जीत रण बंका सिपाही – कवि मोहन सिंह रतनू

आज संकट री घडी हे,
देश पर विपदा पडी हे,
कारगिल कसमीर मे,
कन्ट्रोल लाइन लडखडी हे।
जुध रो बाजे नगारो,
सुण रह्यो हे जगत सारो,
दोसती री आड दुसमण,
पाक सेना अड़वड़ी हे।
सबक तु इणने सिखावण, जेज मत बीरा लगाई।
जीत रणबंका सिपाही, जूंझ रण बंका सिपाही।।१।।[…]

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सैनांणी

छत्राण्यां इण छिति, गुमर रची जग्ग गाथा।
सुणियां अंजस सरब, माण में झुकज्या माथा।
आंण थरप इण अवन, ध्यांन सुजस दिसी धारी।
ज्यांरी कीरत जोय, साची जपै संसारी।
इल़ नांम अमर अजतक अहो, रसा अरक लग रैवसी।
बैवसी बात वसुधा परै, कवी सदाई कैवसी।।[…]

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भूरजी, बलजी पर बड़ौ साणौर गीत – महाकवि हिंगलाजदानजी कविया

लखे घोर घमसांण ऊडांण ग्रीधण लहै,
अपछरां पांण बरमाऴ ओपै।
ऊगतो विचारै भांण आरंभ इसा,
किसा कुऴ भांण रै सीस कोपै।।

बाट उप्रवाट बहता थका बाहरू,
उरस अड़ि अबीढै घाट आया।
दाटणा जिका कुज्रबाट दीपक दहूं,
थाटणा थाट मुह मेऴ थाया।।[…]

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भाव व भाषा का सुभग संगम: मेहाई महिमा

कवि श्रेष्ठ सागरजी कविया, जिन्हें कवियों ने ‘सागर सिद्ध’ की संज्ञा से अभिहित किया है, की गौरवशाली वंश परंपरा में रामप्रतापजी कविया के घर वि.सं.1924 की माग शुक्ला 13 शनिवार के दिन सेवापुरा गांव में कवि पुंगव हिंगलाजदान जी कविया का जन्म हुआ। कुशाग्र बुद्धि, विलक्षण स्मृति, वाग्मिता, आदि गुण आपमें वंशानुगत थे। यही कारण है कि आप एक नैसर्गिक कवि थे। आपका समग्र काव्य हृदयग्राही व चित्ताकर्षक है। डिंगल़-पिंगल़ में आपको समरूप प्रावीण्य प्राप्त था तो साथ ही आप संस्कृत व उर्दू में भी निष्णांत थे। यही कारण है कि डिंगल़ के मर्मज्ञ विद्वानों ने आपको डिंगल़ परंपरा का अंतिम महाकवि माना है जो वस्तुतः सत्य प्रतीत होता है।

आपकी उल्लेखनीय रचनाएं हैं-‘मेहाई-महिमा‘, ‘दुर्गा बहतरी’, ‘मृगया-मृगेंद्र’, ‘अपजस-आखेट’, ‘प्रत्यय-पयोधर’, ‘सालगिरह शतक‘, ‘वाणिया रासो’। इन महनीय रचनाओं के अलावा आपके कई डिंगल छंद व चिरजाएं शक्ति की भक्ति में प्रणीत हैं जो अत्यंत प्रसिद्ध व लोकप्रिय हैं।[…]

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गीत सांगा मैणा रो-कल्याण दास गाडण कहै

।।गीत मैणा सांगा रो।।
—कल्याण दास जाडावत कहै—

कड़िबांधी तणो भरोसो करतां,
तीन च्यारि लागी तरवार।
‘सांगला’ तणी कटारी साची,
मारणहार राखियो मार।।
सांगा, जो कि अपनी कड़बंध अर्थात तलवार पर हमेशा भरोसा रखता था यानी जिसे अपनी प्रहार क्षमता पर पूरा विश्वास था। भलेही उसे तीन चार प्रबल प्रहारों का सामना करना पड़ा लेकिन ऐसी विषम परिस्थिति में भी उसने अपनी कटार के वार से उस दुश्मन को मार गिराया जो उसे मारने को उद्धत था।[…]

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सूजै जिसो नह कोई शेखो !

