मा देवनगा

।।छंद – गयामालती।।
मही मेदपाटं विदग मंडण,
धर पसूंदं तूं धणी।
तप त्याग दिनकर ध्यान तारां,
जपै माल़ा जोगणी।
वन बाहर विचरण बाघ वाटां,
गुढै नदियां गाजणी।
अई देवनगा नमो आढी, भगतजन दुख भंजणी।।1[…]

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सुंधा मढ ब्राजै सगत

छपन क्रोड़ चामुंड अर, चौसठ जोगण साथ।
नवलख रमती नेसड़ै, भाखर सूंधा माथ।।१

झंडी लाल फरूकती, जोत अखंडी थाय।
मंडित मंदिर मात गिरि, राजे सुंधा राय।।२

रणचंडी दंडी असुर, सेवक करण सहाय।
बैठी मावड़ बीसहथ, सगती सुंधाराय।।३

डाढाल़ी दुख भंजणी, गंजण अरियां गात।
भाखर सुंधा पर भवा!, चामंड जग विख्यात।।४[…]

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सूंधाराय सताईसी

जुगती नह कछु जाणबो, निजपण उगती नाय।
भगती उर भर भावना, गिर सूंधा सुरराय।।1

विसन भूतपत ब्रहम जिथ, कर नीं सकिया काय।
जनहित प्रगटी जोगणी, सो सूंधै सुरराय।।2

वडा देव हुय बापड़ा, पड़िया आय’र पाय।
रोल़विया असुराण रण, सो सूंधै सुरराय।।3

सगत पास श्रीमाल़ रै, बसै सदा वरदाय।
अखै जगत अघटेसरी, निमख लखै कहु नाय।।4[…]

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सैणी-सुजस

।।छंद – रेंणकी।।
लाळस कव लूण एक ही लिवना,
रात दीह हिंगळाज रटी।
वीदग रै घरै बेकरै बाई,
पह निज देवी तूं प्रगटी।
सकळापण जांण आंण ले सरणो,
नत हुय सुर नाग नमै।
जुढिये इळ विमळ सैणला जोगण, रंग सोनथळ मात रमै।।
जिय रंग सोनथळ मात रमै।।१[…]

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रँग शीलां रखवाल़िया,जोर झिणकली झाड़!!

एक जमानो हो जद अठै रा नर-नारी मरट सूं जीवण जीवता अर सत रै साथै पत रै मारग बैवता। हालांकै धरती बीज गमावै नीं आज ई ऐड़ा लोग है जद ई तो ओ आकाश बिनां थांभै ऊभो है अर ऐड़ै नर-नाहरां री बातां हालै। पण उण दिनां री बातां बीजी ही। बीसवैं सईकै री बात है भाडली(जैसल़मेर) रा भाटी रुघजी मानसिंहजी रा (रुघराजजी /रुघनाथजी) धाट रै गांम छौल़ रै सोढा संग्रामसिंह अमरसिंह रां रै परण्योड़ा हुता। सोढीजी रो नाम गीतांकंवर हो। उणां री जोड़ायत सोढीजी, एक’र आपरै पीहर छौल़ गयोड़ा हा। रुघजी रै रावल़ै बात चाली कै सोढीजी नै आणो(लेने के लिए) मेलियो जावै। बात तय हुई कै जोगराजजी बीठू नै मेलिया जावै। वै जावै अर सोढीजी नै ले आवै। जोगराजजी नै बुलाय’र मा सा कह्यो कै- “बाजीसा आप ऊँठ लेय’र पधारो अर छौल़ जाय’र बीनणीसा नै ले आवो। आप तो उणरै माईत हो सो नीं उणरै संकोच री बात नीं आपरै।”[…]

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रे बाजे समदर तीरां

।।गीत जात बुध चित्त विलास।।

रे बाजे समदर तीरां!
मादल़ डफ चंग झांझ मंजीरा!
नवलख संग नित रास रमे रव गूंजे गगन गंभीरा!
घरर घरर समदर घुघवाटे,निरमल़ उछल़त नीरा!
समदर तीरा![…]

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जोग माया रो गीत सपाखरु – कविराज लांगीदास जी

देवी झंगरेची, वन्नरेची, जळेची, थळेची देवी;
मढेची, गढेची देवी पादरेची माय।
कोठेची वडेची देवी सेवगाँ सहाय करे,
रवेची चाळक्कनेची डूँगरेची राय।।1[…]

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