उण काल़ नैं दुरकार काढ्यो

आंधियां अटारी
खैंखाट करती
आवती
वैर साजण
मुरधरा सूं
गैंतूल़ लेयर धूड़ रा।
अर धूड़ जिण तो
आंखियां
हर एक री
भर दिया रावड़
दीवी कावड़
सूखा सारी
आपरै आपाण सूं।
पण मुरधरा
निज माण रै बल़
आपरै कल़ पाण
आ तो ताण ऊंची
बरसात री इक आस साथै।
बरसात वा तो
है सदा ई
आद सूं
रज रोक उडती
ठांभदे
आकाश रै मग
हरस पगला ठमकती
आ रमकती
धर धमकती
झट मेटती
उण काल़ रा ऐनाण सारा।
काल़ जिण विकराल़ बणनै
नाज नै घर साज सारा जीमग्यो हो!
फगत रूंखां,
छोड छोडा!
मुरधरा रो मुल़कतो मन
धोरियां आपाण तन
अर जूझतो जबरेल जन
उण काल़ री विकराल़ता सूं
नहीं डरियो!
नहीं मुड़ियो
मिनखपण रै माग सूं
अपणास नै
अनुराग सूं
अर रस रसीली राग सूं
पंचरंग सिरपर पाग बांधै
भिड़ पड़्यो
निज भाग सूं
उण काल़ रो बो थाग लेवण
राह सत री
आपरी पत पाण राखण
मिनखपण उण नहीं तजियो
फूल सारू पांखड़ी
उण रखी निज घर आखड़ी
धिन सही मनसूं
राब पही नै
पाय पीवण
पीढियां तक प्रीत पाल़ी
आपणी इण मुरधरा
उण काल़ नै दुरकार काढ्यो!
मिनखपण रा
बीज बायर,
रीझ री निज रीत ऊपर
प्रीत रो मग सदा पाल़्यो
नीत री थिर नींव
देय’र
दुखी रो दिल
दरद हरनै
मरदपण नै रख्यो कायम
काल़ सूं अणबीह
रैय’र
काल़ नै उण कूट काढ्यो।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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