ठिरड़ै रा ठाट


–8–
।। ई काणिये मारिया पा?।।

शेर नै ई सवाशेर‘ अर ‘बाबै के ई बाबो‘ जैड़ा कैतांणा बणिया है तो कीं न कीं कारण रह्यो है। तो आ ई साची है कै सौ दिन चोर रा अर एक दिन घणी रो हुवै। इयां तो आ ई साची है कै खावैलो जिणरो खेतियो ईज खावैलो ! अर खेतिया रा खावैला उणरो खो जावैलो पण जिकै खो जावण सूं नीं डरै वै ईज खेतिये रा खावण री हूंस राखै।

ऐड़ो ई एक शेखावाटी में भलो मिनख बसै। घर रै नीं बाड़ अर नीं झूंपड़ै रै किंवाड़ पण आंटीली मूंछां अर डील रो डकरेल। बातां रा लठीड़ काढै तो कमाई रै नाम माथै उण कनै रामो ई राम हरे, पण एक ठाकरां सूं बेलीपा। उणरै एक बाई। बाई परणावण सावै हुई जणै जोड़ायत कह्यो कै – “भलै मिनखां छोरी नै पराए घरै मेलणी है कीं तो करो ! घरां जैड़ो घर है अर थे जोगता मिनख ! इयां बातां सूं कियां पार पड़सी?”

लुगाई री बात सुण’र वो बोलियो – “तूं लागै, ओजूं बावल़ी बूच रैगी ! आ तो एक टींगरी है ! जे सौ हुवै तो सिंज्यां सूं पैला परणादूं। तूं तेरो काम कर म्हैं सवारै सगाई करण जास्यूं।”

लुगाई ई धणी रा लखण जाणती सो चुप रैयगी।

वो दिनूगै ठाकरां रै अठै गयो अर बोलियो – “हुकम महीणैक (एक माह)सारू थांरो घोड़ो, थांरी पूरी पोशाक अर हाजरियो म्हनै देणो पड़सी !”

आ सुण’र ठाकरां कह्यो- “क्यूं भाया ? के करसी ? किंगै काजल़ घालसी ? बता तो सरी ! लोग म्हनै ओल़बो देसी जणां !”

आ सुणर उण कह्यो – “ठाकरां ! इसी कोई बात नीं करूं अर करस्यूं जिकी समेट लेस्यूं। बात आ है कै टींगरी की सगाई करणी है। छोरी म्हांकी सो थांकी। अठै तो मरज्याणा सो कीं जाणै जिको आंतरै जाणो पड़सी।”

आ सुण’र ठाकरां, उण मांगी जिकी सगल़ी चीजां दे दीनी।

वो हाजरिये नै लेय घोड़ै चढ बहीर हुयो जको बैवतो बैवतो पोकरण रै पाखती पूगो। एक ठावकै गांम री तल़ाई माथै घोड़ो पायो गांम री गल़ियां में घोड़ो लारै खांचर फिरण लागो। एकाएक उणरी निजर एक ठावकै घर माथै पड़ी। उण देखियो कै जैड़ो ठावको घर बैड़ो ई उणरो नामी उतारो(कोटड़ी)। उतारै आगै पांच -सात भला मिनख बैठा हथाई करै जितै उण आय रामासामा किया।

बैठोड़ां ई उठ आवकारो दियो- “जी आया ! भलां आया ! केथ विराजणो आपरो?” पूछियो तो उण कह्यो – “मेरो गांम शेखावाटी में !”

“भला इया कीकर ?” उणां चमकतां पूछियो तो उण कह्यो कै – “के बताऊं हाकमा? मेरे एक बाई है। बींकी सगाई करणी। ई बिचारै हाजरिये नै लेय’र लारलै एक साल सूं फिर रह्यो हूं। कठै ई छोरो नीं जचै तो कठै ई खोलड़ो नीं जचै। थांरै ढूंढियो तो ठीक ई दीसै ! ढूंढियो देख’र तो लागै कै अबै अठै ई दस्तूर करदूं। फिरतो फिरतो आंती आयग्यो ! बाई का करम है तो औरूं ढूंढो सुधर जासी पण कदै-कदै ई जचै कै औजू़ं देखल्यां पण बापड़ो ओ हाजरियो मेरी गेल फिर फिरके मराको हुयग्यो पण के करां? सुभाव ई खोड़ीलो है !”

बो भल़ै कीं कैतो जितै उवां मांय सूं एक डोकरो बोल्यो- “बडा सिरदार ! बाई आप करमी हुवै। जे थांनां म्हांरै ए झूंफड़ा दाय है तो म्हारै टिपुड़ै नै बायलकी दो परी। गुण मान हां अर थांरी बाई दूध में अलोएर अर घी में खाएहे ! बीजो तो हमै की बतावां?”

जणै उण कह्यो कै – “थांरो छोरो नै बतावो।”

उणां छोरो बतायो। छोरो पड़ में मांडै जैड़ो, पण उण देखर कह्यो -“अब है जिस्यो ई ठीक है मेरै सूं घणो फिरीजै कोनी !
जिको हूं दस्तूर करस्यूं पण म्हैं फिरतो-फिरतो खर्चा खूट हुयग्यो। गांम आंतरै अर अठै म्हनै कोई जाणै कोनी तो के करां?बताओ? टीका को दस्तूर म्हैं मेरे घर जोग करस्यूं पण हाथ कोनी पूंचे !!”

आ सुण’र इणा़ं मांय सूं एक आदमी कह्यो – “भला भला ! में संकीजण री की जरूत ? आंपै घर भाती पा हुवा ! आपस मेंआंतरां अल़ूझावां पछै की बाकी रह्यो? थे बतावो जिती रकम उधारी पी दां, उठै पाछी पी दिराया ! उधारो लाय में को बल़ै नीं !”

आ सुण’र एकर तो उण माथो धूंणियो अर कह्यो – “मालकां इयां कियां करूं? मेरी सात पीढी लाजै। दिया जिनै म्हैं ई दिया पण अब के करां आगै कुवो अर लारै खाई की बात हुयगी !”

आ सुण’र इणां कह्यो – “अरे में संकण री मुल़गी ई जरूत नीं ! थे बतावो कितरी रकम दां?”

जणै इण कह्यो – “एक हजार दे दिरावो ! बाई रा फूल बाई नै ! म्है तो अठै ई दस्तूर में लगा देस्यूं !”

उणां हजार रुपिया दे दिया। इण पंद्रह-बीस रुपिया तो गुड़ आद दस्तूर में खरचिया बाकी आपरी अंटी में घालिया क्यूंकै वो जाणतो कै विद्या कंठै ! नाणो अंटे !!

