वंश-भास्कर अपूर्ण क्यों रह गया? – डॉ. ओंकारनाथ चतुर्वेदी


वंश-भास्कर तो महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण की अक्षय कीर्ति का आधार स्तम्भ है, ग्रन्थ रचना के समय ही कवि की ख्याति यातायात एवं संचार के अभाव में भी दूर दूर तक फैल चुकी थी। सूर्यमल्ल एवं कर्नल टॉड विगत शताब्दी के महान इतिहासकार रहें हैं। कर्नल टॉड के साथ राजकीय प्रतिष्ठा एवं शासन का प्रभाव था, जबकि सूर्यमल्ल के पास थी अपनी असाधारण लोकोसर प्रतिभा जिसने उन्हें प्रतिष्ठित किया था। “वंश-भास्कर” के प्रकाशन के पूर्व ही इसकी ख्याति दूर दूर तक फैल चुकी थी। भारतीय सामंत एवं जन समाज की हर गतिविधि पर नज़र रखने वाले अँगरेज़ पदाधिकारी भी सूर्यमल्ल की काव्य रचना के मूल कथ्य से परिचित होना चाहते थे। सन १८५७ की “जन क्रान्ति” के ठीक दो महीने पूर्व अजमेर मेरवाड़ के “इंस्पेक्टर ऑफ़ स्कूल” मिस्टर फालन ने सूर्यमल्ल को पत्र लिखते हुए जानना चाहा था –

“सिद्ध श्री बूंदी शुभ सुथान कविवर्य श्री सूर्यमल्ल जी बारैठ जोग्य लिखी अजमेर से श्रीयुत मिस्टर फालन साहिब बहादुर इंस्पेक्टर जिले अजमेर और मेरवाड़ की सलाम बंचना। तुमने न्याय, व्याकरण, काव्यादि संस्कृत और भाषा की कविता में जो नवीन ग्रन्थ बनाये हों उनके नाम और बनाने की मिति और उनके श्लोकों की संख्या भाषा पूर्वक ब्योरेवार लिखकर हमारे पास मेहरबानी करके भेजना चाहिये। इस पत्र का उत्तर शीघ्रतापूर्वक भेजोगे जी। कियधिकम और विशेषकर के भाषा के ग्रंथों की चाह है, उन ग्रंथों में से कुछ श्लोक कवित्त दोहादि और उन ग्रंथों का आशय क्या है, जरूर लिख कर भेजोगे।

हस्ताक्षर
फालन
मिति चैत्र बुदि दूज संवत १८१५ तारीख २४ मार्च १८५७

“उन ग्रंथों का आशय क्या है” पूछकर मिस्टर फालन ने शासक के उस मंतव्य और भेद भरी नीति का परिचय दिया है, जो कि दराज में से झाँक कर सम्पूर्ण कक्ष के चित्र को आँखों में कैद कर लेना चाहती है। यह उपलब्ध पात्र इस बात का प्रमाण है कि अँगरेज़ शासक कितना चौकन्ना था। जो राजदरबार की हर गतिविधि को अपने संकेत पर नियंत्रित रखना चाहता था और बाद में उसको नियंत्रित नहीं किया मसल कर धर दिया।

महाकवि सूर्यमल्ल ने जो प्रत्युत्तर दिया वह वंशभास्कर ग्रन्थ रचना के काल एवं कथ्य पर प्रकाश डालने में पूर्ण समर्थ है। कवि ने खड़ी बोली में ही उत्तर देते हुए हिंदी प्रेम का परिचय देते हुए आज से १३० वर्ष पूर्व अंग्रेजी प्रयोग पर आक्षेप लगाते हुए लिखा था-

