वींजै बाबे रा छंद – जनकवि वृजलाल जी कविया

🌸दोहा🌸
सपत दिनां दिन संत रै,नृपत सुदरसण न्हाल़।
जपत महागुण जातरी,वींजौ तपत वडाल़।।१
रे!नगधारी भारती,भगत तणां गुण भाल़।
पूजण करवै प्रेम सूं, वींजौ तपै वड़ाल़।।२
ओठारू धन री अवस, पूर रखै प्रतपाल़।
बैठौ तापस बैल़वै,वींजौ तपत वडाल़।।३
इष्ट रखै सह आपरो, देस तणी ता दिष्ठ।
निष्ट हुवै दुख नाम सूं, सेवत वींजो सिष्ट।।४

🌸छंद रोमकंद🌸
नर नारिय ऊठ सदा सिर नावत ,पावत भोजन नीर पछै।
चढ़वाय कपूर चढै सिर चन्नण, सामिय ध्यावत मान सचै।
परभातांय सांझ समे कर पूजन,जोगिय नाम वींजांण तपै।
धुन एकण ध्यांन लग्यो धणी धावत, तापस मेर वड़ाल़ तपै।
जिय तापस नग्ग वड़ाल़ तपै।।१

भगवां भरल़क्क सदा अंग शोभत, सीस जटा सरल़क्क सरै।
हिय वे हरल़क्क माल़ा गल़ मोहत,कान मुद्रा परल़क्क करै।
भृगटी भरल़क्क भला मुनि भाल़त,तेज इसो चख लोह तपै।
धुन एकण ध्यांन लग्यो धणी धावत, तापस मेर वड़ाल़ तपै।
जिय तापस नग्ग वड़ाल़ तपै।।२

पँच धूण तपत्तिय ज्यां बिच जत्तिय, अंग वभूतिय, ओप इसी।
धिन एह धरत्तिय जयां सिंह सत्तिय,नाम जपत्तिय दीह निसी।।
मन मांग मुकत्तिय संकर सत्तिय आप त्रिपत्तिय होय अपै।
धुन एकण ध्यांन लग्यो धणी धावत, तापस मेर वड़ाल़ तपै।
जिय तापस नग्ग वड़ाल़ तपै।।३

विछवाय बाघांबर काल़िय कम्बल़, राज डिगम्बर धूह रिषी।
कर माल़ कमंड़ल़ नीर सो न्रिमल़ आज ही अंबर वूठ इसी।
पट धोय पीतांबर नेम धरे नर,चन्नण गोपिय भाल छपै।
धुन एकण ध्यांन लग्यो धणी धावत, तापस मेर वड़ाल़ तपै।
जिय तापस नग्ग वड़ाल़ तपै।।४

मझ भादव मास हुवै मख मंदर, अंदर जोत अखंड अठै।
चित सूं.हित धार सेवे पख चंदर वार ससि दिन पूज वठै।
वरसां खट दूंण खुले पल वापिस ,जाप सदा कव आप जपै।
धुन एकण ध्यांन लग्यो धणी धावत, तापस मेर वड़ाल़ तपै।
जिय तापस नग्ग वड़ाल़ तपै।।५

अमलां मद भांग धतूर अरोगत,आक चण्डू अमराक इसा।
निसि ही दिन होय नसै वस नाचत,जांण जटाधर नाथ जिसा।
अविनासिय ओथ हुआ सिध एकट, जट्ट मुकट्ट थया सजपै।
धुन एकण ध्यांन लग्यो धणी धावत, तापस मेर वड़ाल़ तपै।
जिय तापस नग्ग वड़ाल़ तपै।।६

भगतां बिच सिद्ध वभूतोय सोभत, वालिय नाथ मछंद्र बिचै।
गुण सागर जेथ बिराजिय गोरख,राग छतीस नरद्द रचै।
परतापिय पांच पधारिय पण्डव पीरहि पांच पधारन पें।
धुन एकण ध्यांन लग्यो धणी धावत, तापस मेर वड़ाल़ तपै।
जिय तापस नग्ग वड़ाल़ तपै।।७

सहनाइय ठोर उड़े अति सारंग,वीण सतार टमंक बजै।
इकताराय ढोल समाधिय आगल़,संख टिकोरय घोर सजै।
खुरताल़िय बांस बजै अति खंजर, सांभल़ दैत रु प्रेत खपै।
धुन एकण ध्यांन लग्यो धणी धावत, तापस मेर वड़ाल़ तपै।
जिय तापस नग्ग वड़ाल़ तपै।।८
सबही मिल़ सांढ.हजारुय सांमल़, फेरिय देवल़ गूंढ फिरै।
जिण वेरिय रोग छतीसांय जावत,घेरिय लावत आप घिरै।
चढवेरिय पूज हमेसांय श्री फल़ छाब मिठेरिय छाबन पे।
धुन एकण ध्यांन लग्यो धणी धावत, तापस मेर वड़ाल़ तपै।
जिय तापस नग्ग वड़ाल़ तपै।।९

🌷छप्पय🌷
वींजौ तपै वड़ाल़, साज द्रढ आसण सांमी।
धर तन मन सूं ध्यांन, अखंड धुन अंतर-जांमी।
केसव मिल़वा काज, रात गिर कंदर रहियौ।
कुल़ स्वारथ तज क्रोध, गुणी हर कंठां ग्रहियौ।
कवियांण ‘विजौ”भाखै कवत्त,नर वींजौ नह वीसरै।
खराई पांम खांसी खलह, नैड़ा कदै न नीसरै।।

~~वृजलाल जी कविया

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