Tag Cloud (पोस्ट पढने के लिए कृपया सम्बंधित टैग पर क्लिक करें)

अतुकांत आलेख उलाहना ऐतिहासिक घटना करुण कविता कवित्त कहानी काव्य/खंडकाव्य/ग्रन्थ खरी-खरी गज़ल / नज्म गणपति गीत गीत चित इलोल़ गीत जांगड़ो गीत त्रिकूटबंध गीत प्रहास गीत वेलिया गीत साणोर गीत सुपंखरो गीत सोहणो घनाक्षरी चारण चारणा री बातां चारणों के गाँव चिरजा छंद छंद गयामालती छंद चर्चरी छंद त्रिभंगी छंद त्रोटक छंद नाराच छंद भुजंगी छंद मोतीदाम छंद रेणकी छंद रोमकंद/रूप मुकुंद/दुर्मिल छंद सारसी छंद हरिगीत छप्पय जमर/सती/तेलिया/तागा त्यौहार देश दशा देशभक्ति दोहा/सोरठा नीति नेतागिरी परिचय पुस्तक समीक्षा प्रकृति बेटी भक्ति भगवान शिव भेरूजी मनोरंजक मरसिया माँ अम्बा माँ आवड़ माँ इन्द्र बाई माँ करणी माँ काली माँ खोडियार माँ चंदू माँ चामुंडा माँ चाळकनेच माँ डूंगरराय माँ तेमड़ाराय माँ देवल माँ बीरवड़ी माँ मोगल माँ सरस्वती माँ सायर माँ सोनल माँ हिंगलाज माताजी राजस्थान लोकनायक वात्सल्य विडियो विभिन्न विरह विष्णु अवतार वीर रस श्रंगार संबोधन काव्य समसामयिक सवैया सीख स्लाइड शो हनुमान ગિરા ગુર્જરી

नई प्रविष्टियाँ

चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – १०७ | पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल (द्वितीय उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – आलोचना खण्ड : पद्य साहित्य (रीति काव्य)

‘अनेकारथी कोष’ डिंगल का अद्वितीय ग्रन्थ है। इसमें ठेट डिंगल शब्दों के साथ संस्कृत के शब्द भी हैं। कहीं-कहीं उदयराम ने अपनी ओर से भी शब्द गढ़कर रख दिए हैं। यथा, ‘मधु’ के अनेक अर्थ सूचित करने वाले शब्दों में ‘विष्णु’ नाम न लेकर ‘माकंत’ शब्द गढ़ा गया है।[…]

रहसी रै सुरताणिया!

वीरता अर वीर आज ई अमर है तो फखत कवियां या कविता रै पाण। क्यूंकै कवि री जबान माथै अमृत बसै अर उण जबान माथै जिको ई चढ्यो सो अमर हुयो। भलांई उण नर-नाहरां रो उजल़ियो इतियास आज जोयां ई नीं लाधै पण लोकमुख माथै उण सूरां रो सुजस प्रभात री किरणां साथै बांचीजै।

ऐड़ो ई एक वीर हुयो सुरताणजी गौड़। हालांकि कदै ई गौड़ एक विस्तृत भूभाग माथै राज करता पण समय री मार सूं तीण-बितूण हुय थाकैलै में आयग्या।

इणी गौड़ां मांय सूं ई ऐ सुरताणजी गौड़ हा।[…]

मीठी मसकरी

—(52)—

एक जमानो हो जणै लोगां नै आजीविका चलावण सारू केई पांपल़ा कर’र कूड़ी धजा फरूकावणी पड़ती। उण बखत उवै चौखी-भूंडी री चिंता नीं करता क्यूंकै मरतां नै आक चाबणो ई पड़तो। पण ऐड़ै में ई उवै केदार रो कांकण धार्योड़ा राखता। ऐड़ो ई एक किस्सो है किणी राठौड़ सरदार अर एक बाजीसा रो।[…]

माताजी का छंद भुजंगी – कवि दुला भाया “काग”

।।छंद – भुजंगी।।
नमो ब्रह्मशक्ति महाविश्र्वमाया,
नमो धारनी कोटि ब्रह्मांड काया।
नमो वेद वेदांत मे शेष बरनी,
नमो राज का रंक पे छत्र धरनी।।1

नमो पौनरूपी महा प्राणदाता,
नमो जगतभक्षी प्रले जीव घाता।
नमो दामनी तार तोरा रूपाळा,
नमो गाजती कालिका मेघमाळा।।2[…]

करनी जी – सुरेश सोनी (सींथल)

