वां संतां थांनै आदेस!

आपां केई बार पढां कै सुणां हां कै ‘जात सभाव न मुच्यते’ यानी जात रो स्वभाव कदै ई जावै नीं। इणनै ई ‘तुखम तासीर’ कैवै।

ऐड़ा घणा ई दाखला लोक री जीभ माथै मिलै जिणसूं ई बात री पुष्टि हुवै कै मिनख भलांई कैड़ी ई परिस्थितियां में रैवो पण अवसर आयां आपरी जात रो रंग अवस बतासी। ऐड़ो ई एक किस्सो है। संत हीरादास अर उणांरै चेले दामोदरदास रो।

भगमा लेवण सूं पैला ऐ दोनूं ई मेवाड़ महाराणा री सेना रा साधारण सैनिक हा। एक कसूंबी रो जोधो तो दूजो नैरोली रो मेड़तियो। जिण जागा ऐ तैनात हा उठै कोई ‘द्वारो’ हो अर ऐ दोनूं फुरसत मिलती जणै भजन सुणण अर भोजन करण बुवा जावता। होल़ै-होल़ै जोधै सरदार माथै भगती रो रंग चढियो सो उणां भगमा लेय लिया अर हीरादास रै नाम सूं जाणीजण लागा। उण द्वारै रो महंत रामशरण हुयो जणै हीरादास नै उठै रा महंत बणा दिया। हीरादास नै महंत बण्या देख्या जणै मेड़तियो सरदार ई भगती में भीनो सो हीरादास सूं कंठी बंधायली अर आपरा शस्त्र बीजा तो पाछा जमा करा दिया पण गुरू-चेले सीसम रा दो घोटा आपरै कनै राख लिया कै मोकै-टोकै कणै ई काम आवै। दोनूं गुरू-चेलो भजन करै अर आपरो जमारो सुधारै।

इनै मारवाड़ री भोम कानी आए गांमां ऊंडूं-काशमीर, मोखाब आद गांमां रा जाट बीजा काल़ कुसमै री बखत मक्की-ज्वार आद लावण सारू मेवाड़ कानी जावता, जणै उणांरै ढबण अर भोजन रो ठयो इण संतां री जागा ईज ही। सो उण चौधरियां री इण संतां रै प्रति श्रद्धा बधती गी अर उवै हीरादास रा कंठीबंध चेला बणग्या। एक’र उणां इण साधां सूं अरज करी कै – “हमको चौमासो म्हांरै अठै कियो जावै।”

इयां आ बात उल्लेखजोग है कि ‘ऊंडूं-काशमीर’ कनै आयो गांम ‘मोखाब’ बाबै रामदेव री जनमथल़ी ई है। आज ई उठै उवा जागा मौजूद है जठै ‘तंवरां सूं दिल्ली गई’ उण बखत उणां आपरा गाडा अठै आय छोड्या। आज ई उवा जागा ‘गाडाथल़’ बाजै अर लोक आस्था रो केंद्र है।

जद चौधरियां संतां सूं अरज करी जणै ऐ दोनूं गुरू-चेलो ऊंडूं-काशमीर आयग्या। चौमासो कियो। रामधुन री रणकार लगाई अर आपरै ज्ञान मुजब कथावां सुणाई।

चौमासो पूरो हुयो जणै लोगां कथा माथै चड़ावो कियो। नगद नाणै रै टाल़ कांबल़ां, पटूड़ा, लंकार आद ठावका गाभा चौधरियां किया। अठीनै दो-च्यार माड़ेचा ई, ई तक में आयोड़ा कै कठै ई मालाल़ी हुवै तो वरस सोरो कटै। उणां देख्यो कै चौधरियां साधां नै जोर सीख दी है। ऐ साधड़ा अठै सूं बहीर हुवै जणै आडफेर देय क्यूं नीं इणांसूं मालमतो खोस लियो जावै। आंरै कांई बाखड़ी गायां रो घी बेचियोड़ो। साधड़ा भल़ै कठै ई च्यार दिन कंठ फाड़ ले ला। सो उवै ई तोजी में हा कै कणै ऐ संत अठै सूं बहीर हुवै अर कणै इणांनै कथा रो मातम(महात्म्य) बतावां!

