पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – स्वामी स्वरुपदास

| कड़ी – १७५  | पंचदश मयूख | शल्यपर्व
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित।
| व्याख्या: डा. चन्द्र प्रकाश देवल


अथ वैशंपायन उवाच
जुद्धभूमि बिच भूज जब, आयो त्रियन समेतु।
गांधारी प्रति कहत मिलि, कृष्ण व्यास जुत हेतु।।६७।।
वैशंपायन मुनि बोले कि हे जन्मेजय! जब राजा धृतराष्ट्र कौरव कुल की स्त्रियों के साथ युद्धभूमि में आये तब श्री कृष्ण और व्यास मुनि दोनों मिल कर गांधारी से कहने लगे।[…]

» Read more

हालाँ झालाँ रा कुँडळिया – ईसरदास जी बारहट

“हालाँ झालाँ रा कुँडळिया” ईसरदास जी की सर्वोकृष्ट कृति है। यह डिंगल भाषा के सर्वश्रेष्ट ग्रंथों में से है। इसकी रचना के सम्बन्ध में निन्नलिखित किंवदंती प्रसिद्ध है।
एक बार हलवद नरेश झाला रायसिंह ध्रोळ राज्य के ठाकुर हाला जसाजी से मिलने के लिए ध्रोळ गये। ये उनके भानजे होते थे। एक दिन दोनों बैठकर चौपड़ खेलने लगे। इतने में कहीं से नगाड़े की आवाज इनके कानों में पड़ी। सुनकर असाजी क्रोध से झल्ला उठे और बोले – “यह ऐसा कौन जोरावर है जो मेरे गांव की सोमा में नगाड़ा बजा रहा है” फौरन नौकर को भेजकर पता लगवाया गया।[…]

» Read more

मेहाई-महिमा – हिगऴाजदान जी कविया

।।आर्य्या छन्द।।
पुरूष प्रराण प्रकती, पार न पावंत शेष गणपती।
श्रीकरनी जयति सकत्ती, गिरा गो अतीत तो गत्ती।।1।।

।।छप्पय छन्द।।
ओऊंकार अपार, पार जिणरो कुण पावै।
आदि मध्य अवसाण, थकां पिंडा नंह थावै।
निरालम्ब निरलेप, जगतगुरू अन्तरजामी।
रूप रेख बिण राम, नाम जिणरो घणनामी।
सच्चिदानन्द व्यापक सरब,
इच्छा तिण में ऊपजै।
जगदम्ब सकति त्रिसकति जिका,
ब्रह्म प्रकृति माया बजै।।2।।[…]

» Read more

सालगिरह शतक – महाकवि हिंगऴाजदान जी कविया

।।गीत – झमाऴ।।

[१]
करत निरंतर निकट कट, झंकारव अलि झुंड।
विधु ललाट बारण बदन, सिंदूरारूण सुंड।।
सिंदूरारूण सुंड, धजर बिख-धारणै।
हद उजवल रद हेक, बदन रै बारणै।।
कर-मोदक करनल्ल, जनम जस गाणनूं।
जग जाहर घण जाण, नमो गणराज नूं।।

भावार्थ: जिनकी कनपटी के पास लगातार भौंरों के झुंड झंकार की ध्वनि करते रहते हैं, जिनके ललाट पर चंद्रमा है, हाथी के मुंह वाले जिनकी सूंड सिंदुरी रंग की है। सूंड सांप के फ़न की भांति शोभायमान है, जिनका एक ही दांत, जो मुँह के द्‌वार पर है, बहुत उजवल हैं। जिनके हाथ में लड्‌डू है। उन जगत-विख्‌यात व बहुविज्ञ गणनायक गणेश जी को मैं करनीजी के जन्मोत्सव का यशगान करने के लिये नमस्कार करता हूँ।[…]

» Read more

☆नागदमण☆ – सांयाजी झूला

सांयाजी झूला महान दानी, परोपकारी भक्त कवि थे। वे कुवाव गांव गुजरात के निवासी थे। इनका लिखा हुआ “नागदमण” भक्ति रस का प्रमुख ग्रन्थ है|