सन् 1386 की बात है।

जोधपुर जिले के सुवाप गांव में मेहाजी किनिया के घर उत्सव का माहौल था, क्योंकि उनकी पत्नी देवल देवी आढ़ा के छठी सन्तान होने वाली थी तथा पहले से पांच पुत्रियों के होने के कारण इस बार सभी को पूरा विश्वास था कि पुत्र ही होगा और इस सम्बन्ध में उत्सव की समस्त तैयारियों के साथ दो दाइयों मोदी मोलाणी व आक्खां इन्द्राणी को भी बुलवा लिया गया था।

परन्तु न केवल वह दिन बीत गया, बल्कि सप्ताह व माह भी बीत गया।

इस प्रकार नौ माह बीत जाने के बाद भी प्रसव नहीं हो रहा था, जिससे सभी बेहद चिन्तातुर हो उठे थे। धीरे-धीरे एक-दो नहीं वरन दस माह और बीत गए, मगर फिर भी प्रसव नहीं हुआ।[…]

गीत सैणलाराय रो – पन्नारांमजी मोतीसर जुडिया कृत

।।गीत – संपखरो।।
भुजां साहियां त्रसूल़ झूल़,सगत्यां स तेज भाण,
केवियां कैवांण पांण हटावै कंकाल़।
आराधियां आवै ताल़,तीसरी ईसरी आप,
कीजै माहेश्वरी रिच्छा आरोहा लंकाल़।।[…]

साहित्य श्रृंखला

सुबोध बावनी – कवि देवीदान देथा (बाबीया – कच्छ)

[…]वेद सार खंड ससि, वाम अंक गति मिति,
नौमि गुरू शुक्ल मधु मास के समास ही।
देथा मारू चारन जो भव्य है कहाति जाति,
देस कच्छ स्वच्छ ग्राम बाबिया निवास ही।
देवीदान दीनो “देवी दास” ही प्रकास कीन्हौ,
नवीनो नगीनो ग्रंथ बावनी विलास ही।
सुबुधि उपावनी सो, ताप को नसावनी है,
भावनी सुजान को, बढावनी हुलास की।।५४।।[…]

हालाँ झालाँ रा कुँडळिया – ईसरदास जी बारहट

“हालाँ झालाँ रा कुँडळिया” ईसरदास जी की सर्वोत्कृष्ट कृति है। यह डिंगल भाषा के सर्वश्रेष्ट ग्रंथों में से है। इसकी रचना के सम्बन्ध में निन्नलिखित किंवदंती प्रसिद्ध है।
एक बार हलवद नरेश झाला रायसिंह ध्रोळ राज्य के ठाकुर हाला जसाजी से मिलने के लिए ध्रोळ गये। ये उनके भानजे होते थे। एक दिन दोनों बैठकर चौपड़ खेलने लगे। इतने में कहीं से नगाड़े की आवाज इनके कानों में पड़ी। सुनकर असाजी क्रोध से झल्ला उठे और बोले – “यह ऐसा कौन जोरावर है जो मेरे गांव की सोमा में नगाड़ा बजा रहा है” फौरन नौकर को भेजकर पता लगवाया गया।[…]

पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – स्वामी स्वरुपदास

मंगलाचरण

छंद – अनुष्टुप्
गुणालंकारिणो वीरौ, धनुष्तोत्र विधारिणौ।
भू भार हारिणौ वन्दे, नर नारायणो उभौ।।१।।
दोहा
ध्यान-कीरतन-वंदना, त्रिविध मंगलाचर्न।
प्रथम अनुष्टुप बीच सो, भये त्रिधा शुभ कर्न।।२।।
नमो अनंत ब्रह्मांड के, सुर भूपति के भूप।
पांडव यशेंदु चंद्रिका, बरनत दास स्वरूप।।३।।[…]

सालगिरह शतक – महाकवि हिंगऴाजदान जी कविया

।।गीत – झमाऴ।।

[१]
करत निरंतर निकट कट, झंकारव अलि झुंड।
विधु ललाट बारण बदन, सिंदूरारूण सुंड।।
सिंदूरारूण सुंड, धजर बिख-धारणै।
हद उजवल रद हेक, बदन रै बारणै।।
कर-मोदक करनल्ल, जनम जस गाणनूं।
जग जाहर घण जाण, नमो गणराज नूं।।