सेवट चौधरियां दो ऊंठ लेय एक माथै गुरू अर दूजोड़ै माथै चेले नै बैठाय पूगावण नै बहीर हुया। सात-आठ कोस गया हुसी कै खींपां मांय सूं पांच-सात आदमी निकल़िया। जिणांरै हाथां में कसीडांडिया जैड़ै डांगड़कै लियोड़ै। आवतां ई हाको कियो-
“छोड! छोड ऊंठां नै छेका छोड! जे जीव व्हालो है तो छोड पा। नीं जणां सीधी कपाल़ में आवै। भेजो पो खिंडहे।”

हांकला अर अपरोगा मिनख देख बिचारा चौधरी डरिया अर कातर दीठ सूं गुरां कानी जोयो अर कह्यो- “बापजी ! ऐ तो धाड़ेती है ! के करां ? म्हे गरीब आदमी आंनै को पूगां नीं। म्हांरा जूंग खोससी।”

आ सुणी जणै चेले गुरां कानी जोयो अर पूछियो -“बापजी कांई आदेश है ? राम भणूं का?”

जणै बापजी कह्यो-“कीं नीं करणो हणै राम मत भण! ऐ ई भूख सूं अंत आय ओ काम कर रह्या है। आंनै ओ पूरो माल दे दो। जको बिचारै चौधरियां रा ऊंठ बीजा छोड दे। नींतर आंरै आ कथा मांगी पड़सी।” आ कैय’र गुरां उण माड़ेचां नै कह्यो- “म्हें तो भाई मांगां र खावां। म्हांनै अतीतां नै कांई लूटो। ई काम सूं राम ई राजी नीं। कांई थे सुणी नीं-

डूम गूम लघु वांदरो, पिणघट पर दासीह।
सूता कुत्ता न छेड़िए, भूखा सन्यासीह।।

आ सुणी जणै उणां मांय सूं किणी कह्यो- “मा’राज आ ज्ञान गांठड़ी बांध्योड़ी राखो। भल़ै आगै कठै ई काम आसी। म्हांनै घणो ज्ञान बगारण री जरूरत नीं है। केई दिन भल़ै कथावां करणी अर सीरो दटकावणो चावो जणै ऐ ऊंठिया छोडदो अर जावोरा।”

जणै गुरां कह्यो कै-
“थे आ माल-मता पूरी ले लो अर ऐ ऊंठिया छोडदो। ऐ बापड़ा गरीब आदमी है। आंरा होम करतां रा हाथ क्यूं बाल़ो?”

आ सुणतां ई उणां मांय सूं किणी कह्यो कै – “मसाणां में आई लकड़ी पाछी जावै भला! हमे मा’राज हर भजो।” आ कैय’र उणां ऊंठिया ई खोस लिया अर माल ई पूरो ले लियो। जितै उण संतां कोई करामात नीं बताई। इतरै किणी माड़ेचै मा’राज री चिलकती चादर खांची। जणै उणां मांय सूं किणी कह्यो-
“अरे भला आदमी ई चादरां रो भला की करहे?”

जणै उण चादर खांचणिये कह्यो-
“ऊंठ रै गादियां करांला। ”

चादर खींचीजती देखी जणै गुरां कह्यो कै- “रे बावल़ा हुया रा कै कांई बात है? म्हे बिनां गाभै भूंडा नीं लागां?”

आ सुण’र उणां मांय सूं एक बोल्यो कै- “बापजी नागाधड़ंग फबोला। लोग घणी श्रद्धा राखसी अर पूजसी कै देखो बापड़ा कितरा त्यागी है जिको तन माथै गाभो ई नीं राखै। आ कैय’र उणां गुरां री चादर खांची जणै चेले कह्यो – “बापजी थे कैवो तो राम भणलां?”

आ सुण’र गुरां कह्यो कै-
“लागै हमे राम भणण री बखत आयगी!

“तो कांई राम भणूं?” चेले पूछ्यो तो गुरां कह्यो “भणलो।”

भणलो रै साथै ई चेले हाकल करी कै- “ले संभल़ तनै चादर दूं।”

आ कैय’र उण आपरै कनलै सीसम वाल़ै घोटै री एकै रै जरकाई। हबीड़ लागतां एक पाधरो हुयो जितै दूजोड़ै रै गुरां बल़काई। उवो ई लड़छ पाधरो। दो नै पाधरा देख्या जणै एक-दो गुरां-चेले माथै बाही पण संत ई हा तो आखिर रांगड़! उणां डांगड़क्यां रै आडो घोटो दियो सो डांगड़ै घोटै माथै पड़तां ई तिड़गी। संतां नै आरती करण रै रूप में अर कीं खल़ो खींडण सूं बाकी रा ऊंठ अर माल उठै ई छोड’र बांठां पग दिया जको पाछल ई नीं फोरी।

