वीर प्रसूता चारणी

तारीख़ देख कभी न लिखा,
लेकिन ज़ख्म की तासीर देखी,
लिखना पड़ा ….

गरमी हो या सर्दी, छुट्टियाँ गाँव में ही बितायी जाती है, बचपन में यह अलिखित सी डील होती थी। पालन हर बार होता। एम्बेसेडर कार से रामपुरा तक। रामपुरा, खच्चर की तरह कस्बे और गाँव के बीच की एक संकर किस्म थी या योजक कड़ी।

उस ज़मीन से ही अपनेपन की खुशबू आनी शुरू हो जाती थी। पिताजी की बातचीत का तौर-तरीका पूरा ही बदल जाता। दूर से ही किसी चेहरे को देख ऐसे प्रसन्न हो जाते जैसे बहुत एहतियातन छुपाकर रखे, फिर भुलाये जा चुके पैसे गृहिणी को अचानक मिल जाये। वहाँ से कच्ची घाणी से तेल निकालने वाले, लेकिन दोस्ती में पक्के मन वाले शकूर भाई की बैलगाड़ी ले लेते थे, किराये पर। कार में से सामान जब उस छकड़े में रख रहा होता, तब ड्राइवर पूरे परिवार को अजायबघर की तरह देखता था। लेकिन तब उसकी परवाह ही किसे होती ! ऊपर से रंगबिरंगे कशीदे और काँच की गोटियों से चमकता हुआ कपड़ा गोलाई में आवरण बनाकर छोटा सा घर जैसा लगता था। हिचकोले हौले-हौले खाते हुये वह एक डेढ़ किलोमीटर की दूरी तय की जाती थी। पुरानी बातें …पुरानी चाल के साथ चलती रहतीं ..चालबाज़ियाँ एक न होती। गाँव के रूँख बिरछ जहाँ से दिखने लगते, हुलास भर आता। पोल पर ही पिताजी भाई उतर जाते और प्रणाम चरण स्पर्श के संस्कार होते। भीतर तक घूँघट में ही माँ सहित हम। खुशी भरी किलकारी और रौनक लिये दिन-रात तारी।

पढ़ाई-लिखाई के सारे सरंजाम शहर की सरहद पर छोड़कर ही गाँव से गले मिलने का रिवाज़ था। लेकिन व्यवहारिक परीक्षाएँ तैयार रहती थी कुंकुम थाल लेकर हमारे लिये। अदब, लिहाज, कायदा और विनय …इनमें डिस्टिंक्शन से ही पास होना था, कोई ग्रेस न मिलती थी। गाईड माँ। गृहकार्य में वे खुद भी वैसी ही व्यस्त हो जाती थी, जैसे नर्सरी का बच्चा ‘अ से अनार’ लिखने में उलझ रह जाता है। एक ही कुटुम्ब के होने पर भी किसी अन्य घर भेजना सर्वथा वर्जित मानती हुयी भी, तब वे किसी उपयुक्त जगह भेज दिया करती थी।

दो रिश्ते थे उनसे माँ के। पीहर पक्ष से बुआ, ससुराल पक्ष की तरफ से दादीसास। सात रावले (घरों) वाले छोटे से गाँव में आने वाली वे पहली साक्षर व पढ़ी लिखी महिला थी। जिस जमाने में तीसरी जमात पास को पटवारी बना दिया जाता था, तब वे मेट्रिक पास कर नर्सिंग भी कर चुकी थी। उनके पिताजी गुलामी के दिनों में भी हिज हाइनेस जोधपुर के डॉक्टर थे।
मन इतने तंग न होते थे, और मेहमाननवाजी से तंग न होते थे। उनके पिताजी का घर छहों मौसम, बारहों महीने रोगी और लाचार रिश्तेदारों के आने-जाने से भरा रहता। समर्पित भाव से यथासंभव मदद करते सभी परिजन। बेटियों को कान्वेंट स्कूल में बग्घी से भेजा जाता। चाँदनी (एक परदा जिसे दो परिचारक थामकर चलते है जिससे दूसरा कोई देख न पाये) तनतीं, तब वे स्कूल के भीतर जाती। सुन्दर तो किसी भी तरह से न कहा जा सकता था उन्हें। साँवला रंग पर जन्मगोत्र ‘उज्ज्वल’। बोली जैसलमेर की तरफ की, बाते नेह के घेर घुमेर की। नाकनक्श उनके तीखे न थे, मन के किनारे पर गड़ने वाली नीयत न सीखे थी।