स्वस्ति श्री मदन अजमेर पत्तन शुभ स्थानस्थ सर्व सवुपमा योग्य प्रजा परिपालनायक कवि विश्व शुभवांच्छक सरोपकार श्री श्री मिस्टर फालन साहब बहादुर योग्य लिखितम बूंदी वास्तव्य मिश्रण सूर्यमल्ल का सलाम बंचना अपरंच पत्र आपका आया, वृतांत ज्ञात हुआ। आपने मेरे बनाये संस्कृति भाषा के ग्रन्थ तथा तिनके विषय प्रभाव तथा निर्माण का समय इनका प्रश्न विश्र्व उत्तर मांग्यो अैसे जानिये – संवत १८९७ [सोमवार ४ मई १८ जून १८४०] के वैशाख में मेरे को श्री सिरकार की आज्ञा हुई कि वाहबाण वंश चरित्र सहित आवे और कलियुग लगे पीछे विक्रम भोज तामी नरेंद्र मय तिनके चरित्र की विस्तार से आवे ऐसी आज्ञा हुई तब से ही मैंने ग्रन्थ का निर्माण प्रारम्भ किया परन्तु बीच बीच में श्री हुज़ूर की तीर्थ यात्रा तथा बीमारी और काम की आज्ञा से, प्रवास जैसे आवश्यक अकारण रूप से विलम्ब हो जाने से वर्ष दस की नागा हो गयी और वर्ष आठ में अब ग्रन्थ ३५ हज़ार के लगभग निर्मित हो चुका है जिसमे संस्कृत प्राकृत के पद तथा बृज भाषा की विभक्ति प्रायिक है। तासू न्यून कोई कोई स्थल पर मरुभाषा की विभक्ति के शब्दन की कविता है। कहीं केवल शुद्ध संस्कृत प्राकृत अपभ्रंश और सेजी मागधी पैशाची इन छः भाषाओं की कविता करी है। अब हजार छः सम्त के लगभग ग्रन्थ फेर बनाने का इरादा है। जिसकी अब सिरकार की तरफ से भी अतित्वरा है। इससे ज्ञात होता है कि वर्ष एक में पूर्ण हो जावेगी। इस ग्रन्थ से जुदा और कोई ग्रन्थ मेरा बनाया नहीं जो कुछ याद है सो सर्व विषेष इस ग्रन्थ में ही लिख दिया है जो आप जानेंगे और पूर्ण होगा तो अजमेर के ही छापेखाने में पांच सात सो पुस्तकों को छापने भेजी जावेगी। आपका पत्र भेजने से बड़ा अपूर्व आल्हाद हुआ जिससे मेहरबानगी मालूम हुई। और मेरे बनाये पद्य की प्रति ही चाहते हो तो मरजी जैसे विषय की इसारत करने से भेजे जावेंगे। पत्र का विलम्ब आवश्यक कारणान्तर से हो गया जिसको माफ़ करना चाहिए।
मिति ज्येष्ठ व्युद्धि ११ शनिवार वि.सं. १९१६ तदनुसार मई १८५८

यहाँ एक बात उल्लेखनीय है कि बूंदी से यह पत्र ठीक एक वर्ष बाद भेजा गया। सूर्यमल्ल मिश्रण उस जनक्रान्ति का मूक दर्शक नहीं सक्रिय सदस्य होता वह सामंत नहीं, वरन एक राज्याश्रित कवि था इस क्रान्ति ने उसे ‘जन कवि’ बनने का अवसर दिया था भला वह कैसे चूकता? उसने राज्याश्रय को दर किनारे ही नहीं किया, वह राजकीय सम्मान को कूड़े के ढेर में फेंकने को लालायित हो उठा था। यदि सूर्यमल्ल का बस चलता और सामंत किसी एक झंडे के नीचे एकत्रित हो जाते, सूर्यमल्ल का सपना साकार हो गया होता तो यह देश आज से एक सो तीस वर्ष पहले ही पूर्ण स्वतंत्र हो गया होता। सूर्यमल्ल ने जिस समय मिस्टर फालन को प्रत्युत्तर दिया उस समय वह एक “विशिष्ठ कार्य” से वंश-भास्कर के लेखन से विरत होकर “वीर सतसई” का लेखन कर रहा था तो उधर हर दिशा में उनके व्यक्तिगत हरकारे स्वातंत्र्य संग्राम की पुनीत बेला में उनके हस्तलिखित संदेशों को लेकर हर छोटे बड़े सामंत, जागीरदार से संपर्क साध रहे थे। लेकिन क्या वह स्वप्न साकार हो सका? भिनाय के राजा बलवंत सिंह के नाम भाद्रपद शुक्ल तीन संवत १९०९ [क्रान्ति से पांच वर्ष पूर्व] सूर्यमल्ल ने लिखा था-