भक्त कवि श्री सांयाजी झूला कृत “नागदमण”
।।दोहा-मंगलाचरण।।
विधिजा शारदा विनवुं, सादर करो पसाय।
पवाडो पनंगा सिरे, जदुपति किनो जाय।।…१
प्रभु घणाचा पाडिया, दैत्य वडा चा दंत।
के पालणे पोढिया, के पयपान करंत।।…२
किणे न दिठो कानवो, सुण्यो न लीला संघ।
आप बंधाणो उखळे, बीजा छोडण बंध।।…३
अवनी भार उतारवा, जायो एण जगत।
नाथ विहाणे नितनवे, नवे विहाणे नित।।…४
।।छंद – भुजंगप्रयात।।
विहाणे नवे नाथ जागो वहेला।
हुवा दोहिवा धेन गोवाळ हेला।।
जगाडे जशोदा जदुनाथ जागो।
मही माट घुमे नवे निध्धि मांगो।।…१[…]

» Read more

करुण बहतरी (द्रोपदी विनय) – श्री रामनाथ जी कविया

महाभारतकार ने द्रोपदी की कृष्ण से करुण विनय को ५-७ पक्तियों में सिमटा दिया है| इसी विनय के करुण प्रसंग को लेकर श्री रामनाथजी ने अनेक दोहों व् सोरठों की रचना की है| सती नारी के आक्रोश की बहुत ही अच्छी व्यंजना इन सोरठों में हुई है|

।।दोहा।।
रामत चोपड़ राज री, है धिक् बार हजार !
धण सूंपी लून्ठा धकै, धरमराज धिक्कार !!
द्रोपदी सबसे पहले युधिष्टर को संबोधित करती हुई कहती है| राज री चौपड़ की रमत को हजार बार धिक्कार है| हे धरमराज आप को धिक्कार है जो आप ने अपनी पत्नी को (लूंठा) यानि जबर्दस्त शत्रु के समक्ष सोंप दिया|[…]

» Read more

राजिया रा दूहा – कृपाराम जी बारहट

नीति सम्बन्धी राजस्थानी सौरठों में “राजिया रा सौरठा” सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है| भाषा और भाव दोनों द्रष्टि से इनके समक्ष अन्य कोई दोहा संग्रह नही ठहरता| संबोधन काव्य के रूप में शायद यह पहली रचना है| इन सारगर्भित सौरठों के भावों, कारीगरी और कीर्ति से प्रभावित हो जोधपुर के तत्कालीन विद्वान् महाराजा मान सिंह जी ने उस सेवक राजिया को देखने हेतु आदर सहित अपने दरबार में बुलाया और उसके भाग्य की तारीफ करते हुए ख़ुद सौरठा बना भरे दरबार में सुनाया —-

सोनै री सांजांह जड़िया नग-कण सूं जिके |
कीनो कवराजांह, राजां मालम राजिया ||
अर्थात हे राजिया ! सोने के आभूषणों में रत्नों के जड़ाव की तरह ये सौरठे रच कर कविराजा ने तुझे राजाओं तक में प्रख्यात कर दिया |[…]

» Read more

हरिरस (भक्त कवि महात्मा ईसरदास प्रणीत)

।।मंगलाचरण।।
पहलो नाम प्रमेश रो जिण जग मंड्यो जोय !
नर मूरख समझे नहीं, हरी करे सो होय।।१

!! छंद गाथा !!
ऐळेंही हरि नाम, जाण अजाण जपे जे जिव्हा !
शास्त्र वेद पुराण, सर्व महीं त‍त् अक्षर सारम्।।२

!! छंद अनुष्टुप !!
केशव: क्लेशनाशाय्, दु:ख नाशाय माधव !
नृहरि: पापनाशाय, मोक्षदाता जनार्दनः।।३

राम नाम विना वाणी, राम नाम विना कथा !
राम नाम विना शब्द, सो शब्दाश्र्व अकारथा।।४

राम नाम मयी वाणी, राम नाम मयी कथा !
राम नाम मया शब्दा, सो शब्दा सुक्यारथा।।५[…]

» Read more

देवियांण (भक्त कवि महात्मा ईसरदास प्रणीत)

( छंद अडल )
करता हरता श्रीं ह्रींकारी, काली कालरयण कौमारी
ससिसेखरा सिधेसर नारी, जग नीमवण जयो जडधारी….१
धवा धवळगर धव धू धवळा, क्रसना कुबजा कचत्री कमळा
चलाचला चामुंडा चपला, विकटा विकट भू बाला विमला….२
सुभगा सिवा जया श्री अम्बा, परिया परंपार पालम्बा
पिसाचणि साकणि प्रतिबम्बा, अथ आराधिजे अवलंबा….३[…]

» Read more