अक्सर परिचारिका के साथ गाँव में अकेली ही रहने वाली उन छोटू बुजी (बहूजीसा का देशज रूप) के घर उनका हाथ बँटाने व सीखने के लिये मुझे भेजा जाता था। घर का दरवाजा खोलते ही ज़रा सी तिरछी गरदन कर यूँ हँस पड़ती थी, जैसे दुलार की बदली बरस पड़ी हो। प्रसन्न हो जाती थी। फ्रिज गाँव में न होते थे। आइसक्रीम जमाती घर के दुधारू पशुओं के दूध को चूल्हे पर औटाकर।

कहती,
“जब जाओ, याद दिला देना, तुझे खिलाना चाहती हूँ।”
कुछ घंटे बाद जब जाना होता, तब बोलकर कहा भी नहीं जाता। मुझसे वह मीठी ठंडक बिसरती नहीं, उन्हें वह याद न आ पाती। अगले रोज़ वे पछताती सच्चे मन से। फिर बनाकर घर ही भिजवा देती।

बहुत सी बिसरी बातें और भी बताती जाती। काम तो कितना करवा पाती, लेकिन उम्र में पचपन-छप्पन साल का अंतर होने पर भी उनका साथ ज़रूर रुचता था। वे बातें नीरस न लगी कभी। पाककला में भी निपुण थी। कई सब्जियाँ बिल्कुल अलग तरीके से बनाती थी, जो स्वाद और पौष्टिकता दोनों को बढ़ा देती। कुटुम्ब में इस कारण ख्यात थी। दस बारह वर्ष की उम्र ही थी मेरी, परन्तु रसशाला में व्यंजनों के रस के साथ ही उनकी बातों के रस भी अंतस् तक भर लिया करती थी।

दो बेटे और एक बेटी सहित तीन संतानें। पिता ने अंग्रेजी विषय लेकर स्नातक कर चुके जामाता को चुना। उस जमाने में नौकरी दस्तक देने खुद आया करतीं थी इतने क्वालिफाइड के लिये तो। निश्चिंत थे भविष्य को लेकर। विधाता और नियति के खेल अनोखे। अधिकारी बनना जागीरदारी मिजाज को भाया नहीं। घर बैठे रहे, तो अमल की लत। सुख में नातेदार परछाई बने घूमते है, दु़:ख के बादल घिरते ही गायब। स्वाभिमान और समझ, भूख और ज़रूरतों के हल नहीं निकाल पाती है। वह रोटी नहीं बन पाती। अंतत: मायके से ससुराल की ओर चली वह ही बेटी फिर से उसी घर में संतान सहित रहने आयी। मौसम आने पर डाल पे खिल आये फूल हरख से भरते है, बिन मौसम उनका खिलना भी आशंकित करता है, तो वे तो इंसान थी।

आहत होकर भी मुस्कान बनाये रखना, ‘इच्छा’ शब्द को ज़िन्दगी की डिक्शनरी से ही बाहर कर देना, बिन कहे कई बातें ज़हर हो तो भी निगल जाना तीनों बच्चों ने उम्र से पहले ही सीख ली। जब माँ के साथ एकांत में होते, तब थोड़ा नम माहौल हो ही जाता था।

ऐसी परिस्थितियों में सबसे बड़ी संतान अभिभावकों के लिये दाहिना हाथ और दूजी संतानों के लिये छाँव भरी हथेली होती है। बड़े मामा प्रथम प्रशासनिक अधिकारी बन जाति के गौरव बने थे। दूसरे भारतीय सेना में अधिकारी। ननिहाल में उन सभी को देख वह बालमन अकेले में कभी बिलख पड़ी माँ को देख चुका था। अव्वल आना नई बात न रही उसके लिये। अंधेरे के सिवा कुछ न दिखे, तब सूरज नया बना दिया जाता है पुरूषार्थ के दम पर। उन्नीस बीस की उम्र तक आते आते ही केरियर का चयन कर लिया। सैन्याधिकारी की ट्रेनिंग लेने ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी, चेन्नई।