हिन्दुस्तान का दिल बुरा है जिससे एकता बिरले स्थान पर ही रही है………..परन्तु हिन्दुस्तान के राजाओं में तो यह बुद्धि रह गयी है कि जब से अँगरेज़ और मुसलमान विदेश से यहाँ आये हैं तबसे उनकी आज्ञा मानने में तो अपने धर्म नाम इज्जत गंवाकर भी उनकी इच्छा पूरी करते हैं और जैसे भी ज़ुल्म वे करें उसको वे बरदास्त करते हैं……..जब से यह बुद्धि हिन्दुस्तान के लोगों की हुई तब से विदेशियों का अमल देश पर हुआ………..

जब सारा देश स्वातंत्र्य संग्राम के पुनीत यज्ञ में सर्वस्व होम करने को मचल रहा था, उस समय मिति पांच शुक्ल प्रतिपदा संवत १९१४ को पीपल्या के ठाकुर फूलसिंह को पत्र लिखा था।

“………………………किन्तु ये राजा लोग देशपति जो जमीन के स्वामी हैं वे सब निकम्मे और कायर और हिमालय के गले ही निकले। इस क्रांति ने अंग्रेज़ को चालीस से लेकर साठ सत्तर वर्ष पीछे डाल दिया है तो भी राजा लोग कायरता दिखा रहे हैं और अंग्रेजों की गुलामी करते हैं परन्तु यह बात याद रखिये कि यदि अंग्रेज़ इस बार जम गया तो शताब्दी तक हटाना मुश्किल हो जाएगा। महाकवि सूर्यमल्ल की यह भविष्यवाणी कितनी सच निकली? स्वतंत्रता के नवविहान की हमें एकता के अभाव में ९० वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ी लेकिन श्रेय जन नेताओं ने बटोर लिया।

महाकवि ने नामली के ठाकुर बख्तावर सिंह को क्रांति के सन्दर्भ में लिखा था-

“………………….और उधर की तरफ से पृथ्वी तथा अप्सराओं के आशिक लोगों में राज्य और प्राणों की बाज़ी लगाने वीर जो कुछ अपने साथी होते हुए दिखलाई पड़ते हो तो गुप्त रूप से लिखना। सो अन्यत्र भी बीज नहीं डूबा है, इसलिए और भी कई साथी होने के लिए तैयार हैं। और बाद में भी कई साथी तैयार हो जावेंगे और साथी तैयार करने का दायित्व तो हम लोगों का कुल क्रमागत है आप वहाँ से सूची भेजेंगे तो यहाँ से भी ब्योरेवार लिखा जावेगा, लेकिन इस समय तो गुप्त ही ठीक है। अंग्रेजों की सामर्थ्य देखते हुए इस समय यह बात आप नादानी की ही समझेंगे लेकिन भगवान ने तो हमको शुरू से ही नादानी दी है इसलिए दानाई कहाँ से आवे।“

सूर्यमल्ल का यह पत्र प्रचलित प्रथाओं एवं राज्याश्रय की प्रचलित धारणाओं के खिलाफ उसके उस “बागी” रूप को प्रस्तुत करता है, जिसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था – फिरंगी शासक से मुक्ति एवं भारत की पूर्ण स्वतंत्रता। इस महान अनुष्ठान की पूर्ती के लिए उसने यश विस्तारक ग्रन्थ का लेखन कार्य ही स्थगित कर दिया। वंश-भास्कर क्यों अपूर्ण रह गया? यह जानने के लिए कवि की मानसिकता का पढ़ लेना वांछनीय होगा जो उनके ही द्वारा लिखित पत्रों से प्रतिबिंबित हुई है क्रांति के सन्दर्भ में सूर्यमल्ल ने लिखा था —