इण आपरै सगां नै कह्यो कै – “जान जचै जितरी लाया पण काणो, खोड़ो अर बाडो मिनख जान में मत लाया जे ले आया तो म्हारै सूं कोई भूंडो नीं हुवैला अर फलाणै सावै माथै जान ले आया” आ कैयर इण सीख ली।

तय सावै माथै जान संभी। बींद रो एक मामो काणो ! किणी कह्यो बापड़ो सगो कैयर गयो कै काणै नै जान मत लाया तो किणी कह्यो कै मामै नै कीकर टाल़सो? सेवट किणी कह्यो ले लिरावो इती मोटी जान में कांई ठाह लागै कै कुण काणो हैअर कुण बाडो?

जान आयगी। धरमशाल़ा में डेरो दे दिरायो। चोखा जीमण किया। चोखी खातरी की।

दिनूगै एक दरजी आयो जको हर जानी नै पूछियो कै आप आपरी मनपसंद पोशाक बता दिरावै अबार समठूणी में ओढावणी री दी जासी। जानियां आप-आपरी पसंद लिखाई जितै एक सुनार आयो अर हर जानी नै पूछियो कै वो आप-आपरी पसंद री एक सोने री रकम(आभूषण) बता दिरावै ताकि अबार समठूणी में ओढावणी री हर जानी नै दी जासी ! जानियां आप आपरी पसंद लिखा दी जितै दो तीन जिणा लियोड़ो खुद सगो आयो अर मांचै मांचै फिर’र जंवारड़ा करण लागो जितै उणनै एक मांचै माथै एक काणो आदमी दीखियो ! उण बींद रै बाप नै हेलो कियो अर पूछियो- “ओ के है? ई काणिये के अठै आणकी हिम्मत कियां हुई?”

बींद रै बाप संकतै-संकतै कह्यो- “हुकम ऐ तो बींद रै मामोसा है !”

आ सुण’र उण कह्यो कै “मेरे बणाऊं मामोसा हुवो भलांई काकोसा ! मेरी तो नाक कटगी नीं ! मेरी सात पीढी में कोई काणो जानी नीं आयो। मेरी छोरी का करम ई इस्सा है ! जिको थां बरगां सूं भेटा हुया। अब कोई बात कोनी। रांधेड़ै धान को म्हैं के करूं? फेरा तो उधड़ै कोनी पण अब थांनै म्हैं दूं तो के? पाणी कोनी पाऊं !! मेरे भाईपा नै ई काणियो को बेरो पड़ै जितै बहीर हुयजावो !!” आ कैय’र उवो तो आयो ज्यूं ई गयो अर आपरी बेटी नै एक ओढणै में सीख दे दीनी।

मारग में जानियां मांय सूं एक बोलियो कै – “हणां म्हारै कानां में सांकल़ै मुरकै होवत” तो दूजो बोलियो “भइया हणां म्हारै गल़ै में गोप होवत पण हराम ई काणिये मारिया पा !! ”


–7–
।। देयग्यो दस ! लेयग्यो अस्सी !! ।।

ठिरड़ै रा मिनख हिम्मत रा कोट अर जीभ रा मिठा ! तो तनचारो निभावण में एक सूं बध’र एक। ठिरड़ै रै किणी भलै गांम रै एक भलै मिनख री बैन अगूण रै किणी गांम में परणायोड़ी। उवो आपरी बैन नै मिलण रै मिस उवै गांम कानी टुरियो। बैतो-बैतो थकग्यो। बिंसाई खाय-खाय कायो हुयो पण धोरा धरती में पैंडो छीझै ई नीं। सेवट कायो हुयग्यो। जितै उणनै किणी धोरै सूं ढल़ती एक भतवारण दीसी। भतवारण नै देख’र उणरी आंख्यां चमकी जाणै बुझतै दीये में तेल घातियो हुवै ! उण खाता पग भरिया सपड़क-सपड़क अर धोरे ढल़ती भतवारण नै लारै सूं हेलो कियो-“हे बाया ! हे बाया !! ऊभी रह ! ऊभी रह !! हेलो सुण’र भतवारण चमकी अर जोयो तो उणनै एक असंधो आदमी दीखियो। असंधो आदमी देखर उवा बैय बोकरी ! जितै उवो आदमी आय भेल़ो हुयो अर कह्यो- “अरे बाई ! तूं थकांणी ! थोड़ी ठंभै फूंकारो खाय, इयां की भीनी सूकै ! ले थारी थोड़ी ओडी उतरावां ! थोड़ी नस पाधरी कर !!”

लुगाई देखियो आदमी भलो दीसै पछै बापड़ो कैवै तो रुकण रो ईज है ! उवा रुकी कै उण टप ओडी रै हाथ देयर नीचै मेलाई। ज्यूं ई उण ओडी नीची मेली अर तुरत ई कह्यो- “ले बाया ! थोड़ो थारै भाऊ नै ओलण घाल ! बेपारो करां !”

लुगाई कह्यो- “मींडा म्हारै गूढै ठाम नीं है ! अर बिनां ठाम थांनै ओलण किणमें घालां?”

“ठाम नीं तो शंकण री अंकै ई जरूत नीं है, हूं कोई मैमाण नीं ! तूं इयां कर हेक रोटी नीचै मेले अर दूजी रोटी उवै माथै मेल’र भाऊ नै ओलण घाल परो !” उण आदमी कह्यो तो लुगाई शंकीजती बोली- “दूजोड़ी रोटी में तो तिणो है !”

“अरे ! काली आ ई म्हनै बतावणी पड़ैला कांई ? कै तिणो है तो हेक रोटी ई तिणै वाल़ी रोटी रै नीचै दे परी !
ई में भेल़ी में भेल़ी हुवण री की जरूत?”

उवो रोटी जीम’र आगे आपरी बैन रै सासरै री ओरण में पूगो। उण देखियो कै दो थूंभाल़ी सांढियां ऊभी चरै ही। उण तेवड़ली कै सवारै जावती बखत ई मांय सूं एक रै माथै डोल़ अर दूजी नै खंचाऊं जरूर करणी। बैन रै घरै पूगो। बैन कोड किया क्यूंकै ‘सासरै जंवाई अर बैन रै भाई !!’ बैन राजी। घरवित्त रा समाचार पूछतां-पूछतां भाई पूछियो कै- “बाया ओरण में दो सांढिया ऊभी है, ऐड़ै ऐड़ै रंग री। भटारै की मच्योड़ै है ! भले-भले पण है किण री?”