इण पूरै घटनाक्रम माथै बांकजी बीठू (बासणी) एक डिंगल गीत लिख्यो। गीत री भाषा, भाव अर प्रवाह सरावणजोग है। पूरी घटना आपांरी आंख्यां साम्हीं प्रतख घटती निगै आवै।
गीत दूं उणसूं पैला थोड़ी ओल़खाण बांकजी री दैणी समीचीन रैसी।

बांकजी बासणी गांम रा बीठू हा। महाराजा मानसिंहजी जोधपुर रा समकालीन अर सिरै गीतकार हा। संवादात्मक गीत लिखण में आपरी कोई सानी नीं है। “लूणी-कवि संवाद”, ऊंठ-कवि संवाद”, मंदोदरी-सूर्पणखा संवाद” आद गीत घणा लोकप्रिय है। आपरै समकालीन कवियां में ठावकी ठौड़ राखणिया बांकजी बीठू रा डिंगल़ गीत भाव अर भाषा री दीठ सूं नामी है। ओ ई कारण है कै ऐ गीत लोकरसना माथै आपरी ठावकी ठौड़ बणाई। आपरी प्रज्ञा अर प्रतिभा नै भोपाल़दानजी सांदू री इण एक ओल़ी सूं समझ सकां जिकी उणां इणांरै सुरगवास पछै कैयी-

“वल़ता लेग्या वांकजी,
सद विद्या गुण संग। “

पुनः मूल़ बात माथै आवतां थकां गीत आपरै पठनार्थ–

मझधर पिछमाण करै चत्रमासो,
लख पुल़ साधां पंथ लियो।
मारग मिल़ै माड़ रा मांझी,
दोय संतां उपदेस दियो।।

चह अपराध गांठियो चित में,
धारै सिखां छांटियो ध्यान।
चारू प्रसाद वांटियो चेलां,
गुरां इसो ई छांटिय़ ग्यान।।

बाबा सिख मिल़ै बाथां सूं,
थल़ जातां सूं हरख थुवो।
सिख बातां सूं नहीं सलूधा,
हाथां सूं उपदेश हुवो।।

वेद परायण इसी बचाई,
मही सरायण सुणज्यो मूठ।
निज नारायण गुरु निवाजै,
फजर गई तारायण फूठ।।

लागो ग्यान धरा पर लोटै,
सुध बुध भूला भोम सिलै।
विहद कपाल़ हुवा परवरती,
मुगती पोहरां मांय मिल़ै।।

जाम घड़ी मुरछागत जागा,
हर कर आगा वितन हरै।
लांठा गुरां पंजा सिर लागा,
क्रम भागा डंडोत करै।।

पुर पुरस मिल़ै पुन पैलै,
वैगी सुमरण जुगत वणी।
वल़ती डांग पछमणी वाटी,
त्रिगुटी फाटी सीस तणी।।

वांट प्रसाद वल़ोवल़ वागा,
त्रसना भागी लोभ तणी।
चेलां गुरां वेड़ री चरचा,
सांधां सौ सौ कोस सुणी।।

हीरादास दामोदर हूंता,
और संकै लेता उपदेस।
डांगां जिकां सिखां नै दीनी,
वां संतां थांनै आदेस।।
—-
खट मिल़ आया खोसबा,
सोधा साधां पास।
हीरादास ई हद करी,
दाद दामोदरदास।।

कह्यो जावै कै जिण धाड़वियां रै इणां रै घोटै री लागी उणांरै कानां रा पड़दा फाटग्या। उणसूं वै बोल़ा हुयग्या। जद कोई उणां मांय सूं किणी एक नै तन-गिनायत घर-वित रा समाचार पूछतो तो जणै उवो जाणतो कै उण लूट रै विषय में ईज पूछै। उण बखत री एक बांनगी-

कोई पूछतो कै-
“घरै सैंग सरिया है?”

ओ कैतो-
“ओ पैलो घोटो इयै पुटबड़ै में पड़ियो!”

ना, ना हूं इयां को पूछां नीं। हूं पूछां कै “धीणो-धापो की है?”

जणै उवो कैतो-
“बीजोड़ो इयै कान माथै आयो!”

“अरे! हूं पूछूं कै निरोगा हो?”

जणै उवो कैतो-
“हूं तो खिर्यो पो अर सबल़ो पड़ छूटो। बिचारो बच्यो पो। साधू कैण रा करम रा हता? डीकरा दुसट हा दुसट।”

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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