घर से निकलना तो अब तक हो आता परन्तु भगवान ने अब समय ओर ही कर दिया है इसलिए राजपूतों में जब कभी वीरत्व की भावना देखी या सुनी जाती है तब मन में आनंद आ जाने का व्यसन है। और कहाँ वीरत्व अपना जौहर दिखाएगा और कहाँ डूबेगा तदनुसार हर्ष या खेद प्राप्त होने के बाद ही निकलना होगा। लोभ अनेक तरह के होते हैं उनमे से राजपूत की राजपूती देखने का भी एक लोभ है। इस लोभ का मुझ पर अधिक असर है और सुनते हैं कि साथी भी बहुत मिल जावेंगे, पर हिन्दुस्तान के दिन अच्छे नहीं हैं इसलिए आपस में एकता नहीं करते…….”

रीतिकाल के अंतिम प्रहार में जब सारा सामंत वर्ग भोग विलास के पंकिल जल में आकंठ निमज्जित था उस समय काव्य परंपरा से पूर्ण रूप से प्रथक होकर “वीर रस” की सिंह गर्जना भले ही बेमेल लगती हो लेकिन वह वीर रसावतार की गौरवमय अतीत से प्रेरणा लेकर स्वर्णिम भविष्य को प्राप्त करने की उस अदम्य लालसा का प्रतीक है, जिसके लिए सूर्यमल्ल ने जीवन भर की गाढ़ी कमाई, अपना काव्यत्व, एवं उपलब्ध यश, राज्याश्रय की प्राप्त सुविधा को न्योछावर कर दिया था। वंश-भास्कर जिसका लेखन सोमवार ४ मई १८४० से प्रारंभ हुआ था। इसके लेखन के पूर्व राजर्षि रामसिंह ने सम्पूर्ण चारण भाटों को उनकी वंश वही के साथ संयोजन के लिए आमंत्रित किया था। आज से १३७ वर्ष पहले उस सारस्वत अनुष्ठान पर दस हजार रुपये व्यय हुए जिसकी वर्तमान कीमत करोड़ के ऊपर ही ठहरेगी। क्या किसी भी साहित्य ग्रन्थ रचना पर आज कोई भी व्यवस्था एक करोड़ रूपया खर्च कर सकती है? निश्चित ही यह अत्यंत महत्वाकांक्षी ग्रन्थ था।

