श्रीराम वंदना

।।छंद – मधुभार।।

करुणा निकेत,हरि भगत हेत।
अद्वैत-द्वैत, सुर गण समेत।१
हे वंश हंस।अवतरित अंश।
नाशन नृशंश।दशकंध ध्वंश।।२
रघुनाथ राम। लोचन ललाम।
कोटिश काम।मनहर प्रणाम।।३
मुखहास मंद।कारूण्य कंद।
दशरथ सुनंद।दुखहरण द्वंद।।४
वर वदन चंद।केहरी स्कंध।
जय जगतवंद्य।छल हरण छदं।।५

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श्रीकृष्ण-सुदामा प्रीत का गीत – दुर्गदानजी जी

ठहीं भींत सोवण तणी तटी रे ठकाणे,
कुटि रे ठकाणे महल कीना।।
मिटी रे आंगणे जड़ी सोनामणि,
दान कंत रूखमणी तणे दीना।।1।।

झांपली हती ओठे प्रोळ आवे झकी,
जिका न ओळखी विप्र जाहे।।
बाँह गहे सुदामो तखत बेसाड़ियो,
मलक रो धणी कियो पलक मांहे।।2।।[…]

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रंगभर सुंदर श्याम रमै – स्वामी ब्रह्मानंद जी

।।छंद – रेणकी।।
सर सर पर सधर अमर तर अनसर,करकर वरधर मेल करै।
हरिहर सुर अवर अछर अति मनहर, भर भर अति उर हरख भरै
निरखत नर प्रवर प्रवरगण निरझर, निकट मुकुट सिर सवर नमै।
घण रव पर फरर धरर पद घुघर, रंगभर सुंदर श्याम रमै।।[…]

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गीत वांमणावतार रौ – महाकवि नांदण जी बारहठ

गीत वांमणावतार रौ (नांदण कहै)

आखै दरबार ब्रिहामण उभा,अंग दिसै लुघ वेदअगांह।
रीझ सु इती दीधयै मो राजा,मांडू मंढी जिती भुंम मांह।।1

विप्र विनंतिपयंपै वांमण,मैहर करै लेइस माप।
इळ थी आठ पांवडा अमकै,एकण कुटी जिती तूं आप।।2

जग ताहरा तणौ सांभल जस,हूं आयो मन करै हट।
दुज उंचरै दीये मो दाता,धर्मसाला जेतली धर।।3[…]

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सुबोध बावनी – कवि देवीदान देथा (बाबीया – कच्छ)

[…]वेद सार खंड ससि, वाम अंक गति मिति,
नौमि गुरू शुक्ल मधु मास के समास ही।
देथा मारू चारन जो भव्य है कहाति जाति,
देस कच्छ स्वच्छ ग्राम बाबिया निवास ही।
देवीदान दीनो “देवी दास” ही प्रकास कीन्हौ,
नवीनो नगीनो ग्रंथ बावनी विलास ही।
सुबुधि उपावनी सो, ताप को नसावनी है,
भावनी सुजान को, बढावनी हुलास की।।५४।।[…]

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गये बिसारी गिरधारी – त्रिभंगी छंद – स्व. देवीदान देथा (बाबीया कच्छ)

।।छंद त्रिभंगी।।
ब्रज की सब बाला, रूप रसाला, बहुत बिहाला, बिन बाला,
जागी तन ज्वाला, बिपत बिसाला, दिन दयाला, नंद लाला।
आए नहि आला, कृष्ण कृपाला, बंसीवाला, बनवारी।
कान्हड़ सुखकारी, मित्र मुरारी, गये बिसारी, गिरधारी।।१[…]

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सियावर रामचंद्र

बरसां सूं अजोध्या नगरी मांय उदासी छायोड़ी है। सगळा लोग-बाग आप-आपरै धरम-करम मांय रच्या-पच्या, आयै दिन रा काम-काज नीत-सास्तरां रै बतायै मुजब कर रिया है। घर-गिरस्थी वाळा लोग अतिथियां री सेवा, माता-पिता रो माण अर गुरुवां रो सनमान पूरै मनोयोग सूं करता आपरो जीवण जीवै। किणीं नैं किणीं सूं कोई अड़ी-ईसको नीं, कोई खींचताण नीं, कोई सिकवा-सिकायत नीं, कोई कोरट-कचेड़ी रो काम ई नीं।[…]

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भगत माल़ – गीत चित्त ईलोल़ -कवि ब्रह्मदास जी बीठू माड़वा, जैसलमेर

।।गीत – चित्त ईलोल़।।
प्रसण हुय प्रहल़ाद ऊपर, हर दिखाये हत्थ।
पाड़ सब्बल़ दैत्य पाड़्यौ, करण अदभुत कत्थ।।
तौ समरत्थ जी समरत्थ, सारी बात हर समरत्थ।।१

बाल़ धू वन जाय बैठौ, करण सेवस कांम।
देव अपणी ओट लीन्हौ, धणी अवचल़ धांम।
तौ निध नांम जी निध नांम, जग में व्यापियो निध नांम।।२[…]

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तनै रंग दसरथ तणा

बाप दियो वनवास, चाव लीधो सिर चाढै।
धनख बाण कर धार, वाट दल़ राकस बाढै।
भल लख सबरी भाव, आप चखिया फल़ ऐंठा,
सारां तूं समराथ, सुण्या नह तोसूं सैंठा।
पाड़ियो मुरड़ लंकाणपत, भेल़ो कुंभै भ्रात नै।
जीत री खबर पूगी जगत, रसा नमी रघुनाथ नै।।[…]

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अभिराम छबि घनश्याम की

।।कवित्त।।

मोरपंखवारा सिर, मुकुट सु धारा न्यारा,
नंद का कुमारा ब्रज, गोप का दुलारा है।
कारा कारा देह, मन मोहता हमारा गिध,
गनिका उबारा अजामिल जिन तारा है।
वेद श्रुति सारा “नेति नेति” जे पुकारा, जसु-
मति जीव-प्यारा मैने, उर बिच धारा है।
आँखिन की कारा बिच घोर हा अँधारा, सखि !
कृष्ण दीप बारा, तातें फैला उजियारा है।।१[…]

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