ध्रुव स्तुति – महात्मा नरहरिदास बारहट

“अवतार चरित्र” ग्रन्थ में ध्रुव-वरद अवतार की स्तुति

।।छन्द – कवित्त छप्पय।।
ऊँकार अपार, अखिल आधार अनामय।
आदि मध्य अवसान, असम सम आतम अव्यय।
एक अनेक अनंत, अजीत अवधूत अनौपम।
अनिल अनल आकाश, अंबु अवनी मय आतम।
उतपत्ति नाश कारन अतुल, ईश अधोगत उद्धरन।
अध मध्य ऊर्ध व्यापित अमित, तुम अनंत असरन सरन।।1।।[…]

» Read more

शहीद दलपतसिंह शेखावत

जोधपुर रियासत रा देसूरी परगना रा देवली गांव रा शेखावत हरजीसिंह जी, महाराजा साब जसवंतसिंहजी अर सर प्रताप रा घणा मर्जींदान मिनख हा। आप आपरै जीवन रो घणो समय आं सर प्रताप रै साथै रावऴी सेवा में ही बितायो। आं हरजीसिंहजी रे दो बेटा मोभी दलपत सिंहजी अर छोटा जगतसिंहजी हां। हरजीसिंह जी री असामयक मौत हुवण रै बाद दोनां भाईयां री पढाई भणाई रो बंदोबस्त सर प्रताप करियो अर दलपत सिंह जी मेजर जनरल रा पद पर आसीन हुवा।[…]

» Read more

सूर्यमलजी का मौजी स्वभाव

विश्वविख्यात ग्रंथ वंशभास्कर के रचयिता महाकवि सूर्यमलजी बहुत ही मनमौजी स्वभाव के कविराजा थे और उन्हे मद्यपान का बहुत ही शौक था, उनके लिऐ तत्कालीन समय के राजन्य वर्ग व कुलीन खानदान के मित्रगण अच्छी किस्म की अति उम्दा आसव कढवा कर भिजवाते ही रहते थे। इसी क्रम मे ऐक बार भिणाय के राजा बलवन्तसिंह जी ने इनकी सेवा में बहुत ही मधुर मद्य भेजा था, जिसकी प्रशंसा में सूर्यमलजी ने उनको ऐक कवित्त लिखकर भेजा था। यथाः…[…]

» Read more

कवित्त – मालव मुकुट बलवंत ! रतलामराज

मालव मुकुट बलवंत ! रतलाम राज,
तेरो जस जाती फूल खोलैं मौद खासा कों।
करण, दधिचि, बलि केतकी गुलाब दाब,
परिमल पूर रचै तण्डव तमासा कों।
मोसे मधुलोभिन कों अधिक छकाय छाय,
महकि मरन्द मेटै अर्थिन की आसा कों।
चंचरीक सु कवि समीप तैं न सूंघ्यो तो हू,
दूरि ही सों दपटि निवाजें देत नासा कों।।७८।।[…]

» Read more

भूरजी बलजी के कवित्त – महाकवि हिंगऴाजदान जी कविया

चढ्यो जोधपुर तैं रसाला बीर चाला चहि,
तालन में चालत चंदोल जल तुच्छ पै।
चित्त में घमंड ब्रह्मंड लखैं चकरी सो,
अकरी अदा ते आये सेखाधर स्वुच्छ पै।
पोते राव वीर बनरावन पै दिट्ठि परी,
परी दिट्ठ हूरन की फूलन के गुच्छ पै।
डाकी डाकुवन कूं बकारे किधौं डारे कर,
बाघन के मुच्छ, पांव नागन के पुच्छ पै।।1।।[…]

» Read more

🌷घनाक्षरी कवित्त 🌷

कुंभा से कला प्रवीण, सांगा से समर वीर,
प्रणधारी पातळ की मात महतारी है।
प्रण हेतु परणी को चंवरी में छोड़ चले,
काळवीं की पीठ चढ़े पाबू रणधारी है।।
मातृभूमि की पुकार सुनिके सुहाग रात,
कंत हाथ निज सीस सौंपे जहां नारी है।
कर के प्रणाम निज भाग को सराहों नित,
रणबंकी राजस्थान मातृभू हमारी है।।01।।[…]

» Read more

झरोंखे दृग लायके – “प्रबीणसागर” से मनहरण कवित्त (घनाक्षरी)

कटी फेंट छोरन में, भृकुटी मरोरन नें,
शीश पेंच तोरन में, अति उरजायके,
मंद मंद हासन में, बरूनी बिलासन में,
आनन उजासन में, चकाचोंध छायके,
मोती मनी मालन में, सोषनी दुशालन में,
चिकुटी के तालन में, चेटक लगायके,
प्रेम बान दे गयो, न जानिये किते गयो,
सुपंथी मन ले गयो, झरोंखे दृग लायके. (१) […]

» Read more

आई अरदास रा कवत्त/छप्पय

।।कवत्त/छप्पय।।
हुई भीर हिंगल़ाज, जाझ जग तारण जरणी।
सदा केहरी साज, काज संतन रा करणी।
आरत सांभ अवाज, राज वाहर नित बैणी।
नमो गरीब नवाज, लाज रखण पख लैणी।
सगतियां तणी सिरताज तूं, सदा सहायक सेवियां।
उर दाझ मेट सुख आपणी, कर दल़ पासै केवियां।।1 […]

» Read more

जूझार मूल सुजस

बीकानेर जिले री कोलायत तहसील रै गांव खेतोलाई रै सालमसिंह भाटी रो बेटो मूल़जी एक वीर क्षत्रिय हो। सं १८६६ री भादवा सुदि १२ रै दिन ओ वीर चोखल़ै री गायां री रक्षार्थ जूझतो थको राठ मुसलमानां रै हाथां वीरगति नै प्राप्त होयो। किवंदती है कै सिर कटियां पछै ओ वीर कबंध जुद्ध लड़ियो। आथूणै राजस्थान रे बीकानेर, जैसलमेर नागौर अर जोधपुर मे इण वीर री पूजा एक लोक देव रे रूप मे होवै। मूल़जी जूझार रे नाम सूं ओ अजरेल आपरी जबरैल वीरता रे पाण अमरता नै वरण करग्यो। जैड़ो कै ओ दूहो चावो है :- मात पिता सुत मेहल़ी बांधव […]

» Read more

कवित्त करणीजी रा

वय पाय थाकी हाकी न केहर सकै शीघ्र
कान न ते सुने नहीं किसको पुकारूं मैं
चखन तें सुझै नहीं संतन उदासी मुख
कौन ढिग जाय अब अश्रुन ढिगारुं मैं
तेरे बिन मेरो कौन अब तो बताओ मात
दृष्टि मे न आत दूजो हिय धीर धारूं मै
कहै गीध चरणन मे छांह मिले थिर
शरण जननी की फिर मन को न मारूं मै १ […]

» Read more