रावराजा रामसिंह ने अपार धन व्यय, किसी अपूर्ण ग्रन्थ के लिए नहीं किया था उन्हें सूर्यमल्ल की कारयित्री प्रतिभा पर अगाध विश्वास था। इसलिए आशानंद से चर्चा करते समय जब रावराजा रामसिंह ने महाभारत की परंपरा में “वंश प्रकाशक” एवं “कविकुलपुरन काम” ग्रन्थ लिखवाए जाने की इच्छा प्रगट की तो सूर्यमल्ल ने सहज ही इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया। कवि द्वारा उल्लेखित छंदों को लिपिबद्ध करने के लिए बूंदी राज्य की ओर से आठ लेखक नियुक्त किये गए जो सदैव महाकवि के मुख से निस्तृत छंदों को लिपिबद्ध करने के लिए प्रस्तुत रहा करते थे। वंश-भास्कर का रचना कार्य १६ वर्ष तक निरंतर अबाद्ध गति से चलता रहा। तदनन्तर संवत १९१४ के पूर्वार्ध में [सन १८५७] कभी किसी कारण वश यह रचना कार्य स्थगित हो गया। वे कारण तो अब साक्ष्य के प्रकाश में लोक विश्रुत हैं कि सूर्यमल्ल ने स्वातंत्र्य संग्राम की पुनीत बेला में आज़ादी का घूम घूम कर अलख जगाया था वह रचनाकार जो भविष्य द्रष्टा भी था दुबक कर कैसे रह सकता था? यह सही है कि सूर्यमल्ल के प्रयास निष्फल सिद्ध हुए। यह भी सही है कि जिस अपेक्षा से उसने “वंश-भास्कर” के माध्यम से “रजवट” की अभ्यर्थना की थी वह मृग मरीचिका सिद्ध हुई? उसने केसरिया बाना पहने हाथ में तलवार लिए, घोड़ों की टापों पर अंग्रेजों का मुंड बिखेर देने वाले जिन “मरजीवणो” की कल्पना की थी, वे सभी कवि के ही शब्दों में निकम्मे, कायर, हिमालय के गड़े [ओले] ही निकले। हर आदमी के जीने की अदा होती है, एक लक्ष्य होता है, एक आदर्श होता है, महत्वाकांक्षा होती है। आत्मसम्मान के लिए जीने वाले के लिए आत्मघात के क्षण भी बहुत नज़दीक बने रहते हैं। जब किसी आदमी का सपना टूटता है, उसके आदर्श बिखरते हैं, महत्वकांक्षाओं की किरचें किरचें बिखर जाती है और आत्मसम्मान का व्यामोह आत्मघात की सीमा को छूने लगता है तो आदमी भौतिक रूप से भले ही आत्मघात न करे लेकिन उसके अन्दर का आदमी मर जाता है। उमंग, उल्लास और प्रेरणा के अतिरिक्त जीवन का अर्थ ही क्या है? स्वातंत्र्य आन्दोलन के आत्म बलिदानी प्रारम्भ ने सूर्यमल्ल के ह्रदय में जो आनंद हिलोरें उठाई थी, निराशामय अवसान की बेला में कवि ने समस्त विफलताओं को कालकूट की तरह पान कर लिया। महाकवि विषपायी बन मौन हो गया। सन १८५७ के बाद बूंदी नरेश के पुनः ताकीद करने पर वह कार्य पुनः प्रारम्भ हुआ और लगभग एक वर्ष तक बड़ी मेहनत और तत्परता के साथ चलता रहा किन्तु सन १८६० ई. वि.स.१९१७ के मध्य के लगभग कवि ने अष्टम राशि में जब वह अपने आश्रयदाता रामसिंह का चरित्र निरूपण करने जा रहा था, भाट रामचंद्र के साथ अपने पिता चंडीदान के शास्त्रार्थ सम्बन्धी द्वादश मयूख का सत्रहवां छंद लिखवाते समय ही एकाएक “वंश-भास्कर” का रचना कार्य सदैव के लिए बंद कर दिया गया। उस सत्रहवें छंद की अंतिम छटवीं पंक्ति की भी रचना नहीं की गयी और वह छंद अपूर्ण ही रह गया। इस प्रकार कुल मिलाकर ३७३ मयूखों की रचना हुई और ३७४वां अधूरा ही रह गया। डॉ. रघुवीर सिंह के अनुसार अनिर्दिष्ट कारणवश अपने इस वृहद इतिहास ग्रन्थ को सूर्यमल्ल ने सम्पूर्ण नहीं किया।

यद्यपि कवी इसके बाद भी आठ वर्ष तक और जीवित रहा लेकिन, वह उस रास्ते पर नहीं लौट सका जिसके वह पुल भी तोड़ आया था।

आगे की चर्चा “अकथनीय व्यथा कथा” है। सूर्यमल्ल ने संवत १९१७ से निधन दिवस आषाड़ शुक्ल ग्यारस, मंगलवार वि.स.१९२५ तक किस तरह से अपने ही “कवि” को मरते देखा होगा। इसकी कल्पना तो माडले जेल में नज़रबंद बहादुरशाह ज़फर ही कर सकता था या अंडमान जेल में बंद कभी तिलक ने की होगी। वे आठ साल सूर्यमल्ल ने कैसे काटे? एक सुविख्यात कवि जीते जी कैसे गुमनाम हो गया? इस पर विचार करना समीचीन होगा।