राजस्थान धरती रै जायां री आ तासीर है कै वो धर, धरम अर स्त्री रै माण सारू आपरो सीस शिव री माल़ में पिरोय गरबीजतो रह्यो है।

अगूण सूं आथूण अर उतराध सूं दिखणाद रै कूणै तांई इण धर रा जाया मरण सूं नीं संकिया। मरण ई ऐड़ो! जिणरै पाण आवण वाल़ी पीढी उवां री वीरता रा दाखला देवै अर पाखाण पूतलिया थाप आपरो सीस झुकाय कृतज्ञता ज्ञापित करै। सही ई है जिणां नै सुजस प्यारो हुवै उवै प्राण नै प्यारो नीं गिणै-

सुजस पियारा नह गिणै, सुजस पियारो ज्यांह।
सिर ऊपर रूठा फिरै, दई डरप्पै त्यांह।।

यूं तो ऐड़ै नामां री नामावली इतरी लंबी है, जिणां इण अवन नै आपरी मनसा, वाचा अर कर्मणा पावन करी अर जे कोई दूठ अपावन करण आयो तो उणरै आडो आय आपरो खांडो ताण सुजस खाटियो।[…]

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आह्वान – कवि रिड़मलदान चारण

(छंद-नाराच/पंचचामर)
प्रचंड भुज्जदंड से,धरा अखंड तोल दे।
कराल रूप काल सा, त्रिकाल देख डोल दे।
भुला अतीत-रीत ना, निशंक जीत बोल दे।
पुकार आन-बान की, कृपाण म्यान खोल दे।[…]

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अपभ्रंश साहित्य में वीररस रा व्हाला दाखला

आचार्य हेमचंद्र आपरी व्याकरण पोथी में अपभ्रंश रा मोकळा दूहा दाखलै सरूप दिया है। आं दूहाँ में वीर रस रा व्हाला दाखला पाठक नै बरबस बाँधण री खिमता राखै।आँ दूहाँ रो सबसूं उटीपो पख है -पत्नियां रो गरब। आपरै पतियां रै वीरत री कीरत रा कसीदा काढ़ती अै सहज गरबीली वीरबानियां दर्पभरी इसी-इसी उकतियां री जुगत जचावै कै पाठक अेक-अेक उकत पर पोमीजण लागै। ओ इसो निकेवळो काव्य है, जिणमें मुरदां में नया प्राण फूंकण री खिमता है।

आप-आपरै वीर जोधार पतियां री बधतायां गिणावती वीरबानियां में सूं अेक बोलै-“हे सखी! म्हारो सायबो इण भांत रो सूरमो है कै जद बो आपरै दळ नैं टूटतो अर बैरी-दळ नैं आगै बढतो देखै तो चौगणै उछाह रै साथै उणरी तलवार तण उठै अर निरासा रै अंधकार नैं चीरती ससीरेख दाईं पिसणां रा प्राण हर हरख मनावै-
भग्गिउ देक्खिवि निअअ वलु, वलु पसरिअउ परस्सु।
उम्मिल्लइ ससिरेह जिंव, करि करवालु पियस्सु।।[…]

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हालाँ झालाँ रा कुँडळिया – ईसरदास जी बारहट

“हालाँ झालाँ रा कुँडळिया” ईसरदास जी की सर्वोकृष्ट कृति है। यह डिंगल भाषा के सर्वश्रेष्ट ग्रंथों में से है। इसकी रचना के सम्बन्ध में निन्नलिखित किंवदंती प्रसिद्ध है।
एक बार हलवद नरेश झाला रायसिंह ध्रोळ राज्य के ठाकुर हाला जसाजी से मिलने के लिए ध्रोळ गये। ये उनके भानजे होते थे। एक दिन दोनों बैठकर चौपड़ खेलने लगे। इतने में कहीं से नगाड़े की आवाज इनके कानों में पड़ी। सुनकर असाजी क्रोध से झल्ला उठे और बोले – “यह ऐसा कौन जोरावर है जो मेरे गांव की सोमा में नगाड़ा बजा रहा है” फौरन नौकर को भेजकर पता लगवाया गया।[…]

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म्हनै कांचल़ी रा मांगिया पांच वरस दे!!

आपां मध्यकाल़ रै राजस्थान नै पढां कै सुणां तो ऐड़ै-ऐड़ै पात्रां सूं ओल़खाण होवै जिकै फखत आपरी बात रै सारू ई जीया अर बात सारू ई मरिया। बीजी भांगघड़त में उणां रो कोई विश्वास ई नीं हो।
भलांई आपां जैड़ा आजरा तथाकथित समझणा उणां री इण प्रतिबद्धता नै खाली सनक कै कालाई समझता होसी पण उणां सारू वा बात फखत सहज ही। इयां तो राजस्थानी कवियां ई आ बात मानी है कै दैणो, मरणो अर मारणो जैड़ा तीन काम समझणां सूं पार नीं पड़ै ऐ तो नाम राखण सारू काला ई कर सकै-

नर सैणां सूं व्है नहीं, निपट अनौखा नाम।
दैणा मरणा मारणा, कालां हंदा काम।।

ऐड़ी ई एक बात है लोहियाणा रै कुंवर नरपाल देवल री।[…]

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