बैन कह्यो कै एक आपांरी अर एक फलाणजी मेघवाल़ री है। ठीक-ठीक ! हमे हूं सोऊंलो। सूंवण लागो जणै आपरै मांचै माथै ओढण नै रजाई देखी तो बैन नै हेलो कियो- “अरे बाई ! , ऐथ आ ! ओ की कियो बडभागण? म्हारै सिरख खुबै तूं तो इयां कर कोई भाखलो हुवै तो उरो दे ! म्हनां भाखलै टाल़ नींद नीं आवै।” आ सुण’र बैन कह्यो कै-“भाऊ रजाई कंवल़ी रैसी अर भाखलो तो बरड़ो गाभो हुवै ! उवो थांरै खुबसी !” तो ई पाछो कह्यो- “अरे नीं काली ! म्हनै भाखलै टाल़ मुल़गी ई नींद नीं आवै तूं लाए दे।” बैन भाखलो दे दियो, उवो सूवतो बोलियो- “सांभल़ै हूं साकल़ै छेको ई बहीर होऊंलो ! तूं फोड़ाणी मत होए !”

उवो भलो मिनख उठियो जको भाखलो खांधो घालियो सांढियां हुती जठै आयो पण ओ कांई एक ई सांयढ ! उवै थोड़ी घणी इनै-बिनै जोई सेवट एक माथै भाखले री डोल ठाय आपरै गांम कानी सांगाणी लेय बहीर हुयो।

दिनूंगै बैन रो सुसरो आपरी सांयढ लावण ओरण में गयो पण सांयढ मिली नीं। उणां पग देख’र ओल़ख लिया कै सांयढ नै सग्गो मिलग्यो। उवो घरै आयो अर आपरी बहुआरी नै सुणावतां बोलियो-

भाई आयो अर बैन हंसी !
देयग्यो दस अर लेयग्यो अस्सी !!

ठालोभूलो डकरेल आंपणी ईज सांयढ ले ढल़ियो पण हूं दो आदमी लेय’र लारै जाऊंलो जको पाछी ले आऊंलो।

बैन रो सुसरो ई दो मिनख लेय’र उणरै गांम लारो रो लारै पाधरो पूगो अर उणरै उतारै में ठैरग्यो। अठीनै उवो भलो मिनख जाल़ा में सांयढ नै बांध घरै आयो तो देखियो कै उतारै में बोलाल़ो कैड़ो? उवै आय’र देखियो तो आगे उणरा गिनायत। उवो हामल़ो मिलियो- “भलां आया, जी आया पण हणै इयां एकाएक कीकर ? की काम बीजो हुवो?” कह्यो तो बैन रै सुसरै कह्यो- “बडा सिरदार तैं फोड़ाणा किया जणै ऊभघड़ी आणो पड़ियो !” आ सुणर उण कह्यो- “म्हैं कीकर फोड़ाणा किया ?” थे थांरी बैन वाल़ी सांयढ ले आया !” उणां कह्यो तो इण चमकतै कह्यो- “अरे नीं बडा सिरदार ! हूं सांयढ बाई री नीं, हूं तो फलाणै मेघवाल़ वाल़ी स़ायढ लायो !!”

आ सुण’र बैन रै सुसरै कह्यो- “क्यूं ? उवै में थांरै भाभैजी री पांती ही कांई?”

आ सुण’र उण कह्यो–“हुवो भइया ईं ढूंढ बढाया !!”


–6–
।। भाई रै ऊं ई छाती रांधतो ! ।।

काल़ रो बखत अर कमाई रो कोई जरियो नीं, ऐड़ै बखत में ठरड़ै रा पगाल़ मिनख अगूण रै गांमां कानी मीट देयर इयां टुरता जाणै हिल़ी हिल़ी लांकड़ी अड़क मतीरा खावै। ऐड़ी बखत में एक भलो मिनख अगूण रै गांमां कानी आयो। किणी गांम री कांकड़ में आयो तो उण देखियो कै एक खेत में ठावकी ढाणी। नामी बारलो चंवरो ठायोड़ा। ढाणी रै आगै भैंस्यां उगाल़ै ! चंवरै में मांचां अर रालियां पड़ी तो एकै कानी पाणी री मटकी ई भरी। उण विचार कर लियो कै ढाणी किणी मोतबर चौधरी री है। उण मन में सोचियो ‘जाट जठै थाट।’ महिणो कन अठै ई कूटै काढां ! आगै कांई कसीदो काढणो है आ सोच’र वो ढाणी आगै आयो तो देखियो एक बडी(प्रौढावस्था या इण सूं ऊपर री आयु री जाट स्त्री ) बिलोवण करै ही झगड़क-मगड़क ! झगड़क-मगड़क !! उण जायर बडी नै राम राम किया तो बडी ओल़ख लियो कै कोई रोट्यां रो मैमाण है ! बडी कह्यो- “आवो रा भाई आवो रा ! कित का हो ?”

“म्हारो गांम बडी काल़ै कोसां है ! नाम भलो है पण थांरै की काम पड़ै म्हांरै गांम सूं ? थांरै रामजी राजी।”

ठरड़ै रै वासी कह्यो तो बडी पाछो पूछियो- “तो भाई किसो गांम है थांरो?”

जणै उण कह्यो- “म्हारो गांम ठेठ पोकरण रै पासै फलाणो ! कदै ई सांभल़ियो?”

बडी कह्यो- “अरे कठै नाम लेवै नीनामो रो ? पैलकै ई एक थारै जैड़ो भलो दीखणियो थांरै कानलो एक मिनख म्हारै दो बैड़कै(युवा गाय) ले ढल़ियो, जको आज रो दिन अर काल री घड़ी। पाछी बासी ई नीं ! पण थे कूंकर आया हो ?”

बडी कह्यो तो उवो कैवण लागो- “अरे ई निधणीकै नै बोगी खावै रे ! ऐड़ै भलै मिनखां सूं ई नीं चूको। बडी थे सही कैवो, मिनख री कांई चामड़ी बासै। थे भलो कियो पण उवै अभागै बुरो कियो ! पण थे सोच मत करो हूं उवै गायां थांनै पाछै संभलार जावूंलो। उवै हराम नै हूं है जठै ई जोय लूं लो जे नीं जोवूं तो म्हनै लख लाणत ! हणां म्हनै तनचारै में आगै जाणो है, पण हूं पांतरां नी।”

उणरी मीठी बातां सुण’र बडी देख लियो कै ई रोटी री जागा तो कर ई ली। बडी पूछियो- “कै सिरावण करोला?”
तो उवै कह्यो- “थे म्हारै मा जैड़ा ! थां थोरो पो कियो तो हमै नां पण कांकर दां?”

