अर दलोजी देथा सपूत होया। अखजी रै गरवोजी अर मानोजी नामक दो बेटा होया। मानोजी एक ‘कागिये’ (मेघवाल़ां री एक जात) में कीं रकम मांगता। गरीब मेघवाल़ सूं बखतसर रकम होई नीं सो मानोजी नै रीस आई। वे गया अर लांठापै उण मेघवाल़ री एकाएक सांयढ आ कैय खोल लाया कै – “थारै कनै नाणो होवै जणै आ जाई अर सांयढ ले जाई।”[…]

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धिन चंदू राखी धरा!!

उन्नीसवों सइको राजस्थान में उथल़-पुथल़ अर अत्याचारां रो रैयो। उण काल़ खंड में केई राजावां अर ठाकरां आपरै पुरखां री थापित मरजादावां रै खिलाफ काम कियो। जिणनै केई लोगां अंगेजियो तो केइयां प्रतिकार ई कियो। उण काल़खंड में चारणां रै बीसूं सांसणां में जमर अर तेलिया होया।
चारणां नै दिरीजण वाल़ो गांम सांसण बाजतो। वो गांम हर लागबाग सूं मुक्त होवतो अर राज कोई दखल नीं दे सकतो। आ एक थापित मरजादा ही। जद जद राज मरजादावां उलांगण री हद तक आयो तो चारणां अहिंसक रूप सूं राज नै रोकण सारू धरणो(सत्याग्रह)जमर अर तेलिया किया। इण तीनूं ई स्थिति में खुद ई कष्ट पावता पण जनता कै राज संपत्ति नै किणी भांत सूं हाण नीं पूगावता।
खुद उत्सर्ग कर देता पण सरणागत कै मरजादा नै नीं डिगण देता। जदकै आज इणरै उलट है। आज केई तबका आपरै प्रदत्त अधिकारां री रक्षार्थ हिंसक होय तोड़फोड़, निर्दोषां रा भोड-भंजण सैति कितरा ई अजोगता काम करै। इणरै उलट चारण कटारियां खाय कै जमर कर सत्य समर रा अमर सेनानी बणता।
उण कालखंड रा ऐड़ा घणा किस्सा है पण एक गीरबैजोग किस्सै सूं आपनै रूबरू करावूं।[…]

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कल़ाऊ रा काचरिया याद है !!

आलाजी बारठ कल़ाऊ रैवै। कनै घणो वित्त, घणो विभो। आगो दियो पाछो पड़ै। रामजी राजी। एक दिन वे आपरै चंवरै बैठा माल़ा फेरै हा जितै एक बांमणी आपरै डावड़ै नै लियां उणांरै कनै आई अर कैयो कै – “बाजीसा म्है आपरै शरण बिखो काढण अर दिन तोड़ण आई हूं!!”

उणां उणनै पूरो आवकारो देय एक झूंपड़ो रैवण नै दे दियो अर सीधै री व्यवस्था करदी। टाबरियो पांच-सात वरसां रो हो सो उणनै उणां आपरा टोघड़िया चरावण रो काम भोल़ा दियो।[…]

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