सूर्यमल्ल “जनकवि” थे, वीर सतसई किसी आश्रयदाता की अभ्यर्थना नहीं, जन-जन की अभ्यर्थना के लिए लिखा गया जनकाव्य का जीता जागता प्रमाण है, उसने अपनी आँखों से बूंदी के पास कोटा में महराब खां और मुंशी जयदयाल को क्रांति को सार्थक रूप देते देखा था और उसने देखा था बर्टन की ह्त्या का अमानुषिक प्रतिशोध, अपमानित एवं लांछित की जा रही हज़ारों नारियों और पेड़ों की शाखों पर झूलते हुए सेकड़ों बागियों के शव, और चील, कौवों, गिद्धों की झूमती बारात जो किसी व्यापक अनुष्ठान की असफलता की कहानी स्वयं कह रहे थे। तांत्या टोपे पर निरंतर अंग्रेजी सेना का दबाव बढ़ता जा रहा था।
हर निष्ठा आदर्श और सिद्धांत की कोई कीमत है, जो निष्ठाप्रिय व्यक्ति को अपने जीवन में चुकानी पड़ती है। सूर्यमल्ल भला अपवाद कैसे रह सकता था? जब असफलता के दौर में दमन चक्र चला और समस्त उत्तर भारत सहित क्रांतिकारियों को मौत के घाट उतारा गया, तब क्या उनके प्रच्छन्न सम्बन्ध रखने वाले सुरक्षित रह सके होंगे? क्या चुगलखोरों ने अवसर का लाभ नहीं उठाया होगा? क्या सूर्यमल्ल की कारगुजारियों को रावराजा रामसिंह ने दरकिनार किया होगा? क्या पोलिटिकल एजेंट तक तांत्या टोपे के बूंदी ठहरने और बागियों से मिलने की खबर नहीं पहुंची होगी? इन सबका उत्तर हाँ में दिया जा सकता है। सूर्यमल्ल ने वह सब कुछ भोगा जो हर मुल्क में “सरफ़रोश” “आज़ादी का दीवाना” भोगता है। सूर्यमल्ल को उनके जीवनकाल में ही पारिवारिक सुखों से वंचित कर बूंदी में “हाउस अरेस्ट” कर दिया गया। उनकी हर गतिविधि पर नज़र रखी गयी। गढ़ से लेकर हवेली एक डेढ़ किलोमीटर है वहाँ तक पहुचने से सूर्यमल्ल को वंचित कर दिया। सूर्यमल्ल द्वारा लिखित एक पत्र उसका साक्षी है और उसका अंश इस प्रकार है। यह पत्र पीपल्या के ठाकुर फूलसिंह को सन १८५७ में लिखा गया था।

ओरां के तो दंड एक साल का हासिल को हुओं अर म्हारे तीन सौ हर साल दंड का लिखी दिया और बड़ा तकादा सूं पुराणा बोहरा ललकार ही दिया त्यां का रुपये पैटे असबाब घर की तमाम बिकि गयो छे……………ग्रन्थ का लेखक बगैरह तमाम छुड़ा ही दिया सुणवाइ करे नहीं तींसूं चित्त पर बरस दो से निहायत उदासी बढ़ रही है।

आज से १३० वर्ष पूर्व, स्वातंत्र्य संग्राम के विफल हो जाने पर अपने ही राज्याश्रित, स्नेहभाजन कवि पर ३००/- रुपये प्रतिवर्ष का आर्थिक दंड क्यों और किसलिए लगाया गया था? क्या यह सब अंग्रेज़ शासक को प्रसन्न करने के लिए नहीं किया गया था? एक अन्य पत्र में पुनः वंश-भास्कर लेखन की जो व्यवस्था की गयी थी उसका वर्णन कवि ने इस प्रकार से किया है। —

सरकार “वंश-भास्कर” ग्रन्थ का पुनः निर्माण कर एक ही वर्ष में समाप्त कर देने का आदेश दिया है। मेरी निगरानी के लिए पुरोहित रामगोपाल जी एवं मिश्र अम्बालाल जी की नियुक्ति की गयी है, वे दोनों ही समस्त दिन की बणावट, छंदों एवं मूर्तछंदों की गिनती से सरकार को सूचित करते रहते हैं और दो तीन महीने से मुझे हवेली से बुलाकर किले में ही रख दिया। पांच सात दिन में रात्रि के समय हवेली से जाने की इजाजत मिलती है, लेकिन प्रभात काल के पूर्व ही पुनः किले में उपस्थित होना पड़ता है।