बडी एक रोटी र राब आगै मेलतां कह्यो- “भाई रे ! उवो पैलको भलांई म्हारी गायां लेयग्यो हुवै पण हो पण वाल़ो, रोटी बिचारै कदै ई एक सूं बधीक नीं ली। लो करो सिरावण।”

उण तो राब में रोटी मसल़र दो-तीन कवां में ई रोटी सूं मिल लियो अर बडी नै पूछियो- “बडी ओ चाडो थांरै ठावको है ! जूनो दीसै !”

आ सुण’र बडी बतावण लागी कै- “ओ मेरी सासू कै हाथ को है, कोलायत वाल़ै मेल़ै सूं डोकरी उखणैर लाई ! बडी आगै कीं बोलती जितै उवै कह्यो- “बडी थोड़ी रोटी दो !” तो बडी कह्यो- “हां बो ई किना किना आधी रोटी ऊपर लेतो !” आ कैयर आधी रोटी झलाई।

बो रोटी चूर’र भल़ै पाछो बोलियो कै- “बडी आ माकड़ी ठावकी दीसै ! जूनी हुसी?”

बडी कह्यो आ माकड़ी मेरलो सुसरो ठेठ नागौर मेल़ै सूं फलाणै वरस लाया !” बडी कीं आगै बोलती जितै उण कह्यो- “थोड़ी रोटी भल़ै दो !” जणै बडी कह्यो- “हां बो ई किना किना चौथाड़ोक रोटी मांगतो, बाकी करड़ो संकाल़ू हो।” बडी चौथाड़ोक रोटी दी तो उण तो भक बोलाई अर पाछो कह्यो-“बडी ओ नेतरो जूनो दीसै !”

बो भल़ै कीं कैतो जितै बडी कह्यो- “भाई रे ! हूं तो ऊं ई कैती ! , बो ई तेरलै दांई री दांई छाती रांधतो !” ले ऐ रोट्यां रंजर जीमलै।

बो भाई तो रोट्यां जीमर चंवरै में जाय’र आराम सूं सूयग्यो। पांच-सात दिन उठै ई जमियो रह्यो। एक दिन आंती आय’र बडी कह्यो- “भाऊ तूं कैतो नीं कै- म्हारै आगै केथ ई तनचारै में जावणो है !” तो तूं जा परो हूं आज थोड़ी म्हारी मा सूं मिलण जाऊला। आ सुण’र उण देखियो कै हमै अठै सूं बहीर हुवणो पड़सी पण हणै वाल़ी टंक टाल़ लां तो कैड़ीक हुवै आ सोचर उण कह्यो- “बडी थे म्हनै घणो सोरो राखियो। म्हैं थांनै घणा रोभा गातिया। तकलीफ दी। म्हारै घणो आगो जाणो है हणै रोटी वेल़ा बहीर होऊंलो जणै सोपै पड़ियां आगलै ठये पूगस़ूं।” आ सुणर बडी कह्यो- “तो कै मासी मेल़ा करै? तेरे के टीकी काजल़ करणा है जको आगो पाछो हुवै? जातो रे र हुवा !”

तो माजी रो मन चावल़ा में रह्यो ज्यूं उणरो मन टंक टालण में। उण कह्यो- “तो ई बडी थांनै फोड़ाणा किया। माफ करिया।” आ सुणर बडी कह्यो- “के मेरे मृतगाल़ के घालै ज्यूं कानां घालै? लाडी म्हनै घणी लडावण की जरूत कोनी। फोड़ा दिया ! जका दे काढ्या, अब तूं इत हूं खुच परो। क्यूंकै मेरा छोरा घरै कोनी अर बहुआरड़्यां में चाड़ो कोनी, जको हूं इत हूं, जितै जातो रै, नीं जिनां कीं तचकार ले जावैलो !”


–5–
।।ओ सुपनो साचो लागै!।।

ठरड़ो आपरी ठसक रै सारू चावो। आपां सुणता आयां हां कै एक घर तो डाकण ई टाल़ै पण ‘ऐ तो मांटी मारका ! घर रा गिणै न पारका !!‘ मतलब ओ ईज है कै ठरड़ै रा वासी आपरां सूं ई ओचबी करता नीं शंकीजै।

ऐड़़ी ई एक बात हालै कै ठरड़ै रै किणी गांम रै किणी घर में एक पुखता बा अर वांरी जोड़ायत रैवै। घर रा बीजा मोटयार भाती कठै ई आपरी चतराई बतावण गयोड़ा !

सीयाल़ै री पंचपोरी रात कटणी दोरी। केई ताल़ तो डैण – डोकरी गुरबत करी अर पछै सूयग्या। झांझरकै डोकरै, डोकरी नै हेलो कियो – “अरे फलाणै री भाभू ! अरे फलाणै री भाभू ! जागती है कै ऊंगाज्योड़ी(नींद) ? अरे भली आदमण सांभल़ै !”

डोकरी झिझक’र ऊठी अर पूछियो – “हां कांई कैवो, पड़ण देवो कै नीं?”

“अरे ! भली मिनख आज तन्नां (तूझको) हेक खुशखबरी दां !”

डोकरी कीं नींद में भंग पड़ण सूं अर कीं डोकरै रै सभाव सूं आंती हुयर रीसां बल़ती बोली – “दियोड़ी है खुशखबरी ! म्हनै तो खुशखबरी थांरो हाथ झालियो जद ई मिलगी। भल़ै कांई बाकी रैयगी, जको हमै दो? हां बतावो कांई है?”

“अरे ! बडभागण की इयां बाचका भरती बोलै? कदै नैचै सूं बात सुणल्या कर। थारै ई खोड़ीलै सभाव सूं आधी बात तो हूं पांतरणो !”

डोकरै दबक दी तो डोकरी थोड़ी मोल़ी पड़ती बोली – “हां बतावोरी की कैता?”

डोकरै कह्यो – “भला भला तन्नां की कां(कहूं)? हूं कैतो थोड़ो झिंझकां ! तूं रीहां(रीस) नीं बल़ै तो कां ! नीं म्हारी बात म्हारै गोढै!”

डोकरी भलै घर री ही उण कह्यो – “इणमें झिझकण री कांई बात? थे म्हनै लायो हो, हूं थांनै नीं ! कैवोरी। म्हारै ई धीजो हुवै।”

डोकरी कह्यो तो डोकरो कैवण लागो –
“सांभल़ै ! आज म्हनां बे सुपना लाभा(मिले, आए) है। भाई रै सुपनां भाई ! जी सोरो हुवो !”