भोर होने से पहले जैसे लालिमा दिखने लगती है वैसे ही लग रहा था खुशियाँ अब तो आरती का थाल लिये इंतजार कर रही है। ट्रेनिंग के दौरान फोन पर बात करते हुये माँ को कहते,
“जैसे मासीसा और उनके बच्चे खुद के गाँव जाते है, वैसे ही हम भी अपने गाँव रहेंगे और अपना खुद का घर होगा। माँ ! अब आपकी आँखों में जगमगाहट होगी, पानी नहीं। मैं ज़िन्दा ही आपके लिये हूँ। दोनों छोटे भाई बहनों को कहना बचपन नहीं ला सकता तुम्हारा लेकिन बचपने को फिर से जिन्दा कर दूँगा। एक बार आने दो। आप सभी की ख्वाहिश और सपनों के सितारे, ज़मीं पर बिछा दूँगा। भरोसा रखना माँ मुझ पर। आपकी जिम्मेदारी पूरी तरह से अब मेरी।”

रिश्ते भी आने लग गये। इजाजत लेकर तय भी किया। भावी वधू के हाथ में चाँदी का सिक्का और माथे पर कुंकुंम बिन्दी लगा दस्तूर पूरा किया। चेन्नई सूचित कर दिया गया।

“माँ ! मेरी हर चीज़ पर पूरा अधिकार है आपको। फैसला लेना तो आम बात है, कभी किसी मान-सम्मान का हकदार मुझे बनाया गया, तब भी बस में रहा तो वह भी आपके ही हाथों लूँगा।”

सब कुछ खूबसूरत सपने की तरह चल रहा था, नींद में करवट आनी ही थी। यह न सोचा था मुँह के बल गिर पड़ेंगे। चोट बींध जायेगी।

नौ-दस माह की अवधि वाला प्रशिक्षण तेजी से छह महीने में ही खत्म किया गया और कमीशंड सेकंड लेफ्टिनेंट के तौर पर आनन फानन में मुक्तिवाहिनी में दायित्व सौंप भेजा गया। सब कुछ काफी गोपनीय रखा गया। माँ सावे की तारीखें निकलवा रही थी। सपूत सावचेती के साथ दुश्मन खेमे की ओर रवाना हो चुके दस्ते में शामिल थे। उम्र बाईस तेईस साल। हजार नामंजूर कर दे मन, होनी उसे मंजूर कर चुकी थी। गौरवमय एक शहादत तिरंगा हाथ में थामे हुयी। गोलियाँ छलनी कर गयी, नियति छल गयी।

कहते हुये उनकी आँखें भर आयी, सुनते हुये मेरी भी। फिर कहा, “तुम जानती हो, उसे वीर चक्र मिला। उसने अपना वादा तब भी निभाया। जिस सम्मान का हकदार वो था, मेरे ही हाथों से लिया गया। पीएम के हाथों मेडल लेते हुये मुझे गहरा खालीपन भी दिखता तो गर्व कर जाती। पर मैं क्या करूँ बेटा …तब मुझे देपाल का चेहरा दिख गया …याद आ गया ..सब सूना था ….सब कुछ ही खाली ..। शहीद होकर भी मेरी जिम्मेदारी उम्रभर की उसने ही ले रखी है। पेंशन के पैसे जब भी हाथ में उठाती हूँ, तब-तब गला रुँध जाता है। नहीं जाना था, वह वचन यूँ निभा जायेगा। वरना ओठों पर तब ही अंगुली रख रोक देती।”

गले लगकर उनके आँसू हथेली से ही पोंछे, जानता था मन वे अनमोल है, उजले है। लेकिन धारायें एक बार बहना शुरू कर दें तब कहाँ रुक पाती है ?

एक विवाह समारोह में कोई सुन्दर सी नववधू आकर पैर छूने लगी। सबकी एक जैसी पोशाकों, घूंघट और गहनों में पहचान नहीं पाते है हम बूढ़े लोग। तब आशीष देकर पूछ ही लेते है। उससे भी पूछा।

कुछ पल खामोश रहकर बोली, “एक चाँदी का सिक्का कभी मेरी हथेली धरा था आपने …एक कुंकुंम बिन्दी माथे पर……..!”

दोनों ही आँखों में
जलधारायें बह रही थी,
एक के शीश पर हाथ धरे थे
आशीष वचन फिर रुँधे रह गये ….!!

~~सरोज देवल बीठू

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