भावार्थ: जिनकी कनपटी के पास लगातार भौंरों के झुंड झंकार की ध्वनि करते रहते हैं, जिनके ललाट पर चंद्रमा है, हाथी के मुंह वाले जिनकी सूंड सिंदुरी रंग की है। सूंड सांप के फ़न की भांति शोभायमान है, जिनका एक ही दांत, जो मुँह के द्‌वार पर है, बहुत उजवल हैं। जिनके हाथ में लड्‌डू है। उन जगत-विख्‌यात व बहुविज्ञ गणनायक गणेश जी को मैं करनीजी के जन्मोत्सव का यशगान करने के लिये नमस्कार करता हूँ।[…]

☆नागदमण☆ – सांयाजी झूला

सांयाजी झूला महान दानी, परोपकारी भक्त कवि थे। वे कुवाव गांव गुजरात के निवासी थे। इनका लिखा हुआ “नागदमण” भक्ति रस का प्रमुख ग्रन्थ है|

भक्त कवि श्री सांयाजी झूला कृत “नागदमण”
।।दोहा-मंगलाचरण।।
विधिजा शारदा विनवुं, सादर करो पसाय।
पवाडो पनंगा सिरे, जदुपति किनो जाय।।…१
प्रभु घणाचा पाडिया, दैत्य वडा चा दंत।
के पालणे पोढिया, के पयपान करंत।।…२
किणे न दिठो कानवो, सुण्यो न लीला संघ।
आप बंधाणो उखळे, बीजा छोडण बंध।।…३
अवनी भार उतारवा, जायो एण जगत।
नाथ विहाणे नितनवे, नवे विहाणे नित।।…४
।।छंद – भुजंगप्रयात।।
विहाणे नवे नाथ जागो वहेला।
हुवा दोहिवा धेन गोवाळ हेला।।
जगाडे जशोदा जदुनाथ जागो।
मही माट घुमे नवे निध्धि मांगो।।…१[…]

करुण बहतरी (द्रोपदी विनय) – श्री रामनाथ जी कविया

महाभारतकार ने द्रोपदी की कृष्ण से करुण विनय को ५-७ पक्तियों में सिमटा दिया है| इसी विनय के करुण प्रसंग को लेकर श्री रामनाथजी ने अनेक दोहों व् सोरठों की रचना की है| सती नारी के आक्रोश की बहुत ही अच्छी व्यंजना इन सोरठों में हुई है|

।।दोहा।।
रामत चोपड़ राज री, है धिक् बार हजार !
धण सूंपी लून्ठा धकै, धरमराज धिक्कार !!
द्रोपदी सबसे पहले युधिष्टर को संबोधित करती हुई कहती है| राज री चौपड़ की रमत को हजार बार धिक्कार है| हे धरमराज आप को धिक्कार है जो आप ने अपनी पत्नी को (लूंठा) यानि जबर्दस्त शत्रु के समक्ष सोंप दिया|[…]

राजिया रा दूहा – कृपाराम जी बारहट

नीति सम्बन्धी राजस्थानी सौरठों में “राजिया रा सौरठा” सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है| भाषा और भाव दोनों द्रष्टि से इनके समक्ष अन्य कोई दोहा संग्रह नही ठहरता| संबोधन काव्य के रूप में शायद यह पहली रचना है| इन सारगर्भित सौरठों के भावों, कारीगरी और कीर्ति से प्रभावित हो जोधपुर के तत्कालीन विद्वान् महाराजा मान सिंह जी ने उस सेवक राजिया को देखने हेतु आदर सहित अपने दरबार में बुलाया और उसके भाग्य की तारीफ करते हुए ख़ुद सौरठा बना भरे दरबार में सुनाया —-

सोनै री सांजांह जड़िया नग-कण सूं जिके |
कीनो कवराजांह, राजां मालम राजिया ||
अर्थात हे राजिया ! सोने के आभूषणों में रत्नों के जड़ाव की तरह ये सौरठे रच कर कविराजा ने तुझे राजाओं तक में प्रख्यात कर दिया |[…]

हरिरस (भक्त कवि महात्मा ईसरदास प्रणीत)

।।मंगलाचरण।।
पहलो नाम प्रमेश रो जिण जग मंड्यो जोय !
नर मूरख समझे नहीं, हरी करे सो होय।।१

!! छंद गाथा !!
ऐळेंही हरि नाम, जाण अजाण जपे जे जिव्हा !
शास्त्र वेद पुराण, सर्व महीं त‍त् अक्षर सारम्।।२

!! छंद अनुष्टुप !!
केशव: क्लेशनाशाय्, दु:ख नाशाय माधव !
नृहरि: पापनाशाय, मोक्षदाता जनार्दनः।।३[…]

यू ट्यूब चेनल