डोकरी ई राजी हुवती पूछ्यो – “कांई सुपना आया?”

डोकरै कह्यो – “हेक सुपनो तो लाभो, जाणां च्यार – पांच कल़हे(कलश) सोनै – चांदी सूं भर्योड़ी लाधै है। हूं उखणै’र घर में लायो। हथिकी राखण लागो जितै बैरण आंख खुली। तूं रीहाजे मत ओ सुपनो तो कुड़ो पो पड़्यो पण बीजै सुपनै री बात कैवूं, तूं कान देयर सावल़ सुणजै ! जाणां म्हारै पेट में एक बे आंटा हालण लागा, केई ताल़ तो माठ झाली पछै मरोड़ा हालण लागा तो हूं झिझकैर उठियो अर कल़िये(शौचमुक्त होने के लिए) गयो पण अठै ई बैरण आंख पी खुली। म्हनै लागै कै ओ सुपनो साचो हुयोरो, तूं जो(देखना) तो ! केथ ई तन्नां धोतियो धोवणो नीं पड़ जावै !”

डोकरी बोली – “हुवो ! हुवो ! हूं समझीरी हमै अबोला रैवो।”


–4–
।।जीमियां पछै चल़ू हुवै!।।

ठिरड़ो घणी बातां रै कारण जाणीजै उण मांय सूं एक आ बात ई चावी है कै अठै रा मिनख इण बात नै पग पग माथै चरितार्थ करता कै मरद तो ओसाण बंको ओ ई कारण है कै अठै रै नरां री बातां आज ई जनकंठां में सुरक्षित है।

एक’र इण धरा रो एक ठावको मिनख खावण-कमावण निकल़ियो। दिन मा घरै गयो अर उवो मिनख एक गांम मे ढूको। उण देखियो कै एक घर रै लारै बाड़ै में लुगायां-पतायां दूआरी बीजी कर रैयी ही। उण घर रै आगै आय’र देखियो थो एक डोकरो माल़ा फेरे हो।

उण देखियो कै ओ घर कमाई सारू ठीक रैसी। अठै खाफरो! बणण में फायदो है। आ सोच’र वो टप घर में बड़ियो अर अठीनै-उठीनै थोड़ो-घणो जिको ई मिलियो उणनै वल़ाणो(कब्जे) करण लागो। जितै माल़ा फेरतै डोकरै खड़का सुणिया अर उठियो। आगै आय’र देखियो तो एक ओपरो (अपरिचित) आदमी ओरड़ी में खल़ूझा करे हो! डोकरे दब दी अर हाको कियो तो वो हांफल़ियोड़ो दोड़ियो। डोकरो ई लारै दोड़ियो। डोकरे नै लारै दोड़तै नै देख’र उवो मिनख एक भींतड़ी चढ’र कूदण वाल़ो ईज हो कै उणरै एक पग रो फिंणचियो डोकरै झलग्यो। फिंणचियो झलतां ई उवै आदमी रड़(जोर से रोना) करी अर कह्यो–“अरे बा! ओ की(क्या) करो? भला बाल़ै(नारू रोग) आल़ै पग नां (को) मत झल्लो (पकड़़ो) ! थोड़ी दया है कै नीं?”

डोकरे नै दया आयगी अर उणां दूजोड़ो पग झालण पांपल़ा किया जितै उवो तो छोडायर बो ई जा! बो ई जा!

रातरो कठै ई रातवासो लियो अर दिनूगै पाछो आगै बहीर हुयो।

भूख सूं भोगना भागै पण रोटी री तोजी नैड़ी नैड़ी बैठती लागी नीं। उवो थोड़ो भल़ै आगै बुवो तो उण देखियो कै एक लुगाई ओडी उखण्योड़ी एक दूजै मारग जावै ही। उणरो मूंडो चेल़कै में आयग्यो। उण बिरकां(लंबे कदम) भरी अर उण लुगाई नै हेलो कियो-

“हे बाई! हे बाई! अरे डीकरा ठंभै ! ठंभै !”

लुगाई इतो मीठो हेलो सुणियो तो ही जठै ई ऊभी रैयगी।

उवो आदमी नैड़ो आयो तो लुगाई जाणियो कै ई म्हनै किणी रै अबल़ेखै(दूसरे के भरोसे) हेलो कियो है पण छो कियो, म्हारै तो बाप जैड़़ो है। उण पूछियो – “हां बा! कांई कैवो?”

“व्हाला! थूं किणरी डीकरी है?”

लुगाई कह्यो – “हूं तो मानैजी री बेटी हूं !”

“भला ! भला ! मानो म्हैं आल़ो धरम भाई। तूं मानै री डीकरी! तूं मानै कै नीं डीकरा पण जोग इये नै कैवै। तूं मिल़ी पी तो म्हनां(मुझको) इयां लागै जाणै म्हारी जाई मिल़ी। आज मानो हंहार(संसार, जीवित) में होवत तूं हूं ऊवै नां फिटकारा देतो कै भला मिनख म्हनै थारै ब्याव में याद नीं कियो।”

लुगाई ऐ बातां सुण’र चमकी अर सोचियो कै ओ आदमी जरूर ई भूल में है। उण संकीजती पाछो कह्यो-
“बा! हूं तो फलाणै मानैजी री बेटी हूं। म्हनै थे ओल़खो कोनी।”

“अरे डीकरा !आ की कैवै तूं? अजै तो म्हारै खोल़ै में थारा भरिया(छोटे बच्चे की शौच) बासता होसी! म्हैं तनै घणी रमाई। आज मानो होवत तो म्हारो हकारो भरत पण वाह ईशर! थारी माया” अर इणरै साथै ई उणरी आंख्यां सूं डल़क डल़क आंसू छूटा।

उणनै रोवतै देख’र लुगाई नै ई दुख हुयो अर पाछो पूछियो कै – “बा! म्हनै कांई कैवता ?”

आ सुण’र उण कह्यो कै – “कैतो भल़ै कांई ? ओडो नीचो मेल अर थारै बा नै थोड़ो झांखल़ करा।”

आ सुण’र लुगाई कह्यो कै – “बा! हूं थांरो धरम भिष्ट नीं करूं। म्हारो पाणी थांनै आचरे नीं। हूं तो फलाणै मानैजी री बेटी हूं।”

“अरे हवै! हवै!(हां) म्हैं तन्नां ओल़खी तूं मानै री डीकरी अर मानो म्हारल़ो भाई। तूं मुल़गी(लेशमात्र) मत शंक। म्हनै झांखल़ करा।”

लुगाई सोचियो आपां, आपां री जात बता दीनी। अगलो नीं गिणै तो ई में आपां रो कोई दोष नीं अर रोटी मिनख सूं मूंघी नीं। आ सोच’र वा बोली कै – “बा ! म्हारै गूढै ठाम नीं है। थांनै झांखल़ किणमें कराऊं?”

