दोय दृष्टांन्त माँ भगवती इन्द्रेश भवानी के

।।माँ भगवती इन्द्रेश भवानी की समदृष्टि व कड़े अनुशासन की पालना के दो दृष्टांन्त।।

** १ **

भव-भय-भंजनी भगवती मावड़ी के चारण-वास में हुये प्रवास के दस दिवस के दौरान हर श्रध्दालुगण भक्तों नें माँ को मिजमानी देने की अथाह तथा पुरजोर कोशिश की तथा भाग्यशाली भक्तों के घर माँ भगवती ने पधार कर भोजन ग्रहण करना स्वीकार भी किया। वहीं पर साधारण व सदगृहस्थ भैरवदानजी जागावत भी रहते थे व उनकी धर्मपत्नि श्रीमती मोहनकुंवर कवियाणी बड़ी धर्मपरायणा व सीधी संकोची स्वभाव की नारी थी।[…]

» Read more

चिरजा इंन्द्रबाईसा की – कवि हिंगऴाजदान जी जागावत

इंन्द्रबाई आये कृपा करि आप,
बड़ापण राज तणूं भारी।।टेर।।

पाप कोऊ प्रकट्यो मों पिछलो,
मैं मति भयो जु मंन्द।
मां मन बिलकुल कुटिल हमारो,
भूल गयो धज बन्द।
फेर फिर किरपा अणपारी।।1।।[…]

» Read more

चिरजा मंदिर की – कवि हिंगऴाजदान जी जागावत

आदरणीय जागावत हिंगऴाजदान जी सा चिरजावां में अनूठो प्रयोग करियो है। भगवती का मंदिर ने सम्बोधित करती दो रचनावां करी है जिणमें पहली में निवेदन है कि हे माँ भगवती आप भव्य मंदिर को निर्माण करवायो जिणमें कई भांत की विशेषता है, और दूसरी चिरजा में भवन ने कहियो है कि भवन तूं कितणो भाग्यशाली है जो बीसभुजाऴी भगवती आप में बिराजमान है। ~~कवि हिंगऴाजदान जी जागावत प्रेषित: राजेन्द्रसिंह कविया (संतोषपुरा, सीकर)

» Read more

डिंगल़ वाणी में भगवती इंद्र बाई

माँ भगवती लीलाविहारिणी इन्द्रकुँवरी बाईसा का जन्म संवत १९६४ में हुआ था उनके भक्त कवि हिंगऴाजदानजी जागावत ने अवतरण की ऐक प्रसिध्द रचना चिरजा सृजित की है जिसमें विक्रम संवत १९६३ के आश्विन नवरात्रो में माँ हिंगऴाज के स्थान पर सभी देवियों की पार्षद भैरव सहित परिषद लगती है, उस परिषद में भैरव माँ को ज्ञापित करते हैं कि मरूधर देश में अवतार की आवश्कता है, भगवती हिंगऴाज अपनी अनुचरी आवड़ माँ को आदेश देकर सही स्थानादि बताकर मरूधरा में अवतार के लिए प्रेरित करती है व भगवती आवड़ अवतरित हो भक्तवत्सला बनती है अद्भूत कल्पना व शब्दों का संयोजन है रचना में यथाः…..

।।दोहा।।
सम्वत उन्नीसै त्रैसट्यां, साणिकपुर सामान।
शुक्ल पक्ष आसोज में, श्री हिंगऴाज सुथान।।

इसके ठीक नवमास बाद आषाढ शुक्ला नवमी को भगवती का अवतरण निर्दिष्ट स्थान पर हो जाने के बाद विभिन्न कवेसरों ने सहज सुन्दर व सरस सटीक वर्णन किया है यथा कुछ दृष्टान्त:[…]

» Read more

अवतरण अर प्रवाड़ां रो गीत

।।गीत।।
प्रथम देश जैसाण बीकाण प्रगटी पछैं,
बरजियो भांण बेड़ो उबारियो।
अबै परब्रह्म वाऴी प्रकृति अद्रजा,
धजाऴी मद्र अवतार धारियो।।1।।

बंस रतनूं धनो छात बीसोतरां,
धनो धिन मातरी मात धापू।
बाप सागर धनो सकति मा बापरो,
बाप-मह धिनो शिवदान बापू।।2।।[…]

» Read more

इंद्र बाईसा का शिखरणी छंद – हिंगऴाजदानजी कविया

।।छंद-शिखरणी।।
ओऊँ तत्सत इच्छा बिरचत सुइच्छा जग बिखै।
लखै दृष्टि सृष्टि करम परमेष्टि पुनि लिखै।।
तुहि सर्जे पालै हनि संभाऴै उतपति।
अई इन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवति।।1।।

क्रतध्वंसी विष्णु कमलभव जिष्णु स्तुति करै।
हिमांसू उष्णांसू पदम-पद पांसू सिरधरै।।
हगामां हमेशां बजत त्रिदवेसां नववती।
अई इंन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।2।।

» Read more

परिचय: राजकवि खेतदान दोलाजी मीसण – प्रेषित: आवड़दान ऊमदान मीसण

चारण समाज में ऐसे कई नामी अनामी कवि, साहित्यकार तथा विभिन्न कलाओं के पारंगत महापुरुष हुए हैं जो अपने अथक परिश्रम और लगन के कारण विधा के पारंगत हुए लेकिन विपरीत संजोगो से उनके साहित्य और कला का प्रसार न हो पाने के कारण उन्हें जनमानस में उनकी काबिलियत के अनुरूप स्थान नहीं मिल पाया। अगर उनकी काव्य कला को समाज में पहुचने का संयोग बेठता तो वे आज काफी लोकप्रिय होते।

उनमे से एक खेतदान दोलाजी मीसण एक धुरंधर काव्य सृजक एवं विद्वान हो गए है।[…]

» Read more