विलल़ा मिनख रूंख नैं बाढै!

पर्यावरण संरक्षण अर रूंख रक्षा री अरज में एक डिंगल़ गीत

।।गीत – वेलियो।।
परघल़ रूंख ऊगाय परमेसर,
अवन बणाई ईस अनूप।
विलल़ा मिनख रूंख नैं बाढै,
वसुधा देख करै विडरूप।।1

पँचरँग चीर धरा नैं परकत,
हरियल़ हरि ओढायो हाथ।
मेला जिकै मानवी मन रा,
गैला करै विटप सूं घात।।2

कुलल़ा काम रूंख नित काटै,
संकट तणा करै सरजाम।
मेटै छांह मांडी वड मालक,
थूथा करां कंवाड़ो थाम।।3

पापी अंकै नाय पसीजै,
कंपै नाय काल़जै कोर।
पाधर करै पताल़ां पूगी,
जड़ां उखाड़ै अपणै जोर।।4

छिती रूप हरियाल़ी छाजै,
सजै आं सूं धरती सिंणगार।
इल़ फल़- फूल पानड़ा आपै
ऊपर सदा करै उपकार।।5

चंगी छांह चिड़कल्यां चहकै,
करै शिखंडी जेथ कल़ाव।
पंछी अवर आसरो पामै
बठै आल़खो आप बणाव।।6

विषधर लिपट गुरड़ पण बैठे,
भलपण रखै करै नह भेद।
खमा भाव राखै बिन खांमी,
अवनी पूरे सबां उमेद।।7

भैंस्यां गाय विटप तल़ भाल़ो
अहर निसा जिथ करै उगाल़।
ऊंठ सांढियां आंरै ओटै
कूट काढदै कितरा काल़।।8

मिनखां तणी कह जग माया
छती रूंखां री कहियै छांम।
ओ की मिनख हिड़कियो उठियो
उथपण रूंखां करै अकांम।।9

ओ तो चलै कैताणो आदू
रूंख रूंख में बैठो रांम।
सठ ओ मिनख सार नीं समझै
विणसै विरछ इल़ा अविरांम।।10

जाल़ां मांय जोगणी जूनी
बैठी वीसहथी कर वास।
जाडी छांह जैणरी जोवो
रमणी मांड अखाड़ै रास।।11

जोगी नाथ जलंधर जाल़ां,
जाल़ां फेर बैठो जसनाथ।
जांभो भल हरबू पण जाल़ां,
माल़ा रटी जिकां धर माथ।।12

पीपल़ लोक कहै परमेसर
निर्मल़ सींच बैसागां नीर।
घेर घुमेर गवाड़ां गैरो
भाल़ो ताप ढाबवा भीर।।13

दीसै दूर जातरी दरसण,
अड़ियो थको जको असमान।
सहविध रूप गांम री सौभा,
महियल़ रयो सदाई मान।।14

नींबां मांय नरायण न्हाल़ो,
ओ वर आपै वेर अवेर।
वसुधा रूप धनंतर वाल़ो,
हरणो रोग सोग नै हेर।।15

गांमै गाम खेजड़ी गोगो
जाहर पीर जैण में जोय।
काल़ां दुरदिन सदा कटाणी
हिव आ मदत खोखाल़ी होय।।16

कैर बांवल़ रु फबै कूमटा,
फोग कंकेड़ा फल़िया फेर।
थल़ियां रूप रोहिड़ो ठावो,
लूंब्यो करै मरू में लेर।।17

पंछियां अडग आसरो पेखो
पसुवां सदा सहारो पोख।
जीवण मिनखां देय पवन जग,
रसा मरूथल़ बढतो रोक।।18

मिटियां तरू मानखो मिटसी,
ऊकल़सी धरती अणमाप।
लोगां लाभ पछै की लेसो,
पिटसो प्रल़य कमायै पाप।।19

पकड़ै सीस पछै पछतासो,
कारी लगसी फेर न कोय।
चितधर हाण-लाभ नै चेतो,
जाडी छांह रुखाल़ो जोय।।20

सरवर पाल़ तणी फब सौभा,
तरवर रौभा दैणो टाल़।
गिरधर कहै सांभल़ो गुणियां
प्रीत विटप सूं राखो पाल़।।21

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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