आ सुणर उण कह्यो – “अरे डीकरा ! ठाम किण अभागिये रै जोईजै? हूं कोई मैमाण थोड़ो ई हूं ? हूं तो घर रो भाती(सदस्य) हूं, तूं अंकै ई मत शंक अर इयां कर एक रोटी माथै एक रोटी मेल’र ओलण परो घाल।”

उण कह्यो ज्यूं ईज लुगाई कियो। उवो जीमर ऊभो रह्यो अर लुगाई नै पूछियो कै – “सांभल़ै!(सुने) हूं थोड़ो ऊंचो(कम) सुणां। तैं की बतायो, किणरी बेटी है? म्हारै पांतरो पो पड़्यो।”

लुगाई कह्यो – “बा! हूं मानैजी री डीकरी ह़ूं।”

“थो! थो! ओ कियो अभागण ? म्हनै भेहट (भ्रष्ट) कियो। तूं सावल़ बता नीं सकती पण हमे की हुवै? हवो भइया जीमियां पछै चल़ू हुवै।” आ कैयर उवै आदमी तो आगै री वाट पकड़ी अर लुगाई बिचारी उणनै जावतै नै देखती रैयी।


–3–
।।म्हैं आल़ा टाबर छौ रुल़ता!।।

ठिरड़ै रो एक वासी रोजी-रोटी री तोजी में अगूण री दिशा में आयो। वो जठै ढूको वो खासो मोटो कस्बो हो। कठै ई कीं काम तो कठै ई कीं काम। काम करै जणै चोटी सूं ऐडी तक पसीनो आवै जणै जायर दैनगी पलै पड़ै। हल़दी लागै न फिटकड़ी रंग आवै गैरो ऐड़ी कोई तजबीज सोच’र आगे टुरियो। आगे देखियो तो च्यारां कानी दुकानां। उण सोचियो कै अठै कीं तोजी बैठ सकै। उण परिया सूं दीठो कै एक सोनार आपरी दुकान में एकलो बैठो है। वो उठै गयो। उण दीठो कै सोनी मो’रां(स्वर्ण मुद्रा) गिणै हो। उण सोनी सूं रामासामा किया अर अणजाण बणतै कह्यो-“अरे भइया! ऐ की है?”

सोनी दीठो कै बिचारो भोल़ो आदमी है। इणनै ध्यान नीं है कै ऐ मो’रां है। आ सोच’र सोनी कह्यो – “बा ! ऐ मो’रां है!मो’रां!समझ्या।”

आ सुण’र उण कह्यो – “भला ! भला ! की गोल़ गोल़ ठाई है ! कारीगर खामची दीहै(दिखता)। भाऊ हेक उरिया(हाथ में, नजदीक) कर तो।”

सोनी टप एक मो’र उणनै झलाई अर कह्यो – “लो ! देखो।”

उण टप हाथ में ली अर गप मूंढै में घातली।

ज्यूं ई सोनी देखियो कै बडभागी मो’र तो गिटी परी तो सोनी कह्यो – “ओ कांई करियो? म्हारी मो’र दो। म्हनै म्हारै घर वाल़ा खाय जावैला।”

आ सुण’र उण कह्यो “भइया ! गाय हती(थी) अर रतन गिटियो। म्हारै सारू तो धोल़ो धोल़ो दूध। म्हनै की ठाह तूं थारै हाथ री दियोड़ी चीज पाछी मांगसे(मांगेगा) ? हूं तो भइया भोल़ो भगर! ठैर्यो। मो’र तो म्है चखी परी। हमै कठै सूं दूं बता ? अर बिंया ई आ दीसती ज ठावकी ही, बाकी तो तोतक हो। मांयां सावलाव कीं नीं हो।”

सोनार माथो पकड़र बैठो रह्यो अर ओ भलो मिनख आगली दुकान ढूको।

देखियो दुकान कंदोई री। विध विध री मिठाइयां जची थकी। पाखती एक आदमी गिरायक नै उडीकै। कदै ई उबासी खावै तो कदै ई आल़स मरोड़ै। जितै ओ गिरायक आयो अर बैठोड़ै री आंख्यां आगै आपरी हथाल़ी फेरी।

दुकानदार कह्यो – “भला मिनख दीसो हो! जाबक इयां कांई करो? म्हारी आंख्यां फोड़ोला कांई?”

“अरे नीं भइया ! हूं तो आ देखतो कै तूं सुजाको( देखने वाला) है कै आंधो घसीड़। बाकी म्हारै कांई लेणो देणो नीं है। तूं इया़ं डरै कांई हूं कोई हाऊ बीजो नीं हूं।”

आ सुण’र दुकनदार कह्यो – “बा म्हनै सात भव रो दीसै!” आ सुण’र उण पाछो कह्यो कै – “तो भला मिनख ! ऐ इतरी मिठाइयां पड़ी है! जिकी नीं खायर तूं जारोको उबास्यां खावै! ई रो कांई कारण?”

आ सुण’र दुकानदार कह्यो – “अरे बा ! इयां हूं मिठाइयां खाऊं तो म्हारा टाबर को रुल़ै नीं? म्हारै घर री बेगी ईज काली हुवै परी।”

“तो भइया थारै बाल़कियां आडा पान फूल अर म्है आल़ा छो रुल़ता!” आ कैयर उण तो गबोगब मिठाई अरोगणी शुरू कर दीनी। उणनै इयां मोफत में मिठाई खावतो देख’र दुकानदार हाको कियो कै – “इयां कांई करो ? म्हारी मिठाई खावो!”

“अरे भला मिनख! हेक तो थारी बला म्है ली, उणरो एहसान मानणो तो आगो अर पाछो म्हनै ई घुरकावै। कैड़ो गुणचोर मुलक है थांरो! होम करतां हाथ बल़िया।”

आ कैय’र उण तो मार्ग लियो अर दुकानदार देखतो रह्यो।


–2–
।।थे इये कालै मिनख रै कयै लागा!।।

पोकरण रै पाखती रो एक गांम। भलै सरतरियै(साधन संपन्न) मिनखां री बस्ती। भला पगाल़ अर पड़ौस रा भलचाऊ। सबै धरती गोपाल़ री मानणिया। जद ई सायत मयारामजी सिंढायच कह्यो हुसी–

बार ओठा घर बंध,
पोकरणा पाड़ौसी!

