विरछ – वंदना

।।दूहा।।
आद कहावत एक आ, लगै न झूठी लेस।
रूंख रसा रो रूप है, विटप रसा रो वेस।।

आज इल़ा रै ऊपरै, अणहद रूंख उगाय।
पूजन कर नित प्रीत सूं, लोचण नेह लगाय।।

।।छंद – नाराच।।
लगाय नेह लोयणां, उगाय रूंख ऐम तूं।
हमेस पोख हेर-हेर, पाल़ नित्त प्रेम तूं।
सनेह नीर सीचतां, मनां हरीत मोहणा।
बणै विरच्छ बोहरंग, सो सुरंग सोहणा।।१

बिनांज लाभ पेख बात, गात ताप में गल़ै।
जड़ां सहीत जोयलै, पराय पोखणां फल़ै।
सवारथी नहीं सपन्न, धिन्न नेह धारियां।
किसोज काज हो कदीम, साच रूंख सारियां।।२

सदाज भांण ताप धिन्य, ढाल रूप ढाकणा।
भिड़ै सदैव झांख सूं ज, डग्ग नहीं डाकणा।
सदा संकट सैहणा, धिन्नोज रूंख धीर ऐ।
अमीर और आप नै, फबै सदा फकीर ऐ।।३

पुणांज पंखियां परम्म, थाट आसरो थपै।
खरीज खोट रे बिनांज, ओट आपरी अपै।
बहै पथ्थिक वाटड़ीज, वाट आसरो बणै।
पहै विसांम प्रेम सूंज, भाव रंग रा भणै।।४

सदाज एक झुंड साथ, थाग मेह थाट दे।
इमां ज रोक आंधियां, मरू प्रसार माट दे।
गुणांज खांण रूंख गात, भोम माथ भावणा।
भलांज ढोर भूख ढाब, प्रीत मूक पावणा।।५

दिलांज नाय द्वेस देख, छत्र छांह छाजणा।
करूं बखांण केम क्रीत, रूंख संत राजणा।
किरोड़ पत्त हो कंगाल, प्रीत एक पाल़णो।
भलाज मूढ ऐम भाल़, घाव क्यूंज घालणो।।६

मतीज बाढ मूढ तूं, रतीज रूंखराज नै।
महीज रूप है मुकट्ट, तूं रूखाल़ ताज नै।
पहूम री प्रभाज नै, बणीज तूं बिगाड़ ना।
अमोल रूंख ऐ अखूं, इल़ाज सूं उजाड़ ना।।7

।।छप्पय।।
संत रूंख इल़ साच, काज परहित रा करणा।
सरब वुस्त नित साज, हांण अरूं विपती हरणा।
सरणा दे नित सबल़, ओट अबल़ां नै आपै।
औरां सारू आप, तन तावड़ियै तापै।
वसू रो रूप आंसूं बणै, रंग लगै रल़ियावणी।
आं बिनां गीध साची अखै, इल़ा लगै उदियावणी।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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