यह पत्र मिति माघ शुक्ल स.१९१५ अर्थात सन १८५८ में लिखा गया था और यह क्रम जीवन के अंतिम क्षण तक बना रहा। मृत्यु के पूर्व कवि का शरीर रोग से जर्जर हो चला और अपनी मृत्यु के पूर्व में उन्होंने रत्नपुर (रतलाम} के शासक बख्तावर सिंह को संक्षिप्त पत्र में लिखा था:-

“चित्त में दुखी पर हाल विशेष हार्द न जाण्यो क्योंकि अब म्यारो देह बी अर्श गुल्म का प्राबल्य करिर रुग्ण ज्यादा रहे छे। तीसुं जाबों ही छे सो जाणसी।”

यह पत्र वैशाख शुक्ल छः संवत १९२४ को लिखा गया था। किले में ही राजवैद्यों द्वारा उनका उपचार चलता रहा लेकिन अंतर्मन पर पड़े गहन आघात का उपचार संभव नहीं हो सका और आठ वर्ष बाद मंगलवार जून ३० सन १८६८ ई. को बूंदी के किले में ही सूर्यमल्ल का निधन हो गया। कोई भी दबाव, तनाव, आग्रह, अनुरोध, भय एवं दंड वंश-भास्कर को पूर्ण नहीं करा सका। वंश-भास्कर अपूर्ण ही रह गया। उसका शेष भाग उनके दत्तक पुत्र मुरारीदान द्वारा ही लिखा गया।

कोटा में क्रांति विफल हो गयी थी। झालावाड़ का झाला अज्ञातवास में चला गया था। कोटा महाराव को बागियों का सहयोग करने के आरोप में बहुत बड़ा आर्थिक दंड भुगतना पड़ा था तब जाकर उन्हें वापस कोटा रियासत मिली थी, उस समय क्या बूंदी के “रावराजा“ तांत्या टोपे की मदद कर सके होंगे? जब तांत्या टोपे शाहबाद की झाड़ी की ओर से निकल रहा था, और उस समय उसके पकड़े जाने और फांसी दिए जाने के समाचार को कवि मन ने कैसे स्वीकार किया होगा? इतिहासकार सूर्यमल्ल इतिहास प्रणयन के उस मोड़ पर खड़ा था जहां उसे अपने आश्रयदाता रावराजा रामसिंह का और उनकी उपलब्धियों का चित्रण करना था और वे उपलब्धियाँ थी क्या? सूर्यमल्ल की वंश-भास्कर लेखन की एक शर्त थी “में जो कुछ लिखूंगा सत्य ही लिखूंगा।” लेकिन क्या वह उस वास्तविकता को उजागर कर सकता था, जिसको उसने स्वयं अपनी आँखों से देखा था? एतिहासिक सत्य के प्रति उनका प्रबल आग्रह और अगाध विश्वास और सच्चाई के सामने लड़खड़ाते रावराजा रामसिंह और मूंछें मरोड़ते अन्य समकालीन नरेश और उनकी चारित्रिक दुर्बलता क्या “वंश-भास्कर” जैसे प्रामाणिक ग्रन्थ की कथ्य सामग्री बन सकती थी? त्याग और आत्मबलिदान तो किसी देश समाज और इतिहास के आदर्श हो सकते हैं, लेकिन आत्मसम्मान बेच कर चाटुकारिता और बहुमूल्य भेंट देकर खरीदी गयी राजगद्दियाँ और भोगविलास के उपजीव्य किसके आदर्श बन सकते हैं? आत्माभिमानी महाकवि के सामने ये सब फूटे ठीकरे थे।

~~डॉ. ओंकारनाथ चतुर्वेदी

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