उठै रा मिनख सूझबूझ वाल़ा। चौमासो आवण सूं पैला खेती रा सगल़ा संज, जावै जठीनै सूं ले आवै! क्यूंकै आपांरै अठै तो कह्यो ई गयो है कै ‘बसुधैव कुटुम्बकम।’ पछै भाई री चीज भाई रै सारू। इणमें शंकण री कांई बात? सो इण गांम रो एक भलो मिनख ऊनाल़ै रो निकल़ियो जको कठै ई रोही में चरतो एक डागो उचका लायो अर बैतै किणी चौधरी री ढाणी मांय सूं एक हल़ ई ले लियो पण उण देखियो कै हल़ में हल़बाणी नीं है! पण वो तो अलख रै भरोसै उकल़तै में ऊरणियो हो। उणनै पूरो विश्वास हो कै चांच दी है वो चूण ई देवैलो। वो घरै आयग्यो। चौमासो आयो। राटक’र मेह बरसियो, जणै उण भलै मिनख च्यार ऊमरा करण रो विचार कियो पण घरै हल़ अर जूंघ तो हो पण जोग री बात ही कै हल़बाणी नीं ही अर बिनां हल़बाणी हल़ कांई काम रो? हल़ोतियो तो करणो आ तेवड़र वो पाछो आपरै घर सूं निकल़ियो कै जुगाड़ तो करणो पड़सी!

वो खासी भां आयो। उणनै एक ताल़ाब दीखियो। उण सोचियो कै बैतां पाणी तो पी ई लूं। आ सोचर वो तल़ाई ढूको तो देखियो कै उठै एक चौधरी पाणी पीवण तल़ाई में बड़ियो पण उण आपरै कनल़ी हल़बाणी पाणी रै कड़खै राखदी अर खोबा भर भर’र पाणी पीवण लागो।

उण भलै मिनख एकै कानी हल़बाणी देखी अर दूजै कानी हल़बाणी रै धणी नै बिनां गिनर पाणी पीवतो देखर मालक नै धिनबाद देतां मन में कह्यो वा रै मोटा मोदी थारी लीला! बैठी भैंस्यां खेत मेल दियो! थारी कुदरत नै कुण लखै। हमै थारी आ ई इच्छा कै हूं हल़बाणी ले लूं!, तो हे ! आ ली। उण बा हल़बाणी आपरै पोतिये रै आंटै में घालर एकै पासै धीरज सूं ऊभो रह्यो। जितै चौधरी पाणी सूं छकर उठियो अर फुरर हल़बाणी रै हाथ घालियो तो देखियो हल़बाणी तो हार मोर हुई! पण चौधरी देखियो कै उठै ईज एक भलो मिनख ऊभो है। उण शंकतै-शंकतै उण मिनख नै पूछियो-
“थां म्हारी हलबाणी दीठी?”

आ सुणर वो भलो मिनख बोलियो – “गेलिया! हल़ोतरा री बखत है! ध्यान राखणो चाहीजै, ई तल़ाई कितरा मिनख ढूकै तनै ठाह है? म्हारै दांई सचेत रैणो। आ जो म्हैं म्हारी हलबाणी पोतिये रै वळ में राखी, गेला तैं गुमा दीनी।”

चौधरी समझग्यो कै हल़बाणी तो आ ईज है पण करणो कांई ?क्यूंकै आदमी ई लांठै घर रो दीसै! हमै कोई कारी फबै नीं। पण तो ई चौधरी हेठी नीं न्हांखी अर कह्यो कै – “हूं च्यार मिनख भेल़ा कर’र न्याय करावूंला। पाखती ई गांम है आपनै म्हारै साथै चालणो पड़सी।”

आ सुण’र उण भलै मिनख कह्यो – “भला भला आ की बात करी है? हूं बैतीयाण अर थूं म्हारै में ओचबी करै! पण भइया थारो गांम गुढै है सो थारी बात मानणी पड़सी। पण म्हनै खंखोल़ी तो खावण दे। थूं ऊभ हूं हेक छिबी खाई अर ओ आयो!” आ कैयर वो मिनख तल़ाई में बड़ग्यो। केई ताल़ चौधरी ऊडकियो पण वो तो निकल़ै ई नीं। जणै चौधरी.कह्यो – “अरे भला मिनख हमै तो निकल़ म्हारै भीनी सूखै!” आ सुण’र उण कह्यो – “सांभलै ! म्हारी धोती भीनी। परभोम, बीजी धोती केथ पकरै? अर हूं भीनोड़ी धोती केथ हालूं?”

आ सुण’र चौधरी कह्यो – “कोई बात नीं थे म्हारो ओ अंगोछो लो अर बारै आवो।” उण आदमी चौधरी रो अंगोछियो पल़ेटियो। आपरी धोती खांधै घाली अर चौधरी साथै उणरै गांम कानी टुर पड़्यो।

गांम रै गवाड़ में च्यार मिनख बैठा। चौधरी पूरी बात बातयर कह्यो कै – “थे न्याय करो, इण म्हारी इणगत हल़बाणी उचकाई!”

वै मिनख बोल़ता उणां सूं पैला ई वो भलो मिनख बोलियो – “अरे भलै मिनखां ओ आदमी थांरै गांम रो है अर थे इनै अजै सावल़ ओल़खो ई नीं। ओ तिकलातिकल कालो है। ई री जीभ में कोई साव-लाव नीं है। हणै ओ कैवै कै आ हल़बाणी म्हारी है। जे हूं थांरै कैणै सूं इणनै हल़बाणी दे दूं तो ओ कैवैलो को ओ अंगोछियो ई म्हारो है! पछै?”

वै मिनख भल़ै की बोलता जितरै चौधरी कह्यो – “अरे भाईड़ां ओ अंगोछियो ई म्हारो है!”

आ सुणर उण मिनख भल़ै मिनखां कानी जोवतै कह्यो कै – “लो जोवो ओ मिनख कालो है का ना? थे हमै मनिया कै नीं ?”

आ सुण’र मिनख ई अबोला रह्या अर वो हल़बाणी अर अंगोछियो लेयर आपरै गांम कानी बहीर हुयो।


–1–
।।बल़-बल़ रे मूवा आगो बल़!।।

सीतारामजी बीठू रो जनम सींथल़ में हुयो पण वै साठीक में खोल़ै आ गया हा सो सीतारामजी साठीका ई बाजिया।

बीसवीं सदी रा दिग्गज डिंगल़ कवि सीतारामजी री पोथी ‘कवि कंठाभरण’ छंद शास्त्र रो नामी ग्रंथ है तो भल़ै ई आपरी मोकल़ी रचनावां अणछपी पड़ी है। आपांरै अठै उणांरो एक गीत ठिरड़ै री सोभा रो गीत घणो चावो है।  इण गीत में बीकानेर इलाके रै बीठू माधजी अर ठिरड़ै रै गांम चौक(पोकरण) रै सिरदार सलजी पोकरणा रो आपसी संवाद गुंफित है।

सहज अर सरल शब्दावली में रचित इण गीत रो गीत सार आप तक पूगतो करूं–

बीकानेर इलाके रा माधजी बीठू, आठ सौ रुपिया लेयर आथूण सूं ऊंठ लावण सारू आथरणा री बखत चौक री कांकड़ में स्थित एक ढाणी ढूका।

ढाणी आगै जायर पूछियो तो ठाह लागो कै ढाणी सलजी पोकरणै री है।

माधजी घर धणी नै हेलो कियो तो एक अधखड़ आदमी बारै आयो अर पूछियो कै-‘हां भइया की कह ? ‘

बैतियाण कह्यो कै “म्हारो नाम माधो बीठू है अर हूं बीकानेरियो रोहड़ियो चारण हूं, हूं रातवासो लेणो चावूं। ”

“अरे बा भलां आया ! जी आया! म्हारी टपरड़ी पवित्र की। जी करता रैवोरा पण इया थांरो की काम ? भला की लेवण आया ऐथ?”

म्हारै कनै आठ सौ रुपिया रोकड़ी है। म्हनै एक ऊंठ लेणो है। सो इयै कारण इनै आयो हूं। माधजी कह्यो तो पाछो सलजी पूछियो कै-“अरे भला मिनख ! अबढी बखत, ओ ऊनाल़ो परभोम अर पछै इतरी सांवठी रकम। भला ! भला ओ की कियो ? जे कोई कुटल़ मिल जावतो तो की करतो ?

आ सुणर माधजी कह्यो-अरे वडा सिरदार! एक तो हूं चारण! पछै अठै च्यारां कानी पोकरणां रो पतंग। बतावो किण रीत रो म्हनै डर लागै ? साचै रजपूत रो जस करां अर जिको कुल़वट लोपै तो म्हें सुवट रो वरण करां। सलजी नै थोड़ो इचरज हुयो अर पूछियो-भला माणस ओ सुवट की हुवै ?

माधजी कह्यो कै कुलवट लोपणियै छत्री माथै म्हें कटारी गल़ै घातां अर म्हांरै रगत रा छांटणा उणरै देवां! पछै ई जे वो नीं मानै तो म्हें सुअवसर जाणर जूंझ’र मर जावां।

आ सुण’र सलजी कह्यो-“वाह रे बारठ वाह! तूं तो म्हनै, म्हारै पूरबलै जनम रै पुन्नां रै प्रताप सूं ईज मिलियो। पण कांई करूं ? एक तो ढाणी रो वासो ! दूजो ढांगी(गायें) तिरसी। जे हूं गांम रैतो होऊं तो तनै ऊंठ दिरायर ठेठ थारै गांम छोडूं। पण भइया ऐ शस्त्र बीजा क्यां बांधिया है ?”

जणै माधजी कह्यो ऐ तो फखत म्हारै शरीर री शोभा है। म्हें छत्री माथै छोह(रीस) नीं करां। जे म्हांनै रीस आय ई जावै तो म्हें म्हांरो शरीर आपै ई छोल लां। क्यूंकै ईश्वर सनातन ई ऐड़ो रचियो है। ”

आ सुण’र सलजी कह्यो-वाह रे चारण वाह! साचाणी थारै साथै सतजुग बैवै। पण भाई रे! रीस मत करजै, म्हांरै अठै रा चारण तो कल़जुग री माख्यां है जको छेड़्यां, इयां छिड़ै जाणै टांटिया छिड़िया हुवै। पण तनै धिनकार है। थारै दरसणां सूं म्हारी भूख पासै हुई। पण तूं रीस मत करजै म्हांरै अठै रा चारण तो ऐड़ा कल़ैगारा है जको बैता बाड़ां सूं राड़ां रचै। म्हें साम्हा मंडां नीं, उणसूं पैला तो वै साम्हा फुरै जावै। ”

माधजी री बातां सुण सुण’र सलजी नै पतियारो आयग्यो कै इण आदमी नै मारण री जरूरत नीं, ओ तो रीस्टी आदमी है। आपै ई मर जावैला।

सो हमै बातां-बातां में रात आधी आयगी। चंद्रमा मा घरै गयो। अंधारे में इणनै कीं नीं दीसै ला कै लूटणियो कुण है ? आ सोच’र सलजी, माधजी नै आगलै गांमतरै सारू बहीर कर दिया। सलजी अंदाज लगा लियो कै हमै वो आदमी करीब जोजन एक बुवो गयो हुसी। जणै लारै सूं लंबी बिरकां भरता खुद पूगा अर परिया सूं धाकल करी कै-“अरे भइया जे जीणो चावै! जणै तो थारै कनै जको कीं है, वो बैवै जठै ई छोड’र बुवो जा। ”

आ सुणतां ई कवि आपरी दुनाल़ी ताणी अर बोल्यो कै-“हूं तो शब्द भेदी हूं, तूं एक’र पाछो बोल, जको बोलतां ई धूड़ भेल़ो नीं हुवै तो म्हनै लाणत कैजै! म्हनै लागै कै थारै अजै धाड़ो धाड़ण रो काम पड़ियो नीं दीसै!”

आ सुण’र सलजी पाछो कह्यो-“अरे वटाल़ा चारण! तूं थारी वट कर। अरे भला मिनख! तनै थारा आखर याद है कै नीं ?”

आ सुण’र माधजी पाछो कह्यो-वट चावो जणै म्हारै साम्हा पग दो! बतावूं कै वट कैड़ी हुवै ?”

आ सुणतां ई सलजी कह्यो कै-आगो जा रे! मर्योड़ो केथ रो ई !!”

सेवट सीतारामजी कैवै कै दोनूं जातां रो जको सनातनी संबंध है उणनै चार जुग जाणै। ई सनातनी संबंधां री मरजादा तो राम ई राखी जको कोई घाण नीं हुयो पण गढवाड़ां(चारणों के गांव) नै इण गीत रै माध्यम सूं ठिरड़ै री सोभा तो सुणा ई दूं-

जातां सीर चार जुग जाणै,
राखी राम सनातन रीत।
सकवी कहै ठिरड़ री सोभा,
गढवाड़ां सांभल़ज्यो गीत।।


~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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